खुशियों के दरवाज़े के ठीक सामने

“कौन है रे ? इतनी गर्मी में भी सालों को चैन नहीं है.” शर्म को खूंटी पे टांग कर राधा, अस्त व्यस्त कपड़ों में अपनी चारपाई पर लेटी हुई गर्मी ...

“कौन है रे ? इतनी गर्मी में भी सालों को चैन नहीं है.” शर्म को खूंटी पे टांग कर राधा, अस्त व्यस्त कपड़ों में अपनी चारपाई पर लेटी हुई गर्मी से जूझ रही थी कि तभी उसकी खोली की कुण्डी खड़की. एक तो पहले से ये गर्मी उसके ऊपर ग्राहक ना आगया हो इस बात की झुंझलाहट से परेशान राधा ने मन ही मन अपने देवता(ग्राहक) को चार मीठी गलियां सुनाते हुए दरवाज़ा खोला. सामने वो खड़ा था जिसे देख कर राधा अपनी सारी झुंझलाहट अपना सारा गुस्सा और थकान भूल जाया करती थी. 

“क्या रे मुरलीधर, बड़ा बीजी हो गया है आज कल.” सामने खड़े उस आदमी ने राधा के अन्दर बुलाने का इंतज़ार भी नहीं किया और सीधा अपनी शर्ट उतार कर उसकी चारपाई पर औंधे मुंह जा लेटा.

“कितनी बार कहा है मुरलीधर नाम नहीं मेरा, तू क्यों बार बार भूल जाती है.” अपनी हालत से पूरी तरह थका लगने वाला वो इन्सान इस हाल में भी अपने गलत नाम के उच्चारण को ले कर शिकायत करना नहीं भूला.

“अब मेरे को अच्छा लगता है तो मैं इसी नाम से बुलाएगी ना, तेरे लिए ज्यादा जरूरी क्या ? मेरा खुश रहना के तेरा सही नाम पुकारना ?”

“अच्छा मेरी माँ, जो मन वो बुला बस मुझे सोने दे.”

“ऐ देख पहिली बात तो अपने को माँ नहीं बोलने का, तू साला भले चोरी चाकरी करता हो पन अपने को पता तेरी माँ मेरे जैसी तो कभी नहीं होएंगी. इसी वास्ते उसको इज्जत दे. मुझे माँ बुला कर उसकी बेज्जती ख़राब मत कर रे.”

“आज लगता है सारा दिन कोई मुर्गा नहीं आया हलाल होने को इसी वास्ते मेको इतना पका रही तू.”

“मैं पकाती तेरे को, चल ठीक निकल इधर से.” राधा ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए उस थके हुए इंसान जिसे वह मुरलीधर कहती थी का हाथ पकड़ पर उसे चारपाई से उठाने की कोशिश करते हुए कहा.

“ऐ राधा बड़ा थक गया मैं रे, प्लीज अपने को सोने दे.”

“अच्छा ऐसा कौनसा पहाड़ तोड़ा जो इतना थक गया तू, हाँ ?”

“अरे पूछ मत, वो सांघवी सेठ है ना, उसके पास से माल उठा के डिलीवरी करनी थी अपने को. किसी हरामी ने मामू लोग को बता दिया और फिर अपन आगे आगे पुलिस अपन के पीछे पीछे. साला तीन दिन से भाग रहा अपन. आज जा के बिस्तर नसीब हुआ. अब थोड़ा सो लेने दे.” मुरलीधर फिर से मुंह तक चद्दर तान कर सो गया.

“काहे को करता है ऐसा काम जिसमें एक पल का चैन ना हो सारा टाईम डर बना रहे  ?” उस थके हुए इंसान की थकावट उतारने के लिए राधा ने उसके सर पर अपना वो जादुई हाथ फेरा जिसे कुछ दिनों पहले एक शराबी ग्राहक ने पैसा मांगने पर चाकू के वर से ज़ख़्मी कर दिया था.

घाव पर बंधी पट्टी का घर्षण मुरलीधर अपने माथे पर महसूस कर रहा था. चेहरे से चद्दर हटाते हुए उनसे राधा का वो हाथ थम कर कहा “ठीक नहीं हुआ अभी तक ? चाकू लगा था, कितनी बार बोला तेरे को टिटनस का इंजेक्शन ले ले लेकिन तू है कि मानती कहाँ अपन की कोई बात.” इसी के साथ उसने राधा का वो हाथ चूम लिया.

“घाव ठीक हो जायेगा तो तू अपन के हाथ को प्यार से कैसे चूमेगा. अपनी सुनसान सी ज़िन्दगी में एक यही पल तो है जब लगता है कि नहीं अपन भी लड़की है और अपन से भी कोई प्यार कर सकता है.” राधा की ऑंखें भर आई थीं. मुरलीधर ने बिना कुछ कहे उसे साइन से लगा लिया.

ये कमरा जहाँ सब राधा का बदन नोचने आते थे. किसी को परवाह नहीं थी कि कमरे कि हालत कैसी है, राधा कैसी है, कमरे का बल्ब जल रहा या कमरे में अँधेरा पसरा है. वो कमरा उस मुरलीधर के आते ही महक उठता था. जो लड़की जवान होने से दो तीन साल पहले राधा के भीतर ही कहीं मर चुकी थी वो इसके आते ही फिर से जी उठती थी. राधा के लिए ये सारी दुनिया ही एक बाज़ार था जहाँ हर तरफ़ खरीद बेच का धंधा चल रहा था. यहाँ दो ही तरह के लोग नज़र आते, एक वो जिन्हें खरीदना था या वो जिन्हें बेचना था. इस बाज़ार में राधा किसी को इंसान मानती थी तो वो था मुरलीधर. क्योंकि एक वही था जो उसके पास सिर्फ उसके लिए आता था उसे फरक नहीं पड़ता था कि राधा नहाई है कि नहीं, राधा ने बाल बनाए कि नहीं, उसे राधा जैसी थी वैसी ही पसंद थी.

राधा के लिए इस बाज़ार का मौसम सिर्फ तब ही बदलता था जब मुरलीधर आता. लेकिन अफ़सोस यही था कि मुरलीधर चाह कर भी बहुत कम आ पता था. चार छः महीने में पुलिस उसको एक बार उसे धर ही लेती और दो चार महीने वो फिर अन्दर ही बंद रहता. जब वो भागते भागते थक जाता तब वो राधा के पास चला आता क्योंकि उसे पता होता कि पुलिस उसे धर लेगी उससे पहले वो राधा से मिल आए.

अगर मुरलीधर राधा की ज़िन्दगी में ना आया होता तो शायद वो कभी जान ही ना पाती कि इस संसार में कोई प्यार और फ़िक्र नाम की चीज़ भी होती है. पहली बार हांफता हुआ आया था कमरे में. कोई शराबी जान कर राधा ने खूब गलियां दी थीं उसे. मगर फिर उसने पैसे उसके आगे रख दिए, राधा को भी तो बस पैसे ही चाहिए थे सामने कौन है उससे उसको क्या मतलब था. पैसे लेने के बाद राधा चोली की हुक खोलते हुए अपने बिस्तर पर लेट गयी. ये उसके लिए आम था, सबको यही से तो शुरुआत करनी होती ठी उसे नोचने की. लेकिन ये अलग था, उसका सबसे पहला ध्यान राधा के होंठों के नीले पड़ चुके दाग पर गया. उसने चोट का कारण पूछे बिना पास पड़ी क्रीम की डिबिया से क्रीम निकल कर चोट पर लगनी शुरू कर दी. राधा स्तब्ध थी ठीक वैसे ही जैसे धरती पर आया पहला  इंसान पहली बार असमान से बरसती हुई बारिश देख कर हुआ होगा. ये सुखद था मगर हैरान करने वाला भी क्योंकि ऐसा अहसास आज से पहले कभी नहीं हुआ था राधा को. क्रीम कोई दावा नहीं थी मगर उसकी चोट पर मुरलीधर का उँगलियाँ फिराना जादूई था. दावा लगाने के बाद वो बिना उसके तन को निहारे एक छोटे बच्चे की तरह मुस्कुराता हुआ सो गया.

राधा उस पूरी रात बस उसी को निहारती रही. वो मुरलीधर को देख कर इस तरह आनंदित हो रही थी जैसे कचरा बीनने वाले को कचरे में से कोई सोने की अंगूठी मिल गयी हो. उसने जान लिया था कि आज तक वो बस इसी अनोखे इंसान से मिलने के लिए ज़िन्दा थी, उसकी उजाड़ खेत में अभी प्रेम की फसल का खिलना बाक़ी था इसी लिए वो इस नरक में भी साँस ले पा रही थी.

मुरलीधर के सोचे मुताबिक़ ही हुआ, सुबह सुबह ही पुलिस राधा की खोली पर आ धमकी और मुरलीधर को अपने साथ ले गयी. मुरलीधर का इस तरह जाना कोई नयी बात नहीं थी मगर इस बार ना जाने क्यों राधा का मन बहुत घबरा रहा था. उसकी आँखों से वो दुर्लभ आंसू अपने आप बह गए जो सालों पहले विलुप्त हो चुके थे. राधा ने अपनी गीली आँखों को छू कर उन आंसुओं को महसूस करने की कोशिश की जिनके छुअन का अहसास ही वो भूल चुकी थी. वो अपनी आंसुओं में भीगी उँगलियाँ देख कर अचानक से यह सोच कर मुस्कुरा दी कि आखिर इस बंजर दिल पर भी मोहब्बत ने अपनी बरसात कर ही दी. लेकिन वो इस बात से अनजान थी कि यह बारिश आने वाले समुंद्री तूफान की आहट है, ऐसा तूफान जो पेड़ों से चिड़ियों के घोंसले तक बहा ले जायेगा.

राधा ने मुरलीधर के जाने के बाद से ही उसका इंतज़ार करना शुरू कर दिया. इंतज़ार तो हर बार लम्बा ही होता था मगर इस बार ऐसा इंतज़ार था जो ख़तम होने का नाम ही नहीं ले रहा था. मुरलीधर को स्मगलिंग के केस में लम्बी सज़ा हुई थी. ये खबर सुनते ही राधा के जीवन में खुशियों के आने की बची खुची आस भी दम तोड़ने लगी. समय अपनी गति में था बीतता रहा, रास्ते में आने वाली हर दुखद याद, हर ज़ख़्म, हर उदासी की फ़िक्र किए बिना वो बस बढ़ता रहा. और आखिर सालों बाद वो दिन आगया जब मुरलीधर जेल से आज़ाद हो रहा था. 

“कितने साल बाद निकला है.” जेल के गेट पर खड़े संत्री ने कुटिल मुस्कान के साथ मुरलीधर से पूछा.

“पता नहीं साब, हाँ बस इतना याद है कि जब गया था तब अपन के बाल काले थे और जब निकला तो अध से ज़्यादा सफ़ेद.” संत्री और मुरलीधर दोनों हँस पड़े.

“अच्छा अब मत आना यहाँ, कोई अच्छा काम धंधा कर और अपनी बीवी के साथ मज़े से ज़िन्दगी काट.”

“हाहाहा, क्या साब अपन को ये सुख कहाँ से अधि ज़िन्दगी साली जेल में कट गयी और बाक़ी जो बची उसमे अपन से शादी कौन करेगा.” संत्री की बात को मजाक समझ कर मुरलीधर अपनी बात कह के आगे बढ़ने लगा.

“साला झूठ बोलता है, बीवी नहीं है तो क्या तेरी अम्मा ये सालों से रोज़ तेरे को पूछने आती है.” संत्री की बात सुन कर मुरलीधर के कदम थम से गए

“अपन का इंतज़ार ? लेकिन अपन का तो कोई है नहीं दुनिया में, एक जान पहचान वाली थी लेकिन वो यहाँ से दूर रहती है.” मुरलीधर सोचने लगा कि ऐसा कौन हो सकता है.

“अब पता नहीं कौन है मगर रोज़ आती है, आज भी पक्का आएगी.” संत्री की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि सड़क के उस पार से एक औरत आती दिखी.

“देख मैंने कहा था ना वो आएगी.” मुरलीधर उस औरत को गौर से देखने लगा. उलझे बाल, चेहरे पर इंतज़ार की मार से पड़ चुकी हलकी झुर्रियां, ऑंखें जैसे सालों से अँधेरी रातों ने उन्हीं जगी हुई आँखों में आराम फ़रमाया हो, पूरा शरीर जैसे किसी युद्ध का मैदान हो जहाँ हर तरफ़ घावों का चीत्कार मचा हो. इतना वक़्त काफ़ी था मुरलीधर को ये जानने के लिए कि ये राधा ही है. मुरलीधर की ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, उसे उम्मीद नहीं थी राधा ने उसे अभी तक याद रखा होगा.

मुरलीधर भागता हुआ उसकी तरफ बढ़ा और इधर राधा के कदम भी तेज़ हो गए. उन दोनों के बीच कि जगह जहाँ वो मिलने वाले थे वो खुशियों का दरवाज़ा था जो उन दोनों को एक नयी दुनिया में ले जाता मगर जब तक वो वहां पहुँचते वो खुशियों का दरवाज़ा बंद होगया. एक भयानक आवाज़ के साथ मुरलीधर के कदम जहाँ थे वहीँ रुक गए. ये कैसे हो सकता है, इस दिन को का सुख भोगने के लिए ये दोनों शायद जन्म से ही तरस रहे थे और आज जब ये पल इतना करीब था तब ये क्या हुआ. जेल की गेट पर खड़े तीनों संत्री भागते हुए आये उन्होंने खून से लथपथ राधा को उठाया सांसें चल रही थीं, उसकी ऑंखें का ठहराव अभी भी मुरलीधर की ऑंखें में ही था. मुरलीधर ने उसी बेसुध हालत में भगवान से बहुत दुआएं मांगीं कि भले ही राधा मुझे कभी ना मिले, भले ही मैं अपना सारा जीवन जेल में ही क्यों ना बिता दूँ मगर ये जो अभी हुआ ये एक भयानक सपना हो. लेकिन नियति इतनी दयावान कहाँ होती है, उसे तो पलक झपकते ही बदल जाने में परम आनंद आता था.

कुछ देर में ही एम्बुलेंस जेल के गेट पर थी. एम्बुलेंस उन दो अभागों को ले कर हस्पताल की तरफ निकल पड़ी जो एक दूसरे का साथ पाने के लिए अपनी किस्मत से लड़ रहे थे. अपना होंसला समेट कर के मुरलीधर ने पूछा “यहाँ क्या कर रही थी, कौन बोला तेरे को यहाँ आने को ?”

“अपनी ज़िन्दगी की भीख मांगने को आती थी, तेरे जाने के बाद अपन को अहसास हुआ कि अपन तो मुर्दा ही पैदा (हिच्चकी) हुई थी, अपने में जान तो तूने फूंकी, जब पता लगा तेरी सज़ा बहुत लम्बी है तो अपन ने वहां उस नरक में मरने से बेहतर यहाँ तेरा (हिच्चकी) इंतज़ार करते हुए मरना समझा. और सच मान मैंने बीते सालों में तुझसे मिलने के लिए कम होते एक एक पल को गिनने में जितना सुकून पाया है ना उतना(हिच्चकी) मुझे अपनी पूरी ज़िन्दगी में कभी नहीं आया.” आज राधा इस हाल में भी हर वो बात मुरलीधर को कह देना चाहती थी जो वो इतने सालों से मन में संजोते आई है. उसकी हिचकियाँ उसे बोलने से रोक रही थीं मगर वो मानने को तैयार नहीं थी.

“चुप हो जा, तू ठीक हो जा हम फिर सब बात करेंगे. मैं तुझे छोड़ कर अब कहीं नहीं जाऊंगा. हम कहीं दूर....” मुरलीधर उसे चुप करने की कोशिश कर रहा था मगर राधा ने उसकी बात बीच में काट कर कुछ बोलना चाहा मगर.....

“अहमद....” इतना ही कह पाई राधा इसके बाद वो शांत हो गयी ऐसे जैसे टीन पर किए प्रहार के बाद अनगिनत आवाजें निकलती हैं और फिर धीरे धीरे शांत हो जाती हैं.

“नई नई, सुन सुन राधा नई, अहमद नई, मुरलीधर मुरलीधर तेरा मुरलीधर, राधा का मुरली........एक भयानक चीख़ के बाद दोनों शांत हो जाते हैं. राधा पूरी तरह शांत और मुरलीधर (या अहमद वो जो भी था) उस ताज़े गहरे ज़ख़्म की तरह जो असहनीय पीड़ा के बाद सुन्न हो जाता है.

दो साल बीत गए आज उसी जेल के गेट पर एक आदमी किसी की जान बचाते हुए मारा गया जहाँ नियति ने राधा को मुरलीधर से छीन लिया था. वहां खड़े लोग कह रहे थे कि वो आदमी सारे शहर में घूमता था, कचरा उठता था, जहाँ रोटी मिल जाए वहां काम कर लेता था मगर कुछ भी करता था लेकिन निगाहें हमेशा उसकी सड़क पर ही होती थीं. इन दो सालों में अपनी जान पर खेल कर उसने कई जानें बचाई थीं लेकिन आज किसी के लिए उसे अपनी जान गंवानी पड़ी. सबकी अपनी अपनी राय थी मगर उसकी लाश उठाने में लगा हुआ वो संत्री जानता था कि ये जो आदमी अभी मारा पड़ा है ये दो साल से बस दूसरों की नियति को बदलने में और आज के दिन का इंतज़ार करने में लगा हुआ था. वो नहीं चाहता था कि वो खुशियों का दरवाज़ा फिर किसी राधा और मुरलीधर के लिए पलक झपकते ही बंद हो जाए.

धीरज झा 


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