वो जो लड़की थी - भाग चार

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मैं मां से कितना भी झूठ बोल लेता मगर लोगों का मुंह कैसे बंद करता । कहीं ना कहीं से ये खबर मां को मिल ही जानी थी कि मैं झूठ बोल रहा हूं और मां को ये पता लग भी गया । सरोज काका के लड़के ने मां को बता दिया कि मेरी नौकरी वाली बात झूठी है । हालांकि मेरा सरोज काका के लड़के से कभी मिलना जुलना नहीं हुआ था मगर ना जाने उसे कैसे मेरा सच पता लग गया था । 


इसके बाद मां गुस्से में लाल हुई मेरे पास आई और कहने लगी "तू ने मेरा विश्वास तोड़ा है । मैंने तेरे लिए खून पसीना एक कर दिया मगर तू मुझसे झूठ बोलता रहा । बता और क्या क्या झूठ बोले हैं तू ने । ये सब उस लड़की की वजह से है ना ?" 


मां की आखिरी बात ने मुझे अंदर तक हिला दिया । मां को कैसे पता लगा उसके बारे में । मैंने बहुत कोशिश की मगर मेरे गले से कोई आवाज़ ही नहीं निकल रही थी । मां का गुस्सा पारे की तरह चढ़ते जा रहा था । 


"अब तू रह खुश मैं अब और नहीं झेल सकती ।" इतना कहने के साथ ही मां ने पास पड़ा चाकू अपने पेट में उतार लिया । मैं रोता रहा चिल्लाता रहा मगर उसे रोक ना पाया  मां ने मेरे सामने तड़प तड़प कर दम तोड़ दिया । मैं अपनी जगह से हिल नहीं पा रहा था । 


मैंने अपनी सारी ताकत समेटी और ज़ोर से चीख उठा । चीखने के कुछ समय बाद मुझे होश आया । मेरी दोनों बहनें और मां मुझे घेरे हुई थीं । मां को देख कर मैंने भगवान का शुक्र मनाया कि ये बस एक डरावना सपना ही था । वो तीनों मेरे पास ही बैठ गईं फिर घंटे भर समझाने के बाद उन्हें सोने भेजा । अब कैसे कहता मां से कि मैंने उसे मरते देखा है । 


इसके बाद मैंने तय किया कि मैं मां को सच नहीं बताऊंगा बल्कि इस झूठ को ही सच करूंगा । कुछ दिन घर पर रहने के बाद परिवार को झूठे सपने दिखा कर मैं फिर शहर लौट आया । पहले ही दिन वो मुझे रिक्शा स्टैंड पर मिल गई । ये उसकी खुलेपन का हिस्सा था या फिर इंतज़ार खत्म होने की खुशी पता नहीं लेकिन उसने बिना उस भिड़ की परवाह किए मुझे गले से लगा लिया । बिना इस्त्री की कमीज पहने एक समान्य से दिखने वाले लड़के को एक गोरी चिट्टी लड़की बीच बाजार में गले लगा के रोने लगती है ये दृश्य भला वहां खड़ा कौन ऐसा इंसान होगा जो मिस करना चाहेगा । 


मैंने जल्दी से एक रिक्शे को हाथ दिया और उसके साथ उसमें सवार हो गया । आंसू रुक चुके थे उसके, चेहरे पर बिखरी उदासियाँ जैसे जल कर अब गुस्से की लपटों में बदलने लगी थी । मेरा हाथ झटकते हुए उसने मुझ पर तड़ातड़ थप्पड़ों की बरसात शुरू कर दी । 


"ऐसे कौन गायब हो जाता है ? तुम्हें पता है पिछली 6 रातों से सोई नहीं हूं मैं । डर के मारे लगातार दिल धड़क रहा है तबसे मेरा ।" वो रोते हुए बोले जा रही थी । उसके हाथ इस तरह चल रहे थे जैसे किसी मशीन का बटन ऑन कर के छोड़ दिया हो । 


"घर गया था यार ।" मैंने थप्पड़ों से बचते हुए कहा । 


"बता कर जाते तो मैं कोई साथ तो नहीं आ जाती ना ।" मैंने उसके हाथों को ज़ोर से पकड़ लिया ।


"अब तो मैं आ गया । अब मारना बंद करो प्लीज ।" वो ज़ोर से लिपट गई मुझसे । हम कॉलेज पहुंच गये थे । मुझे कॉलेज में कुछ काम था । प्रोविजनल सर्टीफिकेट लेना था । उसके बाद हम उसी पार्क में आ कर बैठ गए जहां हम हमेशा बैठा करते थे । 


वो मेरे कंधे से सर टिकाए हुए बैठी थी और मैं खुद को तैयार कर रहा था उसे कुछ ऐसा बताने के लिए जो उसे बिल्कुल पसंद नहीं आने वाला था । 


"मैं दिल्ली जा रहा हूं ।" मैंने आखिर कह ही दिया ।


"अभी तो ठीक से आए भी नहीं और जाने की बात कर रहे हो ।" उसने उसी तरह लेटे हुए कहा ।


"अभी दस दिन हूं यहां । पहले बता दिया नहीं तो फिर कहोगी बिना बताए चले गये ।" 


"क्या काम है ? जो भी हो जल्दी लौट आना ।" वो अभी तक भी किसी सपने में खोई लग रही थी । 


"हमेशा के लिए जा रहा हूं ।" मेरी इस बात ने उसे जैसे अचानक से नींद के आगोश से बाहर खींच लिया हो । उसने झटके से कंधे पर से सर हटाया ।


"हमेशा के लिए ? तुम पागल हो क्या ? ऐसा क्या है दिल्ली में जो तुम मुझे छोड़ के जा रहे हो ? हमारे सपनों का, हमारी शादी का क्या होगा ?" वो एक सुर में बोले चली जा रही थी । 


"उन्हीं को पूरा करने जा रहा हूं । दिल्ली में एक नौकरी मिल रही है । उसके साथ ही यूपीएससी की तैयारी भी कर लूंगा ।" मैंने बिना सार सच बताए उसे समझाने की कोशिश की ।


"वो सब तो यहां भी हो सकता है लेकिन तुम यहां रहना ही नहीं चाहते । तुम्हारा मन भर गया है मुझसे ।" वो उठ खड़ी हुई और कॉलेज गेट की तरफ चल दी । मैं पीछे पीछे भागा । उसे रोकता रहा मगर वो नहीं मानी । बाहर आई रिक्शा लिया और चली गई । मुझे पता था वो मान जाएगी । मैंने उसे जाने दिया । 


मैं अगले दिन रिक्शा स्टैंड पर गया । पता था वो वहां होगी मगर मैं गलत साबित हुआ । उसके बाद मैं हर रोज़ स्टैंड पर उसकी राह देखता लेकिन वो नहीं आती मैं थक हार कर रूम पर लौट आता । 8 दिन इसी तरह बीत गये थे । मैंने अपने जाने की लगभग सभी तैयारियां कर ली थीं । मैं चाह कर भी देर नहीं कर सकता था क्योंकि बहुत मुश्किल के बाद मुझे एक नौकरी मिली थी । जिन्होंने मेरी नौकरी लगवाई थी उन्होंने सीधे तौर पर कहा था कि जिस दिन कहा है उससे एक दिन भी देर की तो नौकरी गई समझो । मुझे जल्द से जल्द नौकरी चाहिए थी जिससे घर भी पैसे भेज सकूं । 


आज आखिरी दिन था मेरा इस शहर में कल सुबह की ट्रेन थी । इधर ये लड़की थी जिसने अचानक ही मुझे एकदम से भुला दिया था । मैं उसके घर तक भी जाता मगर उसकी एक झलक ना मिलती । मैं उसके घर भी चल जाता तो कोई आफत नहीं आ जाती । मैंने शर्ट पैंट का वो जोड़ा संभाल के रखा था जो पिंकी भईया की शादी में सिलवाया था । सब कहते थे इंग्लिश स्टाईल से सिला है । मैं वो पहन कर जाता तो अच्छा प्रभाव पड़ता, पढ़ने में तो मैं फेमस था ही । उन्हें भी पता होगा कि उनकी बेटी के कॉलेज का ये लड़का टॉप आया था । लेकिन कहते हैं गरीबी पय भारी होता है । ये मजबूत से मजबूत आत्मविश्वास को तोड़ देता है । इस गरीबी ने इतनी हिम्मत ही नहीं दी कि मैं उनके दरवाजे पर जा कर कह सकूं कि मुझे आपकी बेटी से मिलना है वो मेरे साथ पढ़ती है । 


खैर कोई मतलब नहीं रह गया था इन बातों का । मैं फिर से बुझी हुई सूरत ले कर कमरे की तरफ बढ़ गया । अभी कुछ ही कदम चला था कि पीछे से आवाज़ आई "अब पता लगा किसी अपने का दूर जाना कितनी तकलीफ देता है ।" मैं इस आवाज़ के बाद एक कदम आगे ना बढ़ पाया ।


क्रमशः


धीरज झा

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