वो जो लड़की थी - भाग दो

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मैं कभी इस लड़की को समझ नहीं पाया था । मेरे साथ कॉलेज आ जा सके इसलिए इस लड़की ने मेरा रूम ब

दलवा कर अपने घर के पास मुझे शिफ्ट करवाया था । पहले इसे रोज़ एक गाड़ी लेने और छोड़ने आती थी मगर जब से हम करीब आने लगे तब से ये ऐसे ही मेरे साथ रिक्शा में आती जाती है । 


मुझे अच्छे से याद है वो दिन जब मैंने इसे पहली बार देखा था । मैं जिन परिस्थितियों से निकल कर यहां तक आया था वहां मेरे अरमानों की ज़मीं इस तरह से बंजर हो चुकी थी कि मेरे सारे अहसास और मोहब्बत की बातें उगने से पहले ही सूख कर उस रेतीली मिट्टी में मिल गई थीं । बचा था तो मेहनत का कांटेदार पौधा जिसे मुझको दिन रात बहाए गये पसीने से सींचते रहना था । मैं अपने इकलौते लक्ष्य को पाने के सपने को मेहनत के पसीने से सींचने में लगा था लेकिन फिर एक दिन ये लड़की आई । 


किसी आवारा बादल की तरह जिसे ना मौसम से कुछ लेना था ना जगह से कोई मतलब । उस दिन ये मुझ पर ऐसे बरसी कि सूखे हुए अहसास और मुर्झाई मोहब्बत में फिर से जान सी लौट आई । ये पहला दिन था जब मेरा किताबों में कम और खयालों में ज़्यादा ध्यान था । हालांकि ऐसा एक दिन ही हुआ उसके बाद मैं अपनी दुनिया और अपनी हक़ीक़त में लौट आया था । 


मुझे खुद पर और अपने हालातों पर पूरा भरोसा था । एक महंगी कार से उतरने वाली परियों जैसी लड़की के लिए मैं तरह तरह की चॉकलेट, आइसक्रीम से लदे फ्रिज में महीनों से पड़े पेठे के डब्बे जैसा था । वो चॉकलेट आइसक्रीम छोड़ कर इस महीनों पुराने पेठे के पास क्यों आती । उसके और मेरे बीच ज़मीन आसमान का नहीं बल्कि पाताल और आसमान से ऊपर वाली दुनिया जितना फर्क था । इसीलिए मैंने कभी इतना लोड ही नहीं लिया था । हां लेकिन कभी कभी उसे चोरी छिपे देख लेता था । समय के साथ ये कभी कभी अक्सर में बदल गया ।


मैं शांत नदी के बहाव जैसा था और वो किसी समुद्री तूफान जैसी । मैं बोलता कम था और वो बेवजह अकेली ही हँसती रहती थी । मुझसे लोगों की मतलब भर की दोस्ती थी, वही प्रॉब्लम सॉल्व कर दो, नोट्स दे दो यही सब वाली लेकिन उसकी दोस्ती इससे अलग थी । वो कई बार क्लास बंक करके घंटों गेटकीपर से बतियाती रहती । मैं सोचता कि उस बूढ़े से इस उम्र की लड़की ऐसा क्या बतियती होगी जो दोनों के चेहरे की मुस्कुराहट कम ही नहीं होती । 


इसी तरह के दोस्त थे उसके । जिससे कोई बात नहीं करता उससे ये घंटों बातें करती । उसमें और मुझमें एक समानता थी और वो ये कि हम दोनों अपनी अपनी दुनिया में अकेले थे । मुझे किताबों की वजह से ये अकेलापन महसूस नहीं होता था और वो अपनी हंसी में इस अकेलेपन को छुपा लेती थी । 


आखिरकार वो दिन आ ही गया जब उसने पाताल से आसमान पार तक की दूरी तय करते हुए फ्रिज से चॉकलेट आइसक्रीम की जगह मुझ जैसे पेठे की तरफ हाथ बढ़ाया । वो दिन मेरे लिए कैसा था मैं बयान नहीं कर सकता । 


"हेल्लो ।" पार्क में बैठा मैं किताबों में खोया हुआ था तभी एक आवाज़ ने मेरा ध्यान वहां से हटाया । वो आवाज़ जो अभी तक मैंने दूर से ही सुनी थी वो आज मेरे इतने पास थी कि उसमें बिठाए गए हर सुर को मैं अच्छे से सुन सकता था । एक बार आंख जो उठी फिर उसे देखता ही रहा ।


"मैं जानती हूं तुम मुझे घूरते रहते हो ।" ऐसा इल्ज़ाम मेरे लिए उस पाप के समान था जिसकी सज़ा का वर्णन गरुड़ पुराण में भी नहीं किया गया । मगर मैं जानता था कि ये पाप मैंने किया है । यही वजह थी कि मैं डर गया । 


"मैं, म मैंने कब घूरा तुम्हें ? मैं तो पढ़ रहा हूं ।" मैंने खुद को संभालते हुए अपनी सफाई दी ।


"तुम घूरते हो वो भी आज से नहीं बल्कि महीने भर से ।" मैं समझ नहीं पा रहा था कि उसकी बातों से मुझे डरना चाहिए या उसकी इस आवाज़, उसकी खुशबू, उसके चेहरे पर बिखरे इस मासूम से गुस्से में खो जाना चाहिए । 


"तुमको गलतफहमी हुई है । मैं भला तुम्हें क्यों घूरूंगा ? मैं बस पढ़ने आता हूं यहां ।" मैंने इस बार पूरे आत्मविश्वास से अपनी बात कही । 


"झूठ मत बोलो मैं तुम्हें हमेशा घंटों छुप छुप के देखती हूं और उस दौरान तुम मुझे खोज रहे होते हो । जब मैं सामने आती हूं तो तुम ऐसे दिखाते हो जैसे ना जाने कब से किताबों में घुसे पड़े हो । और मेरी नज़र जब इधर उधर होती है तुम मुझे गौर से देखने लगते हो । बताओ मैंने गलत कहा ।" उसने बड़ी सफाई से सब बता दिया । मैं उसकी बातों से अब डर गया था । कहीं ये मेरी शिकायत ना कर दे ? कहीं मुझे कॉलेज से ना निकाल दिया जाए । नहीं नहीं ऐसा हुआ तो मैं क्या करूंगा । इन सभी बातों के बीच मैंने इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि वो भी मुझे घंटों देखती रहती है ।


"म मैं अब यहां बैठूंगा ही नहीं । मैं जा रहा हूं । प्लीज़ किसी से शिकायत मत करना ।" पुलिस के डंडे के डर से सारी सच्चाई उगल देने वाले आरोपी की तरह मैंने सब कह दिया और वहां से भागने की फिराक में जल्दी से उठा ।


"अरे ऐसा गजब मत करो तुम यहां नहीं बैठोगे तो मैं घंटों किसे घूरा करूंगी जानेमन ।" किसी लड़की को छेड़ने वाले लफंगे की तरह उसने शरारती मुस्कान के साथ ये बात कही थी मुझे । मगर मैं डरा हुआ प्राणी उसकी वो प्यारी सी हंसी देखने की बजाए वहां से सिर पर पैर रख कर भाग निकला था । 


उस रात मैं किताबों को सामने रख कर उसकी कही बातों को सोचता रहा और कभी खुद पर शर्मिंदा हुआ तो कभी शर्मा कर हंसने लगा । मेरा रूममेट उस दिन हैरान था उसने कभी मुझे इस हाल में नहीं देखा था । हमारी बात ही नहीं होती थी ज़्यादा इसलिए उसने कुछ पूछा भी नहीं । 


अगले दिन वो मुझे रिक्शा स्टैंड पर मिली और मुझे रिक्शा में ऐसे बैठा लिया जैसे मुझे किडनैप कर रही हो । उस दिन के बाद वो कार कभी नहीं दिखी जिसमें वो कॉलेज आया करती थी । मैंने कभी अपने अहसासों का इज़हार नहीं किया और उसे कभी इज़हार करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी । उसके लिए हम तभी से प्यार में पड़ गये थे जब से उसने मेरे साथ रिक्शा शेयर करना शुरू किया था । 


बिना आई लव यू वाली खाद के हमारी मोहब्बत की फसल फलने फूलने लगी थी । ये तय था कि वो मुझे पढ़ते हुए डिस्टर्ब नहीं करेगी लेकिन उसके साथ रहते हुए मैं पढ़ने की बातें नहीं करूंगा । तब से अब तक ऐसे ही चल रहा है सब । वो जिस तरह से हमेशा खुश रहती है उसे देख कर शंका सी होने लगती है । कोई इंसान हमेशा एक जैसे मूड में कैसे रह सकता है । सुना है अमीरों का मूड तो पल पल बाद स्विंग होता है फिर इसे क्या दिक्कत है ?


खैर हम इस तरह की मोहब्बत में नहीं थे जहां हम एक दूसरे की ज़िंदगी में इतने गहरे से घुस सकें । हम फूल पत्तियों से लेकर कॉलेज में काम करने वाले स्टाफ तक के बारे में घंटों बातें करते लेकिन कभी अपने घर परिवार की बातें नहीं कीं । मैं अपनी गरीबी बता कर झूठी सहानुभूति लेने का आदी नहीं था और उसे अपने बारे में बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी । इसलिए सब ऐसे ही चलता रहा ।


*********


मैंने ऑटो लेने की जिद्द की लेकिन हमेशा की तरह उसने रिक्शा कर लिया । कवर किए रिक्शे में मुंह पर दुपट्टा लपेटे वो मेरी बांह को अपनी बाहों में लपेट कर बैठ गई । 20 मिनट लगते थे रिक्शा से हमें घर पहुंचने में ।  


हम दोनों मेरे रूम के पास वाले स्टैंड पर उतरते थे । फिर मैं उसे उसके घर छोड़ता और उसके बाद रूम पर आता । इतना ही मिलना था हमारा रोज़ का । वो बेफ़िक्री सी थी मेरे दिमाग में हर समय कोई ना कोई चिंता सवार रहती थी । 


लेकिन हां उसका साथ अच्छा लगता था मुझे । उसकी बेतुकी बातें जैसे मेरे तन की सारी थकान मिटा देतीं । उसकी खिलखिलाती हंसी मेरे दिमाग से हर चिंता को कुछ देर के लिए दूर कर देती । अजीब सा नशा था उसकी उन भूरी आंखों में । जब वो मुझे छूती तो एक सिहरन के साथ गुदगुदी जैसा कुछ दौड़ता मेरी रगों में । कुछ दिक्कतें ना होतीं मेरे साथ तो शायद मैं उसके पीछे सब भूल चुका होता । वो और नज़दीक आना चाहती थी मगर मैंने ना चाहते हुए भी एक रेखा खींच रखी थी हम दोनों के बीच । 


"अरे ओ सपनों के सौदागर उठो हमारा स्टेशन आ गया ।" उसने मुझे मेरे ख्यालों की दुनिया से बाहर निकाला । मैंने रिक्शे से उतर कर जेब में हाथ डालते हुए रिक्शे वाले को पैसे देने चाहे मगर उसने रोका और इशारा किया कि उसने दे दिए हैं । ये हर रोज़ का था । लेकिन रोज़ हम ऐसे करते थे जैसे ये पहली बार हुआ है । 


मैं उसे कुछ कहना चाहता तो वो पहले ही चुप रहने का इशारा कर देती । मैं भी चुप हो जाता क्योंकि मैं जानता था रिक्शे का भाड़ा देने का मतलब है आज रात खाने में सिर्फ ब्रेड । असल में घर से आने वाले पैसों को मैंने रोज़ के हिसाब से बांट रखा था । हर रोज़ मैं उतने ही पैसे निकालता जितना रोज़ का खर्च था । उससे एक रूपया भी ज़्यादा नहीं । अब ये चॉकलेट का खर्च नया ऐड हुआ था लेकिन इसकी भरपाई भी वो कर देती थी । कैसे ? ऐसे ।


"भईया वो दूध का पैकेट देना ।" दुकानवाले लेकर उसने दूध का पैकेट मेरी तरफ बढ़ा दिया ।


"अरे मैं बाद में आ कर ले लेता ना ।" मैं सच में दुखी हो कर कहता ।


"तुम भूल जाते हो । खुद ही मानते हो ना पढ़ाई के आगे कुछ याद नहीं रहता । और इतनी पढ़ाई के बाद दूध बहुत ज़रूरी है ।" दरअसल वो जानती है कि मैं दूध के पैसों से चॉकलेट खरीदता हूं और वो ये भी जानती है कि मैं कल के पैसों में से एक रूपया भी आज नहीं खर्च करूंगा । मैं थोड़ा असहाय सा महसूस करता तो वो तुरंत भांप लेती । 


"सब एक बार में वापस करना ना जब ऑफिसर बन जाना ।" इसके साथ ही हम दोनों मुस्कुरा देते । इसी के साथ घर आ जाता उसका और हमारा मिलना कल पर निर्भर हो जाता । 


क्रमशः


धीरज झा

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