लाल आंखें (कहानी)

-धीरज झा  किसी  इंसान के अंदर छुपे जानवर ने उसके अंदर की इंसानियत को मार दिया था। नतीजन उस पर हावी हुए जानवर ने एक मासूम को अपने पंज...


-धीरज झा 
किसी इंसान के अंदर छुपे जानवर ने उसके अंदर की इंसानियत को मार दिया था। नतीजन उस पर हावी हुए जानवर ने एक मासूम को अपने पंजे में दबोच लिया। कुछ दिनों से यही चर्चा शहर भर में घूम रही थी। दुर्भाग्य से ये जानवर अप्रवासी था। चुनाव सर पर थे और राजनीति को आप्रवासियों के मुकाबले स्थानीय लोगों से ज्यादा फायदा होने वाला था सो मरहम के नाम पर अप्रवासियों को लेकर स्थानीय लोगों के मन में जहर घोला जाना शुरू हो गया। आम तबके के लोग जल्दी इस जहर की चपेट में नहीं आते, उन्हें बस डर लगने लगता है। और दुर्भाग्य से जब ये डर सच बनता है तब ये जहर काम करता है। अभी फ़िलहाल शहर के माहौल में डर था। रात होते ही ये डर कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता था जो स्वाभाविक है।
लोग बाहर काम करने या पढ़ने वाली अपनी बहू बेटियों को हिदायत दे चुके थे कि घर जल्दी आना है। देश भर में हुई किसी भी घटना का असर सबसे पहले ऐसी महिलाओं पर ही होता है जो मर्यादा के अंदर रहना जानती हैं। राशन महंगा तो रसोई के लिए हिदायत, कहीं किसी बच्चे को कोई बहरूपिया उठा ले जाए तो बच्चों के लिए हिदायत, कोई वारदात हो जाए घर से न निकलने या घर जल्दी आने की हिदायत।  
उस रात रिम्मी को भी घर आने में देर हो गई थी। ऑफिस से घर यही कोई साढ़े चार किमी दूर था। आज तो माधव भी घर नहीं था जो उसे पिक कर लेता ऑफिस से। वैसे तो रिम्मी साहसी लड़की थी लेकिन शहर भर में मंडरा रहे इस भय ने उसे भी आशंकित कर दिया था। मगर अब चारा भी तो कोई नहीं था। जो होगा देखा जाएगा जैसा मन बना कर रिम्मी ऑफिस से निकल कर चौराहे पर पहुंची। दिन में जो सड़क एक मिनट नहीं शांत रहती रात आते आते तक सन्नाटे से जुगलबंदी कर बैठी थी।
अंधेरा रिम्मी को रह रह कर चुनौती दे रहा था। उसकी चुनौती स्वीकार करने के सिवा कोई और चारा भी तो नहीं था न रिम्मी के पास। इतनी देर में उसे एक रिक्शे वाला आता दिखा। उसने हाथ दिया, लेकिन जैसे ही रिक्शेवाला पास आया रिम्मी सहम सी गई। सहमे भी कैसे न, उसकी शक्ल सूरत ही ऐसी थी। उसकी लाल लाल लटकी हुई आंखें बता रही थीं कि उसने किसी चालू नशे का हद से ज्यादा सेवन किया है। बाल बिखरे हुए, रंग ऐसा कि रात का अंधेरा उसके आगे चमकदार लगे, सर पर ताज़ा ताज़ा किसी गहरी चोट का निशान जैसे बता रहा हो कि इसने अभी अभी मार खाई है।
“कहां जाईब मैडम जी…”
“अं…..!!!”
“बताइए कहां छोड़ दें।” रिक्शेवाले की आवाज में थरथराहट सी थी। इसने रिम्मी को और डरा दिया।
“न न नहीं कहीं नहीं जाना है।” रिम्मी ने हडबडाते हुए कहा। कई मौकों पर शरीर के अंग दिमाग के आदेश का इंतजार नहीं करते जिस तरह रिम्मी के बाएं हाथ ने नहीं किया और झट से पहले से सही दुप्पटे को सही करने की कोशिश की।
“समय पहिलहीं बहुत जादा हो गया है। जईसे जईसे बेर (समय) बीतेगा साथ साथ आने जाने का साधनों कम होता जाएगा।” रिक्शेवाले ने समझाने की कोशिश की।
“नहीं नहीं, मुझे कोई लेने आ रहे हैं। मुझे नहीं जाना।” मगर वो नहीं मानी
“अरे अच्छा हुआ भईया आप दिख गए वरना दिक्कत हो जाती, अजीमपुर तक जाना है।” इन दो आवाजों के बीच तीसरी आवाज गूंजी। किसी अन्य सवारी की थी।
“माफ़ करिए बाबूजी, उधर नहीं जाएंगे। आप आगे से कोनो औरो रिक्शा पकड़ लीजिए, ऊहां से अजीमपुर जाने का बहुते सबारी मिल जाएगा।” दूसरी सवारी रिक्शेवाले के इनकार से आगे बढ़ गई। इसके बाद तो रिम्मी का संदेह यकीन में बदल गया। हो न हो ये गलत आदमी है इसीलिए इसने उस आदमी को ले जाने से इनकार किया। रिक्शेवाला वहीं एक बगल में रिक्शा खड़ा कर टहलने लगा।

15 मिनट बाद

“मैडम जी कोई नहीं आया आपको लेने, आप कहें तो आपको छोड़ दूं, रात जादा हो गया है।” इतनी देर में रिम्मी ने किसी से मदद मांगने के लिए अपना फोन निकला मगर बुरे समय में फोन भी साथ छोड़ गया। इसके साथ ही रिक्शेवाले की लाल लाल आंखें उसे लगातार खुद को ही घूरती नज़र आ रही थीं। उसके मन में बैठ गया कि आज उसके साथ कोई अनहोनी होनी तय है। सोच में पड़ गई थी रिम्मी।
रिक्शेवाला समझ गया, वो धीरे धीरे रिम्मी की तरफ बढ़ा। अपने पीठ पीछे से उठ रही कदमों की आहट को पास आता महसूस कर रही थी रिम्मी। जब तक रिक्शेवाला उसके नजदीक आता तब तक वो एक दम से पलटी। रिक्शे वाला उससे कुछ ही दूरी पर था। उसका दायां हाथ पीछे की तरफ कुछ इस तरह था जैसे वो कुछ निकल रहा हो। रिम्मी समझ गई की उसका कल्याण नहीं आज। वो अपनी पूरी ताकत लगा कर रिक्शेवाले पर झपटने को एक दम तैयार थी लेकिन जब तक वो झपटती रिक्शेवाले ने वो निकाल लिया जिसके लिए उसने हाथ पीछे किए थे। रिम्मी ने खुद को वहीं रोक लिए। रिक्शे वाले के हाथ में उसका पर्स था। उसने पर्स में से अपना आई डी कार्ड निकाला।
“मैडम जी, हम जानते हैं माहौल बहुत ख़राब चल रहा है, हम जैसा बाहर से आया लोग को लेकर तो औरो जादा ख़राब है। अपना ही देस में हम लोग दुसमन दिखने लगे हैं सबको। लेकिन मैडम जी आपका इहां अकेले रुकना भी सही नहीं है न। थोडा देर में आपको एको सही आदमी नहीं मिलेगा इहां, नसेड़ी सब का हुडदंग शुरू हो जाएगा। आप हमारा आधार कार्ड और हमारा फोटो खींच के अपना घरवाला सब को भेज दीजिए। या फिर भी मन न माने तो 100 नं पर फोन लगा के बता दीजिए कि हम यहां से यहां जा रहे हैं अगर हम 20 मिनट में दोबारा फोन न करें तो…” रिम्मी जान रही थी कि ये साजिश भी हो सकती है भोला बन कर उसे फंसाने की मगर फिर भी न जाने क्यों उसके विचार उस रिक्शेवाले के लिए बदलने लगे। वो उसकी बात पूरी होने से पहले ही चुप चाप रिक्शे पर ये सोच कर बैठ गई कि अब कोई रास्ता नहीं, हो सकता है ये मुझे घर भी पहुंचा दे लेकिन यहां खड़ी रही तो पक्का कुछ बुरा हो जाएगा। जो होगा देखा जाएगा।
रिक्शेवाले ने उसे रिक्शे पर बैठता देख चैन की सांस ली। वो भी पीछे से रिक्शे की काठी पर जा बैठा। रिक्शेवाला बिना कुछ बोले रिक्शा खींचता रहा। रिम्मी बस यही प्रार्थना करती रही कि आज वो सही सलामत घर पहुंच जाए। कल से इतनी रात तक ऑफिस में रुकेगी ही नहीं।
सर्दियों के आने की दस्तक के साथ हवा में नमी बढ़ गई थी। दिन भले ही शर्ट में कट जाता लेकिन रात को किसी पतली चादर या मोटे कपडे की जरुरत पड़ ही जाती। रिक्शेवाला एक शर्ट में ही रिक्शा खींचे जा रहा था। जैसे जैसे रिम्मी का घर नजदीक आ रहा था वैसे वैसे उसकी जान में जान वापस आ रही थी। पूरे 20 मिनट रिक्शा खींचने के बाद उसने रिम्मी को घर पहुंचा दिया। अब रिम्मी एक दम सुरक्षित महसूस कर रही थी खुद को।
वो रिक्शे से उतरी और रिक्शेवाले की और पैसे बढ़ाते हुए कहा “शुक्रिया आपका। आप न आते तो न जाने कैसे घर पहुंचती।”
“कोनो आता नहीं मैडम जी, ईश्वर भेज देता है और हम तो आपका शुक्रिया कहेंगे जो आपने हमको ईश्वर का हुकुम पूरा करने का मौका दिया।”
रिम्मी के चेहरे की मुस्कराहट लौट आई थी, उसने तंज सा मारते हुए कहा “आपकी बातों से तो आप बहुत धार्मिक और अच्छे इंसान लग रहे हैं फिर इतना नशा क्यों करते हैं। इसी नशे की वजह से तो मैं डर गई थी। परिवार का सोचिए। ये लाल लाल ऑंखें बता रही हैं कि आपने नशा लेने की हद कर रखी है।”
इस पर रिक्शेवाला मुस्कुराया “मैडम जी एक कहावत है कि गरीब का बच्चा जब दो दिन खाना न खाने पर कमजोरी के मारे लडखडाता चलता है तो लोग कहते हैं इसने दारू बहुत पिया है। वही हिसाब हमारे साथ है। नशे को तो हम आज तक छुए नहीं।”
“फिर ये आंखें क्यों लाल हैं आपकी?”
“बेटी के इस्कूल का फीस देना है। पिछला महीने का 5, 7 दिन बीमारी खा गया, एक रुपया का काम नहीं कर पाए। अब इस्कूल या घर का खर्चा बीमारी का बहाना थोड़े न मानता है। इहे कारण है कि अभी रात दिन काम कर रहे हैं। चार रात से एक मिनट नहीं सोए हैं इहे कारण आंख लाल है। दो दिन पाहिले का बात है चक्कर खा के गिर पड़े सर पर चोट लग गया. अब पहिले जईसा बात कहां रह गया. लेकिन हमारा क्या है, हमारा चोट और हम तो ठीक हो ही जाएंगे लेकिन बच्चिया को इस्कूल से निकाल दिए तो उसका मन टूट जाएगा। बहुत आगे बढ़ना है उसको न, इसी लिए चाहते हैं उसका मन नहीं टूटे।” रिक्शेवाले की बात सुन कर रिम्मी उसकी आंखों में देखते हुए खुद का शर्मिंदा हो रहा चेहरा देख रही थी। असल में गलती रिम्मी की भी नहीं थी। समाज में छुपे भेड़ियों का डर लोगों पर इतना हावी हो गया है कि अब आंखें सही और गलत पहचानने में अकसर गलती कर जाती हैं। रिम्मी कुछ बोल ना पाई।  
“कित्थे रह गई सी रिम्मी। किन्नी देर ला दित्ती। उत्तों तेरा फोन वी नइ सी लग रेहा। असीं तां डर ही गए सी, तेरे बाऊ जी चल्ले सी तेनू लब्बण। नाले आ कौन आ ?” दोनों के बीच में एक बूढी मगर फिकरमंद आवाज ने एंट्री की थी जिसने एक साथ ही कई सारे सवाल पूछ डाले थे।
“बीजी इन्होने ही मुझे आज घर तक पहुंचाया है वरना सच में डरने वाली बात हो जाती।” रिम्मी ने उन बुजुर्ग महिला से लिपटते हुए सारी बात बताई।
“जींदे रहो बेटा जी, वाहेगुरु आपको खूब तरक्की दे। अंदर आओ चाय पी लो फिर जाना।” भारत में मेहमानों को चाय पूछने का कोई समय निर्धारित नहीं है। ये आश्चर्य है कि अभी तक चाय को भारत का राष्ट्रीय पेय क्यों नहीं घोषित किया गया। खैर रिक्शेवाले ने देरी का बहाना कर चाय की बात टाल दी और अपना रिक्शा मोड़ने लगा।
“मेरा नंबर रख लीजिए, किसी मदद की जरुरत हो तो बताइएगा।” रिम्मी ने अपना कार्ड रिक्शेवाले की तरफ बढ़ाते हुए कहा।
रिक्शेवाले ने रिम्मी से उसका कार्ड लिया और जेब से पेन निकालते हुए कार्ड के पीछे एक नंबर लिख कर कार्ड को दोबारा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा “मैडम जी मदद लेने की आदत नहीं डाली हमने। हम मानते हैं मदद मांगना इंसान को कमजोर कर देता है और वैसे भी आप एक बार मदद कर सकती हैं बाकी तो हमें ही देखना है। हां हमने आपके कार्ड पर अपना नंबर लिख दिया है। कभी भी देर हो जाए तो हमें फोन कर दीजिएगा। हम आसपास हुए तो ठीक नहीं तो हम किसी भरोसेमंद को भेज देंगे।” इतना कह कर रिक्शेवाला मुस्कुराते हुए रिक्शे पर सवार हो गया।
इधर रिम्मी अपने उस मददगार को हैरानी से देखते हुए बीजी के साथ अपने घर की ओर बढ़ चली। चलते हुए बीजी ने रिम्मी से कहा “और कुछ ‘कंजर’ लोग कहते हैं भइये (पंजाब में बिहार यूपी के उन लोगों को भइया बोला जाता है जो रिक्शा चलाने, सब्जी बेचने,या मजदूरी करते हैं) बुरे होते हैं।” बीजी की बात ख़तम होने के साथ ही रात के उस शांत से माहौल को एक ठहाके ने गुदगुदी की। ये ठहाका रिक्शेवाले का था जो रिक्शे के आगे बढ़ने के साथ साथ गायब हो गया।
नोट : ये कहानी केवल पंजाब या फिर वहां रोजी रोटी की तलाश में गए यूपी बिहार के लोगों के विषय में नहीं। ये कहानी है हर उस इंसान की जो अपना घर छोड़ कर किसी दूसरी जगह जाता है और अपने जैसे किसी एक की गलती के लिए वहां रह रहे सब लोगों की नफरत झेलता है। आंख बंद कर विश्वास करना सही नहीं तो फिर आंख बंद कर अविश्वास कैसे सही हो सकता है ?
फीचर इमेज : गूगल से साभार 
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