एक और मजनुआ

Pic credit : Sunday Oveserver #प्रेम_कहानी डर लगता था रजना को प्रेम से । बहुत छोटा था तब 'मजनुआ का (चाचा)' की जूत परे...



Pic credit : Sunday Oveserver

#प्रेम_कहानी

डर लगता था रजना को प्रेम से । बहुत छोटा था तब 'मजनुआ का (चाचा)' की जूत परेड होते देख लिया था । मजनुआ का को उसकी ना हो सकी प्रेमिका के गांओं वाला सब तो तोड़बे किया, अपने घर जुतियाए गये सो अलग । तभी तो नाम मजनुआ पड़ा, नहीं तो बाबा बड़े प्यार से बिसनाथ नाम रखे थे । लेकिन कौन जानता था बिसनाथ बड़का होके लईकी के खातिर पिटाएगा और मजनुआ कहलाएगा । रजना भी तो केतना हंसता था । केतना बार मजनुआ कह के भाग जाता था ।

रजना कहियो से मजनुआ का नहीं बनना चाहता था । सोचता था कौन ससुर प्रेम में लात खाने जाए । हालांकि मजनु काका के जमाना और था रजना का और है लेकिन तभिओ कभी हिम्मत नहीं हुआ उसका । उसकी अम्मा कहती है पूरा खनदान में रजना सबसे बीस है, रूप रंग से लेकर कद काठी सब में । इंटर के परिक्षा समय सेंटर पर आने वाली हर लड़की एक न एक बार रजना को गौर से जरूरे देखी थी लेकिन उसका पैंट डर के बेल्ट से एतना कसाया हुआ था कि मजाल है मन या तन में जरा सा सुगबुगाहट हो जाए । हालांकि ई बात सच है या फिर रजना का वहम मात्र इसकी पुष्टि हम नहीं करते ।

उम्र बढ़ने के साथ साथ रजना ई बात अच्छा से समझ गया था कि ई सब जनाना रूप का किया धरा होता है एही खातिर उसने अपने मन से रूप का लोभे मिटा दिया था । कुल मिला के इश्क प्रेम मोहब्बत ई सबसे बहुत दूर था हमारा रजना लेकिन मोहब्बत चुंबक है बाबू, खींच लेती है उसको तो और शिद्दत से खींचती है जो ससुर अपोजिट बल लगाता है । रजना का अपोजिट बल ही भारी पड़ गया उसके प्रण पर ।

गांओं देहातज में फागुन को बहुत खास माना जाता है । इस मास का तैश हर बच्चे और बूढ़े को जवान कर देता है महराज । ठंड में एक के बाद एक लादे हुए कपड़ों का बोझ फागुन के साथ एक एक कर के कम होना शुरू हो जाता है । अब कपड़ा उतरने का सोच भला किसके मन में हरिअरी नहीं फूंकेगा ! तभिए तो हर किसी का गलत सही माफ कर दिया जाता है, हंसी मजाक, गाली मार सब पर खुला छूट दे दिया जाता है। ऐसे में ऊ पाहुन को अभागा ही माना जाता है जो रिश्तेदारी के गांओं से गुजरे और उस का कपड़ा बेरंग रह जाए ।

अब हमारा रजना अभागा थोड़े न था । पूरे फरीक में चौदह भाइयों से छोटा था । इसका मतलब 14 ठो भउजाई और 14 ससुरारी । बगल के गांव में बड़के काका के बेटे रघुराम बियाहे थे । तभी तो उस गांव में हर कोई जानता था रजना को ।
बीए का फारम भरने निकला था रजना । अलग ही खुशी झलक रही थी चेहरे पर । अरे भाई पूरे गांओं में को पहिला ग्रेजुएट लो मिलने वाला था । वैसे भी ये वो जमाना का बात है जब बीए बैल नहीं बल्कि बाबू कहा जाता था । आने वाले खतरे से अंजान रजना बाबू जी का झकझक सफेद ससुरारी बूशट आ गेहूंआ रंग का पैंट चढ़ाए अपने साईकिल को हेलिकोपटर बनाए उड़ाए जा रहा था ।

फागुन की धुन से बहुत दूर अपने ही ख़यालों में खोया रजना साईकिल का पाईडिल मारे जा रहा था कि तभी छपाक से पानी का एक लहर आया और हेलीकोपटर क्रैश हो गया । रजना सड़क से ढुलुक के खेत में आ उसका साईकिल उसके ऊपर । कुछ समझ पाता उससे पहिलहीं कई लोगों के ठिठियाने का मिक्स साउंड उसके कान में पड़ा । आदमी चोट से केवल तड़पता है लेकिन मजाक उड़ना ! भाई साहब लहू जला देता है लहू ।

रजना का लहू भी जला, खूब जला । उठते ही ना आजू देखे ना बाजू और सुरू हो गये फलनमा की दाई से बहिन तक सबको तारने। इस देश में सबसे सस्ता हथियार गाली है जब मन खिसियाए तब सबसे पहिले यही छूटता है ।

"अरे बाबू तनि दम धरो । काहे खिसिया रहे ।" दांत चियारती भीड़ में से एक 'होसियार के लंगोट' सामने आए ।

"आओ सरऊ पहिले तुम्हीं को चांपे ।" कहते हैं ना ज्यादा होसियार तीन जगह महकता है । चले थे पंच बनने रजना धर दिए एक ठो । दूसरा हाथ उठाए ही थे कि किसी ने आ के जोर से धक्का दिया ।

"बहुते ताओ आता है तुमको ? रंगे न पड़ा है ? देह थोड़े न खिया गया है पानी से ? ऐतना फिकीर है त फागुन में जीट बूट झाड़ के निकलते काहे हो । बईठो घर में बहुरिया बन के ।" धक्का देने वाले हाथ एक लड़की के थे । जान तो गईए हो गे कि ईहे लड़की नायिका है, तो चलो रूप का बखान भी सुन ही लेओ । गोरा बदन हल्दी चंदन, सुरमई आंखें, सुराही सी गर्दन, हिरनी सी चाल, गुलाबी गाल, होंठ लाल, ऐसा कुछ सोच रहे तो वहम से निकलिए महराज, ऐसा कुछो नहीं था ।

छोटे से कद की लड़की थी, रंग सामान्य से हल्का उन्नीस ही रखिए । बाल ऐसे जइसे घर बुहारने के लिए झाड़ू की जगह इनके केशों का ही प्रयोग होता हो, होंठ फटे हुए, हाथ पैर रोड़ एकदम, हां आखें प्यारी और बड़ी लेकिन गुस्से के बावजूद चेहरे पर मासूमियत कायम ।

"धक्का काहे दी बन्नचर ।"

"तू बन्नचर, तोहर बाप बन्नचर, तोहर खनदान बन्नचर । अपना मुंह देखे हो लगता है जइसे अकाल के कऊआ ।"

"मुंह सम्हार के बोलो नहीं तो भूल जाएंगे कि लईकी हो ।" अम्मा की बातों को हमेशा से सच मानते आ रहे रजना को लड़की का बात छेद दिया था, ऊहो भी एकदम भीतर तक । सब लड़की उसको ताकती रह जाती थी और एक ये है जो गरियाए जा रही है ।

"ऐ रजना बाबू हैं। ऐ पाहुन के भाई हैं जी । का हो गया ।" भईया के साले साहब आ पहुंचे इसी बीच ।

"का महराज, देखिए का हाल बना दिया है आपके गांओं में हमारा । ऊपर से बोलने का तमीजे नहीं है ।"

"अरे बच्चा लोग है, ऊपर से फागुन चढ़ गया है । जनबे करते हैं । ई सब छोड़िए पहिले घर चलिए ।" हर सयाने की तरह इन्होंने भी बात पर माटी लेपने ती कोशिश की ।

"काहे का बच्चा लोग, साला सब सैतान का दूत सब है । और इसको देखिए सिंघ तोड़ के पठरू बनी है । घोड़ा जइसन हो गयी है लेकिन बुद्धि नाम के चीजे नहीं है ।"

"टुन्नू भइया खड़े हैं नहीं तो इहे बात पर गांड़ पर दुल्लती पड़ता तो बुझाइए जाता घोड़ा हैं कि घोड़ी ।"

"ऐ फुलिया घर चल जाओ नहीं अभिए लगेंगे झोंटा ध के मारने । जीऊ लमरा गया है तुम्हारा ।" टुन्नू भइया ने आंखें तरेरते हुए कहा ।

"जा रहे हैं लेकिन ई बैल को समझा लीजिए नहीं तो लगेंगे अभिए...।"

"जाती हो कि दें एक लाठी ।" फुलिया आगे कुछ बोलती इससे पहले ही टुन्नू भइया लट्ठ उठा लिए और वो भनभनाते हुए भाग गयी ।

"भैरो चा के बेटी है । बचपने से कोई समझाने बुझाने वाला रहा नहीं एही खातिर जरा मुंहफट है । बच्चा ही समझिए उसको । चलिए घर चलिए ।"

"नहीं टुन्नू जी पहिलही बहुत देर हो गया है हम तो फारम भरने जा रहे थे । आज अंतिम दिन है । आज नहीं हुआ तो एक साल ब्यर्थ जाएगा ।" रजना इस झगड़े में भूल ही गया था कि उसे फार्म भरने जाना है ।

"अरे तो अइसही जाइएगा का मर्दे । चलिए थोड़ा हाथ मुंह धो लीजिए ।"

"नहीं नहीं टुन्नू जी अब जइसे हैं अइसही चल जाएंगे ।"

"ठीक है जइसे आपका मर्जी । लेकिन आते समय भेंट कर के जाइएगा । ई हल्ला नहीं होता तो आप चुप्पे निकल जाते ।" रजना कुछ बोलना तो चाहता था लेकिन समय के अभाव में सिर्फ मुस्कुरा के रह गया ।

उस दिन किस्मत से फारम भरा गया था । वो घर चला आया । सब कुछ ठीक रहा लेकिन फिर भी रजना अपने दिमाग से फुलिया को निकाल नहीं पा रहा था । उसकी आवाज़ जैसे दिमाग के भीतर आपस में टकरा रही थी । गुस्से से लाल हुआ जा रहा था वो । आते समय भी ससुरारी में रंग धराया था लेकिन इस बार रजना बिना कुछ बोले निकल आया था । जानता था कुछ बोलने का फायदा तो है नहीं सब इहे कहेंगे कि फागुन है, बच्चे हैं। बेकार का समय आ ऊर्जा व्यर्थ करने से अच्छा है कि चुप चाप इहां से निकल लिया जाए ।

"अरे राजन बऊआ, ई का करबा आए जी ।" घर में घुसते ही मझली भऊजी ने सवाल दे मारा ।

"हां हमहीं तो करबाए हैं भउजी । छोटकी भउजी के गांओं में खड़ा हो के चिल्ला रहे थे कि आओ बाल्टी भर रंग डाल दो हम पर ।" रजना जितना क्रोध दिखा रहा था सब उतना ही ठिठिया रहे थे ।

"पक्का फुलिया का काम होगा। एकदम ब...."

"जानते हैं बच्चा ही है ऊ । आपके भइया दुखभरा कहानी सुनाए उसका । ई ना हुआ कि कान ध के दू चार हाथ दें उसको, उल्टा हम्हीं को लगे ज्ञान देने ।" रजना का गुस्सा कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था ।

"बऊआ, ऊ बेचारी बचपने से एतना मार खा ली है कि उसे मार का असरे नहीं होता । उसके बाप को छोड़ कर और कोई नहीं मारता उसे । सब उसकी शरारतें और बात बर्दास्त कर लेते हैं काहे कि सबको पता है अगर कोनो उसके बाप को बताया तो ऊ उसे मार के अधमूआ कर देंगे ।" छोटकी भउजी थोड़ी भावुक हो गयीं ।

"अब अइसा काम करेगी तो पिटएबे करेगी ।" रजना अभी भी शांत नहीं हो रहा था । भउजी हल्का मुस्काईं लेकिन ये मुस्कान एक पीड़ा से भरी थी ।

"जानते हैं बऊआ, बेटी होना एगो अभिसाप है लेकिन किसी कलंक के साथ बेटी का पैदा होना उसकी जिंदगी को जीते जी नरक बना देता है । आप उसका चिल्लाना नहीं सुने हैं ना इसलिए अइसा बोल रहे हैं । बचपन में बहुत डरी सहमी रहती थी । पता नहीं क्या दिखता था उसे हमारे यहां कि अपना टोला लांघ के हमारी दुआरी आ जाती । हम लोग के साथ खेलती, खाती और कभी कभी वहीं कोने में चुपचाप सो जाती । भैरो चा इसलिए भी उसे मारते । कहते कि दूसरे घर जा कर खाती, सोती है, हमको लोग भिखमंगा समझेगा । भैरो चा रोज उसे मारते थे, गलती ना भी हो तभिओ और अगर हो तब तो पूछबे न करिए । जिस दिन फुलिया खुस दिख जाती हम सब समझ जाते कि भैरो चा का मन खराब है ।" पुराने दिनों की याद भउजी की आंखें में भरे आंसुओं के ऊपर कागज की नाव की तरह डोलने लगी ।

"लेकिन ऐसे क्यों करते थे भैरो चा ?" रजना अब कुछ नर्म पड़ गया था ।

"कहे ना कलंक ले के जन्मी थी । इधर ये पैदा हुई उधर काकी मर गयी । तबसे भैरो चा को लगता था कि उनके घर का खुसहाली वही छीनी है । रोज तारी पी के आते और रोज उसे मारते । बेजुबान जानबरो एतना नहीं सहता तो फिर फुलिया कइसे सहती । जब हाथ पैर निकल आया तो एक दिन नोच ली भैरो चा के मुंह कान । देखते लग रहा था जइसे कोई जंगली जानबर पंजा मारा हो । तब से भैरो का थोड़ा दब गये । इधर फुलिया अच्छे से समझ गयी कि कमजोर का जमाना नहीं है । तब से मुंहफट हो गयी है । सुकर मनाइए कि टुन्नू भइया आ गये थे नहीं तो ऊ हाथो चला देती और कोई उसको कुछ नहीं कहता । गलत करती है वो लेकिन अब क्या कहा जाए उसको ।" अब तो फुलिया रजना के दिमाग में और तेजी से नाचने लगी । रात भर उसके मन में उसी को लेकर द्वंद चलता रहा । एक तरफ उसे उसके बारे में बुरा लग रहा था दूसरी तरफ तेज गुस्सा आ रहा था ।

किसी के बारे में सोचते रहना बहुत घातक होता है फिर भले ही उस पर गुस्सा ही क्यों ना हो । ये सोच उस शख्स को दिमाग और मन पर छाप देता है और छप जाने का असर क्या हो सकता है ये आप जनबे करते हैं ।

दो दिन बाद रजना का फिर उसी ओर जाना हुआ । इस बार फुलिया गांओं से बाहर वाले पुले पर दिख गयी । पुलिया बांस की फट्टियों से बनी थी, दोनों तफ खुला था । उसे देखते ही रजना को भउजी की वो बात याद आ गयी 'सुकर मनाइए हाथ नहीं छोड़ी ।' वो सोचने लगा कि साइकिल से उतर जाने में ही भलाई है । कौन जाने ई पगलिया आ के धक्का दे दे । डरते डरते उस पार पहुंचा रजना । वो अकेली बैठी मिट्टी में चित्रकारी कर रही थी । रजना चुपचाप निकल जाना चाहता था ।

"ऐतना डेरा काहे रहे हो । आज नहीं है हमारे पास कोनो रंग ।"

"तुम्हारा का मालूम पुले पर से धकिया दो ।"

"एतनो पागल नहीं हैं हम ।"

"चलो ई तो मानती हो कि कुछ कुछ पागल तो हो ।"

"हां सब कहते हैं तो मान लिए हम भी ।"

"ई का कर रही हो ।"

"चितरकारी कर रहे हैं ।" रजना थोड़ा पास गया उसके । उसने देखा कि फुलिया ने ज़मीन पर पूरे आसमान को उतार दिया है । लग रहा था जैसे सामने से डूबते सूरज को उसने इस मिट्टी में कैद कर लिया हो ।

"तुम तो खूब कमाल चितरकारी करती हो जी । कागज पर रंग से काहे नहीं बनाती ?" फुलिया ने पीड़ा और मासूमियत को मिला कर उसकी तरफ एक बार देखा और फिर नज़रें झुका लीं । रजना भी कुछ बोला नहीं। 

"हमारा नाम राजन है ।"

"जानते हैं । हमारा नाम...।" रजना ने होसियारी दिखाई

"फुलिया है, जानते हैं ।" इस होसियारी पर फुलिया ने उसे घूर के देखा ।

"आज हमारा मन नहीं कर रहा नहीं तो तुमको गर्दा से नहा देते अभिए  ।"

"अब हम का कर दिए ।"

"हमारा नाम भानूमति है ।"

"तो सब फुलिया काहे कहते हैं ?"

"ऊ तो हम किसी बात पर बहुते जल्दी गुस्सा से फूल जाते हैं इसीलिए सब हमको फुलिया कह के चिढ़ाते थे । धीरे धीरे हर कोई इहे नाम से पुकारने लगा लेकिन इसके माने ई थोड़ी है कि हमारा नाम फुलिया पड़ जाए ।"

"समझने का बात है नहीं तो फुलिया का मतलब तो फूल भी हो सकता है ना । भानूमति से तो अच्छा फुलिया बुलाने में लगता है ।"

"बुला के देखो । गर्दा झोंक देंगे ।"

"अरे नहीं हमको सहर जाना है जी । ऊ रंग के लिए बाबू से पहिलहीं बहुत बात सुन लिए हैं । माफ करो ।" इतना कह के रजना ने साइकिल का पाइडिल मारा और आगे बढ़ गया ।
फुलिया की पहुच से थोड़ा बाहर निकल कर उसने साइकिल फिर रोकी और पीछे मुड़ कर बोला "फुलिया ही बुलाएंगे ।"

"अरे तो पास आ कर बुलाओ ना तब बताते हैं।" इस पर रजना ने कान को हाथ लगाए और हंसते हुए साईकिल आगे बढ़ा ली । पीछे फुलिया जमाने बाद मुस्कुराई थी । उसकी मुस्कुराहट बादलों को चीर कर निकलने वाले सूरज सी चमक रही थी । रजना जा रहा था लेकिन कई बार किसी का जाना ज़िंदगी में आने की आहट बन जाता है । दरअसल वो जा नहीं रहा था बल्कि फुलिया के जीवन में आ रहा था ।

अब वो हर समय फुलिया के बारे में ही सोचता था । चार दिन बाद फिर वो भइया की ससुरारी तरफ गया । फुलिया फिर उसे वहीं मिली, ज़मीन पर आसमान को उतारती हुई, ढलते सूरज को समेटती हुई ।

"ये लो ।" रजना ने एक झोला उसकी तरफ बढ़ाया ।
"का है ?"

"देख लो ।" फुलिया ने देखा तो झोले में प्लेन कोरे कागज, पेंसिल, कटर और रबर थी ।

"इसका का करेंगे ?"

"ज़मीन पर बनाती हो और मिटा देती हो लेकिन इस पर बना के सहेज लेना ।"

"भक्क हमको तो पेंसिन पकड़े भी नहीं आता ।"

"सबको सब कुछ हमेसा से कहां आता है कभी ना कभी तो सीखना ही पड़ता है । जइसे माटी में लकड़ी घुमाती हो वैसे ही पेंसिल को कागज पर घुमाओ, सीख जाओगी ।"

"लेकिन ई मेहरबानी काहे ?"

"मेहरबानी कइसा ? कला का सम्मान कहते हैं इसको ।" समझ तो नहीं पाई फुलिया उसकी गहरी बातों को लेकिन मुस्कुरा ज़रूर दी । रजना के दिल पर ठुक रही मोहब्बत की कील पर फुलिया की ये मुस्कान हथौड़ी के अंतिम प्रहार जैसी थी । अहंकारी रजना का अहम टूट चुका था, प्रेम की बयार उसकी जड़ों तक पहुंच कर उसके तन मन को हिला चुकी थी । ये अहसास उसके लिए नया था । लेकिन कम से कम वो समझ सकता था कि ये क्या है मगर फुलिया तो इस प्रेम के रोग से दूर दूर तक अनजान थी ।

उसे तो पता भी नहीं था कि वो अब सारा दिन रजना के बारे में ही क्यों सोचती है, उसने क्यों पहली बार आईने में खुद को इतनी गौर से देखा, क्यों वो अपने झाड़ू जैसे बालों में तेल लगा कर कंघी करने लगी है और क्यों उसकी पेंसिल अब धीरे धीरे कागज पर रजना को उतार रही है । प्रेम से अनजान फुलिया अब रोज रजना का इंतज़ार करने लगी थी । रजना भी अब शाम होने तक बेचैन रहता था । उसे अब कोई फुलिया बुलाता था तो रजना को बिलकुल पसंद नहीं पड़ता था । वो हर रोज़ बहाने से छोटकी भउजी के साथ फुलिया का जिक्र करता ।
भउजी के बार बार फुलिया बुलाने पर एक दिन टोक दिया रजना ने । उसके मुंह से अचानक निकल गया "फुलिया मत कहिए, भानूमति नाम है उसका ।" जमाना इतना एडभांस नहीं था लेकिन रजना की लड़खड़ाती चाल को भउजी देख पा रही थी । भउजी खुश तो थी फुलिया के लिए लेकिन उसे भय भी था आने वाले कल का । वो जानती थी कि रजना को समझाने का कोई फायदा नहीं इसीलिए उसने सब कुछ महादेव पर छोड़ दिया ।

चार साल बीत गये थे दोनों के प्रेम को । रजना तो अब पढ़ाई पूरी करने के बाद बाबू बनने वाला था । फुलिया भी पहले से एकदम बदल गयी थी । अब किसी से उलझती नहीं थी । प्रेम ने उसे संवरना सिखा दिया था ।छुट्टे जानवर से लड़की बन गयी थी वो । छोटे से कद की सांवली सी गुड़िया । रजना का प्रेम उसके चेहरे को नूर से भर गया था । हर रोज़ एक ही जगह मिलना और कुछ मिनटों की बातचीत करना यही प्रेम था उनके लिए ।

इन सबके बीच रजना मजनू काका और प्रेम के डर दोनों से बहुत दूर निकल आया था । वो भूल गया था कि प्रेम इस समाज को कभी समझ नहीं आएगा । दोनों के बीच कुछ चल रहा है इसकी हवा जल्दी ही उड़ने लगी । और ये हवा पहले पहुंची रजना के घर । बाबू ने कड़े शब्दों ने रजना को समझा दिया कि बाबूगिरी का रौब किसी और पर दिखाए । उनके घर में गैर जाति की बहू नहीं आएगी ।

रजना को अचानक से अहसास हुआ कि जिस प्रेम से बचने के लिए वो खुद को बचपन से तैयार कर रहा था अब वो उसी प्रेम के चक्रव्यूह में फंस चुका था । हालांकि उसे भी पता था कि अब वो कुछ नहीं कर सकता । छोटकी भउजी उसकी पीड़ा को अच्छे से समझ रही थी लेकिन कुछ कर नहीं सकती थी । इसी बीच रजना की नौकरी लग गयी । अब तो रजना ने फैसला कर लिया था कि वो फुलिया को और दुख नहीं देखने देगा । वो उसे साथ लेकर शहर चला जाएगा और एक नयी ज़िंदगी शुरू करेगा ।

भैरो चा की तरफ से वो इसलिए भी निश्चिंत था क्योंकि उसे पता था वो बस फुलिया को किसी भी तरह से अपने आप से दूर करना चाहते हैं । दूसरा कोई रिश्ता भी तो नहीं मिल रहा था फुलिया के लिए । लोग उसे देखते ही छांट दे रहे थे । लेकिन इधर रजना ने तो कभी उसमें कुछ खोजने की कोशिश ही नहीं की उसे तो फुलिया जैसी थी वैसी ही सबसे ज़्यादा पसंद थी । यही सब सोच के उसने भैरो चा से मिल कर बात करने की कोशिश की लेकिन किस्मत यहां भी उसके खिलाफ थी ।
भैरो चा लगभग चिल्लाते हुए बोले थे "हमारी बेटी हम पर कोनो बोझ नहीं है जो जाति बिरादरी से अलग जा के बियाह कर दें। बाबू होगे अपने घर के हमारे लिए तुम और तुम्हारा नोकरी कोनो मतलब नहीं रखता । इहां से चले जाओ नहीं तो अच्छा नहीं होगा ।" रजना अपने भाग्य को कोसता वहां से खाली हाथ चला आया था ।

इधर फुलिया जो सबसे लड़ फिड़ जाती थी आज खामोश थी । जिस बाप ने उम्र भर मार के सिवाए कुछ और ना दिया आज चुपचाप सब सह कर उसी बाप की इज्जत को बचा रही थी फुलिया । रिश्ता प्रेम पर भारी पड़ गया था । कुछ महीनों तक रजना ने हाथ पैर मारे, फुलिया को भी समझाया लेकिन कोई फायदा ना हुआ । एक दो बार खबर मिली कि फुलिया ने जान देने की कोशिश की है तब रजना भी समझ गया कि फुलिया ने जिन जंजीरों में खुद को जकड़ लिया है उससे बाहर आने से अच्छा वो मर जाना पसंद करेगी । उसे अहसास हो गया कि अगर वो अब फुलिया से दूर ना हुआ तो उसका हत्यारा बन जाएगा ।

वो शांत हो गया, एकदम शांत ठीक उस बरहम बाबा की तरह जो लोगों की झूठी कसमें झेल कर भी सालों से खड़ा है, सबकी धूर्तता देखने के बाद भी उन्हें आशीर्वाद देता हुआ ।
इधर फुलिया का रिश्ता भी कहीं तय कर दिया गया था । आज जा रही थी किसी और की हो कर वो । रजना अपनी किताबों के पीछे अपना अथाह दर्द छुपाने की कोशिश किए पन्ने पलट रहा था । खुल कर रो भी तो नहीं सकता था अभागा । हर कोई उसके हालत से वाकिफ था लेकिन पेश सब ऐसे आ रहे थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं ।

"बऊआ, आपका दुख समझ रहे हैं लेकिन क्या करें, हमारे हाथ कुछो नहीं । हमको माफ कर दीजिए ।" छोटकी भउजी ने रजना को देखते हुए कहा ।

"अरे भउजी आप काहे माफी मांग रही हैं । आप ही तो हैं जिसने कम से कम हमको समझा तो सही। बाक़ी चिंता मत कीजिए । हम जान गये हैं कि साला ये प्रेम गाछि से टूट कर गिरे आम की तरह ही है । भले ही पड़ा पड़ा सड़ जाए कोई परबाहे नहीं लेकिन अगर हम उठा लिए तो साला चोर कहाएंगे । उसका बाप बोझ मान लिया था उसको लेकिन हमको प्रेम हुआ उससे तो अनमोल हो गयी । ना जाने कब ये समाज सुधरेगा कब ये लोग ।" रजना अभी मन की भड़ास और निकालता लेकिन उससे पहले ही बाहर से किसी ने चिल्ला कर कहा ।

"रे मजनुआ का चिट्ठी आया है । कोनो दे आओ ओकरा के ।" मजनुआ सुन कर सब ठहाका लगा कर हंस पड़े । उस ठहाके में प्रेम की सिसकियां घुट कर रह गयीं ।

मजनुआ शब्द उस हंसते हुए बच्चे के गाल पर एक तमाचे की तरह लगा था जो कभी मजनुआ का को चिढ़ाया करता था । उनकी पीठ पीछे लतखोरबा और ना जाने क्या क्या कह कर बुलाता था । आज वो बच्चा बड़ा होने के बाद खुद मजनुआ कहलाने पर ये समझ रहा था कि तब भी मजनु का की गलती नहीं रही होगी, बहुत प्रेम करते रहे होंगे लेकिन ई प्रेम तो ससुर गणितो से ज़्यादा जटिल है । जमाना गुजर गया लेकिन लोग सबको न तब समझ आया था ना अब आ रहा है ना कभी आगे आएगा । लोग हमेशा प्रेम को मार कर एक नया मजनुआ तैयार करते रहेंगे ।

धीरज झा

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