आपने ही तो सिखाया है

"है साबास, ई है असली सेर । साला जो बोलेगा मार के गाँड़ झाड़ दिया जाएगा । पहिला जमाना अब खतम । गर्ब है तुम पर हमको सेर । हम तुम्हरे सा...

"है साबास, ई है असली सेर । साला जो बोलेगा मार के गाँड़ झाड़ दिया जाएगा । पहिला जमाना अब खतम । गर्ब है तुम पर हमको सेर । हम तुम्हरे साथ हैं ।" आँखों पर लटके चश्में से फोन पर टकटकी लगाये हुए शोभाकांत बच्चे की तरह खुशी से उछल रहे थे । तभी उनके मित्र जनक जी आ गये । उन्हें इस तरह उछलता देख खुशी की की वजह पूछ ली ।

"का सोभाकांत, काहे एतना कूद फान मचाए हो ? ई खुसी का कौन बात है हमको भी बताओ, ससुर हम भी थोड़ा प्रसन्न हो लें ।"

"केतना बार तुमको कहे हैं ससुर फोन ले लो लेकिन तुम ठहरे कंजूस, ब्याज का जमा सारा पईसा करेज पर लाद कर ले जाना । फोन होता तो सब खबर मिलता ना तुमको ।"

"अरे तुमसे सारा खबर मिल ही जाता।है तो काहे फोन खरीदें । बाक़ी हम फोन ले लिए तो तुम किसको अपना ई सब खबर सुनाओगे ।"

"हाँ बात तो ठिके कह रहे हो । अच्छा ई देखो फेसबुक पर दिखा रहा है, ई सेर ऊ कर दिखाया जिसका अभी सख्त जरूरत है ।"

"हमको भी दिखाओ ऐसा का कर दिया ई ।"

"देखो, कईसे लब जिहादी को दौड़ा दौड़ा कर मारा है । धरम में ऐसा सेर सबका बहुत जरूरत है ।" यह कह कर शोभाकांत जनक जी को विडियो दिखाने लगे । इतने में शोभाकांत जी का 16 17 साल का लड़का स्कूल से आया । पहले शोकांत जी ध्यान नहीं दिए लेकिन जब उनका लड़का बिना कुछ बोले घर में घुसने लगा तब शोभाकांत ने देखा कि उसका सर पर पट्टी बंधी है और कपड़े खून के धब्बों से भरा है ।

"ऐ, बबुआ ई का हुआ रे ?" शोभाकांत अपने इकलौते बेटे को इस हाल में देख कर बेचैन हो गये ।

"कुछो नहीं, बस तनिका सा चोट है ।" लड़के ने बेफिक्री से उत्तर दिया ।

"लेकिन चोट लगा कईसे ।"

"ससुर असलमबा बहुत फुदक रहा था, हमको गुस्सा आ गया हम भी पकड़ के पीट दिए । वही झगड़ा ने में सर पर चोट लग गया ।"

"ससुर हरामी इस्कूल पढ़ने जाता है कि झगड़ा करने । हम दिन रात युमको बड़ा अफसर बनाने का सपना देखते हैं और तुम ससुर लफंगा बना फिरता है ।"

"ऊ साला कटुआ बोलेगा आ हम चुप चाप सुनते रहेंगे क्या । आप ही तो कहते हैं अपने धरम के लिए मर मिटने वाला ही असल बीर होता है । सबको काटूंगा जो जो बोलेगा ।" इतना कह कर शोभाकांत का लड़का पैर पटकता हुआ घर के अंदर चला गया । इधर शोभाकांत ज़मीन पर नज़रें गड़ाए हुए किसी गहरी सोच में डूब गये ।

धीरज झा

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