वशिष्ठ सर अगले जन्म में बिहार की शान मत बनिएगा

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अगर आपमें कोई हुनर है, ईश्वर ने यदि आपको कोई असाधारण गुण दिया है तो आपके पास दो रास्ते हैं पहला ये कि आप अपने हुनर को हथियार बनाइए, खूब मार्केटिंग कीजिए, राजनीति सीखिए, कोई जिए या मरे आप बस नाम कमाने से मतलब रखिए, हर तरफ बस अपनी हवा बनाइए। ये सब एक ही रास्ते पर मिल जाएंगे आपको । झूठ क्यों कहूं मैं भी तो यही चाहता हूं कि मेरा नाम हो, हालांकि इतना सब नहीं कर पाता या कभी कर पाऊंगा लेकिन चाहत तो यही हूं ।

वहीं दूसरा रास्त है कि सारा समय अपने उस गुण, उस अद्भुत प्रतिभा को समर्पित कीजिए, उसे जन कल्याण में लगाइए, पैसे और नाम का तनिक मोह मत रखिए और एक दिन गुमनामी में मर जाइए । ऐसी गुमनामी जहां देर से ही सही, मीडिया आपको महान बता रही हो मगर आपके पास से गुज़रने वाले लोग आपको पहचानने तक से इनकार कर जाएं । हालांकि आपके मरने के बाद आपके लिए आंसू बहेंगे । मेरे जैसा कोई ढोंगी आपको अपने बिहार या देश की शान बता कर अपनी छाती पीटेगा लेकिन हालत आपकी उस आवारा जानवर की तरह ही होगी जिसके ज़िंदा रहने पर, कचरा खाने पर, घाव के साथ बिलखते रहने पर कोई हाल नहीं पूछता लेकिन उसके मरने पर लोगों का खून बह जाता है ।

दूसरे रास्ते को सच्ची सेवा कहा गया है । इस तरह आप ईश्वर होंगे, माता कहलाएंगे, पिता कहलाएंगे, गुरू कह कर आपके सामने सब सिर झुकाएंगे लेकिन आप जब 40 साल से ज़्यादा किसी भयानक बीमारी से लड़ते हुए बिता रहे होंगे तब कोई आपका पता लेने तक नहीं आएगा । आपको धरोहर कहा जा सकता है लेकिन आपको बचाया नहीं जा सकेगा । आपके नाम पर फिल्म बना कर करोड़ों कमा लिए जाएंगे लेकिन आपके ईलाज के लिए कोई दस रुपये तक ना जुटा पाएगा  ।

आपको तय करना है कि आप राजनीति का चोगा ओढ़े कोई महान इंसान बनेंगे या वशिष्ठ नारायण सिंह की तरह कोई गुमनाम से गणितज्ञ बनेंगे। आप अगुआ बन कर महात्मा गांधी कहला सकते हैं या फिर बाल मन से देश के लिए लड़ने और अंग्रेजों की मार सहने वाले गौर हरी दास जैसा बन कर 33 साल खुद को स्वतंत्रता सेनानी साबित करने में बर्बाद कर सकते हैं । आप आज की तरह बेस्ट सेलर लेखक हो सकते हैं या फिर मुंशी प्रेमचंद जैसे खोंखते हुए गुमनाम मौत मर सकते हैं। ये फैसला आपका है ।

विलियम शेक्सपियर के गांव स्टैटफॉर्ड को उनके देश वाले तीर्थ स्थल बना देते हैं उनके घर को साहित्य का मंदिर लेकिन यहां मुंशी प्रमचंद के महोबा स्थित उस घर को गिरा दिया जाता है जहां उन्होंने दीप की रौशनी में उपन्यास नहीं बल्कि वो इतिहास लिख दिया जिसे आज सालों बाद पढ़ कर मुझ जैसा कोई गंवार कहता है कि मैंने बहुत पढ़ा है इसीलिए अब मैं लेखक हूं ।

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सुबह जब नारायण जी के निधन के बारे में सुना तो मन हुआ कि हमारे बिहार की शान थे इन पर लिखना तो बनता है लेकिन फिर जब खबर सुनी कि उनका पार्थिव शरीर एंबुलेंस का इंतज़ार करते हुए सड़क किनारे स्ट्रेचर पर पड़ा रहा तो खुद पर शर्म आने लगी। लोग सहेजते हैं ऐसी प्रतिभाओं को, उन्हें ईश्वर बना देते हैं, उनकी चरण धूली को चंदन मान कर माथे से लगाते हैं लेकिन हमने इस आधुनिक आर्यभट्ट को सड़क पर ला दिया ।

एल्बर्ट आइंस्टीन के सिद्धांतों को चुनौती देने वाला नारायण, नासा में लगे 31 कंप्यूटर्स के एकदम से बंद हो जाने पर उनकी तरह ही कैलकुलेशन कर के दिखाने वाला नारायण, नासा में तीन साल काम करने के बाद मन ना लगने पर अपनी माटी में लौट आने वाला नारायण, अपने गणित के अध्यापकों को चुनौती देने वाला नारायण, अपने समय के सारे अकादमिक रिकार्ड तोड़ देने वाला नारायण इलाज के लिए दर दर भटकता है, पांच सालों तक सड़क पर किसी पागल की तरह घूमता रहता है । दुख हुआ ये सुन कर कि उनकी भाभी का कहना था कि देश में किसी मंत्री का कुत्ता बीमार पड़ जाए तो डॉक्टरों की लाइन लग जाती है लेकिन इनके ईलाज के लिए 45 साल में कोई आगे नहीं आया।

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उन्हें आखिर तक खुद से ज़्यादा उन नोट्स की चिंता थी जिन्हें उन्होंने अपनी बीमारी के दौरान भी बनाना नहीं छोड़ा था । अमेरिका से लोग पैसे लाते हैं, रंग बिरंगे सामान लाते हैं लेकिन नारायण जी बक्से भर के नोट्स और किताबें लाए थे । मेरे शहर में भी एक व्यक्ति हैं । कूड़ा चुन कर बेचने का काम करते हैं । आपको जब भी मिलेंगे मुस्कुरा देंगे। बचपन में पागल समझते थे हम उन्हें लेकिन फिर पता चला कि बोर्ड की परिक्षा में लोग अपने बच्चों की मदद करने के लिए उनके आगे पीछे करते हैं। साइंस विषय में महारथ हासिल है उन्हें । वो भी किसी दिन इसी तरह चले जाएंगे गुमनामी में।

आनंद कुमार भाग्यशाली हैं, चाहे लाख विवाद में नाम आया हो लेकिन आज सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है । दुआएं मिल रही हैं, पैसा और नाम मिल रहा है । ज़िंदा रहते हुए अपने ऊपर बनी फिल्म भी देख लिए।  वर्ना यहां तो गुमनामी में मौत होती है और मृतक की रचनाएं तथा प्रतिभाएं बेच कर लोग अमीर हो जाते हैं।

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क्षमा भी किस मुंह से मांगे इन सबसे, इस कुव्यवस्था ने तो हम सबको पाप का बराबर हिस्सेदार बना दिया है। बस यही कहेंगी कि अगर ये दुनिया रहते हुए आपका जन्म फिर से मनुष्य योनि में होता है तो इस बार अपने लिए जी लीजिएगा।  नासा जाइएगा तो लौट कर मत आइएगा अगर आना भी हो तो किताबों कि जगह अकाउंट में नोट भर कर लाइएगा जिससे आपका भी ईलाज अच्छे से हो पाए। सेवा के लिए इस तरह का एक ही जीवन बहुत है ।

आज लोग रो रहे हैं लेकिन गणित के अंक तो आपके लिए तब से आंसू बहा रहे हैं जब से आपकी ये दुर्दशा शुरू हुई । आपकी कॉपी कलम, घर की दीवारें, रेलिंग जहां आप लिखा करते थे और आपका वो भाई आपको बहुत याद करेगा जिसने अंत समय तक आपका साथ नहीं छोड़ा ।

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समझ नहीं आ रहा बिहार और देश की इस माटी पर गर्व करूं जिसने आप जैसी महान विभूति को जन्म दिया या फिर आंसू बहाऊं उस हाल पर जो आपको संभाल ना सका । काश आप प्रसिद्ध होते तो बिहार की दुर्गति को छुपाने के लिए एक नाम आपका भी लेता लेकिन अब तो जब आपका नाम लूंगा तो लोग कहेंगे कि उन्हें तो एंबुलेंस तक ना मिली। क्या करिएगा वशिष्ट सर हमारा देश ऐसा ही है, होनहार बच्चे तंगहाली में फांसी पर झूल जाते हैं और प्रतिभाओं के शव सड़क किनारे ऐंबुलेंस का इंतज़ार करते रह जाते हैं।

ईश्वर आपको अपने चरणों में स्थान और हमें सदबुद्धि दें 🙏


धीरज झा

Vashishthnarayan Singh, Mathematics, Mathematician, Albert Einstein, William  Shakespeare, Munshi Premchand

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वशिष्ठ सर अगले जन्म में बिहार की शान मत बनिएगा
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