हिचकियाँ

पू रे 14 साल 6 महीने 18 दिन 13 घंटे 39 मिनट बाद कदम रखा था माधव ने इस शहर में, जो कभी उसका अपना हुआ करता था. फुआ, मासी, नानी आदि के घर जा...

पूरे 14 साल 6 महीने 18 दिन 13 घंटे 39 मिनट बाद कदम रखा था माधव ने इस शहर में, जो कभी उसका अपना हुआ करता था. फुआ, मासी, नानी आदि के घर जाने की वजह से जब कभी अपने इस शहर के साये तले उसकी आंख ना खुल पाती तो उस दिन सुबह सुबह पेट गुड़गुड़ करने से भी मन कर देता था. यहाँ की हर दुकान में बच्चपन के वो सपने टंगे हुए थे जिन्हें उसने वहां कभी ये कह कर लटकाया था कि “जब बड़ा हो जाऊंगा तब इन्हें खरीदूंगा.” शहर की हर गाली उसके क़दमों की आहट से वाकिफ़ थी, होती भी भला कैसे ना, स्कूल ना जाने के बाद वो अपने लंगोटिए पंछी के साथ इन्हीं गलियों में तो भटका करता था. हाँ पंछी ही तो नाम था उस चिड़ी जैसे मुंह वाले लड़के का, बहती लम्बी नाक और उस से भी लम्बी जुबान, ऊपर से सारा दिन बस उड़ता ही रहता था, कई बार तो सोते सोते टाँगें चलाने लगता था. बचपन में उसे बैठा हुआ किसी ने देखा ही नहीं था, या तो ससुरा सारा दिन भागता था या फिर रात को सोता था.

ये सब कुछ जो कभी माधव का अपना था, एक झटके में पराया हो गया था. उसके बाद ना इस शहर ने उसे कभी आवाज़ दी और ना ही उसने कभी इसे मुड़ कर देखा. आज वही अपना सा शहर माधव को पराया लग रहा था. शहर की गलियां उसे पहचानने से इनकार कर रही थीं तो दूसरी तरफ़ बाज़ार की दुकानों ने अपनी आँखों पर मोटे मोटे शीशे चढ़ा लेने की वजह से उसकी तरफ़ ध्यान ही नहीं दिया. वो भी कहाँ इस शहर से वास्ता रखना चाहता था. मगर ज़िन्दगी बड़ी बेरहम है वो समय समय पर घावों को बस ये जानने के लिए कुरेदती है कि ज़ख़्म में टीस अभी बाक़ी है या घाव पूरी तरह से सूख गया. लेकिन यहाँ माधव का घाव सूखने वाला नहीं था, अपने पिता को खोया था उसने इसी शहर में, अपने प्यार को अपनी आँखों के सामने किसी और का होता हुआ देखा था माधव ने इसी शहर में, अपनी हंसती मुस्कुराती माँ को पत्थर हो जाते हुए देखा था माधव ने इसी शहर में. इन सभी हादसों ने उसके मन में इस शहर के लिए इतनी नफ़रत भर दी कि रातों रात ही उसने माँ से शहर छोड़ देने की जिद्द कर दी और अगले दिन शहर के सूरज को आखरी सलाम कहने तक का मौका ना दिया.

मगर आज ज़िन्दगी ने ये जानना था कि उसका घाव अभी टीस मारता है या नहीं इसीलिए उसे यहाँ खीँच लायी थी. माधव को अपने जिस मुकाम तक पहुंचना था उसका रास्ता इसी शहर से हो कर गुज़रता था और संजोग की बात ही थी कि इस शहर में आते ही यहाँ की धरती ने कर्ण के रथ के पहिये की तरह उसके कार के चक्के को भी जकड़ लिया. उसे ना चाहते हुए भी यहाँ की जमीन पर फिर से कदम रखने पड़े. मीटिंग ज़रूरी थी नहीं तो वो इधर आता ही नहीं. लेकिन इस शहर की ज़मीन पर कदम पड़ते ही ना जाने कितनी यादों ने माँ बन कर एक पल में हजारों बार उसके माथे को चूमना शुरू कर दिया.

सुबह का ही निकला था माधव घर से अब तो दोपहरी भी शाम को गले लगाने के करीब थी तो भूख का लगना भी लाज़मी ही था. माधव ने सोचा शिकवे गिले अपनी जगह हैं भूख अपनी जगह, क्यों ना शम्भू काका के दुकान की मटरी, जलेबी और कड़क चाय का आनंद ले लिया जाए, वैसे भी मुझे कौन सा कोई पहचानेगा और दूसरी बात पैसे दे कर खाऊंगा कौनसा पहले की तरह उधर करना है जो इतना सोचूं . यही सोच कर उसने ड्राइवर से गाड़ी ठीक करवाने के लिए कहा और खुद इमली बाज़ार की तरफ़ निकल पड़ा. जैसे जैसे माधव बाज़ार में घुसता गया उसके मन का डर ये सोच कर बढ़ता गया कि इतने सालों में जिस तरह मैं बदल गया, ये शहर और ये बाज़ार की सभी दुकानें बदल गयीं कहीं इसी तरह शम्भू काका की दुकान भी ना बदल गयी हो. क्योंकि अगर बर्गर पिज़्ज़ा ही खाना होता तो वो कहीं और ना जाता जो पैदल चल कर यहाँ तक आता.

मगर इतनी रंगी पुती दुकानों के बीच एक पुरानी सी दुकान पुराने बरगद की तरह अपनी उसी जगह पर सीना ताने खड़ी देख कर माधव को सुकून आगया. सामने काउंटर पर शम्भू काका अपने उसी अंदाज़ में बैठे हुए थे बस फ़र्क यही था कि शरीर पहले से कमज़ोर होगया था और जो तब इक्का दुक्का सफ़ेद बाल थे उनकी जगह पर इक्का दुक्का काले रह गए थे. दुकान में घुसते ही माधव का हाथ उठने लगा काउंटर पर ज़ोर से मार कर ये बोलने के लिए कि “गोवर्धन दो चाय, और एक प्लेट मटरी की दे दे” वो ऐसे ही कहा करता था वो भी सिर्फ शम्भू काका की गलियां सुनने के लिए, वो माधव की इस हरकत के बाद कहा करते थे “हाँ हाँ गोवर्धन इसके बाप की दुकान ही है दे दे साथ में मलाई भी दल देना दूध में. मुफ्तखोर, सुन ओए गोवर्धन बिना पैसे पानी भी ना देना हरामखोरों को” ये बात अलग है की मटरी के साथ साथ एक एक जलेबी शम्भू काका अपनी तरफ़ से खिलते थे. माधव ने बड़ी मुश्किल से अपना हाथ रोका.

उसके दुकान में घुसते ही जब शम्भू काका की नज़र उस पर पड़ी तो उनकी बूढी ऑंखें कुछ देर के लिए माधव के चेहरे पर थम गयीं. वो बस उसके चेहरे पर एक अपनापन खोज रही थीं, मगर माधव उनके सामने ज़्यादा देर तक रुक ही ना पाया. वो जा कर एक टेबल पर बैठ गया. चाय मटरी और जलेबियाँ मंगवा कर वो वो एक तक से उन्हें ऐसे देखने लगा जैसे उसे अपना खोया हुआ बच्चपन मिल गया हो. कुछ दे ऐसे ही देखने के बाद उसने एक मटरी उठाई और चाय में डुबो कर जैसे ही मुंह में डालनी चाही कि उसके सामने वाले टेबल से एक खनकती हुई आवाज़ उड़ कर उसके कानों तक पहुंची “सूट पहन लो, बूट पहन लो, महंगे चश्मों के पीछे अपनी नाम आँखों की पहचान छुपा लो मगर आदतें, ये आदतें ही ऐसी होती हैं जो बदलती नहीं. जैसे तुम्हारी नहीं बदली, तुम बदल गए, वक्त बदल गया मगर मटरी चाय में डुबोने की तुम्हारी वो गन्दी आदत ना बदली”

इस आवाज़ के कानों में पड़ते ही माधव को ऐसा लगा जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी. जैसे वो जैम सा गया हो, उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो खुश हो या रो दे, उसकी ऑंखें अभी तक निचे झुकी हुई थीं. उसे समझ ही नहीं आरहा था कि वो उस शख्स का सामना कैसे करे जिस से दूर होने के लिए उसने लाख बहाने बना कर अपने इस दिल में अपने शहर के प्रति नफ़रत भरी थी. वो जिससे बचना चाहता था उसी ने उसे अपने ही शहर में रेंज हाथों पकड़ लिया था. उसने मन ही मन एक बार अपनी नियति को को कोसा. ये सब नियति का ही तो किया धरा था कि पहले ज़ख़्म दो फिर उसे सहने को कहो और जब वो सूखने लगे तो उसे फिर कुरेद दो.

“एक बार बोल तो दो जनाब कि हमने तीर सही निशाने पर मारा या हम चूक गए?” वो आवाज़ अब उसके और नजदीक आगयी थी. माधव ने अपने चेहरे पर मुकुराहत सजाई और उसकी तरफ़ देखा. हाए, ये वही सुबह थी जिसके ना होने की वजह से माधव अब तक अँधेरे में था, ये डर जिसका सामना वो नहीं करना चाहता था वो कितना खुबसूरत था, मुक्ता का ये चेहरा आज भी उतना ही खुबसूरत था जितना कि तब हुआ करता था. बस उसके चाँद से चेहरे को सम्पूर्ण चाँद बना दिया था उसके आँखों के नीचे के उस घेरे ने जो शायद ढलती उम्र की निशानी थी या फिर किसी के इंतज़ार का प्रमाण.

“वही हूँ, जो तब था. मैं और मेरा नसीब कभी नहीं बदलने वाले मुक्ता जी.” इतना सुनना था की मुक्ता झट से उठी और आ कर माधव से लिपट गयी.

“इतना दूर भी कोई जाता है क्या जो अगला एक झलक देखने को तरस जाए. गवाह है शहर में आने वाली हर बाहरी हवा जिसमे मैंने हमेशा तुम्हारी खुशबू को महसूस करने की कोशिश करते हुए उनसे तेरे आने की खबर पूछी है.” माधव एक दम से स्तब्ध था, इतना डरने वाली मुक्ता भला आज कैसे इतनी बेबाकी से उसे गले लगा रही है. मगर जो भी हो माधव को वो खोये हुए सुकून का अहसास होगया था.

“शम्भू चाचा, ये ले लो अपनी उधारी, देखो आपका चोर वापिस आगया.” मुक्त ने शम्भू चाचा को भी आवाज़ दे दी. मगर अब माधव को किसी द्वारा पहचाने जाने की फ़िक्र ना थी क्योंकि वो जिससे बचता फिर रहा था उसने तो उसे खुद ही धर दबोचा था.

“मैंने तो इसके अन्दर आते ही पहचान लिया था मगर फिर अपनी आँखों को उम्र का डरावा दे कर झूठा साबित कर दिया. कहाँ चला गया था मेरे बच्चे.” शम्भू चाचा के पैर छूते ही उन्होंने माधव को गले से लगा लिया था.

कुछ देर तक मुक्ता माधव को ऐसे ही देखती रही. फिर अचानक से बोली “शादी कर ली तुमने ?”

“नहीं अभी नहीं.”

“अभी नहीं ? तो कब करोगे ? तुमने कहा था कि तुम जल्दी ही कर लोगे शादी. अब तो उम्र भी 35 से ऊपर हो गयी” माधव मन ही मन ये सोच कर मायूसी से भर गया कि इसे इस बात का ज़रा भी अहसास नहीं कि इसके जाने के बाद मुझ पर क्या बीती होगी ऊपर से ये मेरी शादी के बारे में पूछ रही है.

“हाँ कहा था मगर यहाँ से जाने के बाद काम काज ढूंढने और फिर अपने कामकाज को बढ़ाने के बीच समय ही नहीं मिला जो शादी के बारे में सोच सकें. और वैसे भी यहाँ से जब गए तब जवानी और बच्चपन यहीं छोड़ कर साथ में सिर्फ जिम्मेदारियां ही ले गए थे.” खुद को सँभालते हुए माधव ने सीधा सा जवाब दिया

कुछ देर ख़ामोशी के बाद मुक्ता ने फिर से बात शुरू की “माँ और रागनी कैसे हैं ? रागनी की तो शादी हो गयी होगी ना? बड़ी याद आती है उसकी.”


“वो सब भी अच्छी हैं, हाँ रागिनी की भी शादी हो गयी है. वो भी अक्सर तुम्हें याद करती है.” इस बार भी माधव का सीधा सा जवाब ही था.

मुक्ता माधव को जानती थी. वो कभी भी कोई बात शुरू नहीं करता था, हमेशा उसके सामने चुप चुप ही रहता मगर मुक्ता उसे अपनी बैटन में ऐसा उलझती कि माधव शर्मना भूल जाता था.

“अच्छा माधव तुम्हारी वो वाली आदत छूटी या नहीं ?”

“बहुत कुछ छूट गया है, अब तुम बताओ कौन सी आदत की बात कर रही हो.”

“वही झूठ बोलने के बाद तुम्हें हिचकियाँ आने लगती थीं और तुम पकडे जाते थे.” इतना कह कर मुक्ता बच्चों की तरह लोट पॉट हो कर हंसने लगी. माधव एक तक उसे इस तरह हँसता हुआ देखते जा रहा था. माधव को उसकी हंसी को देख कर ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे वर्षों बाद सुखी ज़मीन पर बारिश के कदम पड़े हों.

“अच्छा तुम्हारी बारिश में भीगने की आदत गयी ये नहीं ? पह्क्ले भारिश में भीगती ठी और फिर अगले चार पांच दिनों तक अपने रुमाल को अपनी नाक की बरसात में भिगोती थी. इस बार लोटपोट होने की बारी माधव की थी.

“छी माधव मैं ऐसा कभी नहीं करती थी, बड़े गंदे हो तुम.” इसके बाद काफ़ी देर तक दोनों बीते दिनों के पन्ने उलटते रहे. देखते देखते शाम भी रात के आग़ोश में जाने को तैयार थी. मुक्ता का फोन बजा

फोन उठाते ही मुक्ता ने कहा “हाँ आजाओ, यहीं शम्भू काका की दुकान पर.”

“मेरे पतिदेव का फोन था, असल में माँ से मिलने आई थी. आज वापिस जा रही थी तो गाड़ी ख़राब हो गयी. मैंने ड्राइवर के हाथों गाड़ी ठीक करने भेज दी और इन्हें फोन कर दिया. सोचा घर जाने से अच्छा है यहीं पर इनका इंतज़ार कर लेती हूँ. तब तक सामने तुम दिख गए, तुम्हे देखते ही लगा जैसे सालों से मांग रही दुआ आज कुबूल हुई मैंने इन्हें मैसेज कर दिया कि मेरा एक दोस्त मिल गया है इस लिए जब तक कहूँ ना तब तक मत आना. अब रात होने को आई तब फोन किया इन्होने.” माधव के बिना पूछे ही मुक्ता ने साडी राम कहानी बता दी. माधव थोड़ी देर के लिए सोच में पड़ गया. सच में ये नियति का कैसा खेल था कि दोनों की गाड़ियाँ ख़राब हुईं और दोनों ने एक ही जगह जाने का मन बनाया. शायद किस्मत ने उन्हें एक बार फिर मिलाना था. एक तरफ शादी को ले कर वो मुक्ता से मायूस था तो दूसरी तरफ ये देख कर खुश भी था कि उसे एक समझदार और अच्छा जीवन साथी मिला है.

“बड़ा कहा मानता है तुम्हारा पति तो.” माधव ने झूठी मुस्कराहट के साथ कहा.

“हाँ वो बहुत अच्छे हैं, एक पति से ज़्यादा एक दोस्त. किसी बात का पर्दा नहीं उनसे.”

“पर्दा रख भी लेंगी तो भी कोई फ़र्क हमें पड़ता नहीं है क्योंकि इतना तो हम जानते हैं कि मोहब्बत के मारे बेवफ़ाई नहीं करते.” मुक्ता की बात ख़त्म होने से पहले ही एक तीसरी आवाज़ उन दोनों के बीच आ धमकी.

बिना पीछे मुड़े ही मुक्ता ने कहा “आप इतनी जल्दी कैसे आगये ? यहीं खड़े जासूसी कर रहे थे क्या ?”

“हाँ अब बीवी सुंदर हो तो नज़र रखनी ही पड़ती है जाने कब कौन आये और उड़ा कर ले जाए.” मुक्ता के पति ने मज़ाकिया लहज़े में कहा

“अच्छा बहुत होगया आपका मज़ाक, इनसे मिलिए ये हैं हमारे दोस्त माधव. आज पूरे 14 सालों बाद मिले हैं. माधव ये हैं मेरे पति” मुक्ता ने दोनों का परिचय कराया.

“अरे भला इन्हें कौन नहीं जनता, हम क्या हमारे घर की दर ओ दीवारें इनसे परिचित हैं, हमारी पत्नी जी ने ना जाने कितने तकिये आपकी याद में आंसुओं से धो कर बदरंग कर दिए.” मुक्ता के पति का इस तरह बेबाकी से बोलना माधव को थोडा अटपटा लग रहा था. लेकिन मुक्ता हँस रही थी क्योंकि वो जानती ठी ये उसके पति की आदत है.

“अरे नहीं सर, इतने भी खास नहीं हैं हम.” माधव ने जलन भारी मुस्कराहट के साथ कहा. इधर मुक्ता का फोन बज पड़ा वो अपना फोन सुनने बहार चली गयी.

“पहली बात तो अभय नाम है हमारा, ये सर वर ना कहिये. दूसरी बात कि आप कितने खास हैं ये अच्छे से जानते हैं हम. कुछ भी छुपा नहीं है हमसे. सच कहें तो आपसे जलन होती है हमें. काश कि आपकी जगह हम होते, कसम से कह रहे हैं ये इंतज़ार जो मुक्ता की आँखों में शादी के दिन से देख रहा हूँ वो इस तरह साथ रहने से बहुत बेहतर है. आप यकीन नहीं मानेंगे, आपको देखने के लिए जितना वो तड़पती थी ना उससे ज़्यादा मैं तरसता रहा हूँ. मुझे बस ये देखना था कि वो इंसान कैसा होगा जिसके लिए मेरी बीवी इतनी बेचैन है, जिसका नाम वो सोते हुए भी पुकारा करती है. शादी की पहली रात मैं जब कमरे में गया तो देखा बिस्तर पर एक दुल्हन नहीं एक बच्ची बैठी है दरी सहमी सी जिसकी आँखों में डर है इस बात का कि कहीं उसका प्यार आज सामने वाली की हवास के आगे दम ना तोड़ दे. मैं इंसान था आम सा मगर उसे देखते ही लगा कि नहीं मुझे इंसान नहीं इसके लिए एक देवता बनना होगा जो इसकी हर ख्वाहिश को पूरा करे. और मैं आज तक देवता बन्ने की कोशिश करता आरहा हूँ.” इतना कहते और सुनते हुए चार ऑंखें बुरी तरह से आंसुओं में डूब चुकी थीं.

माधव मन ही मन खुद को ये सोच कर कोस रहा था कि बेवजह ही उसने मुक्ता को गलत समझा. उसे समझ ही नहीं आरहा था कि यहाँ हम तीनों में सबसे बड़ा बलिदान किसका है. माधव का जिसने आज तक किसी को दिल के करीब नहीं आने दिया, मुक्ता का जो शादी के इतने सालों बाद भी उसका इंतज़ार कर रही है या अभय का जिसने इन दोनों की मोहब्बत का बिना किसी लोभ के सम्मान किया. आज सच में मोहब्बत जीत गयी थी. अपने हर रूप अपने हर रंग में मोहब्बत अव्वल आई थी.

“माधव आज हमारे घर चलो, बहुत ज़रूरी हो तो कल सुबह ही निकल जाना. अब रात भी बहुत हो चुकी है.” मुक्ता ने माधव को घर चलने के लिए बहुत ज़ोर दिया मगर माधव को निकलना था उसने वादा किया कि वापिस आते हुए वो उन दोनों से मिल कर और उनके घर रुक कर जायेगा.

अभय गाड़ी में मुक्ता का इंतज़ार कर रहा था, इधर ये दोनों एक दूसरे से विदा ले रहे थे. मुक्ता ने माधव का हाथ पकड़ कर कहा “गलती मेरी थी, अगर मैं तब हिम्मत कर लेती तो शायद आज हम दोनों एक होते. मगर अब जो बीत गया उसे बदला नहीं जा सकता. बहुत समय बीत गया उस बात को. अब शादी कर लो जल्दी ही. उम्मीद है हमें भी ज़रूर बुलाओगे.”

माधव मुक्ता के मन में किसी तरह का इंतज़ार नहीं देखना चाहता था क्योंकि इसकी सज़ा उसके साथ अभय को भी भुगतनी पड़ रही थी इसीलिए उसने कठोर मन करते हुए कहा “नहीं मुक्त तुम्हारा सोचना गलत है, ऐसा नहीं कि तुम्हारे लिए मैंने शादी नहीं की, सर पर इतनी जिम्मेदारियां और जीवन की परेशानियाँ आगयीं कि प्यार मोहब्बत कहाँ दब गए उस बीच पता ही ना चला. बाक़ी अब स्थिति ठीक है तो एक दो साल में शादी कर लूँगा. और तुम दोनों ज़रूर बुलाऊंगा. हमारे बीच अब वैसा कुछ भी नहीं इसीलिए तुम इतना मत सोचना और आराम से रहना. अपना और अभय का ख्याल रखना.”
ये सब सुन कर एक पल के लिए मुक्ता को बहुत बुरा लगा लेकिन फिर उसने मन को समझाते हुए अपने चेहरे पर झूठी मुस्कराहट सजाई और माधव को गले लगा कर अलविदा कहा.

मुक्ता पीछे मुड़ अपनी गाड़ी की तरफ धीरे धीरे कदम बढ़ा रही थी. माधव के बोल उसके दिल ओ दिमाग पर हथौड़े के सामान प्रहार कर रहे थे. उसका मन हो रहा था कि वो माधव के सामने जा कर रोते हुए पूछे कि इतने साल तक जो वो उसकी एक झलक पाने का इंतज़ार करती रही क्या वो मोहब्बत नहीं थी ? उसने अपनी पति तक को उसकी जगह ना लेने दी क्या वो प्यार नहीं था. जब ये सब ना दबा तो फिर तुम्हारी मोहब्बत कैसे इतनी कमज़ोर थी की दब गयी.

अपनी आँखों के सैलाब को रोकते हुए वो गाड़ी में बैठने जा ही रही थी कि उसके कानों में माधव की हिचकियों की आवाज़ पड़ी. मुक्ता वहीं रुक गयी. वो पीछे मुड़ी और भागते हुए जा कर माधव को गले लगते हुए कहा “तुमसे कहा था ना आदतें नहीं जातीं. तुम्हारी हिचकियों ने तुम्हारी पोल खोल दी वरना आज मैं झूठ को सच मानने जा ही रही थी.” माधव की चोरी फिर से पकड़ी गयी. वो मुस्कुरा दिया. लौटते वक्त उनके घर समय बिताने का वादा ले कर मुक्ता चली गयी.

आज माधव के मन से इस शहर के प्रति उसकी नफ़रत खत्म हो गयी थी, मुक्ता का इंतज़ार खत्म हो गया था और इन दोनों के साथ अभय की मुक्ता के चेहरे की वो पूरी ख़ुशी देखने की बेकरारी भी खत्म हो गयी थी.


धीरज झा

Keywords : Hindi Romantic Story, True Love Never Die, Habit, You & Me, Sacrifices 

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