वो जो लड़की थी - भाग 10

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वो बेचैनी जिसे मैंने सालों की कोशिश के बाद दिल के एक कोने में दफनाया था आज अचानक इस शख्स को देखते ही फिर से ज़िंदा होने लगी थी । ज़िंदगी के इस मुकाम पर जहां मेरे कंधों पर इतनी जिम्मेदारियां थीं मैं फिर से उस स्थिति में नहीं जा सकता जिसने मुझे दुनिया की सुध बुध भुला दी थी । 


उस बाबा के साथ साथ उस लड़की को फिर से देख पाने की उम्मीद भी लौट आई थी । ऐसा लग रहा था जैसे मेरी किस्मत से सौदेबाज़ी चल रही हो । पहले मैं इस बात पर अड़ा था कि मुझे उस लड़की का उम्र भर का साथ चाहिए मगर किस्मत से मोल भाव करते हुए मैं अब इतने पर भी राज़ी था कि मैं बस उसे एक बार नज़र भर के देख पाऊं । खुद को इस बात से संतुष्ट कर पाऊं कि वो ठीक है एकदम । 


उस संस्था से लौटने के बाद मैं फिर से वही हो गया था जो सालों पहले था । चेहरे की हंसी उड़ चुकी थी, हर बात से ऊपर उस लड़की का खयाल था । जब घर गया तो सलोनी ने कितना कुछ कहा, सागर ने कितना कुछ बताया मगर मैंने शायद ही उन लोगों की कोई बात सुनी हो । अभी दिल से लेकर आंखों तक में वो इस तरह समाई थी कि नींद के लिए भी जगह ना बची । सारी रात उस बाबा और उस लड़की के बारे में सोचते हुए बीती । 


मेरा काम भी ऐसा नहीं था जिससे दो चार दिन ध्यान हटा कर अपनी उलझने सुलझा लूं मैं । जिस दिन से प्रशासनिक सेवा में आया था उसी दिन से मेरे जीवन पर से मेरा अधिकार खत्म हो गया था । अब ऐसे अचानक से मैं सब कुछ छोड़ नहीं सकता था मगर दूसरी तरफ मैं इस तरह उलझ कर भी अपने कर्तव्य के प्रति पूरी तरह समर्पण नहीं दिखा सकता था । पूरी रात सोचने के बाद मैंने फैसला किया कि मैं इस मसले को अपने हिसाब से सुलझा कर ही दम लूंगा । 


"इतनी जल्दी कैसे उठ गए ?" मैं जूते पहन रहा था तभी सलोनी की आंख खुल गई । वो जानती थी कि मैं सोने में देर करता हूं और उठता भी देर से हूं । 


"काफ़ी दिनों से सोच रहा था जॉगिंग शुरू करूं । महीनों से रूटीन छूट गया है । आज आंख खुल गई तो सोचा आज से ही शुरू कर दूं ।" मैंने जूते के फीते बांधते हुए कहा । मेरे कहने के साथ ही उसकी नज़रें टेबल पर पढ़ी अलार्म क्लॉक में समय टटोलने लगीं । 


"ये तो अच्छी बात है मगर अभी तो चार भी नहीं बजे । जॉगिंग के लिए ये कुछ ज़्यादा ही जल्दी नहीं है ?" 


"हां, जल्दी जाऊंगा तो जल्दी वापस भी आ जाऊंगा वर्ना अच्छे से दिन निकलने के बाद कोई ना कोई मिल जाता है और फिर दिन भर का सारा रूटीन गड़बड़ हो जाता है ।" 


"हां ये भी सही है । फिर भी ज़्यादा ही जल्दी है ये ।" सलोनी इतना कह कर फिर से सो गई ।


जब आप कोई काम छुप छुपा कर करते हैं तो बेवजह ही पकड़े जाने का डर आपके मन में बना रहता है । जॉगिंग जाना कोई बड़ा इशू नहीं था मगर मैं जॉगिंग के लिए जा कहां रहा था । यही वजह थी कि मैं थोड़ा सा डरा हुआ था । हालांकि सलोनी को बस फिक्र थी इसलिए वो बार बार कह रही थी । 


खैर मैं जॉगिंग के बहाने घर से निकल गया और चौक से ऑटो लेकर सीधा पहुंच गया उस संस्था में जहां मैंने उस बूढ़े को देखा था । अभी पूरी तरह से उजाला नहीं हुआ था । इस इलाके में दिन में भी कोई खास चहल पहल नहीं रहती थी अभी तो फिर भी रात का साया छाया हुआ था । राहत की बात ये थी कि मुझे वहां किसी को जगाने के लिए ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी । कोई था वहां बगीचे में जो मुझे गेट पर देखते ही मेरी तरफ बढ़ा । 


"जी कहिए ?" एक 19-20 साल के लड़के ने बिना गेट खोले ग्रिल के उस पार से पूछा । मेरा चेहरा हुडी में ढका हुआ था ऊपर से अंधेरा भी था । मैं नहीं चाहता था कोई मुझे पहचाने ।


"यहां के वॉर्डन से मिलना है । वो जो बूढ़े से हैं ।" 


"बाबा की तबियत ठीक नहीं है वो सोए हुए हैं । आप दिन के समय आइएगा ।" मेरी वेषभूषा से वो लड़का थोड़ा आशंकित था । शायद ऐसा उन लोगों की वजह से था जो ये ज़मीन खाली करने के लिए दबाव बना रहे थे । 


"मेरा मिलना बहुत ज़रूरी है उनसे । वो मुझे जानते हैं ।" 


"आपको उनका नाम तक नहीं पता और आप कहते हैं कि वो आपको जानते हैं । जो भी हो मैं इस वक़्त उन्हें नहीं जगा सकता । अब आप जाईए यहां से ।" लड़के ने कड़े शब्दों में कहा । इतना कह कर वो जाने लगा । 


"ठीक है चला जाता हूं मगर एक बार उनसे जा कर कह दो कि क्या वो दोबारा एक कलेक्टर को चाय पिलाना चाहेंगे ?" लड़का मेरी बात सुन के मेरी तरफ मुड़ा । 


"वो मना कर देंगे तो मैं चला जाऊंगा ।" लड़के ने मेरी बात पर गर्दन हिलाई और अंदर चला गया । 


कुछ ही मिनट बीते थे कि सामने से उस लड़के के साथ वो बाबा भी गेट की तरफ आते दिखे । 


"माफ़ी चाहते हैं सर । बच्चा आपको पहचानता नहीं ।" बाबा के हाथ जुड़े हुए थे । इस बार पिछली बार से एकदम अलग व्यवहार था उनका । लड़के ने गेट खोल दिया था । 


"आप पहचान गए इतना ही बहुत है ।" मैंने अंदर घुसते हुए कहा । 


"साहब मेरा कौन सा अफसरों के साथ रोज़ का उठना बैठना होता है । सालों पहले एक लड़के ने कहा था कि आने वाले समय का कलेक्टर हूं । बस पहचान गया कि हो ना हो वही लड़का आया है जो अब कलेक्टर बन चुका है ।" बाबा की बात खत्म होने तक हम एक कमरे में पहुंच गए थे जिसमें ऑफिस और रहने की व्यवस्था एक साथ थी । 


"कैसे हैं आप ?" 


"जैसे भी हैं आपके सामने ही हैं बाबू । अब बस यही संस्था हमारी ज़िंदगी है । इसी के लिए समर्पित हैं । आपको देख कर अच्छा लग रहा है । आपके बारे में पढ़ते रहते हैं । सोच कर गर्व होता था कि इस बाबू से हम मिले हैं ।" बाबा की बात पर मैं मुस्कुरा उठा । फिर अचानक से याद आया कि मैं किस काम से यहां आया हूं । 


"चाय नहीं पिलायेंगे ?" 


"अरे काहे नहीं । अभी बना के लाते हैं ।" 


"अरे आप क्यों तकलीफ कर रहे हैं ये यंग मैन बना लाएंगे ।" लड़का अभी तक जान गया था कि मैं कौन हूं । मेरी बात सुनते ही वो एकदम हरकत में आ गया और बिना कुछ कहे सुने वहां से चला गया । 


"आप हमारे गरीब खाने में कैसे ? और आपको कैसे पता चला कि हम यहां हैं ?" 


"बाबा डीएम हैं हम यहां के । पता लगाने पर आएं तो कौन सा चूहा शहर के किस बिल में छुपा है ये भी पता लगा लें । आप तो फिर भी हमारे प्रिय हैं ।" मेरी बात पर बाबा बेमन सी मुस्कान मुस्काए । 


"बाबा अब तो बता दीजिए कि वो लड़की कहां है ? इतने साल इंतज़ार करवा दिया आपने अब तो सच कहिए ।" मैंने बाबा के चेहरे पर नज़रें टिकाते हुए कहा ।


"बेटा अब जो है ही नहीं उसका इंतज़ार करते रहोगे तो इसमें हमारी क्या गलती है बताओ । आपको पहले भी बता दिए थे कि उन साहब की कोई बेटी ही नहीं थी लेकिन आपको तो हम पर कोई विश्वास ही नहीं है ।" बाबा आज भी अपनी उसी बात पर अड़े हुए थे ।


"तो कॉलेज के सारे कागज झूठे हैं ? हम सब पता किए । जिस साल हम उससे अलग हुए उसके अगले साल वो कॉलेज से निकल है । उसका पता भी वही था जहां आपसे हम मिले थे । उसके बाद से उसका कहीं कोई रिकार्ड नहीं है । इतना सब सबूत होने के बाद हम कैसे ये मान लें कि वो थी ही नहीं ।" मेरी आवाज़ ऊंची हो गई थी जो मुझे खुद को ना पसंद आई । मैं चुप हो गया । बाबा मुझे देखते रहे । मैं इतना बड़ा अधिकारी हो कर भी उतना असहाय महसूस कर रहा था कि मैं अगर मर्यादा में ना होता तो रो देता ।


"बाबू ऐसा भी तो हो सकता है कि जिसे तुम खोज रहे हो वो वो हो जी ना कोई और हो ?" थोड़ी देर की शांति के बाद बाबा ने मौन तोड़ा । 


"क्या लगता है आपको हम इतने मूर्ख हैं कि जिससे प्यार करेंगे उसको इतने दिन साथ रहने के बाद भी सही से पहचान नहीं पाएंगे ?" मुझे अब गुस्सा आ रहा था लेकिन मैं बोलने के सिवा कुछ भी नहीं कर सकता था । 


"आप मूर्ख नहीं थे बाबू बस ये प्रेम जो है वो इंसान के सोचने समझने के सारे रास्ते बंद कर देता है । आपने तो सही ही समझा होगा लेकिन...।" चाय आ गई थी । लड़का चाय रख कर वहीं खड़ा हो गया । उसके रहते मैं खुल कर बात नहीं कर सकता था । और शायद बाबा भी नहीं करना चाहते थे इसीलिए चुप हो गए ।


"हम्म्म्म, अच्छा आप इतनी दूर से यहां कैसे ?" मेरे सवाल पर बाबा कुछ हड़बड़ाये लेकिन फिर तुरंत संभल गए ।


"पेट की आग खींच लाई बाबू । वो मकान जहां आपसे मिले थे वो मालिक ने बेच दिया । उसके दो तीन साल किसी स्थाई काम के लिए भटकते रहे । फिर एक सज्जन आदमी से मुलाकात हुई जो हमें यहां ले आए । तब से हम अनाथ आदमी इन बाक़ी अनाथों की देखभाल कर रहे हैं ।" बाबा की कही बात पर मुझे भरोसा नहीं हो रहा था मगर मैं इससे ज़्यादा कुछ कर भी तो नहीं सकता था । 


"सुना है किसी तरह की मुसीबत में हैं ।" 


"अब हमारी तो उम्र हो रही बेटा । कोई मुसीबत हमारा क्या ही बिगाड़ेगी । मुसीबत तो इन बच्चों पर है । कुछ लोग हैं जो इनके सिर से छत छीनने पर लगे हैं । ये लड़का आपकी तरह बड़ा बाबू बनना चाहता है । जब इतना सा था तभी आया था यहां । खुद से ही खुद को पाला है इसने । पढ़ने में बहुत होशियार है । अब बताइए कि अगर ये जगह ना रहे तो ऐसे बच्चों का क्या होगा ? ये फिर से सड़क पर आजएंगे । पढ़ाई लिखाई छूट जाएगा ।" बाबा की आंखें भीग गईं ये सब बताते हुए । उन बच्चों के दर्द के आगे मैं अपना दर्द भूल गया । 


"आप बिलकुल चिंता ना करें कुछ नहीं होगा इन बच्चों को । वादा कर रहे हैं । कल कार्यालय में आ कर मिलिए हमसे । इस ज़मीन के कागज़ और बाक़ी जो भी हो इससे सम्बंधित सब ले आइएगा ।" मेरे आश्वासन के बाद बाबा की आंख के रुके हुए आंसू बांध तोड़ कर बह निकले । 


मैं वहां से चला आया । बाबा से मिलने के बाद एक बात तो तय थी कि बाबा उस लड़की के साथ कुछ गलत नहीं कर सकता था । लेकिन सवाल अब भी वहीं था कि आखिर वो लड़की है कहां, किस हाल में है । 


************


बाबा फोन पर थे । सिर्फ़ बाबा के तरह की आवाज़ सुनाई पड़ रही थी उस तरफ कौन क्या कह रहा था पता नहीं ।


"हां आए थे, अभी तुरंत निकले हैं ।" 


"नहीं कुछ खास नहीं वही पहले वाला सवाल ।" 


"हमारा क्या जवाब होगा ? वही जो पहले था ।" 


"हां ध्यान रखेंगे । लेकिन उनको देख कर दया आता है । इतना बड़ा अधिकारी इस तरह से...।" 


"जैसा ठीक लगे तुमको । हां एक बात, जाते जाते कहे हैं कि यहां के ज़मीन वाले मैटर को सुलझा देंगे ।" 


"हां सो तो है । नेक दिल इंसान हैं ।" 


"ठीक है अपना खयाल रखना । वो कैसी है ?" 


"उसे कहना बाबा याद कर रहे थे ।" 


फोन कट गया । 


क्रमशः 


धीरज झा

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