कहानी उस ‘ऑटो शंकर’ की जिसने सिनेमा ने बना दिया रियल विलेन

आपने जुर्म से जुड़ी बहुत सी फिल्में देखी होंगी और उन फिल्मों में देखा होगा एक भयानक विलेन लेकिन आज जिस हकीकत के विलन की कहानी मैं आपको ...


आपने जुर्म से जुड़ी बहुत सी फिल्में देखी होंगी और उन फिल्मों में देखा होगा एक भयानक विलेन लेकिन आज जिस हकीकत के विलन की कहानी मैं आपको बताने जा रहा हूं उसके तैयार होने के पीछे सबसे बड़ा हाथ रहा है सिनेमा का। कैसे ? ये आप खुद ही जान जाएंगे। तो चलिए हम अपनी उस कहानी की ओर बढ़ते हैं जो एक ऐसे शख्स की है जिसने कभी मद्रास (मद्रास) को ऐसे नर्क में बदल दिया था जिसके साए में सिर्फ भय चैन से सांस ले सकता था।
1955 में तमिलनाडू, वेल्लोर के कंगयानल्लूर गांव में एक ऐसे बच्चे का जन्म हुआ जो 80 के दशक में मद्रास अपराधिक गतिविधियों का बेताजबादशाह कहलाया। वैसे तो बच्चे का नाम रखा गया गौरी शंकर लेकिन बड़े होने के बाद बच्चे के कारनामे इतने घृणित थे कि यदि इसकी भविष्यवाणी हुई होती तो शायद बिना देर किए इसकी माँ इसे पैदा होने से पहले मार देती। किन्तु होना वही था जो नियति ने तय किया था। जब वो बड़ा हुआ तो काम धंधे की तलाश करने लगा। उन दिनों वहां के लोगों के लिए मद्रास ही एक ऐसी जगह थी जहां उन्हें रोजगार मिल सकता था। ऐसे में लड़के ने भी मद्रास जाने का मन बनाया।
जिस दिन उसका मद्रास में कदम पड़ा होगा उस दिन शायद मद्रास की फिजा आने वाले भयानक तूफान की आहट से सिहर गयी होगी। गौरी शंकर को डांस, फिल्में और पेंटिंग का शौक और कॉलीवुड के प्रति उसका प्रेम उसे मद्रास खींच लाया था। कहते हैं मद्रास तब छोटा था। अब जहां लोग कीड़ों की तरह रेंगते दिखाई देते हैं, उन दिनों इन्हीं जगहों पर सन्नाटा और विराना रहता था। गौरी शंकर ने पेरियार नगर में पेंटिंग का काम शुरू कर दिया।
पेंटिंग तो जैसे गौरी शंकर के लिए मद्रास में पैर जमाने का बहाना मात्र था। बड़ा खेल तो तब शुरू हुआ जब अस्सी के शुरूआती दशक में तमिलनाडू सरकार ने शराबबंदी का ऐलान कर दिया। शराबबंदी हुई फिर हटा ली गयी लेकिन तुरंत ही फिर शराबबंदी कर दी गयी। अब बात ये थी कि पीने वाले मानते कहां हैं उन्हें तो शराब चाहिए फिर भला चाहे जैसे मिले, जैसी मिले ।
मद्रास के तटीय इलाकों में ताड़ के बेशुमार पेड़ थे। इतने कि आप गिन ना पाएं और ताड़ है तो ताड़ी का होना निश्चित है। ऊपर से ये इलाके सुनसान थे इसी लिए शराब बनाने वालों को जैसे कारू का खजाना मिल गया। इसी बीच गौरी शंकर के खुराफाती दिमाग ने एक तरकीब सोची । उसने एक ऑटो खरीद लिया और इस ऑटो ने ही गौरी शंकर को ऑटो शंकर बना दिया।
ऑटो से वो शराब की तस्करी करने लगा। शहर को नयी नयी ऑटो रिक्शा की आदत लगी थी। लोगों के आने जाने का मुख्य साधन बनते जा रहे थे ये ऑटो रिक्शा । ऐसे में इन पर शक होना बहुत मुश्किल था। ऑटो शंकर को अपने इस नए धंधे से जबरदस्त मुनाफा होने लगा। उसने शौकिया तौर पर गुनाहों के दलदल में पैर रखा था लेकिन ये दलदल उसे अब अपनी तरफ खींचने लगा था। धीरे धीरे शंकर शराब तस्कर से सेक्स रैकेट के धंधे में खींचा चला आया। अब वो अपने ऑटो का इस्तेमाल अपने माल को ले जाने ले आने में करता था।
यहां से उसका अगला कदम बढ़ा मद्रास अंडरवर्ल्ड की ओर। देखते ही देखते शंकर का दबदबा और रुतबा दोनों बढ़ गए। उसने अपनी खुद की गैंग तैयार कर ली। और ऑटो शंकर के बाद इस गैंग का सबसे खास हिस्सा था शंकर का छोटा भाई मोहन। मोहन के आलावा एल्डिन, शिवाजी, जयवेलू, राजारामन, रवि, पलानी और परमासिवम इस गैंग के अहम सदस्य थे। देखते देखते शंकर ने तिरुवनमियुर (मद्रास का इलाका) में होने वाली सभी अपराधिक गतिविधियों पर अपना अधिपत्य कायम कर लिया। उसका वेश्यावृति का धंधा फल फूल रहा था। यहां की झोंपड़पट्टियों में धड़ल्ले से उसका धंधा चल रहा था। अब ये सामान्य सी बात है कि इतने अपराधिक धंधों को बिना पुलिस की मदद के अंजाम देना असंभव है। ऑटो शंकर के बढ़ते दबदबे के साथ उसके संपर्क भी पुलिसवालों और नेताओं से होने लगे।
इन सबका साथ पा कर शंकर खुद को कानून से ऊपर मानने लगा। अब वो राह चलती लड़कियों को अगवा कर के वेश्यावृति के धंधे में धकेलने लगा था। इसी के साथ उसकी हैवानियत भी उस पर हावी होने लगी। और उसकी हैवानियत के साथ ही मद्रास अब एक ऐसा शहर बन चुका था जिसकी फिजा तक में भय महसूस किया जा सकता था। 1988 के अंत तक तिरुवनमियुर से 9 लड़कियां गायब हो चुकी थीं। ऑटो शंकर से मिली पुलिस मामले को यह कह कर टालने में लगी थी कि उन लड़कियों ने वैश्यावृति का रास्ता चुन लिया है और घर से भाग गयी हैं। लेकिन लड़कियों के परिजन ये बात मानने को तैयार नहीं थे। परिजनों के बार बार दबाव बनाने पर पुलिस ने अनमने मन से मामले की तहकीकात शुरू की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और लड़कियों का कोई सुराग नहीं मिल पाया।
ऑटो शंकर के चंगुल से भागने वाली पहली ज्ञात पीड़िता थी ललिता। ललिता ऑटो शंकर के वेश्यालय में रहा करती थी। पुलिस के मुताबिक 1987 में वो अपने प्रेमी सुदालाइमुथु के साथ भागने में कामयाब रही। उसके भागने की खबर ने शंकर नामक हैवान का गुस्सा और भड़का दिया। वो पागलों की तरह हर तरफ उसे तलाशने लगा। आखिरकर शंकर ने ललिता और उसके प्रेमी को ढूंढ ही लिया और उसे पेरियार नगर ले आया। यहाँ उसने ललिता को पीट पीट कर मार दिया और उसके प्रेमी को जिन्दा जला दिया। दोनों की जीवनलीला समाप्त करने के बाद शंकर ने उनकी लाशें समुद्र में फिकवा दीं। कहते हैं ललिता की लाश इस घटना के डेढ़ साल बाद बरामद हुई।
इसके कुछ दिन बाद शंकर का सामना मोहन, संपथ और गोविंदराज से हुआ। जिन्होंने कुछ महिलाओं को एल.बी. रोड लॉज से ले जाने का प्रयास किया। इस कारण उसका उन तीनों से झगड़ा भी हुआ था। बहरहाल, तीनों को इतनी बुरी तरह से पीटा गया कि उनकी मौत हो गई। और उन्हें पेरियार नगर में एक छोटी सी जगह पर दफना दिया गया। इन पांच हत्याओं के अलावा शंकर ने एक रवि नाम के लड़के की भी हत्या कर दी।
ऑटो शंकर के हौसले बुलंद थे उसे न पुलिस की परवाह थी और न ही कानून की क्योंकि वो जानता था जिन पुलिसवालों और राजनेताओं का वो खास ध्यान रखता है उनका हाथ उसके सर पर बना हुआ है। अपने इसी अहंकार में चूर शंकर ने लड़कियों को अगवा कर देने की वारदातें तेज कर दी थीं। दिसंबर 1988 में शराब की एक दुकान के बगल से गुजरती लड़की को अगवा करने की कोशिश की गयी लेकिन वो किसी तरह गुंडों से बच निकली और सीधा पुलिस के पास जा पहुंची। पुलिस इस बढ़ती गुंडागर्दी से तंग आ चुकी थी। पुलिस के कुछ अफसर अंडरकवर होकर काम करने लगे। वो उस शराब की दुकान में पहुंचे, जहां लड़की को अगवा करने की कोशिश की गयी थी। यही वो समय था जब पुलिस ने पहली बार उस अपराधी का नाम सुना जिसने वहां की सड़कों पर अपराध का तांडव मचा रखा था। और वो नाम था वहां ऑटो शंकर।
ये भी एक संयोग ही था कि राजनीतिक हलचल ने ही ऑटो शंकर को बनाया और राजनीतिक हलचल ने ही उस पर लगाम कसी। हुआ कुछ यूं कि 1987 में तमिलनाडू के तत्कालीन मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्र का निधन हो गया जिसके बाद राजनीतिक उथल पुथल को देखते हुए प्रदेश में राज्यपाल शासन लागू कर दिया गया। पुलिस शंकर को पकड़ नहीं पा रही थी और उधर पीड़ितों के घर वाले गवर्नर पी सी अलेक्जेंडर के पास गए। राज्यपाल समझ चुके थे कि यहां कि पुलिस शंकर से मिली हुई है इसीलिए उन्होंने पुलिस महानिरीक्षक जफर अली को मामले की जांच के लिए पुलिसकर्मियों की एक नई टीम बनाने के आदेश दिए।
इस टीम में पड़ोसी तिरुवन्नमलाई जिले का एक पुलिस कॉन्स्टेबल भी था, जो शंकर को बहुत अच्छी तरह से जानता था। सबसे पहले शंकर का साथी एल्डिन पुलिस की पकड़ में आया। पुलिस की मार ने एल्डिन को तोड़ दिया तथा उसने अपना गुनाह कबूल करते हुए सरकारी गवाह बनने पर रजामंदी जाता दी। इसके साथ ही पुलिस ने शंकर के खिलाफ और भी सबूत जुटा लिए थे जो शंकर की गिरफ्तारी के लिए काफी थे। बहरहाल, शंकर को पकड़ लिया गया। पुलिस ने उससे सभी कत्लों के बारे में पूछताछ की। शंकर की गिरफ्तारी के बाद, पुलिसकर्मियों ने उसके घर की तलाशी ली। तलाशी के साथ जो कुछ बरामद हुआ उसने दुनिया के सामने एक और नए हैवान का चेहरा पेश किया।
1988 में उसके घर से 3 लोगों के कंकाल मिले, जिन्हें उसने दीवार में चुनवा दिया था। इसके साथ ही शंकर की वो डायरी पुलिस के हाथ लगी जिसमें उसने अपने साथ मिले पुलिसवालों और नेताओं के नाम और उनके साथ अपनी तस्वीरों को संभाले रखा था। दो पुलिस वालों को तत्काल ही निलंबित कर दिया गया। बाकी कुछ को जांच के बाद निलंबित किया गया।
शंकर को बाद में मद्रास सेंट्रल जेल स्थानांतरित कर दिया गया, जहां से वो अगस्त 1990 में भाग निकला। बाद में उसे ओडिशा के राउरकेला से गिरफ्तार कर लिया गया। इस मामले में उसकी मदद करने वाले तीन जेल वार्डन सहित पांच लोगों को दोषी ठहराया गया। शंकर के भाई मोहन, सेल्वा और जेल वार्डन, कन्नन, बालन और रहीम खान को आपराधिक षड्यंत्र रचने के लिए छह महीने सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई।
अदालत में जब शंकर से पूछताछ शुरू हुई तो उसने बताया कि उसकी सभी अपराधिक गतिविधियों के पीछे सिनेमा का हाथ है। शंकर के मुताबिक सिनेमा से ही उसे अपराध करने की प्रेरणा और नए तरीके मिले। वो असल में एक खूंखार विलेन बनना चाहता था। इसके बाद भी शंकर ने बहुत से खुलासे किए। उसने बताया कि वो नेताओं के लिए लड़कियों को किडनैप करता था और जब नेता उन लड़कियों के साथ दुष्कर्म कर लेते तो शंकर उन्हें मार कर समंदर में फेंक देता। शंकर ने बताया था कि उसे लोगों को मार कर समंदर में फेंकना बहुत पसंद था।
शंकर को उसके घृणित गुनाहों की सजा फांसी के रूप में मिली। उसने सजा से बचने के लिए दया याचिका भी दायर कि किन्तु उसके गुनाह माफ़ी के लायक नहीं थे इसीलिए तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उस याचिका को ख़ारिज कर दिया। दया याचिका ख़ारिज होने के कुछ दिन बाद ही अप्रैल 27 1995 में सालेम जेल में ऑटो शंकर को फांसी पर लटका दिया गया।
धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : कहानी उस ‘ऑटो शंकर’ की जिसने सिनेमा ने बना दिया रियल विलेन
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