मैं चोर ही हूँ

दा रोगा मूलचंद बड़े ही ख़तरनाक पुलिस अफ्सर थे और अपराधी उनका नाम सुन कर ऐसे कांपते थे जैसे मलेरिया का मरीज़ कांपता है । ऐसा उन्हें लगता था...

दारोगा मूलचंद बड़े ही ख़तरनाक पुलिस अफ्सर थे और अपराधी उनका नाम सुन कर ऐसे कांपते थे जैसे मलेरिया का मरीज़ कांपता है । ऐसा उन्हें लगता था । मगर सचाई तो कुछ और ही थी । अपराधी उनकी रत्ती भर भी परवाह नहीं करते थे । उनको पता था कि वो मूलचंद के सामने से चोरी कर के निकल जाएंगे लेकिन मूलचंद उन्हें पकड़ ना पाएंगे क्योंकि उनके बड़े से पेट से बंधा छोटा सा शरीर उन्हें भागने ही नहीं देगा । ख़ैर दारोगा जी अपनी खुशफहमी में खुश थे तो भला उनको सच बता कर दुःखी काहे करना ।

सर्दियों के दिन थे, अमूमन जैसी सर्दियों की शामें अक्सर देखने को मिलती हैं वैसा सन्नाटा यहां नहीं था । सर्दी से लाल हो रही नाक और किटकिटाते दांतों के बावजूद भी लोग काफ़ी रात तक घरों के बाहर आग जला कर बैठे रहते थे । असल में वे सब ऐसा शौख़ से नहीं बल्कि मजबूर में कर रहे थे । इन दिनों शहर में एक चोर का बड़ा ख़ौफ़ फैला हुआ था । हालांकि अभी कहीं भी चोरी हुई नहीं थी लेकिन एक अंजान व्यक्ति को लोगों ने रात के समय अपने घर के बाहर अक्सर तांका झांकी करते देखा था । एक दो लोगों के ज़ुबान से बात फिसली और पूरे शहर ने उसे लपक लिया, अब तो हर किसी को उसके घर के बाहर वही चोर दिखता था, कुछ लोगों की मानें तो उसके हाथ में बड़ा सा चाकू भी होता था ।

इधर दरोग जी एकदम निश्चिंत बैठे थे । उन्हें अपनी काबीलियत (जिससे उनका दूर दूर तक कोई नाता नहीं था ) पर पूरा भरोसा था । उन्हें ये भ्रम क्षमा करें यकीन था कि उनके होते हुए किसी भी चोर की इतनी हिम्मत नहीं जो उनके शहर से चुनाव में हारी हुई पार्टी का झंडा तक भी बिना पूछे ले जाए । उन्हें पूरा यकीन था कि यह महज़ एक अफ़वाह है जो अब्दुल नाई ने अपनी दुकान पर गप्पें सुनते सुनते हजामत करवाने के लिए भीड़ जुटाने के मक़सद से उड़ाई है । लेकिन अब अफ़वाह से ही सही लेकिन लोगों में डर था इसीलिए दरोगा जी ने चार सिपाहियों को बलि का बकरा बना कर सारी रात ठंड में निगरानी करने आदेश देते हुए अपनी लूना स्कूटर ज़मीन पर लिटा कर फिर खड़ी करने के बाद गिन कर अठ्ठारह किक मार कर स्टार्ट की झूमते हाथी की तरह घर की ओर चल दिए । इधर दरोगा जी गये उधर चारों सिपाही सपने में चोर को पकड़ने में जुट गये ।

बिना किसी काम के ही थक कर चूर हो चुके दारोगा जी ने खाने पीने से निपटने के बाद अपनी भारी भरकम शरीर को बिस्तर पर लाद दिया । श्रीमती जी बच्चों के साथ मायके गयी हुई थीं इसलिए बिस्तर की थोड़ी सी बची जगह पर भी आज दरोगा जी का ही राज था । पूरी तरह पसर कर ज्यों ही दरोगा जी ने आँखें बंद करने की सोची त्यों ही उन्हें लगा जैसे उनके सर के ऊपर जो खिड़की है बाहर की तरफ से कोई उस खिड़की के नीचे खड़ा है । लेकिन दरोगा जी को तो पूरा यकीन था कि कोई उनके घर के आसपास ताकने की भी हिम्मत नहीं करेगा । दरोगा जी ने आँखें बंद कर लीं लेकिन तभी उसी खिड़की के बाहर से किसी के खांसने की आवाज़ आई । अब दरोगा जी के कान खड़े हो गये, उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपना पसरा हुआ शरीर समेटा और पास पड़ी पिस्तौल उठा कर धीरे धीरे बाहर की ओर बढ़ने लगे । ये सब उन्होंने बड़ी सावधानी और फुर्ती से करने की कोशिश की लेकिन फुर्ती का तो इसमें दूर दूर तक ज़िक्र नहीं था । जितनी देर में दरोगा जी कमरे से निकल कर बरामदे से होते हुए मुख्य द्वार खोल कर बाहर पहुंचे इतनी देर में कोई चोर उनके घर को तीन बार लूट सकता था । ये निश्चित था की चोर भाग गया हो और फिर से दरोगा जी खुद की पीठ बिना बात ही थपथपाएंगे ।

लेकिन ये क्या, खिड़की के पास खड़ा वो चोर खिड़की के बाहर ही खड़ा था । दरोगा जी ने देखते ही गर्जती हुई आवाज़ में कहा "कौन है रे ?"

"चोर हूं साहब ।" दरोगा जी दंग रह गये कि चोर चोरी कर के नहीं मानता और ये है कि पहले ही कह रहा है कि चोर हूँ ।

"तेरी इतनी हिम्मत कि एक तो मेरे घर चोरी करने आता है ऊपर से अकड़ कर कहता है कि चोर हूँ । तुझे डर नहीं लगता मुझसे ?" दरोगा जी को चोर का खुद को इस तरह चोर कहना अपनी तौहीन सा लगा जिस कारण वह भड़क गये ।

"बहुत डर लगता है साहेब ।"

"फिर भी मान लिया कि चोर है । बता क्या क्या चुराया है तू ने । बहुत तंग किया है तू ने शहर वालों को अब करूंगा तुझे जेल में बंद ।"

"नहीं नहीं साहेब हम किसी का कुछो नहीं चुराये । हम चुराने का सोच रहे थे ।"

"ससुरे सोचने से कोई चोर थोड़े हो जाता है । तू झूठ बोल रहा है । चल भाग जा यहाँ से ।" दरोगा जी को उसके मैले कपड़े और कांपती ज़ुबान से बिलकुल लग ही नहीं रहा था कि वो चोर है या फिर दरोगा जी को शायद इस बात पर शक़ था कि वह भला किसी चोर को कैसे पकड़ सकते हैं । ख़ैर जो भी हो दरोगा जी ने उसे भगाने की कोशिश की ।

"नहीं नहीं साहेब, हम चोर ही हैं । कब से आपको ढूंढ रहे थे कि आप हमको पकड़ लो । हमारे ही कारन सारे लोग परेसान हैं । आप हमको जेल में बंद कर दो ।" दरोगा जी उसकी बातों से दंग थे ।

"नहीं रे तेरे पास से कोई भी चोरी का सामान नहीं मिला हम कैसे मान लें कि तू चोर है ।"

"है ना साहेब, हम आज ही एक हलुआई की दुकान से दो समौसे चुराए थे ।" उस मैले कुचैले कपड़े वाले आदमी ने जेब से लिफाफे में लिपटा हुआ एक समौसा निकाल कर दरोगा जी की तरफ बढ़ाया ।

"ओए, तू मजाक करता है, दरोगा मूलचंद से मजाक ।" दरोगा जी को उसकी बात पर गुस्सा आ गया ।

"नहीं साहेब, चोरी तो चोरी होती है ना । आप दरोगा हैं आपको हमको पकड़ना ही होगा ।"

दरोगा जी ने उसे गुस्से और प्यार दोनों तरह से समझाया मगर वो अपनी ज़िद्द पर अड़ा रहा । अंत में दरोगा जी ने गुस्से में भड़कते हुए कहा "जेल जाना मजाक लगता है तेरे को ? चल तेरे को जेल में डालता हूँ, जब तेरा पिछवाड़ा सेका जाएगा ना डंडों से मार कर तब तेरी अकल ठिकाने आ जाएगी ।" दरोगा जी की बात सुन कर चोर कुछ ना बोला बस कांपता रहा ।

उसी समय दरोगा जी ने पुलिस स्टेशन फोन कर के सिपाहियों को बुलाया और चोर को जेल में डाल दिया । खबर पूरे शहर में फैल गयी और शहर में दरोगा जी की जय जयकार होने लगी । पहली बार दरोगा जी को शहर वालों की शाबाशी मिल रही थी मगर दरोगा जी खुश नहीं थे । उन्हें भले ही खुशफहमी पालने की आदत थी मगर सच वो भी जानते थे कि किसी चोर को इतनी आसानी से नहीं पकड़ सकते थे वो और वैसे भी उस चोर में चोर वाली कोई बात ही नहीं थी ।

अगले दिन जब वह थाने पहुंचे तो देखा चोर जेल के एक कोने में गठरी सा बना बैठा हुआ है । उन्होंने मज़ाक उड़ाने वाले अंदाज़ में कहा "क्यों भाई चोर, मार रहे हो मज़े । ठंड में कट रही है अच्छी ?"

"हाँ साहेब बड़ी अच्छी कट रही है ।" चोर ने मुस्कुरा कर जवाब दिया ।

"बड़ा ढीठ है यार तू ! इतनी ठंड में मर रहा है फिर भी मुस्कुरा कर कहता है अच्छी कट रही है ।"

"साहेब जी, जब अंजान शहर में आपके सर पर छत नहीं होती ना तब आप गर्मियों में तो कहीं भी सो जाते हो लेकिन जब सर्दियाँ आती है और रात के समय ठंडी हवा और ओस आपको चमड़ी को छीलते हुए आपकी हड्डियों तक को गलाने लगती है तब मुफ्त में जान बचाने के लिए सबसे सही जेल ही नज़र आती है । ओढ़ने को भले ही कुछ ना मिले मगर कम से कम सर छुपाने को और खाने को तो मिल ही जाता है । मैने चोरी नहीं की कभी मैं तो बस भटकता हुआ ऐसी जगह ढूंढता था जहाँ ठंड से थोड़ी राहत मिल जाए मगर जब हद हो गयी तब मैं आपके घर गया ।" चोर की पीड़ा सुन कर दरोगा जी का मन पसीजने लगा ।

"तो कोई काम क्यों नहीं करता ?"

"अनाथ हूँ साहेब, आधी ज़िंदगी एक शहर से दूसरे शहर भटकते हुए निकाल दी । हम इंसानों ने खुद ही एक दूसरे का विश्वास इतना कमज़ोर कर दिया है कि एक अंजान को कोई अपने यहाँ काम नहीं देता ।" दरोगा जी कुछ समय के लिए चुप हो गये । फिर उन्होंने जेल का दरवाज़ा खोल कर उसे बाहर बुलाया ।

"चल मेरे साथ । तुझे काम भी दिलाता हूँ और रहने के लिए घर भी । वैसे तो मेरे लिए भी तू अंजान ही है मगर किसी को तो विश्वास करना ही पड़ेगा और जानता हूँ तू मेरा विश्वास नहीं तोड़ेगा ।" वो चोर जो असल में ज़रूरतमंद था कि सिर्फ आँखें में चमक रहे आँसू बोल रहे थे जो बार बार दरोगा जी का धन्यवाद कर रहे थे । दरोगा जी को आज पहली बार खुद पर दिल से गर्व हो रहा था ।

Keywords :- Hindi Story, Needs, Thief, Police  

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