उक्रिम

रजेसबा अपना बाबू को बड़ा मानता था. तभी तो पढ़ाई लिखाई छोड़ बम्बई चला गया था दू ढेऊआ कमाने के लिए जिससे वो अपने बाबू का करजा उतार सके. एत...


रजेसबा अपना बाबू को बड़ा मानता था. तभी तो पढ़ाई लिखाई छोड़ बम्बई चला गया था दू ढेऊआ कमाने के लिए जिससे वो अपने बाबू का करजा उतार सके. एतना कर्जा था सतरोहन मालिक का रजेसबा के बाबू के मूड़ी पर की एक दिन त रजेसबा के बाबू गरफसरी लगा लिये , ऊ त भला हो रमसेबका के जो बखत रहते देख लिया और हल्ला मचा दिया. रजेसबा ने सोच लिया उस दिन कि अब नही रहेगा इहाँ , अब बम्बई जायेगा और खूब कमायेगा. बीड़ी के कारखाना में काम मिला था. पर एक बीड़ी नही पीता. बड़ा सज्जन लईका था रजेसबा.

उसके बाबू जब भी ज़्यादा भांग खा लेते तब उसे फ पर एक ही बात बोलते “हमरा तोहरा पर पूरा बिस्बास है बौउओ, तू हमारा खोया मान इज्जत लौटाएगा. जानत हो बौउआ, अब दो ठो सपना ही है जो आँख में हर समय उछल कूद करता है. एक ठो ई कि मरने से पाहिले एक कम से कम एको बार सतरोहन मालिक के दुआर के आगे से अपना मोछ को ताओ देते हुए सीना तान के हुआँ से गुजरें. और दूसरा कि तुम्हरी सादी में नाच मंगवाएं. बस ई दू ठो सपना पूरा हो जाए फिर चाहे अगले ही दिन भगवन हमको उठा ले.” फोरमैन की डांट के द्वारा गरियाए जाने के बाद जब भी रजेसबा घर लौटने का मन बनाता तब उसके कानों में बार बार उसके बाबू की यही बातें घूमतीं और वो फिर से अपना मन बदल लेता.

आज सात साल हो गए थे रजेसबा को बम्बई आये हुए. घर का खर्च भेजने के साथ साथ वो अलग से इतना जोड़ लिया था कि आपने बाबूका दोनों सपना पूरा कर सके. अभी उसने बाबूको ये बात नहीं बताई थी वो सामने से उनके चेहरे की ख़ुशी देखना चाहता था. वो चाहता था कि जब वो बाबूका कर्जा चुकाए तो बाबूउसे अपनी गर्व से फूली छाती से लगा लें. यही सोच कर रजेसबा ने दस दिन बाद का टिकट कटवा लिया.

दो दिन बाद रजेसबा को घर की राह पकड़ने थी. इसीलिए सब सामान खरीद रहा था. माँ के लिए आठ खंड सूती साड़ी ख़रीदा था, बाबू के लिए पांच जोड़ धोती, कुर्ता के लिए सिल्क का कपड़ा (उनके दो सपनों के बाद जो तीसरा छोटा सा सपना था वो था जीवन में एक बार सिल्क का कुर्ता पहना, कर्जे की मार ने भले ही उनके इस सपने को कुचल दिया हो लेकिन उनके बेटे की आँखों ने उनके सभी छोटे बड़े सपनों को संजो कर रखा था) और सागवान की लकड़ी का कामदार बेंत ले जा रहा था. इसी खरीददारी में वो इतना व्यस्त हो गया कि दो दिन घर फोन नही कर पाया. तीसरे दिन उसे खयाल आया की ऊ फोन नही करता तो बाबू का फोन तो आईये जाता है पर दो दिन में तो बाबू भी फोन नही किये. उसने सोचा कि फोन कर के हाल समाचार पता कर लेते हैं और साथ ही बाबू को बता देते हैं कि हम घर आरहे हैं. फोन पड़ोस का छोटकनमा उठाया " हेलो , बाबू परनाम. "

" नही रजेस भईया, हम बोल रहे हैं छोटन " छोटन उदास सी आवाज़ में बोला.

" रे ससुरा तू का कर रहा फोन के साथ , बाबा काहे नही उठाये जा बाबा को फोन दे. "

" कका सो रहे हैं भईया. " रजेसबा को थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि बाबू कभी दिन में नहीं सोते थे.

"अच्छा, चल अम्मा से बात करा दे.” इसके बाद छोटन कुछ नहीं बोला बस फोन ले कर बाहर की तरफ चला गया.

कुछ देर में उधर से अम्मा की आवाज़ सुने पड़ी “हाँ बौउआ, कईसन हो.”

“हम तो ठीक हैं अम्मा लेकिन ई बाबू कहे आज दिने में पड़ाए हुए हैं. तबियत तो सही है उनका ?”

कुछ देर तक अम्मा की कोई आवाज़ नहीं आई “हेलो अम्मा, बोल कहे नहीं रही सब सही तो है.?”

“हाँ हाँ बौउआ, सब ठीक है हियाँ, बस तू जल्दी घर आ जा.” रजेसबा हैरान हो गया ये सोच कर कि अम्मा को कईसे पता कि हम आने वाले हैं.

“बाह अम्मा, तुम तो अंतरजामी हो, हम तो आज ट्रेन पकड़ रहे हैं. इहे बताने खातिर तो फोन किए थे.”

“ठीक है बौउआ तू आजा जल्दी फिर खूब बतिया लेना.” अम्मा इतना कह कर फोन काट दी. वैसे अम्मा आज से पहले इतनी जल्दी और इस तरह से कभी फोन नहीं कटी थीं. लेकिन राकेसबा ने इन बात पर ध्यान नहीं दिया. उसे तो अब था कि वो जल्दी से घर पहुँच जाए.

रात को ट्रेन में बैठने के साथ ही रकेस्बा सोचने लगा कि कैसे वो घर पहुँचते ही अन्दर बाद में जायेगा पाहिले बाबू से कहेगा कि चलो सतरोहन मालिक के घर, उसका हिसाब करना है. ये सुनते ही उसके बाबू उसे गले लगा लेंगे. और फिर अपने हाथ से वो उनकी मूछों को ताव देगा. यही सब सोचते हुए वो कब नीद रानी की गोद में समां गया उसे पता ही ना चला. दो दिन के सफ़र में जब वो जागता तो इसी ख़याल को तरह तरह से सोचता. दो रातों और दो दिन बीतने के बाद वोप अपने गाँव को जाने वाली बस में बैठा. अब उसकी धड़कने उस खतरा बस की आवाज़ से ज़्यादा शोर कर रही थीं. इस बीच उसने दो बार घर फोन किया था मगर कोई उठाया ही नहीं. लेकिन उसे अब क्या चिंता थी अब तो वो खुद ही घर जा रहा था.

आज पूरे दो साल सैट महीने और बारह दिन के बाद उसने अपने गाँव में कदम रखा था. घर की तरफ बढ़ता हुआ हर कदम उसकी हर धड़कन को तेज़ कर रहा था. रस्ते में मिलने वाला हर परिचित उसे इस तरह देख रहा था जैसे उसके आने की खबर सबको पहले से ही पता हो. घर के नजदीक पहुँचते ही उसने खुद को समझाया कि बाबू को देखते ही आंसू मत बहाने लग्न नहीं तो फिर चार बात सुनेगा उनसे. मगर भावुकता मानती कहाँ है. उसके आँखों के आगे तो बाबू का...................

उसके आंगन में इतने लोग ? मगर क्यों ? कम से कम उसके स्वागत के लिए तो नहीं आए होंगे. वो कोई जंग जीत कर तो आया नहीं. फिर ये सब यहाँ क्यों और भला इतने चुप चाप क्यों. तभी शांति को चीरती एक दर्द भारी चीख़ ने रजेसबा का कलेजा दहला दिया. कंधे पर टंगा बड़ा सा बैग और हाथ में पकड़ा झोला और बाबू की बेंत दोनों ज़मीन पर गिर गए और उसके कदम घर के अंदर की तरफ खुद से बढ़ने लगे. सामने का जो दृश्य था वो एक पत्थर की तरह था जिसने एक ही वर से रजेसबा के सरे सपनों को चूर चूर कर दिया.

बाबू सफ़ेद चादर में लिपटे हुए थे. अम्मा बेसुध सी पड़ी हुई थी, जैसे रो रो कर हार गयी हो. अब हिम्मत ना बची हो और रोने की. बेटे को देखते ही उसकी तरफ दौड़ी और जा कर उसकी बाँहों में बेसुध सी हो कर गिर पड़ी. रजेसबा ने खुद को सम्भालते हुए साथ ही साथ अम्मा को सम्भाला.

“तोहरे इंतजार में दू दिन से लड़ रहे थे मौत से लेकिन भावी कौन बदल सका है जो ई बदल लेते. इधर शायद तू ट्रेन से उतरा होगा और इधर ई प्रान.....” इससे आगे अम्मा के आंसू बोले जो उसकी आँखों से बह कर अपने बेटे के गलों को चूम रहे थे. रजेसबा शांत होगया, एक दम शांत. सबने बहुत कोशिश की कि वो रो दे जिससे उसका मन हल्का हो मगर वो भावहीन सा बंजर ज़मीन सी आँखों से बस बाबू को देखे जा रहा था.

" जराबे ले गये , अम्मा बोल रही थी कका मर गये. " छोटकन ने बड़ी आसानी और नादानी से सब बोल दिया.

" रे ससुरा पगला गया है का रे ,अभागल कहीं के पतीत जा हमरी माये को फोन दे. " रजेसबा एक दम से सुन्न सा हो गया था जैसे मानों कोई डरावना सपना आया हो और जागने के बाद भी उस सपने से बाहर ना आ पाया हो. "

छोटकनमा जैसे जैसे बाहर जा रहा था रोने की आवाज़ें तेज होती जा रही थीं और रजेसबा का दिल बईठा जा रहा था. फोन रजेसबा की माई ने पकड़ा और रोते हुये बोलने लगी.

" बेटा तोहर बाबू नही रहे बेटा तोहार फोन लगाये थे पर नही लगा. " माँ बोले जा रही थी सब बता रही थी पर रजेसबा कुछ नही सुन पा रहा था दैसे आवाज़ उसके कानों तक पहुंच ही नही रही थी. थर्रा कर जमीन पर गिर पड़ा. उसके बाबा नही रहे अब कल रात चल बसे पर उसे पता नही चला वो रो भी नही पाया.

“भौउजी, महपातर आगए हैं, जल्दी करना होगा, फेनू साँझ होगया तो दिक्कत हो जायेगा.” अम्मा ने रजेसबा का माथा सहलाते हुए उसे कर्म के लिए तैयार होने को कहा. रजेसबा ने भी इशारे में हामी भरी. वो बाबू की सवारी को सजता हुआ देख रहा था. उसे लग रहा था जैसे बाबू के साथ साथ उसके सपनों की भी अर्थी सजाई जा रही हो. सब लोग शवयात्रा के लिए जुट गए.

राकेसबा हँड़िया ले के आगे बढ़ने लगा फिर कुछ सोच कर वो रामसेबका के पास आया और बोला “कका, फर्की महरानी अस्थान की तरफ से ले चलियेगा.”

“बौउआ, ऊ रास्ता उल्टा पड़ जाएगा. इहाँ से सीधे सीधी नदी घाटे निकल जाएंगे.” रामसेबक ने राकेसबा को समझाया.

“हम जानते हैं कका लेकिन इधर से ही चलेंगे.” इतना कह कर वो जल्दी से घर में घुसा और कुछ समय बाद अपनी धोती की खूट में कुछ बांध लाया. फिर उसने सबसे बढ़ने के लिए कहा. रामसेबक उसकी हालत समझ रहा था इसीलिए उसने बिना बहस किए उसी रास्ते से जाना सही समझा जिधर से राकेसबा ने कहा था.

राम नाम सत्य है बोलते हुए बाबू की फर्की आगे बढ़ रही थी. राकेसबा एक दम गम सुम सा ज़मीन की ओर देखते हुए आगे बढ़ता चला जा रहा था. थोड़ी दूर चलने के बाद अचानक से राकेसबा रुक गया और बाक़ी सब को भी रुकने का इशारा किया.

“बौउआ, रुक काहे गए. चलते रहो ऐसे बीच रस्ते नहीं रुका जाता.” रामसेबक ने उसे समझाते हुए कहा.

“कका, यहाँ नहीं रुके तो हमको उम्र भर चैन नहीं आएगा.” इतना कह कर राकेसबा सामने वाले दुआर की तरफ मुड़ा. राम नाम सत्य है सुन कर जिसका दुआर था वो भी बहार आगया. उसने राकेसबा को अपनी तरफ आते देख दुखी मन से कहा “जो हुआ सो बहुते बुरा हुआ राकेस. सुरजू का इतना जादा कोनो उमर भी तो नहीं हुआ था.” सामने वाला व्यक्ति अभी और कुछ बोलता उससे पहले ही राकेसबा ने उसकी बात काट दी.

“हाँ कका, उमर तो नहिए हुआ था लेकिन कुछ हिसाब किताब था जिसका चिंता उनको ले बैठा. खैर ई लीजिए, वैसे तो हम ब्याज लगा के पूरा रकम दे रहे हैं फिर भी अगर कमी लगे तो बता दीजिएगा. और मन ही मन हमारे बाबू को उक्रिम दे दीजिएगा. नहीं तो वो ऊहाँ भी चैन से नहीं रह पाएंगे. बाक़ी कका एक बात कह देते हैं आपसे कि हमारे बाबू के मन में कोनो चोर नहीं था कभी भी बस ऊ अपना परिस्थिति के मारे हुए थे.” सतरोहन से इतनी बात कह के राकेसबा वापिस लौट आया और लौटते ही उसने अपने बाबू के मुंह पर से कफ़न हटाया और उनकी झुकी हुई मुछों को ताव दे कर ऊपर करते हुए उनकी निर्जीव आँखों में संतोष तलाशने लगा.

Keywords:- Hindi Story, Father Son Love, Needs, Dreams 

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क़िस्सों का कोना : उक्रिम
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क़िस्सों का कोना
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