चिंता कायम रहे ( बहुत समय पहले की कहानी )

  वंस अपोन ए टाइम, लॉन्ग लॉन्ग अगो, एक ठो राज्य था । इसी राज्य में एक नगर था जहां के लोग बहुत खुशहाल तो नहीं थे मगर अच्छे से गुजर बसर कर लेत...

 




वंस अपोन ए टाइम, लॉन्ग लॉन्ग अगो, एक ठो राज्य था । इसी राज्य में एक नगर था जहां के लोग बहुत खुशहाल तो नहीं थे मगर अच्छे से गुजर बसर कर लेते थे । लोग बेफ़िक्र थे, अपने काम भर से काम रखते थे । अमीर अपने में खुश था गरीब अपने में । हर कोई अपने कर्म को सत्य मान कर अपने हाल में जी रहा था । ना गरीब को अमीर से शिकायत थी और ना अमीर के मन में गरीब के लिए कोई घृणा । किसी की ज़िंदगी में किसी को जबरदस्ती घुसना आता ही नहीं था ।


सब बिना चिंता फिक्र के लगे हुए थे अपना जीवन चलाने में । दशकों तक ऐसा ही चलता रहा । फिर एक पीढ़ी ऐसी आई जिसे लगा कि अब तक जो चलता आ रहा है वो सही नहीं है । हमें समझदारी दिखाने की ज़रूरत है, चिंता करने की ज़रूरत है, आवाज़ उठाने की ज़रूरत है । 


ये तो अच्छी बात थी । हर कोई तो युवा पीढ़ी से यही उम्मीद करता है ना लेकिन समस्या ये थी कि चिंता किस बात के लिए की जाए । पहली चिंता तो यहीं से शुरू हुई कि चिंता का विषय क्या हो । कुछ एक युवा ही फिलहाल इस मुहीम में आगे आए थे । अन्य अभी भी अपने पुरखों की तरह खुद में मस्त थे । अब ये भी एक चिंता थी कि सभी युवा चिंता क्यों नहीं कर रहे । 


"ए मनोहर ?" 


"का है, जल्दी बोलो ।" 


"अरे हड़बड़ा काहे रहे हो । कौन अफसरी खटने जाना है तुमको ।" 


"खेत में खटना अफसरी खटने से कम नहीं है । अब बोलो नहीं तो हम चले ।" 


"अरे हम कह रहे थे कि थोड़ा समय निकालो ना चिंता करने के लिए ।" 


"अबे पागल हो का ? हमको कौनो चिंते नहीं है तो टाइम काहे निकालें ।" 


"इसी बात पर तो चिंता करना है कि चिंता किस बात पर किया जाए ।" 


"अरे भाई तुम जाओ कोई काम धंधा करो । कोई पैसा कउड़ी कमाओ जिससे घर चले ।" 


"हमको पहिले अपना माटी का फिकिर करना है घर दुआर तो चलता रहेगा ।" 


"माफ करो हम चलते हैं ।" 


ऐसे ही सब जगह था लेकिन नए लड़के चिंता करने को तैयार ही नहीं थे । तभी संजोग से एक दिन हल्ला उठ गया कि राजधानी में गजब हो गया है । रानी और उसकी ननद में झगड़ा हो गया एक साड़ी को लेकर । एक चिंतित युवा ने ये खबर निकाल ली महल से । फिर क्या था कहानी शुरू । चिंता का नया टॉपिक मिल गया । 


खबर आई कि ननद ने रानी से वो साड़ी छीन ली जो उसकी दादी ने उसकी मां को और मां ने मरने से पहले राजा को ये कह कर दी थी कि इसे बहू को दे देना । 


रानी इस पर बिफर गईं । दोनों एक दूसरे पर तरह तरह के इल्ज़ाम लगाने लगीं । इधर जनता को चिंतन का नया विषय मिल गया । 


"बाहर से आई महिला का ऐसा अपमान ।" एक ने चिंता के लिए माहौल बनाते हुए कहा ।


"नहीं सहेंगे नहीं सहेंगे ।" दूसरे ने समर्थन किया । 


"राजा की बहिन है ही ऐसी नकचढ़ी ।" तीसरे ने भी बात रखी । 


"सही कहा, हम एक बार राजधानी गये थे । वो पालकी में जा रही थी हमारे बगल से निकली लेकिन हमको पर्दा उठा के देखी तक नहीं ।" इस बात पर सबने चौथे को घूरा लेकिन बोला कोई कुछ नहीं, चिंता का सवाल था । 


इसी बहस के बीच पहली चिंता यही उठी कि जो अपनी रानी के साथ ऐसा कर सकती है वो राज्य की प्रजा के साथ क्या करेगी । हालांकि झगड़े के दो दिन बाद ही रानी और उसकी ननद में सुलह हो गई थी मगर यहां चिंता और अफवाह महीनों चलती रही । 


इसी से जुड़ी छोटी छोटी चिंताओं से समय कटता रहा मगर एक और सफलता तब मिली चिंतकों को जब गांव में अफवाह फैली कि अपनी बेटी के अपमान और उसे उसकी साड़ी वापस दिलाने के लिए पड़ोसी राजा इस राज्य पर आक्रमण करने वाले हैं । 


"रानी का किया धरा ह सब । वही चिट्ठी लिखी होगी अपने बाप को ।" 


"हम तो पहिले ही कह रहे थे भाई । अब लिख के रख लो कि साड़ी ये खुद छुपा के राजा के बहिन का नाम लगाई है ।" 


"सही कहे रानी ऐसी ही है । हम राजधानी गये रहे तो हमको एको बार चाय नास्ता भी नहीं पूछी ।" फिर सबने उसे घूरा मगर बात चिंता की थी सो जाने दिया गया । 


चिंता अब राज्य की थी सबको । चिंता कर रही जनता बातों बातों में ही खुद से खुफिया हथियार जमा करने लगी । अपनी ही गोष्ठी में बैठ के पड़ोसी राज्य को मात देने लगी । अफवाहें रोज़ नई चिंताएं और बहस रोज़ नए । अब तो लगभग सारा नगर काम धाम छोड़ के चिंता करने लगा था । 


राजा को जब ये खबर मिली तो उसने तुरंत आदेश दिया कि और अफवाहें भेजी जाएं । अगर प्रजा चिंता में ही खुश है तो उन्हें चिंतित ही रहने दिया जाए । कुछ राजा को गलियां बोलने में व्यस्त थे कुछ उसका बचाव करने में । कुछ को ये चिंता थी कि सब काम छोड़ कर चिंतित हैं । कुछ को भुखमरी की चिंता थी । काम किसी के पास नहीं था बस चिंता ही चिंता थी । ये चिंता जैसे नशा बन गई थी और लोग इसके आदी हो गये थे । 


सुबह उठते किसी को बच्चों की भूख से बिलखती चीखें नहीं सुनाई देती बस वो चौपाल की तरफ भागते ये सोचते हुए कि आज कौन सी बात पर चिंता करनी है । अनाज खतम होने लगा, काम काज बंद हो गए । बच्चे भूख से बिलखने लगे । जिन्होंने समझाना चाहा उन्हें भगा दिया गया । धीरे धीरे लाशें उठने लगीं । एक के बाद एक पूरा इलाका चिंता करते करते लाश बन गया । 


अब राजा चिंतित हैं यह सोच कर कि अब उनकी चिंता कौन करेगा । अब हर जगह इस चिंता को पहुंचाने की तैयारी चल रही है । हर कोई चिंतित रहेगा । चिंतित आदमी को तो बस चिंता करने से मतलब है बाक़ी बातों से उसका क्या लेना देना । 


चिंता अब पूरे राज्य में फैल रही है । देखते हैं क्या होता है । 


धीरज झा

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