वो जो लड़की थी - भाग 11

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लोग अक्सर कहते हैं चिंता मत करो लेकिन क्या चिंता खुद के करने से होती है ? आपको लगता है कि आप पर आपका पूरा नियंत्रण है ? शायद नहीं । सारी उम्र दिल और दिमाग के बीच उलझे रहते हैं आप । दिल कुछ कहता है दिमाग की कुछ और ही सलाह होती है । आप सिवाए बेचैन होने के और कुछ नहीं कर सकते । ठीक उसी तरह जिस तरह मैं था । दिल और दिमाग की जंग में मैं उलझा हुआ था । दूसरी तरफ नियति ना जाने मेरे साथ कौन सा ना नया खेल खेलने की तैयारी कर रही थी । 


अगले दिन बाबा ऑफिस में आए थे । ज़मीन के सारे कागज़ थे उनके पास । कागज़ों को देखते हुए मुझे एक बात खटकी । जिस ज़मीन पर वो संस्था बनी थी वो सम्पत्ति बाबा के नाम पर थी । एक आम सा केयर टेकर भला इतनी बड़ी ज़मीन का मालिक कैसे हो सकता है, वो भी ऐसी ज़मीन जिससे कोई फायदा नहीं, जो सिर्फ़ बेसहरा बच्चों की मदद के लिए इस्तेमाल की जा रही है । वैसे भी बाबा ने मुझसे कहा था कि उन्हें यहां कोई शख्स लेकर आया था जिसने उन्हें काम पर रखा था । कोई अपनी ही ज़मीन पर बनी संस्था में नौकरी क्यों करेगा । 


हालांकि मैंने ऐसा कोई भी शक़ बाबा पर जाहिर नहीं होने दिया । उन्हें आश्वस्त करा दिया कि उनकी संस्था सिर्फ़ उन बच्चों की है इस पर किसी तरह की दिक्कत नहीं आएगी । लोकल थाने के इंस्पेक्टर से भी इस बारे में बात कर ली कि भविष्य में कोई भी इस संस्था को खाली कराने के लिए दबाव ना बनाए । बाबा बहुत खुश थे । उन्होंने मेरा धन्यवाद किया और वहां से चले गए । 


अब मेरी नज़रें बाबा पर गड़ी हुई थीं । मेरे ओहदे से हट कर भी पुलिस विभाग में अच्छे दोस्त थे मेरे । वो अक्सर अपनी समस्याओं का पिटारा मेरे आगे खोल दिया करते थे आज समय था कि मैं उनसे मदद माँगू । जिस जगह से हमारी कहानी शुरू हुई थी वहां से लेकर अपने शहर तक हर जगह के पुलिस थानों में जल्दी ही बाबा की जन्मकुंडली निकाली जाने लगी । 


इन सब में ज़्यादा वक्त नहीं लगा । बाबा का सारा चिट्ठा शाम तक मेरे पास था । खुद को ये शख्स जितना शरीफ बता रहा था उससे कहीं ज़्यादा काले थे इसकी कहानी के पन्ने । आंखों में आंसू लिए खुद को बच्चों का मसीहा बताने वाला ये शख्स एक ज़माने में खून के जुर्म में उम्र कैद की सज़ा काट चुका था । अब इसका सार झूठ खुल कर मेरे सामने पड़ा हुआ था । हो ना हो इसका उस लड़की से कोई कनेक्शन तो था । ये भी बड़ी बात नहीं कि इसी ने...।


ऐसी तमाम आशंकाएं मेरे दिमाग में घूमने लगी थीं । पिछले कुछ दिनों से मैं जो था वो मैं जैसा रहा ही नहीं था । एक आधे दिन की बात अलग है लेकिन हर रोज़ ऐसा कुछ चलता रहे और ये सलोनी की नज़र से बच जाए ऐसा संभव नहीं था । आज शाम जब मैं इन्हीं उलझनों के साथ घर पहुंचा तो पाया कि सलोनी अपनी पत्रकारिता को घर तक ले आई है और सवालों का पुलिंदा लिए मेरा इंतज़ार कर रही है ।


"पा, कितने दिन हो गए हमने टेबल टेनिस नहीं खेला । चलिए एक एक गेम हो जाए ।" मैं अभी आ कर बैठा ही था कि सागर ने खेलने की फ़रमाइश रख दी सामने । वैसे मैं कितना भी थका रहता उसकी ज़िद को नहीं टालता था मगर आजकल हालात और थे । 


"नहीं बेटा आज नहीं । आज बहुत थका हुआ हूं मैं ।" 


"आई टोल्ड यू मां, पा अब मुझे प्यार नहीं करते ।" निराश सागर ने अपनी मां के कंधे पर सिर रखते हुए कहा । 


"ऐसा नहीं है बेटा पापा बस थके हुए हैं ।" सलोनी ने सागर को समझाते हुए कहा ।


"चलिए सागर बाबू हम आपको टेबल टेनिस खिलवाते हैं ।" गौरव कार की चाबी रखने आया था । सागर को ज़िद करता देख उसने उसे अपने साथ खेलने के लिए कहा । 


"गौरव भईया आपको आता है टेबल टेनिस खेलना ।" सागर ने आश्चर्य से पूछा ।


"अरे हमें सब आता है खेलने । आप हरा नहीं पाएंगे हमको ।" सलोनी गौरव की बात सुन कर मुस्कुरा रही थी । उसे पता था गौरव सागर को बहला रहा है । सागर भी उसके झांसे में आ गया और खेलने चल दिया ।


"गौरव, देर तो नहीं हो रही ना ?" सलोनी ने पीछे से आवाज़ लगा कर गौरव से पूछा । 


"अरे नहीं भाभी, कुंवारे लोगों का यही तो आराम है ।" इसके बाद हंसता हुआ वो वहां से चला गया ।


मैं अभी भी गुमसुम सा बैठा कुछ सोच रहा था । इतने में सलोनी के सवाल ने मेरा ध्यान अपनी तरफ खिंचा । 


"हुआ क्या है तुम्हें ?" 


"हं, क्या ? मुझे क्या होगा ? सब ठीक तो है ।" 


"ठीक होता तो मेरे इतना पूछने की नौबत ही नहीं आती । मैंने आज तक आपसे कोई सवाल नहीं किया । जानती हूं बहुत तरह की टेंशन होती है, वर्क लोड होता है मगर ऐसी हालत में पहले नहीं देखा तुम्हें । ऐसा लगता है जैसे हमारे बीच हो ही नहीं ।" 


"ऐसा कुछ नहीं है । बस थोड़ा स्ट्रेस है काम का ।" 


"तुम तो मुझे तब भी बहला नहीं सकते थे जब हमारी शादी नहीं हुई थी । अब तो वैसे भी मैं 14 साल से तुम्हारे साथ हूं । तुम्हारी हर हरकत, हर मूड से अच्छे से वाक़िफ़ हूं । बता दोगे तो मन हल्का हो जाएगा ।" 


"ऐसा कुछ नहीं है सलोनी । मैंने आज तक कभी तुमसे कुछ छुपाया है ?" 


"हां बिल्कुल छुपाया है । तुमने तो मुझसे अपनी आधी ज़िंदगी छुपाई है । वो तो मैं ही हूं जिसने तुम पर कभी दबाव नहीं बनाया कुछ बताने का । मुझे अभी भी पहले के बारे में कुछ नहीं जानना । मुझे बस जानना है कि ऐसा क्या है जो तुम्हें खुद से खुद को छीन रहा है । ये तुम्हारे लिए ही नहीं हम दोनों के लिए भी बुरा है ।" सलोनी की इस बात से मैं हैरान था । मैं चुप रह जाने वालों में से ज़रूर था लेकिन झूठ बोलना मुझे कभी से नहीं आता था । मरे लब जब झूठ बोलने लगते तो मेरी आंखें सच कह उठतीं । 


"तुम जानते हो ना कि पति पत्नी होने से पहले हम एक अच्छे दोस्त हैं । जितनी बातें तुमने मुझसे शेयर की हैं उतनी शायद किसी से नहीं । हमारे बीच कुछ भी ऐसा नहीं आ सकता जो सब बिगाड़ दे । तुम पर पूरा यकीन है मुझे । जो भी होगा उसे साथ में सुलझा लेंगे । अब जो है सो बता दो ।" सलोनी मेरे पास आकार बैठ गई थी । 


उसका हाथ जो मेरे कंधे को सहला रहा था उसने मेरे अंदर सालों से जमी बेचैनी को पिघलाना शुरू कर दिया था और ये अब मेरे आंखों के रास्ते बह रही थी । वैसे भी मैं उस लड़की को लेकर उठने वाली बेचैनी को अब अकेला नहीं संभाल सकता था । किसी के साथ तो इसे बांटना ही था और इसके लिए सलोनी से बेहतर और कोई नहीं हो सकता था । मेरा सिर उसके कंधे पर टिक गया और और मेरे आंसू उसके बदन को चूमने लगे । उसके हाथ मेरे सिर को सहला रहे थे । 


"सही कहा तुमने, मैंने अपनी आधी ज़िंदगी तुमसे छुपाई है । तुमसे क्या सबसे छुपाई है । मैं ऐसा अभागा हूं कि बिना किसी गलती के सारी उम्र शर्मिंदा होता रहा । जिस बात से मैं किसी को खुशी दे सकता था उसी बात के लिए लोगों को झूठ बोला । कभी भी मेरी टाइमिंग अच्छी नहीं रही । जब मां को सच बताना था तब मैंने झूठ बोल दिया, जब दोबारा सच बताना चाहा उससे पहले वो चली गई । मैं उस लड़की को बीच मजधार छोड़ आया जिसने मुझे जीने का हुनर सिखाया । उसे जब बताने गया कि उसे जिस वजह से छोड़ गया था वो मंज़िल मैंने पा ली है तब तक वो भी जा चुकी थी । तुम्हें ये सब बहुत पहले बता देता लेकिन डर रहा था कि तुम भी चली जाओगी । मैं जीत कर भी हारता रहा । ऐसी जीत की क्या खुशी मनाता जिसने मुझसे मेरे अपने छीन लिए ।" मैं ये सब बताता रहा, सलोनी सुनती रही । 


मैंने खुद को किताब की तरह उसके सामने खोल दिया । वो पन्ने भी उसके सामने आ गए जो मैंने सबके लिए जला दिए थे । मेरे सिर पर उसके हाथों की सहलाहट मुझे ये बताती रही कि वो मुझे सिर्फ़ सुन ही नहीं रही बल्कि समझ भी रही है । सारी बात बताने के बाद मैंने आखिर में उससे कहा "अब सब कुछ तुम्हारे सामने है । फैसला तुम्हें करना है कि मैं सही था या गलत । अपने मन से जो सही लगे वो सज़ा दे सकती हो ।" 


मेरी बात पर वो नम आंखों के साथ मुस्कुराई और कहने लगी "जानते हो, जब हम दिल से प्रेम में होते हैं ना तो सबसे अच्छी बात ये होती है कि हम प्रेम को समझने लगते हैं । दुनिया में सबसे बड़ा धर्म प्रेम ही है और मेरा मानना है कि प्रेम में जो भी होता है वो कभी गलत नहीं होता । मेरे लिए तुम्हारी कहानी के पात्र नए हो सकते हैं मगर ये कहानी नई नहीं है । तुम्हें क्या लगता है मैं खुद से तुम्हें नहीं कह सकती थी कि मुझे तुमसे प्यार है ? बहुत पहले ही कह सकती थी मगर मैं समझ चुकी थी कि तुम ये जो गुमसुम से रहते हो, ज़्यादा बात नहीं करते इसकी वजह प्यार ही है । कोई है जिसे तुम बहुत ज़्यादा चाहते हो । मैंने कभी जानना नहीं चाहा और ना तन्हें पाने की उम्मीद छोड़ी । बस सब समय पर छोड़ दिया । मेरे प्यार पर मेरा हक़ था मगर तुम्हारे पर सिर्फ़ तुम्हारा । तुम हमेशा से आज़ाद थे अपने मन का चुनने के लिए और जब तुमने मुझे चुना तो मैं समझ गई कि तुम टूट चुके हो और तुम्हें कोई चाहिए जो तुम्हें संभाल सके । हम सब किसी ना किसी मकसद से पैदा होते हैं और मैंने मान लिया था कि मेरा मकसद तुम्हें संभालना है । हर हाल में तुम्हारे साथ थी, हूं और हमेशा रहूंगी ।" 


मैं हैरान था । कोई शख्स इतना कुछ खुद में समेट कर इतना खुश कैसे रह सकता है । उसे सब पता था, हर बात का अंदाज़ा था । वो जानती थी कि कोई तो है जो उसके हक़ पर कब्ज़ा किए बैठी है लेकिन वो मुस्कुराती रही, सिर्फ़ मेरे लिए । प्रेम में इससे बड़ा त्याग भला और क्या हो सकता है । आज उसे पूजने का मन कर रहा था । मैं उसकी गोद में मुंह छुपा के ऐसे रोया जैसे मैं अपनी आंखों से सालों के जमा आंसुओं का हिसाब ले रहा हूं । 


"आज जी भर के रो लो । सालों से जो दबाया है उसे निकाल दो और फिर खुद को तैयार करो इसलिए कि तुम अपनी कहानी का एक सुखद अंत खोज सको और मैं इसमें हर तरह से तुम्हारा साथ दूंगी । मैं नहीं चाहती कि जिससे मैंने प्यार किया उस शख्स की ज़िंदगी किसी अधूरी कहानी सी हो । मैं नहीं चाहती कि तुम पूरी ज़िंदगी एक पहेली को सुलझाते हुए गुजार दो । चलो अब इस पहेली को इकट्ठे सुलझाया जाए ।" उसने मुझे संभाला और ये वादा किया कि अब वो मेरे साथ उस लड़की को खोजेगी ।


मुझे अब पूरा विश्वास था कि हम जल्द ही बाबा की सच्चाई जान लेंगे और उसके बाद उस लड़की तक भी पहुंच जाएंगे । मेरे हाथ जो मेरी मर्यादाओं के कारण बंधे थे उन्हें सलोनी ने खोल दिया था । वो अब खुद मेरे हाथ बन चुकी थी । बाबा के बारे में सच खोजने की ज़िम्मेदारी उसने अपने ऊपर ले ली थी । मेरी उस अधूरी और उलझी हुई कहानी का अंत अब नज़दीक आ रहा था । 


क्रमशः


धीरज झा

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