क वि केदारनाथ सिंह’ जिनके लिए हिंदी देश तो भोजपुरी घर समान रही… सुना है गांव मर रहे हैं ! वहां के बाशिंदे गांव की गोद मे...




वि केदारनाथ सिंह’ जिनके लिए हिंदी देश तो भोजपुरी घर समान रही…
सुना है गांव मर रहे हैं ! वहां के बाशिंदे गांव की गोद में खेलने के बाद उछल कर शहर के कंधे पर चढ़ने को उतावले हैं। वहां के लोगों ने मान लिया है कि उनके बच्चों का भविष्य गांव में सुरक्षित नहीं है। गांव को पिछड़ा हर किसी ने कहा है मगर किसी ने उसके पिछड़ेपन को दूर करने का प्रयास नहीं किया। आज जो दो चार गांव में बचे हैं वो गांव को भी गांव से अलग कर रहे हैं। मोबाइल टावरों से निकलने वाली किरणों ने गांव की हवा का गला घोंट दिया है। अब चौपालों में जवान तो दूर बूढ़े भी नहीं दिखते। मां बाप बच्चों के अच्छे के लिए उन्हें शहर की राह दिखाते हैं मगर शहर की भीड़ इतनी ज्यादा है कि बच्चे उसी में गुम हो जाते हैं और फिर अपने गांव नहीं लौट पाते। बेशक पिता जी अपने रौब में चुप हैं मगर हर बार बेटे का फोन इसी उम्मीद में उठाते हैं कि इस बार कह देगा कि ‘पिता जी मैं गांव आ रहा हूं।’ मां को याद है कि उसका बबुआ बचपन में कैसे अचानक पीछे से आ कर उससे लिपट जाया करता था। मां आज भी इसी आस में दरवाजे की तरफ पीठ कर के खड़ी है कि उसका बबुआ अचानक उसे पीछे से गले लगा कर चौंका देगा। मगर बेटा न फोन पर आने की खबर देता है और न ही अचानक पीछे से आकर मां से लिपटता है।
लेकिन कुछ शख्स होते हैं जिनके अंदर का गांव शहर की कड़ी धूप के बावजूद भी हमेशा फलता फूलता रहता है। ऐसे ही हैं (वे अपने चाहने वालों के लिए कभी ‘थे’ नहीं होंगे) हमारे कवि केदार। 7 जुलाई 1934 को उत्तरप्रदेश बलिया के छोटे से गांव चकिया में जन्मे कवि केदार का बचपन गांव की पगडंडियों पर नंगे पांव दौड़ते हुए बीता। एक सामान्य परिवार में जन्में कवि केदार ने पिता के साथ खेत खलिहानों में घूमते हुए गांव को जिया था। उनकी कविताओं से अक्सर ऐसा प्रतीत होता है जैसे वो लहलहाती फसलों, मैदानों में उगी घास, खेतों में लगे बिजूका, पेड़ों पर चहकते पंछियों यहां तक की अपने आस पास बहने वाली नदी तक से बात करते रहे हों। कवि केदार भोजपुरी की गोद में खेले और हिंदी की उंगी पकड़ कर चलना सीखा। यही कारण है कि उन्होंने हमेशा अपनी मां बोली और देश बोली दोनों को बराबर सम्मान दिया।
पहली बार उन्होंने गांव से निकल कर बनारस की ओर रुख किया मगर यहां भी गंगा ने बाहें खोल कर अपने लाडले का स्वागत किया जिस कारण गांव के स्नेह से उन्हें वंचित नहीं रहना पड़ा। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एम ए करने के बाद उन्होंने हिंदी में पी एच डी की जिसके बाद वो हिंदी पढ़ाने लगे। बनारस से कवि केदार का मोह इतना ज्यादा बढ़ गया था कि उनकी कविताओं के लिए यहां की शामों ने अपने ढलने की गति धीमी कर दी थी। शहर होने के बावजूद भी बनारस ने उन्हें गांवों के करीब रखा किन्तु जब उन्हें जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग से बुलावा भेजा गया तब उनका पाला पड़ा असल शहर से। हमेशा कुछ नया सीखने की चाह रखने वाले कवि केदार बड़ी उत्सुकता से दिल्ली पहुंचे। वो बनारस जहां कवि केदार ने धूल को धीरे धीरे उड़ते पाया, जहां लोगों को धीरे धीरे चलते देखा, जहां के घंटों को धीरे धीरे बजते सुना और जहां उन्होंने शामें धीरे धीरे ढलते देखा था उसके मुकाबले दिल्ली बहुत अलग थी। इस भागती दौड़ती, बेपरवाह बेफिक्र और कभी कभी बेहद निर्दयी दिल्ली ने उन्हें अकेला कर दिया था। अब उनके पास हिंदी का साथ था जिसकी मदद से उन्होंने अपने शब्दों को कविताओं का रूप दे कर जीवित कर दिया। अब उनकी कविताएं बोलने लगी थीं। वो अपनी गांव की नदी को याद करते हुए इस शहर की बड़ी भीड़ में पसरे सूनेपन पर वार करते हुए कविता लिखते।
दिल्ली भले ही मुगलों से ले कर नेताओं तक का गढ़ रही, भले ही सशक्त रही, भले ही क्रूर रही मगर कभी भी कवि केदार पर हावी न हो पाई। दिल्ली अकेलेपन से जितना वर करती कवि केदार के अंदर बलिया से ले कर चकिया तक के लोग, फसलें, सभ्यता सब एक साथ मुस्कुरा देते। और इसी तरह लगता गया कविताओं का अंबार। कवि केदार की सबसे खास बात ये रही कि उन्होंने पहले उस दृश्य को जिया और फिर उसे शब्दों में ढाला। उसने पहले ये कल्पना किसी ने नहीं की थी कि दुनिया को किस तरह से होना चाहिए था, उनसे पहले ये किसी ने नहीं बताया था कि हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया क्या है, उन्होंने उसके हाथ को महसूस किया फिर पाया कि दुनिया को उसी हाथ जैसा होना चाहिए।
कवि केदार ने जिस तरह से गांवों को अपने अंदर सहेज कर रखा उसी तरह बलिया, चकिया ने भी उनका सदैव सम्मान किया। कहते हैं जब कवि केदार बलिया स्टेशन पर उतरते थे तब लोग समझ जाते थे कि गर्मियां आगयी हैं। यहां बंबई (मुंबई) में पत्थर घिसाई का काम करने वाला भी जब अपने गांव लौटता है तो ऐसे लगता है जैसे वो मुंबई में ही पला बढ़ा हो और गांव उसके लिए एक दम नया हो लेकिन कवि केदार के लिए अपना गांव घर जैसा था। वो अपने देश में होते थे अपने कर्म के लिए लेकिन सुकून के लिए वो अपने घर लौट आया करते थे गर्मियों में। शायद इसी लिए हिंदी उनके लिए देश थी और भोजपुरी उनका घर।
केदारनाथ ने हिंदी में अपनी राचानाएं प्रकाशित करने का सिलसिला 1960 में ही शुरू कर दिया था। उनकी रचनाएं इतनी अद्भुत और खास थीं कि उन्हें सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ने अपनी प्रसिद्ध ‘तीसरा सप्तक’ में प्रकाशित किया था। माना जाता है कि उस समय अगर तीसरा सप्तक में किसी कवि का नाम आ जाता था तो वह रातों-रात प्रसिद्ध हो जाता था। केदारनाथ के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। हालांकि, खुद केदारनाथ की रचनाओं में भी इतना दम था कि लोग उन्हें पढ़ने के बाद कभी भूलते नहीं थे। कवि केदार के अंदर मुस्कुरा रहे गांव ने इन्हें मैथिलीशरण पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), जीवन भारती पुरस्कार (उड़ीसा) दिनकर पुरस्कार,व्यास सम्मान और साहित्य अकादमी पुरस्कार के साथ साथ अन्य भी अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित करवाया। इतना ही नहीं कवि केदार की कविताएँ विश्व के लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में जैसे अंग्रेज़ी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन, हंगेरियन आदि में अनुवादित हुई हैं। अपने लिखन के लिए उन्हें हिंदी साहित्य का सबसे बाद सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ भी मिल चुका है। यह पुरस्कार पाने वाले वह चुनिंदा हिंदी लेखकों में से एक हैं। इसके बावजूद भी ये कहना गलत नहीं होगा कि उनका लेखन इतना अच्छा था कि किसी पुरस्कार से उसे नहीं मापा जा सकता।
कवि केदार बच्चे की तरह गांव को एक टक निहारा करते थे और गांव अपनी मुस्कराहट से मां की तरह उन्हें सहलाया करती थी। सब बहुत अच्छा था लेकिन फिर 19 मार्च 2018 का दिन ऐसी खबर ले कर आया जिसके बाद चकिया गांव या बलिया के चेहरे पर ही नहीं अपीति समूचे विश्व में बैठे हिंदी प्रेमियों के चेहरे पर उदासी पसर गयी। क्योंकि इसी दिन हिंदी और गांव की मिट्टी के लाडले, माटी के कवि केदारनाथ सिंह इस दुनिया को अलविदा कह गए। उन्होंने लड़खड़ाती हिंदी को सहारा दिया, उदास हो रहे गांव के चेहरे पर मुस्कराहट लाई, रो रही नदियों को चहकना सिखाया। वो भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उन्होंने ऐसी कविताएं लिख दी हैं जिनके माध्यम से वो हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगे। जिस तरह गांव उनमें मुस्कुराया करता था उसी तरह कवि केदार अपनी कविताओं में मुस्कुराते नजर आएंगे।
सुना है कवि केदार
हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया
को पूर्ण कर गये ?
किसी ने कहा कि
वो आज सुबह उठे और
लंबी दूरी तय करने निकल गये
शायद इसीलिए 
नदी को भी रोते देखा 
जाने से उनके
वो गांव चकिया भी रोया
बहाने से उनके
वो बूढ़ी अम्मा भी रोई जिसकी कमर थी झुकी
वो सारस भी रोए जिनकी प्यास
को कविता में उतारा था कवि ने
वो हिमालय भी रोया 
जिसका पता 
बच्चे की उड़ती पतंग ने दिया था
वो गर्म और सुंदर हाथ 
जिसकी तरह दुनिया को होना था
वो माथा पीट पीट रोए
देश हिंदी भी रोई 
गांव भोजपुरिया भी रोया
मगर क्यों ?
सब कहते हैं 
कवि केदार एक थे 
मगर कविताएं तो अनेक हैं
हर कविता 
बीज बन रोपी गयी है
सोच में 
समझ की खाद से बढ़ेगा बीज 
बढ़ेगा बढ़ता रहेगा और बढ़ेगा 
और बढ़ते बढ़ते लाखों केदार
मुस्कुराएंगे एक साथ सबकी सोच में 
यही कारण है कि 
मैं नहीं मानता कि हिंदी की सबसे 
खौफनाक क्रिया पूर्ण हो हुई है
हिंदी जब तक रहेगी
खेत खलिहान बाग मचान
जब तक रहेगा
चावल का बचपन जब तक लहलहाएगा
जब भी कोई झोला ले कर बाजार करने जाएगा
जब भी तपती धरा और
शोला बरसाते आसमान के तले
कोई बच्चा जिंदा और हरी दूब
ढूंढने जाएगा तब तब
कवि केदार मुस्कुराएंगे
तब तब वो हमारे बीच
फिर जीवित हो जाएंगे
आज उनके जन्मदिवस पर उन्हें कोटि कोटि नमन और भावपूर्ण श्रद्धांजलि। साहित्य जगत आपका सदैव ऋणि रहेगा कवि केदार…
धीरज झा

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