वो जो लड़की थी - भाग पांच

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"हो गया गुस्सा शांत ? क्या मिला ये सब कर के ? बेकार में ये 9 दिन गंवा दिए ।" मैं जो अब तक उसे लेकर फिक्रमंद था अचानक से गुस्से से भर गया । 


"तुमने गंवाये हैं मैंने नहीं ।" उसने कोरा सा जवाब दिया ।


"मैंने भी नहीं गंवाये ।" मैंने भी उसी के लहजे में उसे जवाब दिया । 


"वो तो मैं देख ही रही थी । कैसे उस खम्भे पर रोज़ अपना गुस्सा निकालते थे ।" उसने सामने लगे खंभे की तरफ आंखों से इशारा करते हुए कहा । 


"मतलब तुम यहीं थी ? हर रोज़ ?"


"मैंने कहा ना कि मैंने दिन नहीं गंवाये । मुझे तुम्हें देख के ही सुकून मिल जाता है और मैंने तो तुम्हें रोज़ देखा है । तुम्हीं मुझे नहीं देख पाए ।" उसकी बात सुन कर मेरा सार गुस्सा पिघर कर मेरी आंखों में भर आया और धीरे धीरे किनारों से बहने लगा । मन हुआ मैं भी गले लगा लूं उसे बिना इस भीड़ की परवाह किए मगर मैं कर ना सका । 


उसकी तरफ बढ़ा ही था कि उसने मुझे रोका "दिल्ली जा रहे हो तो पास मत आना ।"


"मैं समझाता हूं ना तुम्हें ।" मैं फिर आगे बढ़ा उसने फिर रोका । 


"मैं बच्ची नहीं हूं जो ना समझूँ । सब समझ आ रहा है मुझे ।" ये बात उसने बच्चों की तरह ही कही थी । 


मैं तेजी से आगे बढ़ा उसका हाथ पकड़ा और सामने खड़े एक रिक्शे पर बैठ गया । उसने हाथ छुड़ाने की कोशिश भी नहीं की । रिक्शेवाले को पार्क चलने का बोल कर मैं चुप हो गया । 15 मिनट तक हम चुप ही रहे । पार्क आ गया हम उतर गये । उसने हमेशा की तरह पहले ही रिक्शेवाले को पैसे दे दिए । 


मैं उसका हाथ पकड़े तेज़ी से पार्क की ओर चल पड़ा । भीड़ से दूर लगे एक बैंच पर उसे बैठते हुए बोला "दिल्ली ना जाऊं तो क्या करूं बताओ मुझे ?" 


"जो करना है यहीं कर लो । मैं पापा से कह के अच्छी...." उसकी बात पूरी नहीं होने दी मैंने 


"मुझे सिर्फ जॉब नहीं करनी ।" 


"हां तो तैयारी भी यहीं कर लो । सानू भईया यहीं से पढ़ कर तो..." 


"तुम समझ नहीं रही । तुम्हारे साथ होते हुए मैं पढ़ाई पर फोकस नहीं कर सकता ।" मैंने वो बोल दिया जो कोई भी प्रेम करने वाला अपने साथी नहीं सुनना चाहता । 


"मतलब मैं तुम्हारे लिए एक प्रॉब्लम हूं ?" उसकी आंखों के आंसू पलकों पर झूलने लगे । 


"नहीं यार । तुम प्रॉब्लम होती तो तुमसे छुटकारा चाहता । ऐसे मना नहीं रहा होता । तुम मेरे हालत से वाक़िफ़ नहीं हो ।" मैंने घुटनों पर बैठते हुए कहा । 


"हमारे सपनों का क्या होगा ? और हमारी शादी का ?" 


"उसी के लिए जा रहा हूं । तुम ही बताओ क्या एक ऐसे लड़के के साथ सारी ज़िंदगी बिता लोगी जो दूध भी तुम्हारे पैसों से खरीद के पीता है, जिसके रिक्शे का किराया तक तुम देती हो ?" 


"हां मैं रह लूंगी ।" वो तपाक से बोली ।


"तुमने गरीबी देखी नहीं ना इसलिए ऐसा कह रही हो । मेरी दो बहनें हैं जिनकी शादी की ज़िम्मेदारी मुझ पर है । ज़मीन बेच कर मां ने पढ़ने भेजा था मुझे इस उम्मीद में कि मैं कुछ बन कर घर लौटूंगा । इस बार घर जाने पर उन्होंने मुझसे पहला सवाल यही पूछा कि नौकरी मिल गई ? मैं उन्हें क्या बताता कि मैं प्यार में हूं इसीलिए मैं नौकरी नहीं पा सका ? गरीब के लिए प्यार से कहीं ज़्यादा रोटी मायने रखती है । मैंने पहली बार मां से झूठ बोला कि मुझे नौकरी मिल गई है । अब मुझे नौकरी भी करनी है पढ़ाई भी करनी है और जल्द से जल्द एक मुकाम भी हासिल करना है । लेकिन मैं नहीं कर पाऊंग अगर तुम्हारे आसपास रहा । मैं 8 दिन से सोया नहीं, ढंग से खाया नहीं सिर्फ़ ये सोच कर की तुम नाराज़ हो । क्या ऐसे हाल में मैं कुछ कर पाऊंगा ?" मैं ये सब कहते हुए रो पड़ा । वो चुपचाप मुझे सुनती रही ।


"आज कहने में बहुत अच्छा लग रहा है कि मेरे साथ रह लोगी लेकिन कल को जब तुम्हें एक एक रुपया खर्च करते हुए सोचना पड़ा तो कोसोगी अपनी किस्मत को । मैं भी तुम्हारी तरह किसी अमीर घर में पैदा होता तो ये सब कभी नहीं जान पाता जो तुम्हें बता रहा हूं । हमें जीने के लिए भी लड़ना पड़ता है यार और ये लड़ाई तुमसे नहीं लड़ी जाएगी । मुझे वक़्त दो मैं कुछ सालों में ही लौटूंगा कुछ बन कर फिर जैसे कहोगी मैं वैसे रहूंगा । हमारे सारे सपने पूरे होंगे हमारी शादी होगी ।" मैंने घुटने पर बैठे बैठे अपना सर उसकी गोद में रख दिया और रोने लगा । रोते हुए मैंने उसकी सूरत नहीं देखी । मैं जान नहीं पाया कि मेरी बातों का उस पर कैसा असर हुआ है   


बस उसने इतना कह दिया कि "जाओ ।" 


"क्या ?" मैं समझ नहीं पाया उसने ये बात किस लहजे में कही है । 


"जाओ मैं इंतज़ार करूंगी । अब मुझे घर जाना होगा इससे पहले कि मैं टूट जाऊं और तुम मुझे टूटता देख कर अपना इरादा बदल दो ।" वो ऐसे उस पार्क से निकली जैसे मैंने उसके अंदर से उसकी आत्मा निकल ली हो । मैंने उसे सब कुछ बता दिया था लेकिन वो अभी भी बहुत कुछ अपने अंदर दबाए हुए थी । मुझे नहीं पता था कि वो सब क्या है और ना मैंने जानने की कोशिश की थी कभी ।


अगले दिन वो स्टेशन पर भी आई थी मुझे आखिरी बार देखने । जाने से पहले बोली "हमें सच में अदला बदली कर लेनी चाहिए । तुम लड़की की तरह दूर जा रहे हो और मैं लड़के की तरह यहां खड़ी आंसू बहाउंगी ।" मैं मुस्कुरा उठा । 


"लौट कर ज़रूर आना । इंतज़ार करूंगी ।" यही उसके आखिरी शब्द थे । ट्रेन मुझे दिल्ली ले आई । यही दिल्ली मेरी नई किस्मत लिखने वाली थी । 


ये मेरी मजबूरी थी या मेरा स्वभाव नहीं जान पाया मैं मगर सच यही था कि दिल्ली आने के बाद मैं मतलबी हो गया था । कुछ दिन जी भर रोया मगर उसके बाद मेरे सामने था तो सिर्फ मेरा लक्ष्य । जितना मन लगा के नौकरी की उससे कहीं ज़्यादा मन लगाया पढ़ाई में । मां को हर महीने पैसे भेजता रहा और यहां ज़िंदगी से एक लड़ाई लड़ता रहा । ये लड़ाई 3 साल चली । पढ़ता था मगर फिर भी कामयाब ना हो पाता । तब पता चला कि बिना गुरूमंत्र के यहां यूपीएससी का चक्रव्यूह नहीं टूटता । जैसे तैसे गुरू भी तलाश लिया । उसके बावजूद भी नाकामयाबी के अलावा और कुछ हाथ ना लगा । 


इस बीच जब भी मैं हारा हुआ सा महसूस करता तो इसकी यादें मुझे घेर लेतीं । नंबर दिया था उसने, मन होता कि उससे बात करूं, उससे मुझे हिम्मत मिलती थी मगर मैं डरता था कि कहीं थोड़ी सी हिम्मत के बदले मैं उसे इस संघर्षपूर्ण ज़िंदगी का हिस्सा ना बना लूं । कहीं ये सब मुझे फिर से अपने लक्ष्य से दूर ना कर दे । उसकी आवाज़ सुनी नहीं कि ये तपस्या भंग हो जाएगी । यही सब सोच कर कभी फोन नहीं किया मैंने उसे । ना ही कभी इस बीच घर जाना हुआ । मां से और झूठ नहीं बोल सकता था सो फैसला कर लिया था कि किला फतह कर के ही जाऊंगा । 


चौथा साल था इसलिए मैंने अपनी सारी मेहनत झोंक दी थी । कुछ फ़रिश्ते मिले थे यहां, जिन्होंने बहुत सहारा दिया । ऐसे दोस्त भी मिले जिनके लिए उन्के खुद के कामयाब होने से ज़्यादा ज़रूरी मेरा आगे निकलना था । मैं किताबों और नोट्स में इतना खो गया था कि खाने सोने की सुध ही भूल बैठा था । ऐसे हाल में सलोनी मेरे लिए खड़ी हुई । वो हर रोज़ खाने से लेकर मेरी सेहत तक का खयाल रखती थी । उसे मेरे हालातों की खबर थी । वो ना होती तो शायद मैं पढ़ते पढ़ते मर जाता । 


एक दिन मैंने उससे पूछा था "क्यों करती हो मेरे लिए ये सब ? तुम्हें तो अपने लिए भी समय निकालना मुश्किल होता है फिर क्यों ?" 


वो पहले मुस्कुराई और फिर बोली "कई सवालों का जवाब नहीं मिलता और ना जानने की ज़रूरत महसूस होती है । बस तुम्हें और तुम्हारी मेहनत को देखती हूं तो लगता है तुम्हारे लिए जितना कट सकूं उतना कम है । यकीन मानों तुम्हारा जीतना मेरे जीतने जितना सुख ही देगा मुझे ।" 


उसकी आंखों में ना प्यार का भाव था ना दोस्ती का, ये अलग ही था । जैसे अपने मन में श्रद्धा पाल रखी हो उसने मेरे लिए । मैं ये सब समझ पाने की स्थिति में बिल्कुल नहीं था । इन दिनों मेरे पास दो ही जवाब थे एक मुस्कुराना और दूर ये कहना कि 'फिक्र मत करो सब अच्छा होगा ।'


खैर मेरे लिए करो या मरो का समय आ गया था । मैं अपनी किस्मत लिख आया था । मेहनत का फल मिला और ऐसा मिला कि मुझे हरि दर्शन का सुख मिल गया । परीक्षा क्लियर हो चुकी थी, मैंने लक्ष्य साध लिया था । सालों की मेहनत ने मुझे वो रैंक दिलाया था जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी । 


मोहब्बत एक पूत को कपूत बना सकती है ये बात तब पता चली जब मां को ये खुशखबरी देने की बजाए मैंने पहले उसका नंबर मिलाया । धड़कते दिल के साथ मैंने नामर डायल किया । सब सोच लिया था कि क्या बोलूंगा, कैसे मनाऊंगा उसे । मगर नंबर नहीं लगा । एक बार दो बार कई बार लेकिन लगातार एक ही तरह की टोन । शायद ये नंबर बंद हो चुका था । मेरी बेचैनी जो मैंने तीन सालों से समेट कर रखी थी वो अब और दबने को तैयार नहीं थी । 


मैं एक बार फिर मतलबी हो गया । बिना सलोनी या किसी को मिले मैं उसी रात गायब हो गया वहां से । मैंने किसी को मौका नहीं दिया मेरी खुशी बांटने का । मैं उस शहर के लिए रवाना हो गया जहां से उसे अलविदा कहा था ।


वही स्टेशन, वही सड़कें, वही रिक्शा स्टैंड, और वही मोहल्ला जहां मेरी जान रहती थी । उसके बड़े से घर के पास पहुंचा । मेरी कामयाबी ने उस आत्मविश्वास को फिर से मजबूती दी थी जो गरीबी के कारण कभी टूट गया था । मैं ये सोच कर आगे बढ़ा कि जाते ही कहूंगा मुझे आपकी बेटी से मिलना है मैं उसका दोस्त हूं । जिसने अभी अभी यूपीएससी क्लियर किया है । 


यही सब सोचता हुआ मैं उस बड़े से दरवाज़े तक पहुंचा । धड़कते दिल के साथ बेल बजाई । सामने वो खड़ी थी और मैंने उसे गले लगा लिया । खैर ऐसा सोचना मेरा खयाल मात्र था जो मैं लगातार देख रहा था । 


क्रमशः 


धीरज झा

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