हम बिहारियों को बर्बादी की इस तरह से आदत पड़ी कि हम बहादुर हो गए...

हमारा बिहार बहुत बहादुर है। हाँ सच कह रहे हैं। इसे बहादुरी की आदत हो गयी है। अरे बड़ों तक क्यों जाइएगा, आप बच्चों को ही देख लीजिये। ब...



हमारा बिहार बहुत बहादुर है। हाँ सच कह रहे हैं। इसे बहादुरी की आदत हो गयी है। अरे बड़ों तक क्यों जाइएगा, आप बच्चों को ही देख लीजिये। बड़े बड़े शहर में बच्चा लोग हज़ारों खर्च कर के स्विमिंग सीखने जाता है । जिन शहरों में पानी को हमेशा बंद बोतलों में देखा गया है स्वभाविक है उसे एक जगह जमा देख कर बच्चे डरते ही हैं। मां बाप को डर लगा रहता है अलग। इसीलिए तो तरह तरह का जैकेट पहना कर उतारते हैं पूल में। दूसरी तरफ हमारे गाँवों में चले जाइए और देखिए कि सात सात साल का बच्चा सब डुबाह पानी में बिना कोई भय के कुदुक रहा है, पानी का ऐसा रेड़ा चल रहा है कि गांव के गांव बह जा रहे हैं लेकिन ये बच्चा सब निडर हो के पऊंड़ (तैर) रहा है ।

क्या लगता है इन सबके मां बाप को ये डर नहीं लगता होगा कि कहीं बच्चा डूब न जाए ? लगता है साहब बहुते लगता है लेकिन फिर भी कुदुकने देते हैं नदी में काहे कि उनको पता है सांप के बिल में हाथ डालने वाले को गहुमन का मंतर आना जरूरी है ।

न पानी का डर है, ना सूखे का डर और ना ही डर है बिमारियों का। सोचते हैं कि ससुर मर ही ना जाएंगे ! उससे क्या हो गया सबको एक दिन मरना है। वैसे भी यहाँ सुध लेने वाला कौन है हमारी। अरे ये इतने निडर हैं कि भंवरवा के तोहरा संगे जाई और तोहरा जाए खातिर बांस के बिमान बनल बा, देहिया चार दिन खातिर मेहमान बनल बा जैसे निर्गुण गीत इन्हें प्रिय हैं।

बात ये है न सर कि इन लोगों को बर्बाद होने की इस तरह से आदत पड़ चुकी है कि अब इन्हें और किसी बात से डर ही नहीं लगता। अरे महाराज खुद से सोचिए कि हर साल कोई बउराई नदी एक साथ लाखों लोगों का घर तबाह कर जाए फिर भी कोई हो हल्ला ना मचे, सत्ता के कानों पर जूं तक ना रेंगे, भला इससे बेफिक्र और निडर राज्य दूसरा कोई मिलेगा आपको ? अरे साहब जान तो उसकी है जो केरल में बहता है, चेन्नई में बहता है, मुंबई में बहता है, ये बिहारियों की जान काहे की जान यार। हमें तो खुद फर्क नहीं पड़ता। सही कह रहे हैं, हमारा तो हर बार का है तो कौन भला इतना ध्यान दे।

हमारे तो बच्चे ससुरे इतने निडर हैं कि पन्नी में लिप्टा हुआ किताब कॉपी कांख में दाब कर कूद जाते हैं इन बेदर्द नदियों की कोख में। कहते हैं स्कूल जाना है, पढना है, कुछ बनना है. हमको खीस लहर जाता है, हम कहते हैं अबे बईठो घर पर, क्या उखाड़ लोगे स्कूल जा कर, कौन यहाँ लालटेन बारे खड़ा है जो तुम्हारे भविष्य को रौशन कर देगा, तुम्हारा भाग्य तीर के निशाने पर था और हमेशा रहेगा। करम तुम्हें तुम्हारा दिल्ली पंजाब मुंबई जैसे राज्यों में ही कूटना है। तुम्हारे भाग्य में परदेसी हो जाना लिखा है फिर चाहे पढ़ के हो जाओ या फिर गन्ना छील कर। तुम्हारा मैथ कितना अच्छा है, तुम याद कितनी जल्दी करते हो, तुम्हारी समझ कितनी है ये सब किसी के लिए मायने नहीं रखता बाबू। कोई तुम्हे मौका नहीं देगा अपना भविष्य सुधारने का। तुम्हारा भविष्य हर साल इस दाहर में बह जाया करेगा।

आप बच्चों को देश का भविष मानते हैं ना लेकिन हमारा तो कितना ठो भविष्य इस बाढ़ ने लील लिया लेकिन माओं ने गंगा माई की मर्जी समझ कर दिल को पत्थर कर लिया हर बार। जानते हैं साहब बहुत पहले नहीं जाएंगे, ये आंकड़े बस 1979 से बता रहे हैं। तब से अब तक 8570 लोग खतम हो गए इस दाहर यानी कि बाढ़ की वजह से। इतना ही नहीं साहब और भी है सुन लीजिए, 25 हजार से ज़्यादा मवेशी और जानवर मारे गए हैं, 7.70 करोड़ हेक्टेयर जमीन बाढ़ में दह, डूब गयी। अब तक लगभग 3.74 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर लगी फसल खराब हो चुकी है। इन ख़राब फसलों ने किसानों को 7969 करोड़ रुपए का नुकसान पहुँचाया। 1.15 करोड़ मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं। 4151 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है सार्वजनिक इमारतों के टूटने से।

ये आपके ही किसी बड़े मीडिया संस्थान का सर्वे है साहब, उस मामूली से नुकसान का सर्वे जो 1979 से अब तक बाढ़ ने बिहार को पहुंचाया है। ये तो वही हिसाब हुआ कि एक तो पहले ही थाली में दो रोटी और नून तेल उसे भी कुकुर चट कर जाए। बिहार की झोली में पहले से कितना था जो हर साल ये बाढ़ और छीने ले जा रही है।

कोई बात नहीं, हमारा बिहार बहादुर है। इसको अब बर्बाद होने से डर नहीं लगता। अरे जिसने अपने मासूम बच्चों को तड़प तड़प कर मरता देख लिया उसे भला कोई और डर खाक डरा सकता है। वैसे भी दुनिया के पास बहुत कम यादगार बातें होंगी बताने को लेकिन हमारे पास हर साल एक नयी याद होती है। सबको याद है कि 1987 की बाढ़ में मरे लगभग 1400 जानों में से उनका कितने साल का बच्चा दह गया। आपको अपने बर्थडे याद रहते हैं लेकिन हमारे यहां याद रखने के लिए ये तरीका है 93 के दाहर में जनमल रहे बबुआ। 93 की बाढ़ में बबुआ का जन्म हुआ था। 2004 वाले दाहर में 522 करोड़ की फसल जो तबाह हुई थी न उसके गम में फलाने काका ने गरफंसरी लगा कर मरने वालों की संख्या को 886 कर दिया था लेकिन चुंकि वो दाहर में दह कर या डूब कर ना मरे इसीलिए उस साल मरने वालों की संख्या 885 ही बताई जाती है। इसी तरह किसी साल बाढ़ ने किसी के बच्चे को लील लिया, किसी का घर बह गया तो किसी को अपनी डूबी फसलों का शोक खा गया।

बस इतना ही तो नुकसान हुआ है हमारा। फिर भी देखिए हम मुस्कुरा रहे हैं, अन्य राज्यों में जा कर गलियां खा रहे हैं, आपके वोटों के लिए लड़ मर रहे हैं। हमें फर्क नहीं पड़ता साहब, रत्ती बराबर नहीं। अभी भी सैकड़ों गांव बह गए, 45 के आसपास लोग मर गए, 70 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हैं, कितनी फसलें तबाह हो गयीं, कितने बीघा जमीन देखते देखते गायब हो गयी मगर देखिए हम फिर भी खड़े हैं, अड़े हैं। आने वाले साल इलेक्शन में आपके लिए ही लड़ेंगे, आप सबको ही वोट देंगे। आप सब सामान हैं साहब, आप सब महान हैं साहब। इसीलिए तो हम आपसे खफा नहीं होते, कभी अपने डूबे हुए बच्चों का हिसाब नहीं मांगते। हम बहुत बहादुर हैं साहब, बहुत बहादुर, क्योंकि हमें हर साल बर्बाद जो होना है...

एक बहादुर बिहारी

धीरज झा  


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