धोनी का भले ना सही लेकिन उस माही का सम्मान करिए जो मारता था

न एक जीत उम्र भर ठहरती है  न इक हार से सब कुछ तमाम होता है बहुत पहले ये लाइन लिखी थी । जीत हार बस दर्ज हो जाती है लेक...




न एक जीत उम्र भर ठहरती है 
न इक हार से सब कुछ तमाम होता है
बहुत पहले ये लाइन लिखी थी । जीत हार बस दर्ज हो जाती है लेकिन आपका प्रदर्शन हमेशा याद रखा जाता है । बात हमेशा युवराज के छः छक्कों की होती है, उस मैच में भारत कितने विकटों से जीता इसकी नहीं । उसी तरह हमें जोगिंदर शर्मा याद रहते हैं, कुंबले, श्रीनाथ की पारी याद रहती है, कैफ युवराज की साझेदारी याद रहती है । आज आप निराश हैं, झुंझलाए हैं, कोसने वाले धोनी को कोस रहे हैं, जायज़ भी है क्योंकि इंसान सबसे ज़्यादा गुस्सा उसी पर होता है जिससे उसे सबसे ज़्यादा उम्मीद हेती है । भारतीय टीम से उम्मीद थी इसीलिए लोग गुस्से में भी हैं ।
क्रिकेट को हमने ऐसा खेल बना दिया है जहां खिलाड़ी का नाम भी हम हीं बनाते हैं और उसे बदनाम भी हम हीं करते हैं । हॉकी में किस खिलाड़ी का करियर कब शुरू हुआ और कब ख़तम हुआ हमें मालूम भी न होगा । हम तो बस इनकी किसी बड़ी जीत पर बस खुश होना जानते हैं । इनके हिस्से तो हमारा गुस्सा भी नहीं आता क्योंकि लगाव ही नहीं है इस खेल से किसी को ।
लेकिन क्रिकेट में हम एक एक खिलाड़ी की ब्रांडिंग भी करते हैं और धप्प से लाकर पटक भी देते हैं । धोनी का जलवा इतना रहा कि बॉलीवुड वालों ने इसके नाम पर हमसे पैसे कमा लिए । धोनी का क्रेज़ था तभी फिल्म भी बनी और सुपर हिट भी रही । माही सच में जब मारता था तो लौंडे तारीफ़ करते नहीं थकते थे । दुनिया का बेस्ट फिनिशर होने का खिताब धोनी ने ख़ुद से ख़ुद को नहीं दिया । ये हम ही थे जिन्हें आदत थी धोनी को अंतिम गेंद पर छक्का मार कर बड़े स्टाइल से बैट घुमा कर बगल में दबाते हुए देखने की ।
क्रिकेट का भगवान बनाया है ना हमने सचिन तेंदुलकर को । रनों का अंबार, शतकों का अंबार लगाने वाला सचिन लेकिन उसी सचिन के घर के आगे फूंके गये पुतलों का धुआं कभी कभी तो उनके घरवालों को आज भी याद आता होगा ना । जब क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन बुरे दौर से नहीं गुज़रे तो भला कोई और कैसे बच सकता है इससे ।
पाकिस्तान से जीतना हमेशा हमारे लिए एक इज़्जत के सवाल जैसा रहा है । यही पाकिस्तान था ना जिसने 2006 में मेज़बान भारतीय टीम के 35 ओवर्स में 190 पर पांच विकेट ढाह दिये थे । 289 का लक्ष्य था । तब यही धोनी था ना जिसने 46 गेंदों में 72 बना कर नाक बचाई थी । या फिर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट मैच में 224 रनों की शानदार पारी भूल गये हम । या फिर हमें याद करना होगा वो मैच जब रंगना हेराथ ने 4 विकटें झटक कर भारत की कमर लगभग ही तोड़ दी थी । 2 ओवर 17 रन । धोनी के बल्ले से निकला एक छक्का और दो चौके इसी के साथ बिना किसी उछल कूद के बंदे ने चेहरे पर मुस्कान सजाई और अपने साथ जीत लिए चलता बना ।
ऐसी कितनी पारियां खेलीं धोनी ने जिस पर हम सबने तालियां पीटीं मगर दुर्भाग्य रहा कि विश्वकप ना हासिल कर सके। गुस्सा सबका जायज़ है क्योंकि उम्मीद थी लेकिन अब जो तय था वो हो गया । मेरा छोटा भाई धोनी का बड़ा वाला फैन है, मैं ख़ुद उसे धोनी की बुराई कर कर के चिढ़ाता रहा । क्योंकि मुझे धोनी से बहुत ज़्यादा उम्मीद थी मगर वो बात ना बन सकी लेकिन अब सब ख़तम हो चुका है । बचा है तो बस हमारा वो प्यारा खिलाड़ी जिसकी वजह से हमने न जाने कितनी बार खुशी मनाई ।
उसकी नम आंखों को देखिए, उसके टूटते सपने को देखिए, उसकी पीड़ा को महसूस कीजिए और उसे सम्मान के साथ विश्वकप से विदाई दीजिए । फिर भले ही गरियाते रहें, भले ही उस पर प्यार लुटाते रहें ये आपकी मर्ज़ी, आपकी पसंद नापसंद है ।
लेकिन फिलहाल के लिए माही के लिए बस सम्मान है, वैसा ही सम्मान जैसा एक जंग से लौटे सिपाही का होना चाहिए फिर भले ही हम जंग जीते हों या हारे । वैसे भी आज के धोनी के लिए आप बीते कल के उस माही को कैसे भुला सकते हैं जो मारता था तो फुला देता था । हमारा क्या है हम तो अगली बार फिर से सब भूल कर विश्वकप में इंडिया इंडिया चिल्लाएंगे लेकिन ये खिलाड़ी फिर इस मंच पर नज़र नहीं आएगा ।
धीरज झा

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धोनी का भले ना सही लेकिन उस माही का सम्मान करिए जो मारता था
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