मजदूर आपका मनोरंजन कर रहा है, मजे लीजिए, मगर....

Pic credit : Aajtak मज़दूर घर की तरफ भाग रहे हैं । कोई मजबूरी में पैदल चल पड़ा तो किसी ने देखा देखी घर की राह पकड़ ली । कोई पैदल चला, को...

Pic credit : Aajtak


मज़दूर घर की तरफ भाग रहे हैं । कोई मजबूरी में पैदल चल पड़ा तो किसी ने देखा देखी घर की राह पकड़ ली । कोई पैदल चला, कोई साइकिल से, कोई रेल से तो किसी ने अपनी रिक्शा ही उठा ली । ये सड़क पर पसीना और खून बहाते रहे तो हम जैसे बातें बनाते रहे । किसी ने इन्हें देख कर आंसू बहाये तो कोई इन्हें बेवकूफ कह कर हँस पड़ा । वैसे तो ना इन्हें हमारे आंसुओं से फरक पड़ा ना ही हमारी हँसी से ।

हर कोई बस एक ही मंत्र 'मरना है तो घर पर ही मरेंगे' जपता हुआ आगे बढ़ता रहा । इन मजदूरों को देख कर लोगों की आंखें भी खुलीं । बिहार की जानता ने तो राज्य में ही इन मजदूरों के रोज़गार की मांग उठा दी । ये सब कुछ चला मजदूरों के नाम पर लेकिन इन सब बातों के बीच एक अहम बात हमें शायद नज़र ही नहीं आई ।

दो महीने हो गये लॉकडाउन शुरु हुए । देश भर में बंदी होने के साथ ही इन मजदूरों के पलायन की खबरें आने लगीं । दो महोनों से ये लोग अपने घर का रास्ता पकड़े हुए हैं लेकिन अभी तक घर नहीं पहुंचे। मैं यहां एक मज़दूर की नहीं बल्कि सभी मजदूरों की बात कर रहा हूं । संख्या में ये कितने हैं जो इनकी गिनती खत्म ही नहीं हो रही ?

दरअसल इनकी संख्या खत्म भी नहीं होगी क्योंकि ये सर्वव्यापक हैं । ये नींव में दबी वो ईंटे हैं जिनका योगदान किसी को दिखता नहीं लेकिन इनके बिना भवन का निर्माण असम्भव है ।  आप जिस घर में खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं वो घर इनका बनाया हुआ है, आप जिस पलंग पर बैठ कर इनकी खिल्ली उड़ाने के बाद मजे से टांग पसार के सो जा रहे हैं वो पलंग इनका बनाया हुआ है, आपके घर में रखी एक एक चीज़ पर इन मजदूरों की उंगलियों के निशान छपे मिल जाएंगे आपको ।

आपके पास धन हो सकता है लेकिन आपके पास उतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि आप मजदूरों की जगह खुद काम कर लें । आपका व्यापार, आपके फार्म, आपकी उपजाऊ जमीनें, आपकी दुकानें, आपकी मीलें कारखाने सब कुछ इन मजदूरों से ही आबाद हैं । और तो और जिन सड़कों पर ये चल रहे हैं उनका निर्माण भी इन्हीं के हाथों हुआ है ।

इन्होंने हमसे मदद नहीं मांगी, ये सरकारों के भरोसे नहीं बैठे, खुद हिम्मत की और अपने घर की तरफ बढ़ चले । ऐसे में किस हक़ से हम इन पर हँस रहे हैं ? दिक्कत में हम सब हैं लेकिन जो भी हो कम से कम अपने घर में तो हैं, अपने परिवार के साथ तो हैं । अगर एक दिन भी हमें इन जैसी परिस्थिती में जीना पड़ जाए तो ये हँसी  दम तोड़ देगी हमारी ।

अपना देश छोड़ विदेशों में जा कर मजदूर करने वाले एनआरआई कहलाते हैं लेकिन अपने ही देश में काम कर के पेट भरने वाला गरीब बिहार, यूपी एमपी आदि का मजदूर हो जाता है । जिसने काम तो लेते हैं लेकिन उनकी मुसीबत में कोई उन्हें सहानभूति तक नहीं दिखा सकता ।

ज्योति नाम की लड़की और उसके पिता का नाम आज कल बहुत सुन रहा हूं । पहले पहल तो साहस के कारनामे सुने और अब उन कारनामों की पोल खोल सुन रहा हूं । मैं हैरान हूं ये देख कर कि जिस समय देश दुनिया के पास चिंता करने को इतना कुछ है उस समय हम उस लड़की के नाम पर बहस कर रहे हैं जो कल तक अगर मर भी गयी होती तो कोई उसे पूछने वाला ना मिलता ।

आज बहुत लोग गणित निकाल रहे इस बात को लेकर कि अगली 7 दिन में 1200 किमी कैसे साइकिल चला ली! मान लिया कि नहीं चलाई होगी इतना साइकिल तो क्या किया जाए ? फिर वापस से भेज दिया जाए ये कह कर कि बेटा जाओ इस बार साइकिल चला के आना । क्या इसके सिवा और कोई खबर, और कोई मुद्दा नहीं है हमारे पास बात करने के लिए ?

है तो लेकिन हम उन पर बात नहीं करेंगे क्योंकि हमें तो हँसना है ज्योति जैसी बच्चियों पर, पैदल चलने वाले मजदूरों पर । हंसिए और ज़ोर से हंसिए वैसे भी इस देश में गरीब का रोना तमाशा बन जाता है । ये मज़दूर भी आपका मनोरंजन कर रहे हैं,आनंद लिजिए और साथ ही साथ दुआ कीजिये कि आपको इनके जैसी दिक्कतें कभी ना झेलनी पड़ें ।

धीरज झा

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क़िस्सों का कोना : मजदूर आपका मनोरंजन कर रहा है, मजे लीजिए, मगर....
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