दो कांपती अवाज़ें (भाग - 4)

शा म के सात बज चुके थे मगर दिवाकर अभी तक अपने कमरे में गुमसुम सा पड़ा हुआ था. हरी ने सोच लिया था कि अब ऐसे बात नहीं बनेगी. उसे अच्छे से पत...

शाम के सात बज चुके थे मगर दिवाकर अभी तक अपने कमरे में गुमसुम सा पड़ा हुआ था. हरी ने सोच लिया था कि अब ऐसे बात नहीं बनेगी. उसे अच्छे से पता था दिवाकर उदास होते ही उस घाव की तरह हो जाता है जिसे जब तक ज़ोर से दबाओ ना तब तक वो अपना मवाद बहार नहीं निकलेगा. और उसे ये भी पता था कि दिवाकर के अन्दर जमा हुआ वो मवाद बहार कैसे आएगा.

“मैं मार्किट जा रहा हूँ, तू चलेगा ? या तेरे लिए कुछ लेता आऊँ ?”

“उहूँ.” हरी के सवाल का बस इतना सा जवाब ही उसे मिल पाया. हरी भी समझ गया कि अभी वो यहाँ से हिलने वाला नहीं.

तक़रीबन एक घंटे बाद हरी वापिस आया तब तक दिवाकर उसी मुद्रा में बैठा कमरे की दीवारों पर टंगी उन तस्वीरों को निहार रहा था जो सुनैना ने उसे अपने हाथों से बना कर दी थीं. बिना कुछ बोले हरी अपने हाथ में पकड़ा हुआ बैग लिए किचन में घुस गया. दिवाकर जनता था वो स्पेशल बैग था और एक ही काम के लिए उप्तोग किया जाता था. हरी ने मार्किट से आने के बाद हरी से कोई बात नहीं की वो बस अपने उस काम में लग गया जिसकी तयारी वो मार्किट से ही कर के आया था. दिवाकर ने सोचा कि वो उसके पास आएगा मगर ऐसा हुआ नहीं, हरी अपना सारा ताम झाम ले कर अपने कमरे में चला गया.

इंसान सच में बड़ा विचित्र प्राणी होता है, उदासी में किसी से बात भी नहीं करता और मन ही मन ये इच्छा भी पाले रखता है कि कोई उसके पास बैठे उसे बात करने के लिए उकसाए. दिवाकर के मन में भी यही चल रहा था. उसका सबसे अच्छा दोस्त उसे उसके हाल पर छोड़ कर अपने मज़े लेने में व्यस्त कैसे हो सकता है. वाशरूम जाने के बहाने से दिवाकर उठा और चुपके से हरी के कमरे में झाँकने लगा. हरी ने साज सजावट के साथ चखने और व्हिस्की की बोतल को सजा रखा था. दिवाकर को ये देख बहुत बुरा लगा.

“आज का दिन ही मिला तुझे पार्टी मानाने के लिए ?”

“हाँ आज का दिन सबसे सही लगा, तू फिर ना जाने कब उदास हो, तब तक कौन इंतज़ार करे.” हरी ने मन ही मन मुस्कुराते हुए कहा.

“दोस्ती के नाम पर धब्बा है तू.” दिवाकर चिढ गया

“अरे यार गुस्सा कहे होता है, आजा तू भी मैं किसी से नहीं कहूँगा कि तूने दारू पी कर उदास होने का नियम तोडा है. अच्छा ऐसा करना मेरी तरफ पीठ घुमा के पीना जिससे तुझे लगे कि टू अकेला पी रहा है.” हरी ने बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी को रोक रखा था.

“रहने दे तुझे अगर इतना ही ख्याल होता मेरा तो ऐसे अकेले ना बैठ जाता पीने.” दिवाकर गुस्से गुस्से में सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया था.

“जनता था तू चला आएगा इसी लिए पहले ही दो गिलास रखे हैं.” ना चाहते हुए भी दिवाकर के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कराहट आ गयी.

दो पेग तक दोनों ने एक दूसरे से कोई बात नहीं की. ऐसा लग रहा था जैसे दो लोग होते हुए भी दोनों अकेले अकेले ही पी रहे हों. तीसरे पेग ने अपना असर दिखा दिया. दोनों माथा हल्का हल्का नाचने लगा.

“मैय्यत में आया है क्या किसी की ? कोई गाना वाना लगा.” दिवाकर ने किसी बादशाह की तरह हुकुम बजाय.

“जैसा आपका हुकुम मेरे आका.” हरी ने भी बादशाह के हुकुम को सर माथे से लगते हुए एक पार्टी सांग लगा दिया.

अभी हरी झुमने ही वाला था कि दिवाकर का नशा बोल पड़ा “साले मज़े ले रहा है, आज शादी है मेरी जो ख़ुशी के गीत बजा रहा है. कोई ग़ज़ल लगा, या दर्द भरा कोई नगमा छेड़.”

“नई भाई नगमा नहीं छेड़ सकता.”

“क्यों बे.”

“भाई नगमा का भाई असलम जिम जाता है साला बहुत मरेगा.” हरी की बात पर दिवाकर का चार दिन से ना हंसने का व्रत टूटा और वो लोट पोट हो कर हंसने लगा. इतना हंसा कि उसकी आँखों से पानी बहने लगा.

धीरे धीरे तेज़ हंसी कब सिसकियों में बदल गयी पता ही नहीं लगा. हरी जो चाहता था वो हो रहा था, दिवाकर का दर्द अब बहार आना शुरू हो गया था.

“रो मत मेरे भाई, तू तो सबको हिम्मत देता है फिर तू ऐसे कैसे कमज़ोर हो सकता है, रो मत देख तू रोयेगा तो मैं भी रोएगा.”

“साल सुनैना मेरे को छोड़ के गयी इसी लिए मैं रोएगा तुझे कौन छोड़ गया जो तू रोएगा. नगमा छोड़ गयी क्या ?” शराब का नशा दिवाकर को तय ही नहीं करने दे रहा था कि उसे हँसना चाहिए या रोना.

“मैं रोएगा क्योंकि मेरे भाई की ज़िन्दगी उससे छीन रहे सब और मैं साला कुछ नहीं कर पा रहा.” हरी बच्चों की तरह रोने लगा.

“अरे वो ज़िन्दगी को जिंदगी बनाया भी तो तू ही ना. याद है तेरे को, कैसे मुझे बार बार उकसा कर सुनैना के पास भेजा करता था. मैं हर बार उसके आस पास से घूम कर आजाता और तू हर बार मुझे गलियाता था. अच्छा था भाई उसके आस पास घूमना ज़्यादा अच्छा था, एक प्यारा सा अहसास होता था, उसे पता लग गया तो उसका रिएक्शन कैसा होगा इसका मीठा सा दर होता था, सब होता था, एक उम्मीद जब तक नहीं थी तब तक सब सही था. जहाँ हम एक हुए, हमने सपने देखे, उम्मीदें जगीं कि ज़िन्दगी के लटकन लग गए ससुर.” बोतल की आखरी हिस्से में आखरी पैग जितनी शराब खनक रही थी बाक़ी की शराब दोनों की आँखों और बातों से छलक रही थी.

“सब ठीक हो जायेगा भाई, भाभी तेरी हो के रहेगी. साला ज़मीन असमान एक कर दिया जायेगा.”

“अब कुछ नहीं होगा भाई, अब बस वो वादा पूरा करना है, जिसे पूरा करने की हिम्मत मुझमे नहीं. मैं बड़ी बड़ी बातें कर आया सुनैना के सामने मगर मैं अब कमज़ोर पद रहा हूँ. मेरी ताक़त बस सुनैना है वो साथ होती है तो हिम्मत रहती है. जनता है मैंने ये बात कभी उससे भी नहीं कही, वो जब मेरे सामने आती है ना तो मैं अपनी हर छोटी बड़ी परेशानी को भूल जाता हूँ, मेरे लिए बस तब उसके साथ बिताये पल ही सारा जीवन होता है, और वही मेरी पूरी दुनिया, उसके खिलखिला कर हँसते हुए देखने पर ऐसा महसूस होता है जैसे यही वो ख़ुशी है जिसे पाने के लिए इंसान पैदा होता है. मुझे समझ नहीं आती कि वो मेरी ज़िन्दगी में आई और मैं उसके इतना करीब हो पाया इसके लिए खुद को खुशकिस्मत कहूँ या ये जानते हुए कि उसी के साथ मेरी ज़िन्दगी ज़िन्दगी कहलाएगी फिर भी ना उसे अपना बना सका इसके लिए खुद को बदकिस्मत कहूँ.”

अब दिवाकर रो नहीं रहा था, बस बोले जा रहा था बिना ये देखे कि हरी कब का सो चूका है. चीजें तब तक आम रहती हैं जब तक उनकी अहमियत को हम जान नहीं लेते और अहमियत जानते ही वो इतनी कीमती हो जाती हैं कि किस्मत उसका दाम बढाती चली जाती है. जितनी अहमियत उतना बड़ा दाम, सुनैना दिवाकर की ज़िन्दगी थी इसीलिए बेशकीमती थी, इतनी बेशकीमती कि खुद दिवाकर भी किस्मत से उसका सौदा नहीं कर पा रहा था.

जो कहानी मैंने शुरू की है, वो कोई ऐसी कहानी नहीं है जिसका अंत आपके सामने कुछ दिनों के इंतज़ार के बाद सामने आजाए. ये ज़िन्दगी की तरह ही है, क्या होगा इसके लिए बस इंतज़ार ही करना पड़ेगा, कुछ अलग नहीं है इसमें बस उन लाखों आम प्रेमियों के जैसी ही एक प्रेमकहानी है जिसके अंत का खुद उन्हें भी नहीं पता, जिनके हाल से सब अंजान हैं, जो लोगों के लिए या तो किस्से बन जाते हैं या फिर उनका मज़ाक का विषय. ये लिखी भी क्यों जा रही है इसका भी मुझे पता नहीं, बस मन कर गया कि कुछ ऐसा लिखूं जो लम्बा चले, कुछ इस तरह जैसे ऊपर बैठा कोई हर रोज़ हमारी किस्मत लिखता होगा, बिना ये जाने कि अगले दिन क्या होना है, जिस रस्ते पर इन्हें मैंने छोड़ दिया है वो इन्हें कहाँ पहुंचाएगा इसका कुछ भी अंदाज़ा नहीं. रोज़ की ज़िन्दगी की तरह ही कोई भी किस्सा सामने आ सकता है. दोस्ती का, दुश्मनी का, प्यार का, कोई भी....

अपने सुकून के लिए लिख रहा हूँ...अगर आपके पास समय और पढ़ने का मन हो तो नज़र मार लिया करें. जैसे सबकी ज़िन्दगी हमेशा बोरिंग नहीं होती वैसे हो सकता है कभी ना कभी कुछ रोमांचक दिवाकर और सुनैना की ज़िन्दगी में भी आपको देखने को मिल जाए :)

क्रमशः

धीरज झा 

Keywords : Hindi Heart Touching Love Story, Story Series, Episode 4th, Sacrifice, Sadness, Dreams, Friendship

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