खराब ग्रह

"ये ग्रहों की खराब दशा ही है जिसने तुम्हें इतना परेशान कर रखा है । और कोई उपाए करो ना करो मगर कल से एक उपाए ज़रूर करना शुरू कर दो । ...

"ये ग्रहों की खराब दशा ही है जिसने तुम्हें इतना परेशान कर रखा है । और कोई उपाए करो ना करो मगर कल से एक उपाए ज़रूर करना शुरू कर दो । काले कुत्ते को देसी घी से चुपड़ी हुई रोटी डालो । बुरे ग्रह कट जाएंगे और तुम्हारा जीवन खुशहाल होने लगेगा ।" किसनपाल सीधा साधा मध्य दर्जे का बंदा था । भगवान में उसकी शुरू से ही आस्था बनी थी । उसकी सबसे बड़ी खासीयत ये थी कि वो अपने बुरे वक्त के लिए भगवान को कभी नहीं कोसता था । उसके हिसाब से किसी के साथ बुरा या अच्छा होना सब उसके अपने कर्मों का पर निर्भर करता है । अगर भगवान के पास इन सब की ज़िम्मेदारी होती तो वो अपने बच्चों को कभी दुःखी ना करते ।

ज्योतिष में उसका कुछ ज़्यादा विश्वास नहीं था हाँ मगर वह विरोध भी नहीं करता था । किसनपाल की श्रीमती जी ज्योतिष में ज्यादा यकीन करती थीं और आज उनकी ही वजह से वह महराज जी के पास आया था । आज कल परेशानियाँ थोड़ी ज़्यादा बढ़ गई थीं तो किसनपाल ने भी सोचा चलो एक बार महराज जी की भी सुन ली जाए ।

महराज जी को भी पता था किसनपाल के पास कुछ ज़्यादा है नहीं जिससे वह ग्रहों की शांति के लिए जाप या हवन यज्ञ कराए इसीलिए उन्होंने किसनपाल को सस्ता सुंदर टिकाऊ उपाय बताया । किसनपाल ने भी सोचा क्या दिक्कत है हफ्ता भर कुत्ते को देसी घी में चुपड़ी रोटी खिला कर देखने में । इसी बहाने घर में घी तो आएगा दो चार दिन खुद भी खा कर देखेंगे । कर्जे परेशानियों का ऐसा असर हुआ कि जीभ तो जैसे घी का स्वाद ही भूल गई । आप तो जानते ही हैं मध्यवर्गीय परिवार बचत के अभियान को सफल बनाने के लिए पहला वार अपने खान पान पर ही करता है ।

किसनपाल सुबह सुबह नहा कर पूजा पाठ से निपटा तब तक श्रीमती जी ने चार रोटियां बना कर उस पर घी लगा दिया । घी भी ऐसे लगाया जैसे रोटियों को घी का डिब्बा दिखा दिया हो । किसनपाल ने भी सोचा भाई कुत्तों ने ही खाना है और उनको कौन सा घी हज़म होता इसलिए उन्हें अपच से बचाने के लिए नाममात्र घी सही है ।

किसनपाल काले कुत्ते की तलाश में निकल पड़ा । मगर वो कहते हैं ना ढूंढने लगो तो परछाई भी छुप कर बैठ जाती है । किसनपाल ने पूरा मोहल्ला छान मारा उसे सफेद, ललहूं, सरसों रंग के, चितकबरे, कान कटे, खुजली वाले, घाव वाले सभी कुत्ते मिले मगर काला कुत्ता ना मिला । एक क्षण उसने सोचा कुत्ते तो कुत्ते हैं फिर सफेद क्या काले क्या, इन्हें ही खिला देता हूँ । मगर उसकी अंतरआत्मा ने उसे ऐसा करने नहीं दिया ।

फिर किसनपाल ने तय किया कि वो बस्ती की तरफ जाएगा वहां बहुत से कुत्ते होते हैं काला कुत्ता भी वहीं मिल जाएगा । हुआ भी वैसा ही वहाँ पहुंचते ही उसने देखा कि एक काला कुत्ता जिसके गले में पट्टे की कमी पूरी करने के लिए लाल फीता बांध दिया गया था और फीते का छोर एक झोला उठाए हुए बच्चे के हाथ में था । किसनपाल भागता हुआ बच्चे के पास पहुंचा और उसे रुकने का इशारा किया ।

बच्चा रुक गया और उसके साथ ही उसके पीछे पीछे चल रहा उसका आज्ञाकारी कुत्ता भी रुक गया । किसनपाल ने कुत्ते को ऐसे देखा जैसे सुखों की चाभी उस कुत्ते के गले में लटकी हो । किसनपाल को यकीन हो गया कि कुत्ते को रोटी खिलाने भर की देर है इसके बाद उसके बुरे दिन समाप्त हो जाएंगे । जैसे ही किसनपाल ने कुत्ते के सने रोटी रखी वैसे ही उसकी नज़र सामने खड़े बच्चे पर पड़ी । बच्चा शांत था मगर उसकी आँखों में बहुत शोर था । जैसे कह रहा हो कि मुझसे अच्छा तो यह कुत्ता ही है जिसकी फिक्र कोई तो करता है । इतने में कुत्ते ने दांतों में रोटी दबाई और लड़के के आगे रख कर उसकी तरफ देखने लगा । अब कुत्ते की आँखों में बच्चे की बात का जवाब था । जैसे वह कह रहा हो कि "तेरी फिक्र के लिए मैं हूँ ना ।"

किसनपाल ये सब देख कर शर्म से गड़ने लगा । इस पल उसे ऐसे लगा जैसे कोई पर्दा उठ गया हो आँखों के सामने से, जैसे किसी ने नींद से जगा दिया हो उसे । किसनपाल ने सोचा ग्रह अगर नाराज़ हो जाएं तो जैसे दिन हैं वैसे ही रहेंगे मगर यह बच्चा आज भूखा रह गया तो शायद मेरी खुद से नाराज़गी मेरा हाल और बुरा कर देगी । यह सोच कर उसने बाकी की रोटियाँ बच्चे को दे दीं और उसके सर पर हाथ फेरते हुए घर की तरफ मुड़ गया ।

अगले दिन

"थोड़ी सब्जी भी डाल देना ।"

"क्यों ? कुत्ता कब से सब्जी खाने लगा ?"

"कुत्ता तो घी भी नहीं खाता । फिर भी खिला रहे हैं ना । कल महराज जी के पास गया था तो वही बोले कि सब्जी भी दिया करो कुत्ते को ।"

महीना बीत गया । हालात तो वैसे के वैसे ही थे मगर किसनपाल के चेहरे की चमक जो सालों से थोड़ी थोड़ी कर के गायब हो गई थी वो फिर से लौट आई थी । 

कुछ महीनों बाद खराब ग्रहों की संख्या भी बढ़ा दी गई क्योंकि बच्चों की संख्या पाँच छः हो गई थी । उपाए के लिए पाँच छः कुत्तों का खाना जाने लगा । हाँ बस अब रोटी में घी नहीं लगा होता था क्योंकि यह किसनपाल की जेब चाह मंज़ूर ना कर पायी ।

धीरज झा

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