वो जो लड़की थी- भाग 12

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इस आज कल की हवा में इतना अविश्वास घुल चुका है कि कोई अगर आप पर विश्वास कर भी ले तो आप खुद पर ही हैरान होने लगते हैं । सलोनी को मैं इतने सालों से जानने का दवा कर रहा था लेकिन मैं ये नहीं जानता था कि उसके मन में मेरे लिए इतना प्यार है । आज कहीं ना कहीं मैं खुद पर शर्मिंदा भी था । अब समझ आता है कि इंसान इतना दुखी क्यों रहता है । जब वो निश्चित को छोड़ अनिश्चित के पीछे भागने लगता है तो हंसती खेलती ज़िंदगी में दुख और चिंताओं का समावेश निश्चित तौर पर हो ही जाता है ।

सलोनी ने मुझे और मेरे प्यार को समझा । उसने इस बात से उदास होने की बजाए मेरा साथ देने का फैसला किया । सलोनी को पता चला कि बाबा कहीं जाने की तौयरी में हैं । कहां ? ये नहीं पता था लेकिन अचानक से ही उन्होंने निकलने प्रोग्राम बनाया था । जब तक उनके पीछे कोई जाता नहीं तब तक ये पता चलना मुश्किल था कि आखिर चल क्या रहा है । एक डीएम हो कर मैं ऐसे ही जगह जगह नहीं भटक सकता था लेकिन अब मैं अकेला नहीं था सलोनी मेरे साथ थी ।

मैं ऐसा कुछ सोचता उससे पहले ही उसने सोच लिया था कि वो बाबा के पीछे जाएगी और सच का पता लगाएगी । सलोनी ने जब मुझे ये बात बताई तो मैं थोड़ा डर गया । मैं नहीं जानता था कि ये बाबा असल में चीज़ क्या है, कितना खतरनाक है । मैंने सलोनी को मना भी किया मगर वो नहीं मानी । सलोनी गौरव को साथ लेकर बाबा के पीछे निकल गई ।

मेरे दिमाग के सभी रास्ते अभी एक ही सोच की तरफ जा रहे थे और वो था उस लड़की के बारे में पता लगाना । क्या उस बाबा ने मेरी उस मोहब्बत के साथ कुछ बुरा कर दिया था जिसकी चाहत में मेरी आधी ज़िंदगी गुज़र गई थी ? उस लड़की को लेकर इसने झूठ क्यों कहा था या फिर सच में उसके बारे में इसे कुछ पता नहीं था ? संस्था की ज़मीन का मालिक खुद होते हुए भी इसने ये क्यों कहा था कि वो वहां सिर्फ़ एक नौकरी करता है, अचानक से बाबा को शहर से बाहर जाने की क्यों सूझी ? क्या वो भाग रहा था मुझसे ? इन बातों का जवाब तो बाबा ही दे सकता था ।

यही सब सोच रहा था कि तभी मुझे खयाल आया उस लड़के के बारे में जो मुझे संस्था में मिला था । मुझे यकीन था कि वो कुछ ना कुछ ऐसा बता सकता है जिससे इन सवालों जवाब खोजने में आसानी हो सके । लेकिन समस्या ये थी कि उससे मिला कैसे जाए । मैं कल सुबह तक का इंतज़ार नहीं कर सकता था और अभी मेरा उससे मिलने जाना सही नहीं था । ऐसे में इंस्पेक्टर हरीश ही मेरी मदद कर सकता था । हरीश मेरे मुश्किल भरे दिनों का दोस्त था । सिविल सर्विसेज की तैयारी हमने साथ ही की थी मगर उसका हो नहीं पाया । उसके बाद उसने पुलिस फोर्स ज्वाइन कर ली थी । अभी 7, 8 महीने पहले ही उसकी पोस्टिंग मेरे जिले में हुई थी ।

मैंने उसे फोन किया और उस लड़के को किसी तरह मुझसे मिलवाने के लिए कहा । हरीश का ऐसा था कि वो हर तरह से काम निकलवाने में माहिर था । इसी वजह से मैंने ये काम उसे दिया था और उसने उसे पूरा भी । कुछ ही देर में हरीश उस लड़के को मेरे ऑफिस ले आया था । मैंने उन्हें अंदर बुलाया । लड़का मुझे देख कर जिस तरह घबराया मैं जान गया कि हरीश ने उसे किसी और ही बहाने से बुलाया है ।

"हाऊ आर यू यंग मैन ?" मैंने उसे सहज महसूस कराने की कोशिश की ।

"फाइन सर ।" उसने दबी हुई आवाज़ में कहा और फिर हरीश पर एक नज़र डाली । मैंने हरीश को देखा और वो जान गया कि अब उसका यहां कोई काम नहीं ।

"सर मैं बाहर इंतज़ार करता हूं ।" इतना कह कर वो बाहर चला गया ।

"अरे खड़े क्यों हो बैठो ना ।" मैंने लड़के से कहा ।

"थैंक यू सर ।" लड़का मेरा इशारा पा कर सामने कुर्सी पर बैठ गया ।

"तो तुम भी आईएएस बनना चाहते हो ?" मैंने उससे पूछा ।

"नहीं सर मुझे आईपीएस बनना है । मैं मानता हूं कि सिस्टम को सुधारने से पहले लॉ एंड ऑर्डर को सुधारना ज़्यादा ज़रूरी है । वैसे भी आईएएस बनने वालों की तो लंबी कतार लगी हुई है ।" लड़के के जवाब से मुझे लगा जैसे उसके निशाने पर मैं भी हूं मगर उसने ऐसा कुछ सोच कर नहीं कहा था ।

"बहुत बढ़िया ।"

"सर मुझे क्यों बुलाया है आपने ? वो सर बोले कि मेरा नाम किसी लिस्ट में निकला है जिसके लिए मुझे उनके साथ चलना होगा । मैंने पूछा भी कि कौन सी लिस्ट तो उन्होंने बताया नहीं । क्या मुझे गिरफ्तार...।" लड़का सहम गया था ।

"तुमने कुछ गलत किया है ?"

"नहीं सर ।"

"फिर डर क्यों रहे हो ?"

"इस दौर से डर लगता है सर । आज कल तो बिना बात के लोगों का खून हो जाता है तो जेल हो जाना कौन सी बड़ी बात है । बड़ी मुश्किल से यहां तक पहुंच के कुछ करने का सपना देखा है सर । अगर कुछ भी गलत हुआ तो सपना टूट जाएगा । कोई और ऑप्शन नहीं है सर ।" लड़का भावुक हो गया था । उसमें मुझे मेरी सालों पुरानी झलक नज़र आ रही थी ।

"ऐसी कोई बात नहीं है । वैसे भी गिरफ्तार होते तो भला यहां क्यों आते । तुम जैसे बच्चों की कद्र करता हूं मैं । यकीन मानों आज से 18 साल पहले मैं वहीं खड़ा था जहां तुम आज खड़े हो । यही सपने, ऐसे ही हालात । तो अगर मैं यहां पहुंच सकता हूं तो तुम भी पहुंच जाओगे । बस एक बात याद रखना कुछ भी हो जाए हिम्मत मत हारना ।" किनारे तक पहुंचने के लिए पानी में हाथ मार रहे इंसान को 'तुम कर सकते हो' कह कर हिम्मत देना ही बहुत होता है । मेरी बात से लड़के को भी ऐसी ही हिम्मत मिली थी । वो मुस्कुराने लगा ।

"सर आपने बताया नहीं कि यहां क्यों…?"

"बस यूं ही । मुझे तुमसे मिल कर अच्छा लगा था उस दिन । मैं बस तुम्हारे बारे में जानना चाहता था । अपने बारे में बताओ मुझे ।" हालांकि इतना तो ये लड़का भी जनता था कि एक डीएम के पास इतना खाली समय नहीं होता कि वो किसी को बस यूं ही मिलने के लिए बुलाए फिर भी वो घबराया नहीं । मेरी बातों ने उसे सहज कर दिया था ।

"सर कचरे के ढेर का कोई टैग प्राईज़ थोड़े ना होता है । हम अनाथ कचरे जैसे ही हैं । बहुत छोटा था तभी हैजे से मां पिता जी दोनों चल बसे । उसके बाद मेरे दादा ने मुझे पाला लेकिन फिर उनकी भी मौत हो गई । बताते हैं कि मैं सिर्फ़ दो तीन साल का था जब बाबा मुझे अपने साथ ले आए थे । वो ना होते तो ना जाने मेरा क्या होता । तब से मैं उनके ही साथ हूं । धीरे धीरे मुझ जैसे और भी बच्चे उनके पास आने लगे । जिन्हें पढ़ना था वो बाबा के पास रहे बाक़ी हाथ पैर निकलते ही अपने अपने काम पर लग गए लेकिन बाबा ने बहुत से अनाथों को सहारा दिया है ।" मैं लड़के की बात बहुत गौर से सुन रहा था । उसकी आंखों में सच्चाई और बाबा के प्रति सम्मान साफ दिख रहा था ।

"किसी और को भी बाबा के साथ देखा है कभी ?"

"नहीं सर साथ तो नहीं देखा लेकिन ऐसी ही एक संस्था कहीं और भी है लेकिन उसे कौन चलाता है ये मैं नहीं जानता । बाबा अक्सर वहां जाते रहते हैं । पहले कम जाते थे मगर जब से मैं बाक़ी के बच्चों की देखभाल करने लगा तब से वो अक्सर जाते हैं ।"

"तुमने पूछा नहीं कि वो कहां जाते हैं ?"

"सर जो हाथ भूखे पेट को रोटी खिलाते हैं उनसे ये पूछने की हिम्मत कहां होती है कि खिलाने से पहले हाथ धुले थे या नहीं । बाबा से सवाल करना सही नहीं लगता । वो खुद किसी ना किसी परेशानी में रहते हैं हमेशा ।" लड़के की बातों को सुन कर मेरे मन में आया कि उसे मुफ्त की एक सलाह दे दूं कि वो बाक़ी सब भूल कर लेखक बनने की तैयारी करे । इतनी सी उम्र में उसे ज़िंदगी ने बहुत कुछ सिखा दिया था ।

"अच्छा तुम्हें पता है कि तुम पैदा कहां हुए थे और अपने दादा के साथ किस शहर में रहते थे ।"

"बाबा बताते हैं कि मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के सोमनगर में हुआ था और मेरे दादा नगरलोक के एक कॉलेज में दरबान की नौकरी करते थे । उसके बाद बाबा के साथ दो तीन साल उसी शहर में रहा फिर हम लोग यहां चले आए । तब से यहीं हूं मैं ।" लड़के के मुंह से नगरलोक का नाम सुन कर मैं चौंक गया । ये वही शहर था जहां से मेरी कहानी शुरू हुई थी ।

"क्या तुमने बाबा से कभी पूछा कि तुम्हारे दादा किस कॉलेज में दरबान थे ।"

"हां अभी हाल ही में कोई चर्चा चली थी तब बताया था उन्होंने कि दादा जी मूल चंद कॉलेज में काम करते थे ।" लड़के की बातें अब मुझे हैरान करने के साथ साथ कुछ तारों के जुड़ने की ओर इशारा भी कर रही थीं ।

"तुम्हारे दादा का नाम हरिलाल था ?" मैंने बड़ी उम्मीद से पूछा ।

"हां सर लेकिन आपको कैसे पता ?" लड़का मेरे मुंह से अपने दादा का नाम सुन कर हैरान था । एक डीएम भला सालों पहले के एक दरबान का नाम कैसे और क्यों जानेगा ?

"तुम्हें याद है अच्छे से कि तुमने बाबा के साथ कभी किसी को नहीं देखा ? किसी लड़की को या किसी महिला को । मेरी उम्र की महिला ?" उसके सवाल को नज़रंदाज़ करते हुए मैंने अपने सवाल उसके सामने रख दिए ।

"नहीं सर मैंने कभी नहीं देखा किसी महिला को उनके साथ । हां उन्हें एक फोन ज़रूर आता है मगर किसका आता है ये नहीं पता । वो हर रोज़ बात करते हैं ।" अब मैं अपने खयलों में खो गया था । मेरे दिमाग के घोड़े दौड़ने लगे थे । लड़का कुछ देर तक इंतज़ार करता रहा मेरी तरफ से कुछ बोले जाने का लेकिन मैं अपनी अलग ही दुनिया में उलझा था ।

"सर मैं जाऊं ?" उसकी आवाज़ ने मेरा ध्यान तोड़ा ।

"हं, हां जाओ । और मैंने जो भी पूछा है तुमसे उससे संबंधित कुछ और याद आए तो मुझे इस नंबर पर तुरंत कॉल करना ।" मैंने उसे अपना कार्ड देते हुए कहा ।

"ओके सर ।"

"अरे सॉरी तुम्हारा नाम पूछना ही भूल गया ।" मुझे याद आया कि मुझे अभी तक लड़के का नाम ही नहीं पता था ।

"सर रमन नाम है मेरा । सर आपने मेरे दादा जी के बारे में नहीं बताया कि कैसे जानते हैं आप उन्हें ।" लड़का कुर्सी से उठ गया था लेकिन जाते जाते अपनी जिज्ञासा मिटाना चाहता था ।

"मैं उसी कॉलेज में पढ़ा हूं और हमारे समय में तुम्हारे दादा जी वहां काम करते थे । बहुत अच्छे थे वो और उनसे काफ़ी देर तक बातें भी होती थीं हमारी ।" उसे कैसे बताता कि जिसकी वजह से उसके दादा जी के साथ इतनी देर बातें होती थीं उसी को खोजने के लिए उससे ये पूछताछ कर रहा हूं ।

लड़का मेरे और अपने दादा जी के संबंध को जान कर खुश हुआ । कुछ देर में वो वहां से चला गया और मुझे ना चाहते हुए भी अपने काम में लगना पड़ा । मगर सच पूछिए तो मैं वहां हो कर भी वहां नहीं था । सलोनी को पता नहीं था कि वो कहां जा रही है लेकिन मैं समझ गया था कि बाबा नगरलोक जा रहे हैं । अब मैं एक कदम और पास था । मैंने फैसला किया कि मैं शाम को नगरलोक के लिए निकल जाऊंगा । सलोनी ने सागर को संभालने के लिए पहले ही सुनीता को बुला लिया था ।

मैं काम खत्म कर के ऑफिस से सीधा नगरलोक के लिए निकल गया । सुनीता को फोन कर के बता दिया कि हम दोनों ही आज घर नहीं आएंगे और वो सागर और उसके सवालों दोनों को संभाल ले । मैं निकला ही था कि सलोनी का फोन आ गया ।

वो कुछ बोलती उससे पहले ही मैंने कहा "मैं नगरलोक आ रहा हूं ।"

उसने हैरानी जताई "मगर तुम्हें कैसे पता कि हम नगरलोक की तरफ जा रहे हैं ?"

"क्योंकि बाबा भी वहीं जा रहे हैं ।"

"तो क्या हम रास्ते में रुक कर इंतज़ार करें तुम्हारा ?"

"नहीं नहीं, मुझे अभी 4 घंटे लगेंगे तुम तक पहुंचमे में । तब तक बाबा कहां गायब हो जाएगा पता भी नहीं चलेगा । तुम लोग उनका पीछा करो । लेकिन ध्यान रहे कुछ करना मत । बाबा से छुप कर रहना वो जानते हैं तुम्हें । उनकी लोकेशन पर पहुंच कर मेरा इंतज़ार करना ।"

"ओके बॉस ।" फोन कट गया । मैं एक कदम और आगे बढ़ चुका था उस लड़की की तरफ । अब मुझे उस तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता था । कल का सूरज मेरी अधूरी कहानी को पूरा करने वाला था ।

क्रमशः

धीरज झा

नोट :- शहरों के नाम काल्पनिक हैं ।

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