गुड़ सी मोहब्बत (कहानी)

- धीरज झा  “अरे  वो देखो बाबा आ गए।” मैदान के एक कोने में सुस्ता रहे लड़कों में से एक ने कहा। इसी के साथ सभी बच्चे बाबा के लौटने का इ...


- धीरज झा 
“अरे वो देखो बाबा आ गए।” मैदान के एक कोने में सुस्ता रहे लड़कों में से एक ने कहा। इसी के साथ सभी बच्चे बाबा के लौटने का इंतजार करने लगे।
“अरे यार ये बाबा रोज़ कब्रिस्तान में क्या करने जाते होंगे।”
“हमारी दाई बता रही थी कि ये बाबा भूतों से बात करते हैं। हर रोज़ उनका हाल चाल पूछने जाते हैं।” किसी गुप्त सूचना की तरह उस लगभग गंजे से लड़के ने धीमे से ये बात कही
“अरे चुप हो जाओ, हर रोज तुम्हारे पास यही कहानी होती है। इस दफे दसवीं तड़प जाओगे और अभी भी तुम सुनी सुनाई बात पर विश्वास करते हो।” उन लड़कों में सबसे बड़ी उम्र के लड़के ने समझदारी भरे लहजे में कहा।
“अरे नहीं भइया, ये सच कह रहा है। हमने कई बार बाबा को अकेले बतियाते देखा है।” गमछा से अपना पूरा मुंह लपेटे लड़के ने गंजे लड़के की बात का समर्थन किया।
उस बड़े लड़के ने छोटे लड़कों की बात पर कुछ दे सोचा और फिर कहा “ठीक है जब बाबा भूतों से बात करते हैं फिर हमें यहां नहीं रुकना चाहिए। कौन जाने वो अपने साथ किसी भूत को पकड़े आएं।”
बड़े लड़के की बात सुन कर बाकी सभी लड़के एक साथ बोले “हां हम चले जाएं और आप बाबा से सारी गुड़ उड़ा ले जाओ।”
“अच्छा तो गुड़ भी खाओगे और बाबा की बुराई भी करोगे। ठहरो बाबा को बतात हूं।”
“क्या बताना है राकेश बाबू। बता दो। ज़माना गुज़र गया हमको किसी ने कुछ बताया ही नहीं।” सभी लड़कों की आवाज के बीच एक बूढी आवाज गूंजी। सब चुप हो गए।
“अस्सलाम वालेकुम बाबा।”
“वालेकुम अस्सलाम बच्चों। और सब खैरियत न ?”
“हां बाबा सब अच्छा है।”
“तो राकेश मियां, आपने बताया नहीं कि हमें क्या बताने वाले थे।”
“अरे कुछ नहीं बाबा, जानते ही हैं सब बच्चों को।” लड़के ने बाकी सबको बच्चा बता कर खुद के सयाने होने की पहचान दी।
“हाहाहा, हां सब बच्चे हैं ही बहुत ख़राब एक आप ही तो होनहार हैं। बाकी मैं इनके अब्बा लोगों को यहां गुड़ बांटता आया हूं जानता हूं ये क्या कह रहे होंगे।” सभी बच्चों के गले सूखने लगे कि आज तो बाबा गुस्सा जाएंगे। अब तो गुड़ भी नहीं मिलेगी और बाबा भूत पीछे छोड़ेंगे वो अलग।
“नहीं नहीं बाबा ऐसा वैसा कुछ थोड़े ही न कह रहे थे।” उस गंजे बच्चे ने सफाई दी
“तो जैसा तैसा कह रहे थे वैसा वैसा ही बता दो।” बाबा ने चुटकी ली।
“वो ये कह रहा था कि आप भूत से बातें करते हैं।” गमछे से मुंह ढके जिस लड़के ने गंजे लड़के की बात का समर्थन किया था उसी ने राज खोल दिया जिसके बाद बाबा बहुत जोर से हंसे। बाबा की हंसी ने सबको डरा दिया।
बाबा ने आगे कुछ नहीं कहा उन्होंने सभी बच्चों को गुड़ दिया और पेड़ की छांव में हमेशा की तरह बैठ गए। गुड़ मिलने की देर थी कि सभी लड़के वहां से दुम दबा कर भाग खड़े हुए। बाबा उन्हें जाता देख एक बार को मुस्कुराए और अपने आंखें बंद कर कुछ सोचने लगे।
“बाबा।” एक आवाज ने बाबा का ध्यान खींचा। उनके हिसाब से सभी लड़के जा चुके थे।
“अरे राकेश मियां, आप अभी तक गए नहीं। जाइए नहीं तो भूत बुला लेंगे हम।” बाबा हंसे लेकिन इस हंसी में एक पीड़ा थी। हम सब हंसी को हंसी की तरह देखते हैं। आंसुओं की किस्में हमने तय कर दीं लेकिन हंसी हमेशा हमारे लिए ख़ुशी का प्रतीक ही रही। लेकिन कई बार इस हंसी में जो दर्द छुपा होता है वो दुःख के आंसुओं से कई ज्यादा गाढ़ा और पीड़ादायक होता है।
“बाबा हम जानते हैं आप न तो यहां भूतों से बात करने आते हैं और न ही आपके पास कोई भूत है।”
“फिर तो आप सच में समझदार हैं। अच्छा अब ये बताइए कि आप हमसे क्या चाहते हैं जो अभी तक गए नहीं।”
“बाबा मैं बस इतना जानना चाहता हूं कि आप यहां हर रोज़ क्यों आते हैं। सब तो कहते हैं कि आप कई बार रात में भी यहां आकर बैठे रहते हैं।”
“है कोई अपना उसी से मिलने आता हूं।”
“है ? लेकिन बाबा यहां तो सिर्फ ‘था’ रहते हैं।”
“मेरे बच्चे किसी को भी ‘था’ हमारी सोच बनाती है। जिंदगी तो बस मौजूदगी छीन कर ले जाती है, खयाल नहीं। और खयालों का जहान ऐसा है कि जो वहां का हो गया वो फिर कभी ‘था’ नहीं होता।” समझदारी दिखने वाले लड़के के लिए अब ये ‘था’ ‘है’ का खेल बहुत पेचीदा होता चला जा रहा था।
“बाबा सही से बताइए ना वो कौन है जिसे आप मिलने आते हैं, क्या आप सच में भूतों से बात करते हैं ?”
“नहीं राकेश मियां भूतों से हमारा कभी कोई राबता नहीं रहा। यहां तो कोई अपना है जिसके स्नेह की डोर हमें हर रोज यहां खींच लाती है।”
“कौन है वो अपना।” लड़के के चेहरे की उत्सुकता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई।
“इसके लिए तो आपको एक कहानी सुननी पड़ेगी।”
“हाँ मुझे कहानियां बहुत पसंद हैं।”
“सिर्फ पसंद हैं या उन्हें समझते भी हैं।”
“समझता हूं बहुत अच्छे से।”
“हम्म्म्म, ठीक है।”
“तो सुनाइए।”
“बहुत पुरानी बात है। नज़रें भले आज धुंधला देखने लगी हैं लेकिन यादों में हमें अब भी सब साफ साफ दीखता है। हम आपको तब की बात बता रहे हैं जब आपके बाबा भी बिना चड्डी के घूमा करते थे। उन दिनों गांव टोलों में नहीं बंटा था।सियासी हवा तब गाँवों तक नहीं पहुंची थी। मुस्लिम का हिन्दुओं के दरवाजों पर खूब आना जाना था। न हम तिलक ठोप देख कर डरते थे न वो हमारी दाढ़ी का खौफ खाते थे। आपको शायद सुन कर हैरानी हो कि तब किसी घर में ताला नहीं लगता था। किसी को अगर एक दो दिन के लिए कहीं जाना हो तो वो पड़ोसियों के हवाले घर छोड़ कर चला जाया करता था। सुबह की नमाज़ें और आरती एक साथ ही हुआ करती थी। वो आस्था के सम्मान का दौर था, इंसानियत का दौर था। लेकिन…” बाबा खामोश हो गए, कुछ सोचने लगे।
“लेकिन क्या बाबा…” लड़के ने टोका
“लेकिन मोहब्बत तब भी गुनाह ही थी। शायद आज से बड़ा गुनाह। और मैं तब का ही गुनेहगार हूं। मैंने मोहब्बत की। उस लड़की से जिसका कोई नहीं था। मैंने गुनाह किया उसके साथ जिंदगी गुजारने का सपना देखने का। मैंने बचपन से उसको मार खाते देखा था, उसकी आंखों से बहने वाला एक एक आसूं तेजाब की तरह मेरे दिल पर फफोले बना रहा था। मैंने एक उम्र तक उसे रोज़ अपने रिश्तेदारों के हाथों पिटते देखा, अच्छे खाने को तरसते देखा। मेरे घर से अचानक गुड़ गायब हो जाना, मां की बनाई पिन्नियों का कम होना या कोई अच्छा पकवान बनने पर उसकी मात्र घाट जाना कोई इत्तेफाक नहीं था। ये मैं ही था जो उसके लिए ये सब चुराया करता था।
अजीब खेल खेला था नियति ने। एक परियों सी खूबसूरत लड़की की ख़ुशी की कीमत बस एक भेली गुड़ थी। वो गुड़ देख कर इतनी खुश हो जाती कि उससे लिपट कर मर चुकी चींटियों का ख्याल भी उसे न आता। वो गुड़ देख कर खुश होती और मैं उसकी खुशी देख कर सुकून पा जाता। उसे देख कर ही मैंने जाना था कि ख़ुशी पाना कितना आसान होता है। मैं रोज़े रखता था ताकि वो सहरी और इफ्तारी में कुछ अच्छा खा सके। दिक्कतें हमारे यहां भी थीं लेकिन उन दिक्कतों से बचाने के लिए मेरे पास अम्मा और अब्बा थे। मुझे बचपन में ही ये समझ आ गया था कि अल्लाह ने मुझे इसकी देखरेख के लिए ही पैदा किया है।” बाबा असमान की और देखते हुए उन दिनों में खो गए थे और बाबा की कहानी के साथ साथ लड़का भी उनके पीछे पीछे चल दिया था।
“वक्त बीतता रहा और मेरा दिल में उस लड़की के लिए दबा स्नेह का बीज प्रेम का विशाल शजर हो गया। और वो लड़की, उसे तो शायद मुझसे उसी दिन मुझसे मोहब्बत हो गई थी जिस दिन मैंने पहली बार उसके आंसू पोंछे थे। जब तक हमारी मोहब्बत छुपी हुई थी तब तक वो अनाथ थी, अपने रिश्तेदारों पर बोझ थी और जिस दिन इस मोहब्बत की खुशबू हर तरफ फैली उसी दिन उसे अपने घर की इज्जत बना लिया था उसके रिश्तेदारों ने।
जो सूखी रोटी खाने पर मजबूर थी वो अब उस महल की राजकुमारी हो गई थी। वो खूब रोई लेकिन उसका रोना तो रोटी तक के लिए नहीं सुना जाता था फिर मोहब्बत के लिए कहां से चुना जाता। उसकी शादी कहीं और तय कर दी गई। लेकिन मेरी रोज उसे गुड़ देने की आदत नहीं छूटी। ये गुड़ ही था जिसके कारण लोगों द्वारा इतना ज़हर फ़ैलाने के बावजूद हमारे रिश्ते की मिठास हमेशा बनी रही।” प्यार मोहब्बत के नाम पर लड़के ने अभी तक कुछ फिल्में ही देखी थीं। मोहब्बत की ये सच्ची दास्तां सुनना उसके लिए नया अनुभव था लेकिन इसके बावजूद उसकी आंखों के कोर भीग चुके थे।
“उसके निकाह का दिन आ गया। मैंने सोच लिया था कि मैं मोहब्बत के लिए अपने पूरे समाज से बैर मोल लूंगा। मैंने सब हिसाब लगा लिया था कि उसे लेकर यहां से कहां जाना है, क्या करना है, किस तरह जिंदगी बितानी है लेकिन मैं इन सब बातों का हिसाब लगाते हुए ये भूल गया था कि आखिरी हिसाब उस अल्लाह का ही होता है। यहां भी अल्लाह मुझसे पहले अपना हिसाब लगाये बैठा था। मेरे पहुंचने तक शादी का घर मातम के घर में तब्दील हो चुका था। वो पागल लड़की कुछ देर इंतजार भी न कर पाई और उसने ज़हर खा लिया था। लोगों की भीड़ के बीच पड़ा उसका जिस्म अपनी जल रही रूह को बाहर निकाल में जुटा था लेकिन उसकी रूह मुझसे मिलने की जिद्द पर अड़ी थी। भीड़ को हटाते हुए मैं उसके पास पहुंचा। उसका सिर मैंने अपनी गोद में लिया। शायद इस विरोध होता लेकिन न जाने क्यों उस वक्त हर कोई शांत था। अभी सिर्फ और सिर्फ मेरी चीखें और दो पलों की जिंदगी के लिए मौत से लड़ती सांसों की आवाज वहां गूँज रही थी।”
उसने मुझे देखते ही अपनी बंद हो रही आंखों को खोला और अपने होंठ हिलाए “आ गए तुम! गुड़ लाए हो ?”
उसके सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि आज मैं गुड़ नहीं लाया था। मैंने सोचा कि मैं गुड़ कैसे भूल सकता हूं, हमारे रिश्ते की बुनियाद है ये गुड़ और मैं इसे ही भूल गया।
“मुझसे एक वादा करो।” वो ऐसे बोली जैसे बहुत जल्दी में हो। हां वो जल्दी में ही तो थी। मैंने सिर हिला दिया।
“मैं वापस आउंगी। तुम मेरा इंतजार…?” उसकी सांसें मौत से लड़ते हुए हार चुकी थीं। आंखें खुली रहीं और उसकी आखिरी बात उसकी हलक में ही रह गई।  मैंने उसकी आंखें बंद करते हुए कहा “हां, इरम मैं हमेशा तुम्हारा इंतजार करूंगा। तुम्हे मेरे लिए लौट कर आना होगा” वो चली गई थी। मैं रोता रहा बिलखता रहा। मैंने किसी को उसे हाथ न लगाने दिया। वो जिंदा नहीं थी इसी लिए न तो किसी के घर की बेटी थी, न इज्जत। भले ही अब वो दूसरों के लिए लाश थी मगर मेरे लिए आज भी उसके उतने ही मायने थे जितना उसके जिंदा होने पर।” बाबा अब ठीक उसी तरह खामोश हो गए जैसे किसी तूफान के बाद कुदरत शांत हो जाती है।
लड़का बाबा के हाथ में रखे गुड़ को एक टक देखे जा रहा था। बाबा को शायद अब ये बताने की ज़रूरत नहीं थी कि वो हर रोज यहां किस्से मिलने आते हैं। लड़का ये भी समझ चुका था कि बाबा किसी भूत से बात नहीं करते। लेकिन उसके दिमाग में एक बात लगातार घूम रही थी जिसे वो पूछना चाहता था। कुछ पल रुक कर उसने बाबा से सवाल किया “बाबा आप तो मुस्लिम हैं न और मुस्लिम तो पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखते न। फिर वो वापस कैसे आएंगी ?”
लड़के की बात पर बाबा पहले मुस्कुराए और फिर एक लंबी सांस खींच कर बोले “प्रेम का अपना अलग ही धर्म है। यहां सिर्फ वही रिवायतें मानी जाती हैं जिसमें मिलने की उम्मीद जिंदा रहे। इस प्रेम और उससे मिलने की उम्मीद ने मुझे भी काफ़िर बना दिया। ये प्रेम एक दिन हमें ज़रूर मिलाएगा…”
बाबा के इन शब्दों के साथ ही उनकी नजरें कब्रिस्तान की और जा टिकीं और फिर टिकी रहीं। उनके चेहरे पर इस वक्त वही मुस्कान थी जो उन दिनों उस लड़की को देखते ही खिल जाया करती थी. लड़के के आंखों में आये पानी के सूखने पर उसे ये मालूम हुआ कि बाबा का इंतजार आज समाप्त हो गया है। लड़के ने कुछ देर बाबा को गौर से देखा और फिर गांव की तरफ ये चिल्लाता हुआ भगा “बाबा चले गए, बाबा चले गए।”

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