वो जो लड़की थी - भाग आठ

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अगर किस्मत मुझ पर मुसीबतों की बारिश कर रही थी तो सलोनी मेरे लिए वो छाता बन गई थी जिससे मैं काफ़ी हद तक इन मुसीबतों से बच पा रहा था । उसके स्वभाव ने कुछ ही दिनों में सुनीता और लक्ष्मी को उसका अच्छा दोस्त बना दिया था । सलोनी के माता पिता भी मेरी बहनों को अपनेपन का अहसास दिलाने में नहीं चूक रहे थे । ये मेरे लिए बहुत बड़ी मदद थी वर्ना ऐसे हालातों में ना जाने मेरी और बहनों की क्या हालत होती । सलोनी का जादू इन पर इस तरह छाया था कि अब ये दोनों हफ्ते में एक बार मुझे फोन करती थीं । 


मैं सलोनी का शुक्रगुज़ार था । उसके प्रति मेरा सम्मान बढ़ गया था मगर मैं अभी भी उस लड़की की यादों से खुद को बाहर नहीं निकाल पाया था । ट्रेनिंग के दौरान मैं जिस भी नई जगह पर गया वहां मैंने किसी तरह के चमत्कार की पूरी उम्मीद की । फिल्में तो उतनी नहीं देखी थीं लेकिन समय मिलने पर रोमांटिक नॉवेल ज़रूर पढ़े थे । ये उन्हीं का असर था जो मुझे लगता था किसी नई जगह पर वो एकदम से सामने मुझे दिख जाएगी और उसे देखते ही ये दुनिया कुछ पल के लिए थम सी जाएगी । होश में रहेंगे तो सिर्फ़ मैं और वो । मैं उसे देखते ही ढेरों सवाल करूंगा और वो उन सवालों का जवाब देने की बजाए मुझसे आ कर लिपट जाएगी । हालांकि मैं मन को ये समझा लेता था कि ये सब सिर्फ़ किस्से कहानियों में होता है मगर फिर भी हर आशिक़ की तरह मैं भी एक कभी ना पूरी होने वाली उम्मीद में जी रहा था । 


ट्रेनिंग खत्म हो गई थी अब मुझे प्रोबेशन पर जाना था । मुझे एम पी कैडर मिला था । पोस्टिंग रुड़की से दूर थी । निकलने से पहले एक बार मैं बहनों से मिलना चाहता था । वो खुद को कितना भी सही बता रही थीं मगर एक बार उन्हें सामने से देख कर तसल्ली करना चाहता था । मैं जानता था कि किसी अनजान घर में बहुत सी ऐसी बातें या जरूरतें होती हैं जो इंसान कह नहीं पाता । यही सब जानने मैं रुड़की पहुंच गया । सलोनी के घर वाले मुझसे मिल कर बहुत खुश थे । उसके पिता से मेरी घंटों बातचीत चली । वे काफ़ी दिलचस्प आदमी थे । उनके फौज के अनुभव जान कर मुझे काफ़ी कुछ नया जानना को मिला । सलोनी से अभी मेरी कोई खास बातचीत नहीं हुई थी । 


"ठीक हो ना तुम दोनों ।" समय मिलने पर मैंने दोनों बहनों से पूछा ।


"हां भईया हम एकदम ठीक हैं ।" सुनीता ने जवाब दिया ।


"कुछ चाहिए हो तो बता दो । फिर मैं चला जाऊंगा तो जल्दी मिलना नहीं हो पाएगा ।" पढ़ाई लिखाई की बात करने के बाद मैंने फिर एक बार दोनों से पूछा ।


"नहीं भईया यहां सब कुछ कहने से पहले ही मिल जाता है । सलोनी दीदी और मां जी दोनों बहुत खयाल रखती हैं । कई बार हमने कई चीज़ों के लिए पैसे देने की कोशिश की मगर दोनों ने डांट दिया । अपनी बेटी की तरह मानते हैं ।" उनकी बातें सुन कर मैं मुस्कुरा दिया । अब कुछ खास नहीं था बात करने को सो मैं उनके पास से उठ कर चलने लगा । मैं जैसे ही मुड़ा वैसे ही मुझे ये अहसास हुआ कि वो दोनों आपस में कुछ बात कर रही हैं । 


"क्या हुआ ? सब ठीक तो है ना ?" मैं फिर उनकी तरफ मुड़ा । 


"हं, हां भईया सब ठीक है ।" सुनीता ने घबरा कर कहा । ये उन दोनों का मेरे लिए लिहाज ही था कि उन्होंने कभी भी मुझसे मतलब की बात के अलावा कुछ और बात नहीं की थी । बचपन से ही हमारे बीच कुछ खास बातचीत नहीं होती थी । कई बार मन होता कि उनसे बात करूं खूब सारी मगर मैं इस चलन को कभी तोड़ ना पाया । 


"तो आपस में क्या खुसरफुसर कर रही थी दोनों ?" मैंने ज़रा सख्त हो कर कहा ।


"भईया वो ना दीदी...।" लक्ष्मी ने सुनीता की तरफ ईशारा कर के कुछ कहना चाहा मगर सुनीता ने उसे कुहनी मार के चुप करा दिया ।


"बताती हो या दोनों के लगाऊं एक एक ।" ये मेरा बचपन का डायलॉग था उनके लिए । आज काफ़ी समय बाद बोलने का मौका मिला था ।


"बता देंगे मगर वादा करो गुस्सा नहीं करोगे ।" सुनीता ने डरते हुए कहा ।


"हम्म्म्मम..।" 


"हम्म्म्मम, नहीं वादा करो ।" मुझे अब गुस्सा भी आ रहा था और हंसी भी । मैंने दोनों पर कन्ट्रोल किया । 


"हां वादा करता हूं ।" 


"वो ना हमें सलोनी दीदी बहुत पसंद है भईया ।" 


"अच्छी बात है । वो लड़की भी अच्छी है । वैसे भी अभी दो साल उसके साथ रहना...।" मेरी बात नहीं पूरी होने दी सुनीता ने ।


"ओफ्फो भईया हमें उस तरह से पसंद तो हैं ही वो मगर हमें दूसरी तरह से भी पसंद हैं ।" 


"ये क्या इस तरह उस तरह लगा रखी है । साफ साफ बोलो ना ।" 


"हमें वो इस तरह से पसंद हैं कि हम चाहते हैं आप शादी कर लो उनसे ।" लक्ष्मी ने वो बात कह दी जो सुनीता नहीं बोल पा रही थी । मैं उनकी बात पर हैरान था सलोनी को लेकर मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था । मैंने दोनों को घूर कर देखा लेकिन उन पर मेरी घूर का कोई असर नहीं हुआ । ये नियम है, जब तक मुंह बंद रहते हैं तभी तक डर रहता है मुंह खुलने पर फिर बात कहने में इंसान हिचक महसूस नहीं करता ।


"इस बार आपकी घूर से हम डरने वाले नहीं हैं भईया । मां रही नहीं, और कोई है नहीं जो आपसे बात कर सके इस बारे में और आप खुद से इस बारे में कुछ सोचोगे नहीं तो अब हमें ही सोचना होगा और हमने सोच लिया है । आपको मंज़ूर हो तो हम आपके रिश्ते की बात आगे बढ़ाएं। सही कहा ना दीदी ?" ये मेरी छोटी वाली बहन थी । मैं और सुनीता उसकी तरफ हैरानी से देख रहे थे । उसने सुनीता को कोहनी मारी और सुनीता ऐसे चौंकी जैसे नींद से जागी हो ।


"हां हां, सही कहा लक्ष्मी ने । अब हमें ही सोचना है और हमने सोच लिया है ।" 


"तुम दोनों पागल हो गई हो ।" इतना कह कर मैं कमरे से बाहर निकल आया । इन दोनों की बातों की वजह से मैं सलोनी का सामना करने से डर रहा था । 


मैं सोचने लगा कि ये बात सलोनी को पता चलेगी तो उसे कैसा लगेगा । उसने हमारी इतनी मदद की और मेरी ये पागल बहनें क्या क्या सोच रही हैं । वो एक प्रतिष्ठित परिवार से संबंध रखती है और हम ठहरे गरीब घर के लोग जिनके सपने अब जा के कहीं पूरे होने की उम्मीद नज़र आई है । ना मेरे पास छत है ना कोई ठिकाना फिर भला कैसे ? नहीं नहीं मेरी बहनें कोई बचपना कर दें उससे पहले उन्हें समझाना होगा । मैं जानता था ये सब तर्क देने से कुछ नहीं होगा । मुझे कुछ और बहाना करना होगा । मैं वापस उनके कमरे में गया । 


सलोनी भी वहां थी । मुझे देख कर तीनों थोड़ा घबराईं मगर अगले ही पल सलोनी ने कहा "कहां थे ? मैं चाय के लिए खोज रही थी । आ जाओ नीचे ही सब साथ में चाय पीते हैं ।" 


"हां, तुम चलो, हम बस आते हैं ।" सलोनी ने दोनों की तरफ देखा और चली गई । 


उसके जाते ही मैंने दोनों बहनों से कहा "अब तुम दोनों मेरी बात ध्यान से सुनों । माना कि तुम दोनों अब अम्मा हो गई हो । मेरी देखभाल तुम दोनों ही करोगी मगर अभी ऐसी कोई बेवकूफी मत करना । मैं अपना प्रोबेशन पीरियड पूरा कर लूं फिर आराम से बात करेंगे इस बारे में ?" 


"मतलब फिर आप शादी कर लेंगे ?" 


"मैंने कहा बात करेंगे ।" 


"और शादी कब करेंगे ?" 


"बात सही रही तो शादी भी…" मैं आगे बोल ना पाया मगर वो दोनों मुस्कुरा दीं । 


अगले दिन मुझे निकलना था । सलोनी से भी बात हुई लेकिन इस बार मैं उससे नज़रें चुराता रहा । यहां से निकलने के बाद समय ने जैसे पंख लगा लिए थे । मैं अपने काम में हर रोज़ बेहतर हो रहा था । प्रोबेशन पीरियड में मैंने ऐसे ऐसे काम किए कि मैं सबकी पहचान में आने लगा । एक लड़का जो उधारी और कर्जे की ज़िंदगी जीता था, जिसने अपनी मां से झूठ बोला जिसके लिए ये सब सपना था आज वो लोगों की वाह वाही और सरकार से ईनाम ले रहा था । 


मुझे अब सिर्फ़ अपना काम दिखता था, मुझे इस सिस्टम के लिए अपने देश के लिए बेहतर करना था फिर भले ही मुझे इसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़े । समय तेजी से भागता रहा । इसी बीच बहनें लगातार मुझ पर शादी का दबाव बनाती रहीं । मैं भी समझ गया था कि मुझे ज़िंदगी में आगे बढ़ना ही होगा । मैं एक ऐसी लड़की के लिए अब और इंतज़ार नहीं कर सकता जिसका कोई वजूद ही ना हो । वो मेरी यादों में हमेशा रहेगी, उसके साथ जो मैंने किया उसका पश्चाताप हमेशा रहेगा मुझे मगर मैं अब और खुद को भटकने नहीं दे सकता । 


सच कहूं तो मैं मतलबी हो गया था । अब मुझे मेरे आसपास कोई ऐसा चाहिए था जो मेरी फिक्र करे, जिसे मेरी चिंता हो, जिसका प्यार सिर्फ़ मेरे लिए हो जिससे मैं मन की हर बात कह सकूं । और सबसे बड़ी बात ये थी कि जो गलती मैं उस लड़की के लिए कर चुका था वो मैं सलोनी को लेकर नहीं करना चाहता था । मैं जानता था कि अगर मुझे शादी करनी ही है तो उसके लिए सलोनी से बेहतर और कोई लड़की नहीं हो सकती । 


काफ़ी सोचने के बाद मैं एक दिन अचानक ही रुड़की पहुंच गया । सलोनी के घर से कुछ दूर पहले रुक कर मैंने उसे फोन किया ।


"अरे, आज ये चमत्कार कैसे ?" उसने फोन उठाते ही हैरानी से मुझे कहा । 


"कैसा चमत्कार ?" 


"तुमने खुद से जो फोन किया ।" वो हंसने लगी । 


"कोई आसपास तो नहीं ।" 


"वैसे तो मैं अकेली हूं मगर आज ये जासूसों की तरह बात क्यों कर रहे हो ?" 


"मिल सकती हो ?" 


"अरे तुम ऐसे क्यों बात कर रहे हो और मैं भला क्यों नहीं मिलूंगी ? कहो तो वहां आ जाऊं ।" उसने मज़ाक में कहा ।


"नहीं उसकी ज़रूरत नहीं है । मैं ही यहां आ गया हूं ।" 


"यहां कहां ? घर पर तो नहीं आए ।" 


"नहीं थोड़ा पीछे हूं ।"


"तो घर आ जाओ ना । ये ब्वायफ्रेंड की तरह बिहेव क्यों कर रहे हो ।" 


"कभी ऐसी फीलिंग ली नहीं ना तो सोचा आज ले लूं ।" वो बहुत ज़ोर से हंसी ।


"अच्छा ये बात है । चलो ले लो फीलिंग तुम भी क्या याद करोगे ।"


"जल्दी से तैयार हो के आ जाओ मैं यहां चौक पर इंतज़ार कर रहा हूं । अकेली आना और किसी को बताना मत को मुझसे मिलने जा रही हो ।"  


"ऐसी क्या बात है ?" 


"कहा ना फीलिंग लेनी है ।" वो फिर हंसी । 


"ठीक है आती हूं ।" 


"ज़्यादा टाइम मत लगाना । मुझे आज ही वापस भी जाना है ।" 


"अभी आई ।" कुल आधे घंटे बाद वो चौराहे पर पहुंच गई । थोड़ी देर में हम एक रेस्टोरेंट में थे । 


"इतनी क्या ज़रूरी बात थी कि तुम्हें इस तरह से आना पड़ा ? कहीं सुनीता या लक्ष्मी ने कोई शिकायत तो नहीं की ?" उसने कॉफी का सिप लेते हुए शरारती मुस्कान के साथ कहा ।


"तुम्हारा गुणगान करने से उन्हें फुर्सत मिले तभी वो शिकायत करेंगी । पता नहीं क्या जादू कर रखा है तुमने उन पर ।" 


"मैं क्या जादू करूंगी । जादू तो उन्होंने कर दिया है मेरे मम्मी पापा पर । ऐसा लगता है वही दोनों उनकी बेटियां हैं और मैं मेहमान आई हूं ।" उसकी बात सुन कर अच्छा लगा मुझे । 


"अच्छा मज़ाक नहीं सिरियस्ली बताओ ऐसी क्या बात है ? कोई घबराने वाली बात तो नहीं ?" 


"घबराने वाली बात मेरे लिए है और मैं घबरा भी रहा हूं ।" 


"तो मत घबराओ और साफ साफ कहो ।" 


मैंने एक लंबी सांस ली और उससे कह दिया "मेरी बहनें चाहती हैं कि मैं और तुम शादी कर लें ।" इतना कहने के साथ मैंने एक लंबी सांस ली ।


"ठीक है लेकिन मेरी तो शादी तय हो गई ।" उसने बहुत ही सहज तरीके से कहा । इतने सहज तरीके से कि जैसे उसे कोई फर्क ही ना पड़ा हो ।


"क्या ?" मैं चौंक पड़ा क्योंकि मुझे ऐसी कोई जानकारी नहीं थी ।


"इसमें चौंकने वाली क्या बात है अब कोई सारी उम्र किसी के इंतज़ार में थोड़े ना बैठा रहता है ।" सलोनी की इस बात ने मुझे फिर एक बार यादों के भंवर में धकेल दिया । ऐसा लगा जैसे ये बात वो कह रही हो । मैं सोचने लगा शायद उसने भी इसी तरह मेरा इंतज़ार किया हो और अंत में हार कर किसी और से शादी कर ली हो ?


"हे, सुनो । अरे बाबा मज़ाक कर रही थी । मुझे क्या पता मेरा मज़ाक तुम्हें इस तरह से सुन्न कर देगा ।" सलोनी ने मेरा हाथ दबाते हुए कहा । मैं जैसे नींद से जाग गया था । 


"ऐसे कौन मज़ाक करता है ?" 


"दिल की बात कहने में कोई इतनी देर भी तो नहीं लगाता । तुम्हें पता भी है कि यहां आते हुए मेरी हालत क्या थी । मुझे लगा ना जाने क्या कह के मना कर दो तुम ।" उसे लग रहा था कि मैं अपने दिल की बात कह रहा हूं जबकि ईमानदारी से कहूं तो ये मेरा ज़िन्दगी के साथ एक तरह का समझौता था । 


"वैसे तुम्हें मेरा इस तरह कहना बुरा तो नहीं लगा ?" 


"बुरा ? तुम्हें पता भी है ये सुनने के लिए मैंने क्या क्या पापड़ बेले हैं ? ऐसा नहीं कि आज तुम एक अच्छे पद पर हो इसलिए मुझे पसंद हो । मैं तुम्हें दिल्ली में रहने के दिनों से पसंद करती हूं । तब कई बार सोचा कि तुमसे दिल की बात कह दूं मगर फिर जब तुम्हें अपने लक्ष्य को पाने के लिए इतना जुनूनी होते देखा तो सोचा नहीं अगर अभी तुम्हें कुछ ऐसा कहूँगी तो हो सकता है इसका असर तुम्हारी मेहनत पर पड़े । मैं घर से कुछ समय मांग कर बस ये देखने दिल्ली गई थी आखिर लोग कैसे तैयारी करते हैं लेकिन सिर्फ़ तुम्हारे लिए मैं 3 साल वहां रुकी रही । जिस दिन तुम्हारा रिजल्ट आया और तुमने यूपीएससी क्लियर कर लिया सोचा उसी दिन सब कह दूं तुम्हें मगर तुम अचानक ही गायब हो गए । उसके बाद कभी हिम्मत ही नहीं पड़ी । अब जब सुनीता और लक्ष्मी मेरे नजदीक आईं तब उनके बार बार कहने पर मैंने उन्हें अपने दिल का सारा हाल बताया । उन्होंने मेरे लिए तुमसे हमारी शादी की बात कही । तो अब अंदाज़ा लगा लो कि तुमसे हमारी शादी के बारे में सुनना मेरे लिए कितनी खुशी की बात होगी ।" वो एक सांस में अपनी सारी बात कह गई । मैं उसे गौर से देखता रहा । 


मुझे उसमें अपना अक्स दिख रहा था । जैसे मैं उस लड़की के लिए पागल था वैसे ही ये मेरे लिए । किसी को बिना बताए उसे शिद्दत से चाहते रहना दुनिया की सबसे कठिन तपस्या है । मैं इस तपस्या का अनादर नहीं कर सकता था ।


"तुम्हारे मम्मी पापा से कौन बात करेगा ? मैं तुम लोगों की तरह किसी बड़े खानदान...।" उसने मेरी बात पूरी ना होने दी ।


"उन्हें शुरू से ही सब पता है । तुम अगर उस समय यूपीएससी ना भी क्लियर किए होते तब भी हमारी शादी की कोशिश करती मैं । हमारी शादी के बीच हमेशा से सिर्फ़ तुम खड़े थे । तुम मान गये हो तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी ।" ये बताते हुए उसकी पलकें झुकी थीं और मैं उसे एकटक देखे जा रहा था । 


आसमान में सूरज डूब रहा था मगर मेरी कहानी की नई सुबह होने वाली थी थी ।  


क्रमशः 


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धीरज झा

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