ऐसी मोहब्बत फिर ना देखी कभी, जैसी वो 23 साल का भगत निभा गया

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आज का दिन खास है । खास इसलिए क्योंकि आज एक बच्चे का जन्म हुआ था । कहते हैं दुनिया में हर सैकेंड बच्चे जन्म लेते हैं लेकिन इतिहास लिखने वाला बच्चा कभी कभी ही इस दुनिया को नसीब होता है । हमें गर्व है कि हमें ये बच्चा नसीब हुआ जिसकी रगों में वतन की मिट्टी घुली थी और जिसकी धड़कनें धक धक की जगह इंकलाब ज़िंदाबाद का राग गाती थीं । 


उस बच्चे को भारत माता ने अपने सीने से लगा कर पाला था । उसने लड़ाई तो लड़ी लेकिन कभी किसी निर्दोष का लहू नहीं बहने दिया । वही था जिसने अंग्रेज़ों के मन में ये ख़ौफ पैदा कर दिया कि भारत की युवा पीढ़ी अपने देश के लिए सूली पर झूल जाने का दम भी रखती है । 


हम सबका बचपन बीता है । हम में से कईयों ने अपनी पहुंच के हिसाब से गांव के देहातीपने से लेकर बड़े शहरों की चकाचौंध तक सब जी लिया । हर तरह के शौक को जीना, खाना पीना घूमना । दोस्तों संग मस्ती, पढ़ लिख कर बड़ा बनने का सपना पालना । शायद हमारे लिए युवावस्था का सही उपयोग कुछ ऐसा ही है । लेकिन इस बच्चे को देख कर हमें सीखना चाहिए कि आखिर जवानी कैसे जी जाती है । 


इसके बचपन और जवानी को जान कर हमारे रोंगटे खड़े हो जाने चाहिए। वैसे तो लोग उसे भागांवाला कहते थे लोकिन वह अजीब किस्मत ले कर पैदा हुआ था। आजादी तो उसके साथ ही पैदा हुई थी। आज उसका जन्मदिन है।


28 सितम्बर 1907 को ही तो जन्मा था वो। उस समय सबने सोचा होगा कि कितना अभागा है जो पैदा होने से पहले ही अपने पिता और चाचा को जेल में बंद करवा दिया । मगर किसी को क्या पता था कि उसके भाग्य के बलिहारी तो भारतवासी हमेशा रहेंगे । इसीलिए तो वो मां के पेट के अंदर से ही मुस्कुरा रहा था । इधर इसकी पैदाइश हुई और उधर इसके पिता आजाद हो गए। 


उस गुलाम देश की गुलाम हवा में सांस ले रहे उसके किसी करीबी ने तो जरुर कहा होगा कि ‘अपना काका आजादी साथ ले कर आया है।’ सच ही तो था, एक गुलाम देश में आजाद सोच के साथ आजाद घूमना ये सिद्ध करता था कि आजादी उसके साथ ही जन्मी थी।


जुनूनी था वो बचपन से ही । अब आप ही देख लो जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हुए खुश होते हैं फिर उन्हें तोड़ कर नए खिलौनों के लिए रोते हैं उस उम्र में वो लड़का बंदूक की खेती करता था। कहता था गन्ने की फसल भी ऐसे ही उगती है, आज एक बंदूक बोऊंगा तो कल हज़ारों बंदूकें उपजेंगी । लड़का उन में से था जिन्हें बचपन से ही गुलामी चुभती थी । 


उसे घुटन भरा लगता था गुलाम देश में सांस लेना । घर से सुखी संपन्न था, चाहता तो विदेश चला जाता चैन की साँस लेने, ठीक वैसे ही जैसे आज के कई युवा ये कह कर चले जाते हैं 'क्या रखा है इस देश में सिवाए गरीबी और घुटन के ?' मगर वो नहीं गया बल्कि उसने जिम्मा उठाया अपने साथ करोड़ों देशवासियों को इस घुटन से आज़ादी दिलाने का।


लायलपुर के बंगा गांव में जन्में इस लड़के का नाम रखा गया ‘भगत सिंह संधू’। ये तो महज एक नाम था, आज भी इस नाम के हज़ारों लोग दर दर की ठोकरें  खा रहे होंगे, जिनका कोई वजूद नहीं होगा । लेकिन उस लड़के ने ये नाम अमर कर दिया मगर ये नाम अमर हो गया, क्यों ? क्योंकि ये नाम था उस आँधी का, उस जज़्बे का जो एक बच्चे के दिल ओ दिमाग में घर कर गई थी । जिस उम्र में हम ज़िंदगी को लेकर अपने परिवार को लेकर अभी गंभीर होना सीख रहे होते हैं उस उम्र में फांसी पर झूल गया वो अपनी दोनो माँओं का बच्चा । 


उसे बिना सोचे समझे ऐसा नही करना चाहिए था । उसे आम लोगों की तरह सोचना चाहिए था कि जब कोई नहीं कर रहा तो मैं अकेला क्यों लड़ूं, क्यों मरूं  । अच्छे घर से था पढ़ता लिखता सरकारी नौकरी करता। दिखने में सोणा सुनक्खा था, किसी लड़की से प्यार करता फिर शादी करता, बच्चे होते, ऐश की ज़िंदगी जीता मगर उसका देश को आज़ाद कराने का जुनून उसके लिए इन सपनों से बहुत ऊपर था । 


संयोग देखिए जिस आजादी को वो अपने साथ ले कर आया था, जिसे उसने हमेशा अपने साथ रखा, उस आजादी को जाते हुए हमारे बीच छोड़ गया, एक चिंगारी की तरह जो देखते देखते एक आग में बदली और गुलामी की जंजीरों को पिघला दिया। मगर वो आग देश की आजादी के साथ ही बुझा दी गयी। सबको लगा अब तो हम आजाद हैं अब भला इस आग की क्या जरुरत है। मगर शायद उस आग को बुझाना ही हमारी सबसे बड़ी भूल बन गयी। 


सच बता रहा हूं जी, बड़ी मस्ती मारी है हमने। जवानी का हवाला दे कर सही गलत बहुत कुछ किया है लेकिन जब जब इस लड़के का खयाल आया तो जलन हुई है। वहां हम क्यों न थे, वो फंदे का झूला हमारे नसीब में क्यों न था। वो भीड़ जो जेल के बहार खड़ी अपने नारों से इस लड़के के लिए अमरत्व का द्वार खोल रही थी उन नारों में नाम हमारा क्यों न था।


शायद यही सोच थी उस लड़के की कि हर दौर में युवा जब जब उसे याद करे, जब जब उसके बारे में पढ़ें तब तब यही सोचें कि हम क्यों नहीं ? फिर बाद में भले ही उन्हें भूल जाया जाए मगर समय समय पर भी ये 'हम क्यों' नहीं वाली जलन उठते उठते एक दिन उस लड़के को हर युवा में जिंदा कर ही देगी। हां यही वजह रही होगी छोटी सी उम्र में हंसते हुए फांसी के फंदे पर झूल जाने की। 


शायद इसीलिए उस लड़के ने जाते हुए भारत मां से कहा होगा कि मैं लौट कर आऊंगा। शायद हम समझे ही नहीं कि ये सब केवल देश को अंग्रेजों के कब्जे से आजाद करने के लिए नहीं था। ये सब तो आजादी के लिए था, सम्पूर्ण आजादी के लिए। ऐसी आजादी जिसमें खुद के लिए कम दूसरों के लिए ज्यादा आवाज उठाई जाए। 


भगत सिंह का जन्म हुआ था अपने मकसद को पूरा करने के लिए और हम पैदा होते हैं अपनी उलझनों में ही उलझ कर दम तोड़ देने के लिए । देश की कौन सोचता है ? वो कर पाया क्योंकि उसे करना था बिना ये सोचे कि कोई और मेरे साथ चल रहा है या नहीं । भगत सिंह ने ही कहा था प्रेमी , पागल, और कवि एक तरह के ही होते हैं क्योंकि इन्हें वही दिखता है जो इन्हें करना है कौन क्या कहता है क्या सोचता है उस से इन्हें कोई फरक नहीं पड़ता । 


अगर हमें भगत सिंह को असल श्रद्धांजलि देनी है अगर हमें उनके बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देना तो हमें खुद से कोई एक बदलाव का संकल्प लेना होगा, चाहे वो बदलाव कोई छोटा सा ही क्यों न हो मगर बदलाव करना होगा बिना ये सोचे कि 'कोई नहीं कर रहा तो मैं क्यों करूं ।' 


सलाम है आज़ादी के उस प्रणेता को जिसने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों तक की आहुति दे दी । नमन है भारत मां के उस लाल को जिसने आज़ादी की वो मधाल जलाई जिसकी आग सालों तक युवाओं के दिलों दहकती रही । नमन है तुम्हें भागांवाले ।


धीरज झा

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Qisson ka kona, kisson ka kona: ऐसी मोहब्बत फिर ना देखी कभी, जैसी वो 23 साल का भगत निभा गया
ऐसी मोहब्बत फिर ना देखी कभी, जैसी वो 23 साल का भगत निभा गया
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