वो जो लड़की थी - भाग तीन

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"सुनों ।" घर आने से कुछ कदम पहले जब मैं लौटने लगा तो उसने कहा ।


"हां कहो ।" मैं अभी उसे देखते हुए ही उल्टी दिशा में मुंह कर के चल रहा था ।


"वो तुमने पार्क में कहा था कि देखना हो तो रूम पर आ जाना तो आज रात को आऊं क्या ?" इतना कहते ही वो शरारत में खिलखिलाती हुई भागने लगी । उसे पता था कि ऐसा कुछ कहने के बाद अगर वो पास आई तो उसके कान खींचे जाएंगे ।


"सच में हमें अदला बदली कर लेनी चाहिए ।" मैं शर्म में मिली हंसी हँसता हुआ वहां से लौट आया । 


यही था हमारा रोज़ का मिलना । कोई फोन नहीं था जिस पर रात रात बातें हो सकें । कोई वॉट्सएप्प या मैसेंजर नहीं था जहां हम चैट कर सकें । उसके घर जाने के बाद मेरी एक अलग दुनिया थी । इन्हीं के बीच मेरी शामें और रातें कटती थीं । जहां मैं था मेरी चिंताएं थीं और किताबों से झांक रही बेहतर कल की उम्मीद । वो बेहतर कल जिसका सपना मुझ से ज़्यादा मेरी मां ने देखा था । 


संपन्न हम कभी से नहीं थे मगर जिस हाल में थे खुश थे । पिता जी खेती से इतना निकाल लेते थे कि दाल रोटी सही से चल सके । मैं हमेशा से पढ़ने में होशियार था इसीलिए वो चाहते थे कि मैं बड़ा हो के मास्टर बनूं । सपने देखने की कोई सीमा नहीं होती मगर इंसान सपने हमेशा अपनी औकात के हिसाब से ही देखता है । जो अपनी हद से आगे के सपनों को देख लेता है वो इतिहास रचता है । पिता जी के लिए मेरा मास्टर हो जाना ही उनका सबसे बड़ा सपना था । हालांकि ये भी उनकी हैसीयत से ऊपर की बात थी मगर वो इसे पूरा करना चाहते थे । 


लेकिन वक्त कब इंसान के हाथ में रहा है । एक दिन खेतों से लौटते हुए उनकी साइकिल फिसली और वो गिर गये । बरसात के दिनों में गांव देहात में ये आम बात है मगर यहां ये आम ना हो कर दुर्भाग्यपूर्ण हो गई । पिता जी गिरे और उनका सिर पत्थर से जा टकराया । पिता जी का सिर, उनका सपना और परिवार सब बिखर गया । ऐसा लग रहा था जैसे नियति ने जबरदस्ती उनका सिर उस पत्थर से दे मारा था । 


मां कुछ समय के लिए ज़िंदा लाश सी हो गई थी । तीन बच्चों की ज़िम्मेदारी ऐसी औरत के ऊपर आ गई थी जिसने कभी घर की चौखट के बाहर पैर भी नहीं रखा था । जो आता था वो यही कहता था कि बच्चे अनाथ हो गये । मां को ये बात नहीं पसंद आई । समय के साथ उन्होंने खुद को संभाल और खुद से खेतों का काम संभालने लगी । मेरे बढ़ने के साथ उनकी मेहनत भी बढ़ती रही । 


कॉलेज आने से पहले उन्होंने कहा मुझे कि 'बेटा हम दस्तूर तोड़े हैं तुमको अपना हद तोड़ना होगा । तुम्हारे पिता जी मास्टर बनाना चाहते थे तुमको लेकिन अब तुमको अफसर बनना होगा । हम बहुत सुने हैं तुम्हारे लिए । बहुत बोला है ये लोग हमको । अब तुमको इन सबका बोलती बंद करना है । सरकारी अफसर बन के ही लौटना वर्ना समझ लेना कि मां नहीं रही ।' 


मां ने ये बात किस दर्द को दबाने के लिए कही थी ये नहीं जानता लेकिन उसका संघर्ष मैंने देखा था और मुझे उसका सपना पूरा पूरा करना था ।  


ये सैकेंड ईयर था । अब बस एक साल बचा था । मुझे इसी में अपना ग्रेजुएशन भी कंप्लीट करना था और यूपीएससी की तैयारी भी । मुझे यकीन था मैं ये दोनों साथ में ही कर लूंगा । 


इसके अलावा अपनी कोई दूसरी दुनिया नहीं थी । हां मेरे अपने ज़रूर थे जिनके लिए मैं उनसे दूर बैठा था । असल में दोनों स्लेबस एक साथ पूरा करने वाली बात ओवर कांफिडेंस में आने जैसा नहीं था बल्कि मजबूरी थी मेरी क्योंकि मेरे पास समय नहीं था । 


खैर फिलहाल ज़िंदगी ऐसे ही दिन के दो हिस्सों में अच्छे से कट रही थी । सेकेंड ईयर के एग्ज़ाम खत्म हो चुके थे । हर बार की तरह मैं क्लास टॉपर होने के साथ साथ और ना जाने क्या क्या टॉपर था और वो मर मरा के पास हुई थी । मैं साइंस से था वो आर्ट्स से । मेरा रिजल्ट सुन कर वो मुझे खुशी से गले लगाते हुए बोली "यहां भी हमें अदला बदली की ज़रूरत है ।" 


एक तरफ लड़कियां जहां पढ़ाई को लेकर सीरियस रहती हैं वहीं ये लड़की पढ़ाई की टेंशन को किसी बक्से में बंद कर आई थी । इसका कहना था कि ज़िंदगी को आज ना जिया तो फिर कभी जीने का ये मौका नहीं देगी । यहां भी हमारी सोच अलग थी । 


मुझे लगता था कि इसकी वजह थी और वो ये कि उसे ज़िंदगी से कुछ ऐसा कुछ चाहिए नहीं था जो उसके पास ना हो और मुझे ज़िंदगी ने ऐसा कुछ दिया नहीं था जिसकी मुझे ज़रूरत हो । उसके लिए हर चीज़ आसान थी और मेरे लिए सब कुछ एक जंग की तरह जहां जीते तो मिलेगा वर्ना मारे जाओगे । 


खैर इन बातों का तब कोई ज़्यादा मतलब नहीं था । समझदारी थी मगफ तजुर्बा नहीं था ना । लगता था ऐसे ही एक दिन सब ठीक हो जाएगा । वक्त जैसे जैसे बीत रहा था वैसे वैसे मैं सपने देखने की एक भयानक बीमारी पाल बैठा था । ऐसी बीमारी जिसके कारण गरीब इंसान की जान भी जा सकती है । वो सपने जो अपने हाथ में नहीं हैं, वो गरीब इंसान के लिए कैंसर जैसी बीमारी से भी भयानक हैं । मगर कहा ना तब इन बातों का अहसास कहां था मुझे । 


वक़्त बीतता रहा हम और नज़दीक आते रहे । उसे वक्त ज़्यादा देने लगा । पहले उसके हिस्से का वक़्त उसके पास होने तक ही सिमित था लेकिन अब उसके पास ना होने पर भी उसके लिए वक़्त निकालना पड़ता था । उसकी शरारतें, उसका बेफ़िक्र होने के बावजूद मेरे लिए फिक्रमंद होना, उसकी बातें, उसकी हंसी सब मुझ पर हावी होने लगी थीं । इसका नतीजा आखिरी साल में दिख गया । 

 

मैं फिर से कॉलेज टॉपर होने के साथ साथ अपने सबजेक्ट में स्टेट टॉपर रहा । हर तरफ मेरा नाम गूंज रहा था मगर मेरे चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी । मैं जानता था कि इस सिस्टम में मेरे जैसे के लिए टॉपर होना आगे की राह आसान नहीं करेगा । मेरे पास ये आखिरी साल था और मैं इस साल में सिर्फ एक तरफ से ही पास हो पाया था । मेरा यूपीएससी क्लियर नहीं हुआ । मैं जनता था ये इतना आसान नहीं है शायद दिन रात इसकी तैयारी करता रहता तब भी ना क्लियर होता ये मगर यहां अफसोस ये था कि मैंने कोशिश ही नहीं की थी । ध्यान देता तो यूपीएससी ना सही कोई और परीक्षा निकाल लेता । कम से कम नौकरी तो लगती । मगर मैं तो यहां प्यार में फंस चुका था । मुझे बस दुख हो रहा था गलती का, कहां हुई है ये मैं अभी भी नहीं समझा था । 


उसने बहुत समझाया मगर वो सच से वाकिफ़ नहीं थी । मेरा सच मेरे आने वाले कल का कत्ल करने पर तुला था । मैं उसे बिना बताए अपने घर लौट आया, अपने सच का सामना करने । मेरे टॉपर होने की खबर पूरे गांव को पता लग चुकी थी । लेकिन सबके पास देने के लिए सिर्फ बधाईयां ही थीं किसी के पास ये हिम्मत नहीं थी कि तू आगे बढ़ हम तेरे साथ हैं । भला होती भी क्यों किस हक़ से मैं मांग करता इनसे । 


घर पहुंचते ही मां ने गले लगा लिया । बड़ी उम्मीदों से मेरी ओर देखा । मैं अंदर से कांप रहा था । खाना खाने के बाद मां ने पूछा "अब तो नौकरी पक्की ना ?" 


मैं घबरा गया । दो बहनों और मां की उम्मीद मुझ पर थी मैं कैसे एक झटके में तोड़ देता । जो थोड़ी सी ज़मीन बची थी उसे बेच कर तीन साल मांगे थे मैंने । अब क्या कहूं इन्हें कि मैं भटक गया था । तीन तीन जिम्मेदारियां संभाल नहीं पाया ?


"हां पक्की है मां ।" ज़िंदगी में मैंने पहली बार मां से झूठ बोला था मैंने । वो भी आंखों में आंखें डाल कर । क्योंकि अगर मैं उसकी आंखों में देख कर ना बोलता तो वो मेरा झूठ पकड़ लेती । वैसे भी वो ये मान चुकी थी कि जो उसने चाहा है वो पूरा हो कर रहेगा ।


"बस अब ट्रेनिंग में साल दो साल का समय लगेगा ।" ये सुन कर मां कुछ समझी तो नहीं मगर चिंतित ज़रूर हो गई । 


"दरमाहा तो देंगे ना ?" उसने अपनी चिंता जाहिर की ।


"हां मगर कम देंगे ।" एक झूठ का सूत मुझसे नए ताने बुनवाता चला गया । 


"कोई बात नहीं थोड़ा बहुत भी आता रहे तो काम चल जाएगा । बाक़ी नौकरी लग गई यही बहुत है ।" मां को नहीं पता था यूपीएससी क्या होता है, उसने तो ये भी नहीं सोचा था कि उसका बेटा कलेक्टर बनने की तैयारी कर रहा था । उसके लिए तो बस मेरा सरकारी अफसर बनना ही काफ़ी थी । वो खुश थी, जब से पैदा हुआ हूं उसे पहली बार इतना खुश देखा था मैंने । काश पिता जी होते तो देखते कि उनकी रज्जो को हंसना भी आता है । 

क्रमशः

धीरज झा

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