वो जो लड़की थी - भाग एक

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"पा, हैव यू एवर लव समवन ?" ड्राईंग बुक में कलर करते हुए बड़े सहज तरीके से सागर ने मुझसे ये सवाल पूछा था । लेकिन सवाल सुनने के बाद मैं सहज नहीं था । मेरे होंठों तक आता हुआ चाय का प्याला छलक गया । बदन जो कांप गया था । चाय के कुछ छींटे शर्ट पर भी पड़ गए थे । यही हाल बीवी जी का भी हुआ था । मगर भाव में फर्क था उनकी चाय हंसी फूटने के कारण छलकी थी और मेरी हैरानी के कारण । 


सागर अभी सिर्फ 12 साल का है और मुझसे ऐसा सवाल पूछ रहा है । हमारे समय में पिता के पैरों की आहट सुन कर बच्चे दुबक के कोना पकड़ लेते थे । इतना खौफ था पिता का और एक ये जनाब हैं कि बाप का डर तो छोड़ो लिहाज भी भूल गये हैं । 


"बेटा तुम्हारे पापा को आज भी किसी से प्यार है और शायद ज़िंदगी भर रहे । हम दोनों से भी ज़्यादा ।" सलोनी की बात सुन कर दूसरी बार भी चाय की चुस्की भरने की कोशिश भी नाकाम रही । फिर छलक गई ।


" किससे मम्मी किससे ? बताओ बताओ ?" सागर जिद्द करने लगा ।


"किताबों से । इनको हमेशा से ही किताबों से प्यार रहा है । इतना प्यार कि जनाब ने पहले गिफ्ट के तौर पर भी किताब ही दी मुझे ।" सलोनी ने ताना मारते हुए कहा । 


"वैसे इस तरह के सवाल मम्मी पापा से नहीं पूछे जाते बेटा ।" मैंने सागर को समझाया लेकिन नतीजा वही हर बार जैसा । समझाने के बाद सवालों का सेशन चालू, अब देते रहो जवाब ।


"मगर क्यों ? मेरे तो सारे फ्रेंड्स अपनी मम्मी पापा की लव स्टोरीज़ सुनाते हैं । एक मेरे पास ही कोई स्टोरी नहीं है ।" सागर ने बुरा सा मुंह बना लिया ।


"अरे ऐसे सैड नहीं होते । अच्छा मैं आपको सुनाऊंगी ना लव स्टोरी ?" मुझे कभी कभी सागर की आदतों पर चिढ़ आ जाती है । क्या करूं ऐसे माहौल का आदी नहीं रहा ना मैं । हां लेकिन सलोनी संभाल लेती है । फिर मुझे भी बुरा लगता है । 


"किसकी लव स्टोरी मम्मा ?" 


"श्रीराम और सीता जी की ।" 


"कौन जिनकी बड़ी सी पिक्चर लगी है मंदिर में ?" सागर ने उत्सुकता में पूछा ।


"हां वही । बहुत मज़ा आएगा ।" मैंने सलोनी को इशारा किया कि मुझे मीटिंग के लिए निकलना है । उसने भी मुस्कुरा कर जाने का इशारा किया । वर्ना इस सागर का दिमाग खिसकता तो कहता साथ बैठ कर स्टोरी सुनो और बात नहीं मानी तो जनाब 2 3 दिन तक मुंह फुलाए रहेंगे । सलोनी ना होती तो इस लड़के को तीनों टाईम दो दो चमाट देता खुद सुधर जाता । वैसे सच कहूं तो मैं भी बस कहने भर ही हूं उसकी उतरी हुई सूरत देख कर मेरा खुद का मन पिघल जाता है । 


मैंने कपड़े बदले और आ कर कार में बैठ गया था । गाड़ी चल पड़ी थी । मैं कोशिश करता हूं कि एसी का कम से कम यूज़ करूं । आज मौसम सुहाना है तो मैंने गाड़ी के शीशे डाऊन करवा दिए हैं । हवा के झोंके से खेल रहा हूं । बचपन याद आ जाता है ऐसे । कैसे मैं तेज़ हवा चलने पर हवा की दिशा में दौड़ा करता था । तब लगता कि जैसे हवा गाल सहला रही है और मैं बिगड़े बच्चे की तरह उसका हाथ झटक रहा हूं । यही सब सोचते हुए अचानक फिर से कानों में सागर की आवाज़ गूंज गई । लगा जैसे पूछ रहा हो 'पा, हैव यू एवर लव समवन ?" 


अब क्या बताता उसे कि किस तरह का प्यार किया था मैंने और क्या जवाब देता उसके फिर से पुछने पर कि आगे क्या हुआ ? आगे तो कुछ हुआ ही नहीं । आगे कुछ होने के लिए पीछे मुड़ कर देखना पड़ता है मगर मैंने तो जैसे अपनी आंखें ही बंद कर ली थीं । मेरी आंखें अर्जुन की आंखों की तरह सिर्फ लक्ष्य पर थीं । मैं उस वक़्त को याद नहीं करना चहता लेकिन आज मैं खुद को रोक भी तो नहीं पा रहा । 


************


साल 2001


"सच कहूं यार हमें ना अदला बदली कर लेनी चाहिए ।" मैं हांफता हुआ पार्क में पहुंचा ही था कि उसने मुझे देखते ही ताना मार कर अपनी खीज उतार दी ।


किताबें रख कर मैंने हाँफते हुए ही पूछा "अदला बदली ? कैसे ?"


"मतलब तुम लड़की हो जाओ और मैं लड़का ।" 


"अरे मैं जो हूं ठीक हूं मगर ये नेक खयाल तुम्हारे दिमाग में कैसे आया ?" 


"कब से आ रहा है बस कहा आज है । लड़कियों वाले सारे नखरे तुम्हारे हैं, लेट तुम आते हो, टाईम तुम्हारे पास कम होता है, अरे यार इन सब आदतों पर हमारा कॉपीराइट है । तुम आदतें तो बदलने से रहे तो तुम ना लड़की ही हो जाओ । ये सोच कर मन तो समझा लूंगा ना कि लड़कियों की आदत ही ऐसी होती है ।" वो एक सांस में ही सब कुछ बोल गई । और ये तो अभी शुरुआत थी वो और बोलती अगर मैंने उसके हाथ में डेयरी मिल्क ना थमाई होती तो । 


"घूस दोगे मगर सुधरोगे नहीं ? हर बार लेट आने का इतना महंगा फाइन भरना अच्छा लगता है तुम्हें ?" 


"तुम्हारे लिए महंगा सस्ता क्या देखना जी । चलो अब देर हो रही है वर्ना फिर डांट खाओगी ।" मैं खड़ा होने ही लगा था कि उसने फिर से हाथ पकड़ कर खींच लिया ।


"क्या यार फिर से लड़कियों वाले बहाने । लेट मैं हो जाऊंगी, डांट मुझे पड़ेगी उससे तुम्हें क्या ? तुम आराम से जाना रूम पर जा कर पसर जाना । थोड़ी प्यार मोहब्बत की बात तो कर लो ।" उसने थोड़ा नज़दीक खिसकते हुए कहा । 


"कभी देखो आ कर रूम पर कि कैसे यहां से जाने के बाद पसर कर सोते हैं । अभी से जा कर जो पढ़ाई में घुसेंगे फिर सुध ना रहेगी ज़माने की ।" 


"जानती हूं बड़े पढ़ाकू हो । तभी तो मेरी भी सुध नहीं रहती ।" उसने मुंह बना कर कहा ।


"अरे तुमको गलतफहमी है कि तुम ज़माने में आती हो । तुम तो खुद हमारा ज़माना हो । किताबों में भी तुम ही दिखती हो । कल तो तुम्हें याद करते रहे तो आधा घंटा पहले आंख लग गई ।" 


"ओह हो हो हो, आधे घंटे का जुर्माना भर दें हम ?" एक शरारती सी मुस्कान लिये वो और करीब हो गई मेरे । 


"बड़ी बेशर्म हो कसम से । सच में अब लगता है अदला बदली करानी ही पड़ेगी ।" इसके साथ ही मैं उठ खड़ा हुआ । कुछ देर वो बैठने की ज़िद करती रही फिर पीछे पीछे चली आई । हम दोनों हमेशा की तरह रिक्शा स्टैंड की तरफ बढ़े ।


क्रमशः....


************


किश्तों वाली कहानी लिखने का पाप पहली बार कर रहा हूं मगर मजबूरी है । कहानी अभी पूरी भी नहीं हुई और 5500 से ज़्यादा शब्द हो चुके हैं । पूरी कहानी कोई पढ़ेगा नहीं इस लिए किश्तों में पोस्ट कर रहा हूं । 


धीरज झा

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