एटलस ब्वॉय की प्रेम कहानी

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ठंड के रुख कड़े होने शुरू हो चुके थे । सुबह शाम की सर्दी ने हवा से हाथ मिलाने पर सख्ती करना शुरू कर दिया था । ना चाहते हुए भी हाथों को जेब में या कांख में दबा कर छुपाना पड़ता था । ऐसे मौसम में उसके लिए तो दोहरी परेशानी थी । एक तो खुद सुबह सुबह उठ कर कोचिंग जाना पहाड़ था ऊपर से उस एटलस साइकिल वाले को उसके लिए रोज़ ठंड में खड़े देखना उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगता था । कई बार कोचिंग के लड़कों ने हड़काया भी था लेकिन वो ढीठ मानने वाला कहां था ।

हालांकि कभी भी उस लड़के ने रीधिमा से कुछ कहा नहीं था लेकिन फिर भी सब जानते थे कि कोचिंक के बाहर की क्लास वो उसी के लिए लगाया करता था । इसका सबूत भी था । रीधिमा जिस दिन कोचिंग नहीं आती थी उस दिन लौट भी तो जाता था । ना कोई हरकत ना चेहरे पर कोई अजीब से भाव । बस उसे वहां खड़े होकर रीधिमा को देखना होता था । मंदिर जाने वाला भक्त भी कभी कभी पत्थर की मूरत में बसे भगवान से कुछ कह देता है लेकिन ये तो अपने भगवान के निस्वार्थ दर्शन के लिए ही आया करता था ।

रीधिमा उसे रोज़ देखती । मन में आता कि उससे जा कर बात करे लेकिन घर परिवार के संस्कार और लोगों की मौका तलाशती नज़रें उसके पैर हमेशा रोक लेतीं । मगर सहेलियां कहां मानने वाली थीं । उन्होंने तो लड़के का नाम एटलस ब्वॉय और रीधिमा का नाम एटलस गर्ल फाइनल कर दिया था । कई बार ये एटलस ब्वॉय अपनी साइकिल पर चढ़ कर रीधिमा से उसके सपने में मिलने आया था मगर यहां भी दोनों की मुलाकात के बीच कोई ना कोई आ जाता था ।

सब कहते थे पार वाली बस्ती का लड़का है । पढ़ने में बहुत तेज है । ये साइकिल भी पढ़ाई की ही देन थी । उसे कोई प्रतियोगिता जीतने पर मिली थी । सब तो ठीक था लेकिन अच्छे घर की लड़की पार वाली बस्ती के लड़के के साथ ? घोर पाप, अनर्थ, मतलब कि या तो लड़की की शादी या फिर लड़के की जूत परेड । रीधिमा को ये दोनों मंज़ूर नहीं था । अच्छी खासी फिल्में देख रखी थीं उसने, उन्हीं का आधा असर था रीधिमा के दिमाग में । सारी फिल्म में प्यार में आने वाली कठिनाइयों पर तो पूरा विश्वास था उसे लेकिन हैप्पी ऐंडिंग को लेकर 'ऐसा तो बस फिल्मों में ही होता है' वाले ख़याल थे उसके । 

लेकिन इसके बावजूद भी उस लड़के को दिमाग से निकाल कहां पा रही थी । चाहती तो कोचिंग वाले सर से कंप्लेन कर के भगवा सकती थी । पुलिस बुलवा सकती थी लेकिन ये मन, ये साला किसी कायदे के हिसाब से भला चला ही कब है । ऊपर से उस लड़के की आंखें । कसम से उसके लिए किसी लाई डिटेक्टर की ज़रूरत नहीं थी । वो खुद में सच्चाई की मशीन थीं । उन्हें देख कर लगता था जैसे वो लड़की से कह रही हों कि सिर्फ तुम हां कर दो उसके बाद ये दुनिया, यहां के सारे ऐश ओ आराम, ये प्यार, मोहब्बत इन सब से तुम्हारी ज़िंदगी का कोना कोना भर दूंगा ।

"एक बात कहें ?" रीधिमा की सहेली ने एक दिन अचानक से कहा ।

"अभी नहीं, सवाल मिस हो जाएगा ।" ब्लैक बोर्ड पर नज़रें गड़ाए हुए, वहां लिखे जवाब को तेजी से कॉपी पर नोट करते हुए रीधिमा बोली ।

"कमाल कर रही हो यार तुम भी । इधर तुम्हारी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा मिस होने पर है और तुमको सवाल मिस होने की पड़ी है ।" सहेली की बात पर उसने सहेली की तरफ देखने की बजाए सीधे खिड़की से बाहर देखा । उसके देखते ही दो आंखें उससे इस तरह टकराईं जैसे इनका जन्म ही इसी टक्कर के लिए हुआ है । रीधिमा की आंखें अपने आप झुक गयीं । फिर उसने सहेली को देखा जो अपनी नज़रें बाहर टिकाए इस इंतज़ार में थीं कि कब वो दो नज़रें उसकी नज़रों से टकराएं।  रीधिमा को खास फर्क पड़ना नहीं चाहिए था लेकिन फिर भी उसे जलन सी हुई ।

"पढ़ाई कर लो वर्ना बहुत कुछ मिस हो जाएगा लाइफ से ।"

"अबे तुम चुप रहो यार । इसके लिए हम सब कुछ मिस करने को तैयार हैं ।" रीधिमा कुछ बोली नहीं। 

"ऐ सुनो, तुम ना डिसाइड कर लो कि तुमको इससे बात करना है कि नहीं।  अगर नहीं करना तो बोलो हम अपना देखें ।" सहेली ने अचानक से रीधिमा की तरफ देखते हुए बड़े गंभीर स्वर में कहा ।

"तुम पागल हो क्या ? क्या अंट संट बोले जा रही हो ।"

"बता रहे हैं । ईमान ही है, क्या पता कब डोल जाए । फिर कहोगी यारी में गद्दारी कर दिए । इसीलिए बता रहे हैं कि ये लौंडा भले तुम्हारी दीवानगी में यहां आता हो लेकिन देखते देखते इसने कईयों के मन में अपने लिए दीवानगी जगा दी है ।"

"क्या बकवास है ।"

"बकवास नहीं है महरानी, ज़रा ग़ौर से क्लास की लड़कियों को देख लो, सारा वहम उतर जाएगा ।" रीधिमा ने ऐसा दिखाया जैसे उसे सहेली की बातों से कोई फर्क ही नहीं पड़ा लेकिन चुपके से जब उसने क्लास में नज़र दौड़ाई तो पाया कि हर लड़की की आंखें खिड़की से बाहर टिकी हैं ।

"हो गयी तसल्ली ।" रीधिमा अचानक कानों में पड़ी आवाज़ सुन कर घबरा गयी ।

"एक बात कहे देते हैं तुमको, अगर इसे हाथ से जाने दी ना तो सारी उम्र प्यार के लिए तरस जाओगी । जानते हैं प्यार करने का उम्र नहीं है हम लोग का, वैसे भी यहां हम लोग को किसी भी उम्र में प्यार करने का परमीसन नहीं मिलता । लेकिन तुम ये चांस मिस मत ना करो । मन कहता है कि ये लड़का एक बार हाथ पकड़ा ना तो फिर कभी छोड़ने वाला नहीं है । मम्मी पापा बाहर जा रहे हैं दो दिन के लिए । दादी का आंख कान दोनों करीब करीब फ्यूजे है । आस पड़ोस हम संभाल लेंगे । कहो तो मीटिंग करवा दें ?" सहेली ने बड़ी गंभीरता से सारी बात कही ।

"क्या बात कर रही हो यार । तुमको हमारे पापा का पता है ना।  घिसियाते हुए ले जाएंगे हमको । मार से बहुत डर लगता है हमको । माफ करो ।" अपनी बड़ी बड़ी आंखों को और बड़ा करते हुए रीधिमा ने कहा । उसके डर का सारा हाल उसकी धड़कनें कह रही थीं जिनका शोर इस वक्त इन दोनों की फुसफुसाहट से कहीं ज़्यादा था ।

"हमारे पिता जी ने तो घर के बाहर प्रेमी मिलन संस्थान का बोर्ड लगवाया है ना ! और हमको रखें हैं एजेंट कि बेटा जाओ और दुखियारे जोड़ों को पकड़ कर हियां ले आओ ।" रीधिमा उसे घूरने लगी लेकिन बोली कुछ नहीं ।

"मैडम, आरती तो वो भी नहीं उतारेंगे हमारा । रिस्क तो हमें आपसे ज़्सादा है । लेकिन हम नहीं चाहते की पंद्रह बीस साल बाद आज का समय याद कर के हम मलाल करें कि दुनिया की एक बेहतरीन प्रेम कहानी हमारे डर के कारण नहीं लिखी जा सकी । सो दोस्ती निभा रहे हैं । कल पापा मम्मी निकलेंगे । आज भर सोच लो । मन हो तो बता देना वर्ना बाद में पछता लेना।" इतना कह कर सहेली रीधिमा से दुगनी स्पीड से ब्लैक बोर्ड पर लिखे सवालों को कॉपी पर नोट करने लगी ।

इधर रीधिमा के हाथों से कलम छूट गयी । वो गहरी सोच में डूब गयी । सारा दिन ऐसा ही चलता रहा । खाना भी नहीं खाई । कोई फैसला नहीं कर पा रही थी । डाइबटीज के मरीज सी हालत हो गयी थी । ना सामने पड़ा मीठा खाते बन रहा था और ना छोड़ते । खाए तो जान पर बने और ना खाए तो मन ना जीने दे । अंत में मन जीत गया । रीधिमा ने अंतिम बात यही सोची कि बिना अपने मन के जिना कोई जीना होता तो जेल में बंद करना कोई सज़ा ना होती । कम ही जीएंगे लेकिन एक बार तो मीठा चख ही लेंगे । सहेली को हरी झंडी दिखा दी गयी । उसने लड़के तक बात पहुंचा दी । रीधिमा खिड़की से उसे देख रही थी । मिलने का पैग़ाम सुनते ही वो लड़के के जिस तरह के भाव थे उससे ये अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि बंजर ज़मीन को जब ज़माने बाद बादल चूमते होंगे तो वो कैसा महसूस करती होगी ।

समय तय था, जगह तय थी, बस किस्मत तय होनी बाक़ी थी । इसी ने तो तीन दिलों की धड़कन बढ़ा रखी थी । इस कहानी को मैं अगर बहुत बहुत बहुत पुराने ज़माने में जाकर लिखता तो लोग इसे पढ़ने के बाद रीधिमा की सहेली को ही अब्दुल्ला मान लेते जो बेगानी शादियों में दीवाना हो जाया करता था । सच में उसका ऐसा ही हाल था । रीधिमा से ज़्यादा चिंतित वह दिख रही थी । कोचिंग के बाद का समय तय हुआ था । सारा शहर अगर कुछ समय के लिए शांत हो जाता तो आज तीन धड़कनों की गूंज आसानी से सुन सकता था ।

प्लॉन था कि पहले रीधिमा और उसकी सहेली घर पहुंचेंगी, इसके ठीक बीस मिनट बाद एटलस ब्वॉय पैदल ही हाथ में एक किराना दुकान की छाप वाला झोला लेकर आएगा और इधर उधर किसी को ना देख कर घर का दरवाजा खटखटाएगा । फिर सहेली बाहर आएगी और दरवाज़ा खोल कर उससे थैला लेते हुए अपनी पैनी नज़रों से आस पड़ोस की दीवारों में लगे कान और आंखों का अवलोकन करेगी और सब ठीक होने पर लड़के को अंदर बुला लेगी । अगर प्लॉन के हिसाब से सब ना हुआ तो इसके लिए एक प्लॉन बी भी था, 'जो होगा देखा जाएगा ।'

लेकिन प्लॉन बी की ज़रूरत ही नहीं पड़ी । मोहब्बत के आग़ाज़ में कठिनाइयां जान बूझ कर मुंह फेर लेती हैं। क्योंकि उन्हें आगे चल कर मज़े जो लेने होते हैं । शुरुआत में ही सब बिगड़ जाएगा फिर मोहब्बत में लोग बर्बाद कैसे होंगे ? ख़ैर लड़का अंदर घुस गया ।

"कौन है सहेली ?" ओह मैं बताना भूल गया सहेली का नाम ही सहेली था । मतलब प्यार का नाम ।

"कोई भी तो नहीं है दादी ।"

"हमको अभी दिखा कोई ।"

"अरे दादी तुमको तो दादा भी दिखते हैं कभी कभी तो वो सच में आते हैं क्या ?"

"चल बदमाश, पुराने ख़यालों में खोना पड़ेगा अब ।" इतना कह कर दादी ने फिर से आंखें बंद कर लीं । सहेली ने लड़के को ले जाकर पीछे वाले कमरे में छोड़ दिया । रीधिमा यहां पहले से ही मौजूद थी । सहेली लड़के को छोड़ कर दादी के पास लौट गयी । रीधिमा से ज़्यादा वो लड़का घबराया हुआ दिख रहा था । वो इतना घबराया था कि उसे देख कर रीधिमा की घबराहट कम हो गयी ।

"बोलो ?" कुछ देर चुप रहने के बाद रीधिमा ने ही शुरुआत की ।

"आपने बुलाया है । हमको लगा आपको कुछ कहना है ।"

"हम तो इसलिए बुलाए कि तुम एक साल तीन महीने और सात्ताइस दिन से कोचिंग के बाहर खड़े खड़े थक गये होगे । हमको लगा शायद बैठने की इच्छा हो रही हो तुम्हारी ।" रीधिमा ने गंभीर हो कर कहा ।

"नहीं वो हम, हम घर जाते हैं ना वहीं थोड़े ना खड़े रहते हैं ।" इस मासूम से जवाब पर रीधिमा हंस दी । डरा हुआ एटलस ब्वॉय भी मुस्कुराया ।

"नहीं वो हम तो जब भी देखे वहीं खड़े देखे तुमको । इसलिए सोचे शायद...." रीधिमा फिर हंसी। 

"अरे महारानी हमने कहा था दादी फ्यूज है, आस पड़ोस नहीं । उनका कान आंख दोनों ज़रूरत से ज़्यादा तेज है । इसलिए थोड़ा आराम से ।" सहेली ने अचानक आ कर दोनों को चेताया ।

"ओह, अब नहीं होगा ।" लड़के ने हाथ जोड़ कर कहा । इस पर सहेली रीधिमा को देख कर मुस्तुराते हुए चलाी गयी ।

"चलो हंसी मज़ाक बहुत हुआ अब वो बात कर लें जो करने आए हैं ।"

"जी, बिलकुल करिए ।"

"करिए ?" रीधिमा ने आंखें बड़ी करते हुए दोनों हाथ चमका कर कहा ।

"हमारा मतलब है बोलिए ।"

"तुम्हें सच में कुछ नहीं बोलना ?"

"नहीं हमको क्या बोलना होगा ।"

"तो वहां खड़े क्यों रहते हो ?"

"आपके लिए।" लड़के ने नज़रें झुका कर कहा ।

"हमारे लिए ही खड़े रहते हो और हमसे ही कुछ नहीं कहना ! पर क्यों ?"

"औकात जानते हैं हम अपना ।" लड़के की आंखें भीग गयीं लेकिन लब अभी भी मुस्कुराहट से लदे हुए थे ।

"हम औकात की बात नहीं करते । करते तो मिलने नहीं बुलाते लेकिन फिर भी पूछना चाहते हैं कि जब तुमने औकात का सोच ही लिया था तो फिर ये रोज़ रोज़ का देखना क्यों ?" अभी तक खड़ी रीधिमा पास पड़ी कुर्सी पर बैठते हुए बोली ।

"हमारे पिता जी मजदूर हैं । उन्हीं से सीखे हैं।  वो हमेशा कहते हैं कि जो चीज औकात से बाहर हो उसे पाने की चाह मत रखो लेकिन उसे चाहना भी मत छोड़ो । हम लोग चाहना छोड़ देंगे तो लाश हो जाएंगे क्योंकि पा लेना हमारी किस्मत में होता नहीं । तो कम से कम चाहत में उसे निहार तो सकते ही हैं । हमारे भाई को एक लाल बस्सा चाहिए था । वो एक साल तक दुकान के बाहर उस बस्ते को देखने जाया करता था । हर रोज़ बिना नागा । जबकि वो जानता था ये उसे मिलने वाला नहीं लेकिन चाहत को तो ज़िंदा रखना ही था । जानती हैं पिछले साल हमको एक प्रतियोगिता में एक साइकिल और पचास रुपया ईनाम मिला था । ईनाम में सिर्फ साइकिल ही था । वो पचास रुपये हमें हमारे सर ने खुश हो कर दिए थे । और छोटका की किस्मत देखिए कि वो बस्ता भी पचास का ही था । उसकी निस्वार्थ चाहत ने उसे वो दिला ही दिया जो वो चाहता था । हां लेकिन ना भी मिलता तब भी वो उसे रोज़ देखने ज़रूर जाता । शायद अब आप समझ गयी हों ।" रीधिमा एकदम शांत हो चुकी थी । उसकी आखों के कोर भीग चुके थे ।

खुद को थोड़ा संभाल कर रीधिमा बोली "कभी सोचा नहीं कि हम किसी से कंप्लेन कर देंगे या फिर कोई और तुम्हें टोक देगा ।"

"नहीं, ये सब इंसान तब सोचता है जब उसके मन में कोई स्वार्थ होता है । जैसे कि आज डर लग रहा है क्योंकि आपसे मिलने का स्वार्थ था मन में । वहां तो हम बस खड़े होते हैं । इस पर किसी को अच्छ लगे या बुरा क्या फर्क पड़ता है ।" रीधिमा को लड़के की बातें और उसका स्वभाव भा गया था । बहुत कुछ कहना चाहती थी उससे । लेकिन उसे पता था कि कुछ और कहने का कोई मतलब नहीं।  इसीलिए वही कहा जाए जो मतलब का है ।

"हमारे हाथ बंधे हैं। हम लोगों का किस्मत में खुद से फैसला करना नहीं होता । हम सब ये नियती पर छोड़ देती हैं । एक ख़वाब देखे हैं, पढ़ने का । हज़ार ज़िद्द करने और बार बार डांट खाने के बाद जा कर इसे सच करने की हिम्मत कर पा रहे हैं । इसके बाद अगर तुम्हारे साथ आगे बढ़ने का ख़वाब भी पाल लेंगे तो कुछ नहीं कर पाएंगे । क्योंकि हम जानते हैं सबको । ना ये ख़वाब पूरा होने देगा इसके साथ हमारा पहला ख़वाब भी तोड़ देगा सब । हमको कुछ करना है, अपना दम पर । लेकिन एक बात ज़रूर कहेंगे । हमारे हाथ में हमारा किस्मत को लिखना होता तो आज लिख देते ।" रीधिमा बस बोल कर रह गयी क्योंकि वो उसे गले लगा कर रो भी तो नहीं सकती थी ।

"आपको याद है कि हम कितना दिन से आपको देख रहे हैं । हालांकि आप नोटिस इतना समय से कर रही हैं मगर हम आपको इससे एक महीना और सोलह दिन पहले से देख रहे थे । लेकिन आपने नोटिस किया, हमको अपना किस्मत में लिखने की चाहत रखी । इन सब बात से ही हमको हमारी निस्वार्थ चाहत का फल मिल गया । बाक़ी प्रेम पंख होते हैं बेड़ी नहीं । हम ही अगर लोग सब को आपके पैरों में बेड़ियां डालने का कारण दे देंगे तो फिर हमारे चाहत का, इस तपस्या का भला क्या मतलब रह जाएगा । आप निश्चिंत होकर पढ़िए और हमारी तरह चाहत के नियम को फॉलो करिए । कौन जानता है कब बंजर जमीन पर फूल खिल जाएं और कब हंसता बाग उजड़ जाए । ये सब नियतीए तय करती है । सिर्फ आप ही लोग नहीं हम लोग भी सब कुछ नियतिए पर छोड़ देते हैं ।" रीधिमा उसे देख कर मुस्कुरा दी और एटलस ब्वॉय ने उसे ऐसे देखा जैसे बचपन में सुनी कहानियों में से वो परी अचानक निकल कर बाहर आ गयी हो जिसके बारे में सोच कर हम एक निश्चल प्रेम में डूब कर सो जाया करते थे । रीधिमा को उसने इतने करीब से मुस्कुराते हुए पहली बार देखा था ।

"नहीं जानते कि आगे क्या होगा लेकिन ये जानते हैं कि तुम बहुत आगे जाने वाले हो । किसी भी चीज को बहुत ईमानदारी से चाहते हो । बस कभी कुछ गलत मत चाहना बाक़ी तुम्हारा कल बहुत सुनहरा है ।"

"उसी कोशिश में लगे हैं ।" इसके बाद कुछ देर दोनों एक दूसरे को देखते रहे ।
जाने से ठीक पहले रीधिमा ने उस लड़के से कहा "अपना नाम तो बता दो ।"

लड़के ने मुस्कुरा कर कहा "एटलस ब्वॉय ।" दोनों मुस्कारा दिए । दोनों का शरीर एक दूसरे से पांच सात फुट के फासले पर था लेकिन दोनों की आत्मा एक दूसरे को गले लगा चुकी थी ।

आज की शाम अलग होने तक एटलस ब्वॉय की निस्वार्थ चाहत का कुछ असर रीधिमा में दिखने लगा था । आंखों के कोर गीले थे लेकिन उदास कोई नहीं था । सहेली आज पहली बार सच्ची मोहब्बत का अहसास कर रही थी क्योंकि दरवाज़े पर खड़ी रह कर उसने सब सुन लिया था । रीधिमा आज किसी और ही दुनिया में थी । मां की डांट, पिता के लाढ़ इन सबका कोई असर छू नहीं पाया था उसे । आज आज़ादी महसूस कर पा रही थी वो । उसमें एक नई उम्मीद जगी थी ।

अगले दिन वो हुआ था जो सबको एक दूसरे से कानाफूसी करने पर मजबूर कर गया । एटलस ब्वॉय आज अपनी जगह से गायब था । रीधिमा को थोड़ा बुरा लगा लेकिन वो जानती थी कि भले वो यहां नहीं है लेकिन उसकी दो आंखें उसे कहीं ना कहीं से देख रही हैं। क्योंकि वो जताना छोड़ सकता है लेकिन चाहत नहीं । रीधिमा सड़क की तरफ देख कर मुस्कुरा दी और उसकी मुस्कुराहट ने वहीं कहीं छुपे लबों पर अपनी छाप छोड़ते हुए उन्हें भी मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया ।

नोट - जिस कहानी की ये शुरुआत है उसका अंत इससे बहुत अलग है । कब होगा अंत इसके बारे में कह नहीं सकता । इसे किश्तवार नहीं बल्कि एक ही कहानी समझ कर पढ़ें । दो लोगों की ज़िंदगी का बेहद छोटा हिस्सा है ये कहानी । आगे जो होगा वो शायद आप सबकी सोच से बहुत अलग हो ।

धीरज झा

Hindi Love Story, Story Series, Atlas Cycle, Memories

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क़िस्सों का कोना : एटलस ब्वॉय की प्रेम कहानी
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