फुटबॉल ग्राउंड में लड़कों का भ्रम तोड़ने वाली वो बच्ची आज 'सोने की चिड़िया' बन गयी

एक छोटी सी बच्ची अपने चचेरे भाई के साथ फुटबॉल ग्राउंड पहुंचती है। एक बड़ी सी गेंद के पीछे सबको भागता देख बच्ची भी रोमांचित हो जाती है। ...


एक छोटी सी बच्ची अपने चचेरे भाई के साथ फुटबॉल ग्राउंड पहुंचती है। एक बड़ी सी गेंद के पीछे सबको भागता देख बच्ची भी रोमांचित हो जाती है। उसके अंदर खेलने की तीव्र इच्छा उठती है। अपने चचेरे भाई से कहती है कि उसे भी खेलना है मगर चचेरा भाई उसे ये कह कर टाल देता है कि ये खेल लड़कों के लिए है, तुम लड़की हो, थक जाओगी। मगर लड़की जिद्दी थी मानने वाली कहां थी। भाई ने भी सोचा थोड़ी देर दौड़ेगी फिर खुद थक कर बैठ जाएगी। बच्ची को मैदान में उतरता देख सभी लड़के हंसने लगे। खेल शुरू हुआ, लड़के बॉल के पीछे भागने लगे। काफी देर तक खेल चलता रहा, सब लड़के धीरे धीरे थक कर सुस्ताने लगे। सबके चेहरे से हंसी गायब थी। मैदान में जो आखिरी हंसी गूंज रही थी वो थी उस बच्ची की। वो अभी भी बॉल को नचाए फिर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे अभी अभी मैदान में आई हो, थकान ने तो जैसे छुआ भी नहीं था उसे। कई साल बीत गए इस बीच बहुत कुछ हुआ और इसी के साथ वो बच्ची दुनिया के सामने आई ! कब ……?
2018 में । देश था फिनलैंड, शहर था टेम्पेयर, अयोजन था आईएएएफ अंडर 20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर की दौड़ का। अपने अपने देशों का प्रतिनिधित्व कर रहीं महिला धावकों में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही वो बच्ची भी थी जो कभी अपने चचेरे भाई को फुटबॉल खेलता देख फुटबॉल की स्ट्राइकर बनना चाहती थी। अभी तक उसका नाम उसके कोच और उसके जान पहचान वालों तक ही सीमित था। कोई उसका नाम भला जानता भी क्यों किसी को क्या पता कि वो पतली दुबली सी लड़की सारे देश के सम्मान का दायित्व लिए खुद को दौड़ने के लिए तैयार किये बैठी है। भारत में एथलेटिक्स का हाल तो जानते ही हैं फिर भला कोई क्यों भारत की इस बेटी से उम्मीदें रखता। दौड़ शुरू हुई, वो बच्ची दौड़ में सबसे पीछे थी। शुरूआती 35 सैकेंड में वो अंतिम तीन में भी नहीं थी। ऐसे में इक्का दुक्का किसी ने अगर उम्मीदें लगायी भी होंगी उससे, तो वो इसके बाद दम तोड़ती हुई दिखने लगीं। एक एक सैकेंड के साथ खेल बदल रहा था। भारत की जिस बेटी ने सबसे पीछे से शुरुआत की थी वो अब एक एक करके सबको पछाड़ने लगी थी। बेसुध पड़ी उम्मीदों में अब थोड़ी हुकहुकी सी महसूस होने लगी थी। खेल अपने आखरी चरण में था, अंतिम सौ मीटर में वो बच्ची चौथे स्थान पर थी। जीत अब तीन कदम दूर थी। वो सबको पछाड़ते हुए आगे बढ़ रही थी इस बीच रोमानिया की आंद्रिया मिकलोस ने उसे पीछे कर दिया लेकिन ये बेटी दबने वाली नहीं थी, उसे आज हारना नहीं था। यहां से उसने अपनी सारी ऊर्जा लगा दी और इसी ऊर्जा ने वो कीर्तिमान रच दिया जिसके लिए सारा देश कब से सपने देख रहा था। भारत की बेटी ने 51.46 सैकेंड में ये रेस जीत कर अपना नाम इतिहास के पन्नों पर दर्ज करा लिया था। उसके पीछे रोमानिया की एंड्रिया मिक्लोस 52.07 सेकेंड के साथ दूसरे और अमरीका की टेलर मैनसन 52.28 सेकेंड के साथ तीसरे स्थान पर रहीं।
दौड़ खत्म होते ही उस बच्ची ने पाया कि वो और उसका देश जीत गए हैं। इसके बाद भी वो रुकी नहीं पूरे मैदान में अपने हाथ लहरा कर दर्शकों को अपनी आवाज तेज करने का इशारा करती रही। शायद वो कहना चाहती थी कि निकाल दो अपने अंदर की वो सारी भड़ास, गोल्ड न मिलने की अपनी वो सारी मायूसी जो तुम आज तक दबाते आये हो आज खुशी के शोर में बहार निकल दो। ऐसा लग रहा था मानो वो कह रही हो कि जब सुविधाओं से वंचित हैं तब ये कर दिखाया तो सोचो अगर सुविधाएं मिलीं तो हम क्या नहीं कर सकते। इसके बाद उस बच्ची ने अपने कोच को ढूंढा उनसे गले मिली और फिर उनके हाथ से तिरंगा ले कर अपने आप में समूचे भारत को समेटे हुए वो तिरंगा ले कर पूरे मैदान का चक्कर लगाने लगी। उस बच्ची ने वो कर दिखाया था जो आज तक इस स्तर पर कोई भी भारतीय महिला या पुरुष एथलीट नहीं कर पाया था। यहां तक की फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह और पी टी उषा भी नहीं।
जानते हैं उस बच्ची की दिलचस्पी उस दिन फुटबॉल में नहीं बल्कि दौड़ने में थी। वो चाहती थी कि वो फुटबॉलर बने लेकिन नियति ने उसके लिए कुछ और ही चुना था। फुटबॉल तो महज ये अहसास कराने का माध्यम था कि उस में वो काबिलियत है जो उसके पैरों को पंख बना सकती है और उस दिन ये सच साबित हुआ, वो लड़की फिनलैंड कि धरती पर दौड़ी और कब वो दौड़ते हुए उड़ने लगी, कब उसने गोल्ड अपने पाले में लपक लिया ये पता ही नहीं चला।
कमियां उम्मीदों को जन्म देती हैं । सोने की चिड़िया कहे जाने वाले हमारे देश में सोने की बहुत कमी रही है । हम हर स्पर्धा में सोने के लिए तरसे हैं । कहते हैं अंग्रेज सोने की चिड़िया लूट कर ले गये थे लेकिन ये 19 वर्षीय लड़की सोने की चिड़िया बन कर देश लौट रही है । 2018 में हुए आईएएएफ अंडर 20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप के दौरान जीते स्वर्ण पदक के बाद ये बच्ची फिर से सुर्खियों में है और इस बार एक गोल्ड नहीं बल्कि इसके कब्जे में हैं पूरे तीन गोल्ड मैडल । वो बच्ची है हिमा दास । वही हिमा दास जिसने 11 दिन में तीन गोल्ड मैडल अपने नाम किए ।
हिमा ने पोलैंड में हुई पोजनान एथलेटिक्स ग्रांड प्रिक्स के दौरान दो जुलाई को हुई 200 मीटर रेस को 23.65 सेकेंड में पूरा कर पहला गोल्ड जीता । इसके बाद 8 जुलाई को पोलैंड में हुए कुंटो एथलेटिक्स टूर्नामेंट में 200 मीटर की रेस में 23.97 सेकेंड के साथ दूसरा स्वर्ण पदक अपने नाम किया। और फिर 13 जुलाई को क्लांदो मेमोरियल एथलेटिक्स प्रतियोगिता में महिलाओं की 200 मीटर रेस को 23.43 सैकेंड में पूरा कर हिमा ने तीसरा गोल्ड मैडल भी अपने नाम कर लिया।
जब हिमा 7 वर्ष कि थी तो अपने पिता से कहती थी "दिउता (पापा) मुझे एक दिन हवाईजहाज में बैठ कर उड़ना है।" आज हिमा खुद एक हवाई जहाज है जो देश की उम्मीदों को लेकर मैदान में उड़ रही हैं ।
आज हर कोई हिमा दास के बारे में जानना चाहता है। पता करना चाहता है कि कैसे वो असम के छोटे से गांव से उड़ कर दुनिया के बड़े बड़े मैदानों तक पहुंची और मात्र कुछ सैकेंडों में समूचे मैदान को चार बार तिरंगे के नीचे समेट लिया। किन्तु ये बात महज कुछ सैकेंडों की नहीं है ये बात है वर्षों की मेहनत और संघर्ष की। भारत की इस बेटी ने भारत को उस क्षेत्र में चार बार विश्व विजेता बनाया जिसमें लोग तीसरे स्थान पर आना भी एक सपना समझते थे। उनकी इस अपार सफलता के पीछे उनकी कड़ी मेहनत और हिम्मत का बड़ा योगदान है।
9 जनवरी 2000 को असम के नौगांव जिले के कांदुलिमारी गांव में जन्मी उड़नपरी हिमा दास एक बेहद साधारण किसान परिवार से संबंध रखती हैं। उनके संयुक्त परिवार में 17 लोग हैं। हीमा के दोस्तों का एक ग्रुप है जिसने अपना नाम मोन जय (Mon Jai) रखा है। इसमें सात लड़के हैं जिन्हें वो दुनिया के सबसे बेहतरीन दोस्त मानती है।
हिमा बचपन से ही निडर और हिम्मतवाली है। उनके दोस्त बताते हैं कि एक बार वो उसने अपने घर के पास लगे मक्खी के छत्ते को जला दिया। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि एक मक्खी ने सुबह उसके चाचा को डंक मार दिया था।
हिमा के पिता खेती के सहारे अपना परिवार चलते हैं । ऐसे में बेटी को एथलीट बनाना उनके लिए बेहद कठिन था। किन्तु हिमा के कोच ने हमेशा उसकी मदद की। अपने लक्ष्य को पाने के लिए हिमा अपने घर से 140 कि.मी दूर रह कर कड़ी तपस्या करती है। हिमा के कोच निपोन दास ने उनमें सबसे ज़्यादा विश्वास दिखाया । उनके कोच ने बताया था कि हिमा ने दो साल पहले ही रेसिंग ट्रैक पर कदम रखा था। वह अपने मां बाप के 6 बच्चों में सबसे छोटी बेटी है। हिमा के परिवार वाले उसके एथलीट बनने पर राजी नहीं थे मगर वो निपोन दास ही थे जिन्होंने हिमा पर विश्वास दिखाते हुए उनके परिवार को मनाया और हिमा ने उनका विश्वास न तोड़ते हुए इतिहास रच दिया।
अंडर 20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में जीतने के बाद हिमा ने कहा था कि ‘मैं आज एक सपना जी रही हूं। मेरे लिए मैडल मायने नहीं रखता, मायने रखती है तो टाइमिंग। मुझे अपनी टाइमिंग सुधार करना है। मैं मैडल के पीछे नहीं टाइमिंग के पीछे भाग रही हूं और एक बार मैंने टाइमिंग को पा लिया तो फिर मैडल खुद ही मेरे पीछे भागेंगे ।" आज हिमा के शब्द सच होते दिखाई दे रहे हैं। वो अपनी टाइमिंग सुधार कर भागने में लगी है और मैडल उसके पीछे भाग रहे हैं ।
देश की ऐसे बेटे बेटियों को दिल से सलाम है जो अपनी परेशानियों को अपने मेहनक के शोर से दबा कर आगे बढ़ रहे हैं और देश का नाम रौशन कर रहे हैं। हिमा को सलाम, उसके जज़्बे को सलाम 🙏🙏
धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : फुटबॉल ग्राउंड में लड़कों का भ्रम तोड़ने वाली वो बच्ची आज 'सोने की चिड़िया' बन गयी
फुटबॉल ग्राउंड में लड़कों का भ्रम तोड़ने वाली वो बच्ची आज 'सोने की चिड़िया' बन गयी
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