वो जो लड़की थी - भाग नौ

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जब आप आज में ज़िंदगी जी रहे होते हैं तब आपको कुछ खास पता नहीं चलता मगर जब आप कल को पीछे मुड़ कर देखते हैं तब आपको अपनी ही ज़िंदगी किसी सिनेमा जैसी लगती है । मेरे साथ भी ऐसा ही था । जो मैं कर आया था उस पर मुझे यकीन ही नहीं होता था कि ये मैंने ही किया है । आज मेरी ज़िंदगी का नया अध्याय शुरू होने जा रहा था । मेरी बहनों से लेकर सोनल और उसके मां बाप तक सब खुश थे । मैं खुश होने की कोशिश कर रहा था ।

पता नहीं क्यों जब भी मैं इस शादी के लिए उत्सुक होने लगता तभी मुझे वो लड़की याद आती । मुझे लगता कि मैं दूसरी बार उसे धोखा दे रहा हूं । उसकी यादें सर्दियों के मौसम जैसी हो गई थीं, जो धुंध की तरह छंट तो रही थीं मगर कंपकंपी नहीं जा रही थी । लेकिन अब जो तय कर लिया था उससे मुंह भी नहीं फेर सकता था ।

शादी के बाद समय ने गति पकड़ ली । मेरी उलझनें विराम पर चली आईं । अब सिर्फ़ परिवार था और काम । काम की वजह से कई बार ट्रांसफर हुआ लेकिन इसका मुझ पर कोई असर नहीं था क्योंकि ये सब मुझे बता रहा था कि मैं अपना काम सही ढंग से कर रहा हूं । सलोनी ने मेरी बाक़ी सारी जिम्मेदारियां संभाल ली थीं । उसके मम्मी पापा की ज़िद के कारण लक्ष्मी उनके घर ही रुक गई । लक्ष्मी भी वहां खुश थी । सलोनी और सुनीता मेरे साथ साथ ट्रांसफर का मज़ा ले रही थीं ।

समय इसी रफ्तार से भागता रहा । मैं अपने कर्तव्य के प्रति इस तरह से समर्पित हो गया कि मुझे ना दिन बीतने का अहसास होता और ना साल । कम समय दे पाने के बावजूद भी सलोनी कभी शिकायत नहीं करती । शिकायत करने से अच्छा उसने खुद को भी व्यस्त कर लिया । पहले तो उसने सोचा था कि वो घर पर ही रहेगी लेकिन मेरे व्यस्त रहने के कारण उसने पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू कर दी । कुछ समय उसने जॉब भी किया लेकिन फिर पता चला कि सागर आने वाला है । इधर सुनीता और लक्ष्मी ने अच्छी पढ़ाई के साथ साथ अच्छी नौकरियां भी पा ली थी । दोनों अपने जीवन में खुश थीं । परिवार पूरा हो चुका था ।

सागर के आने के बाद मैं घर पर पहले के मुकाबले ज़्यादा समय देने लगा । ऐसा कुछ सोच कर नहीं किया था बस अब घर जल्दी जाने का मन होता था । सोचता था पिता का सुख मैं ना पा सका लेकिन इसे कभी ऐसा महसूस नहीं होने दूंगा । सागर के बाद ही सलोनी से मेरी नज़दीकियां और ज़्यादा बढ़ गई थीं । ये उसके लिए बड़ी राहत की बात थी ।

इन सब बातों में जो एक बात बुरी थी वो ये कि उस लड़की की याद मेरे ज़हन से लगभग मिट चुकी थी या फिर ऐसा कहूं कि वो मेरे लिए बुक शेल्फ पर रखी वो नॉवेल बन गई थी जिसे मैं पसंद तो बहुत करता था लेकिन उसके दर्द में खुद को डुबोने की हिम्मत नहीं हो पाती थी । कुछ खास मौकों पर वो याद आ जाया करती थी । उसे लेकर मेरी उम्मीद और चमत्कार का विश्वास सब कमज़ोर पड़ चुका था । कुल मिला कर वो मेरे लिए मेरी ज़िंदगी की उस डायरी जैसी हो गई थी जिसे मैंने सबसे छुपा कर बड़ी शिद्दत से लिखा और फिर कहीं रख कर समय के साथ उसे भूल गया ।

आज सागर ने जब अचानक से सवाल कर दिया कि पा हैव यू एवर लव सम वन ? तब लगा जैसे उसने अचानक के कानों में कहा हो भूल गए ना मुझे ? खैर अब सोचने का भी क्या फायदा था 18 साल गुज़र गए थे । मैं शायद उन प्रेमियों में से नहीं था जो जन्मों तक अपनी प्रेमिका का इंतज़ार करते हैं ।

सालों बाद आज का सारा दिन उस लड़की के नाम गया था । हर पल मैं उसी को सोचता रहा था । शाम को जब घर पहुंचा तो पता चला लक्ष्मी आई है । सागर उसी के साथ मार्किट गया था । मेरे घर पहुंचते ही सलोनी ने बड़ी सी स्माइल के साथ मेरा स्वागत किया । खूब सारी बातें नहीं होती थीं हम में और खूब सारी बातें ना होने का एक फायदा ये होता है कि आपको सामने वाले को अच्छे से समझने का पूरा मौका मिलता है ।

इतने सालों में मुझे ये कुछ पता चला था कि जब सलोनी अपनी बीच वाली उंगली से लगातार नाखून खुरचती है तो इसका मतलब होता है उसे कोई टेंशन है । जब वो खुश होती है तो अपनी स्माइल नहीं रोक पाती । वैसे तो उसकी आवाज़ प्यारी है, हंसती हुई भी प्यारी लगती है लेकिन जब वो रोती है तो उसकी आवाज़ फंसती है और इसके साथ ही एक अजीब सी आवाज़ आती है । पिछली बार जब उसकी नानी गुजरी थीं तब वो रोई थी । उसके रोने पर मुझे हंसी आ जाती है, बड़ी मुश्किल से खुद को रोका था मैंने । आज वो मुस्कुरा रही थी वो भी दिल से । कोई खास बात ही होगी ।

"तो क्या खास बात है जो आप बताने के लिए घंटों से बेचैन हैं ?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा ।

"तुम्हें कैसे पता ?" वो एकदम हैरान रह गई ।

"अब इतने दिन से साथ हैं आगे भी साथ रहना है तो ये सब तो जानना ही पड़ेगा ना कि कब क्या चल रहा है दिमाग में आपके ।" मैंने पानी का गिलास उठाते हुए कहा ।

"कमाल है डीएम साहब । यूं ही नहीं लोग आपके दीवाने हैं ।" उसने सलाम करते हुए कहा ।

"शुक्रिया आपका इस तारीफ के लिए । अब बता दीजिए कि आखिर खुशख़बरी है क्या ।"

"मैं मां बनने वाली हूं ।" उसने कहा और मैं चौंक गया ।

"क्या ? मगर...।"

"क्या क्या और ये अगर मगर क्यों ? शादी हो चुकी है हमारी और दो बच्चे पैदा करना कोई अपराध नहीं है ।" वो मेरे बगल में आ कर बैठ गई ।

"हां मगर हमने तय किया था कि बस एक ही ।"

"हां तो ये आपको सोचना चाहिए था ना ।" उसे ऐसे कहा कि मेरे पास बोलने को कुछ बचा ही नहीं । सच कहूं तो मैं शर्मा गया ।

"अब तो भूल कर भी नहीं होगा दूसरा बच्चा । मैं तो मज़ाक कर रही थी लेकिन इस मज़ाक से आपकी सच्चाई सामने आ गई ।"

"उफ्फ़ तुम और तुम्हारे ये मज़ाक । वैसे तुम्हें ही दिक्कत थी इसीलिए कहा था कि बस एक । कहो तो दूसरा आ जाएगा ।" अब शर्माने की बारी उसकी थी ।

"अच्छा अब ज़्यादा शर्माओ मत और बताओ कि बात क्या है ।"

"बात ऐसी है डीएम साहब कि मैंने डेली अखबार उदय में अपन रिज़्यूम भेजा था । अब सागर बड़ा हो गया है तो सोच रही थी अपनी डिग्री को वेस्ट क्यों करूं । यही सोच कर भेजा था रिज़्यूम । उन्हें जम गया और आज उनकी तरफ से मुझे कॉल आई था । मेरा ब्लॉग भी पढ़ा उन्होंने । मुझे सब एडिटर के लिए पूछ रहे थे । वैसे मैंने कल तक का समय मांगा है । तो बताओ क्या करना चाहिए ?"

"करना क्या है । वही करिए जो मन कहता है । वैसे भी उदय का रेपुटेशन काफ़ी अच्छा है । बहुत कुछ सीखने को मिलेगा । बस एक बात का ध्यान रखना है... ।"

"हां जानती हूं । मैं खुद नहीं चाहती कि मुझे आपके नाम पर नौकरी मिले । उन्हें नहीं पता कि मैं आपकी बीवी हूं । और कोशिश रहेगी कि जब तक ज़रूरत ना हो तब तक पता भी ना चले ।"

"इसीलिए तो आप पर नाज़ है हमें ।" मैंने सलोनी की पीठ थपथपाते हुए कहा ।

"एक बात इसमें और भी अच्छी है ।"

"वो क्या ?"

"वो ये कि इसकी ब्रांच लगभग हर जिले में है तो ट्रांसफर के बाद कोई दिक्कत भी नहीं आएगी । जहां मन वहां से नौकरी करो ।" एक तरह से ये तंज था मुझ पर जिस पर मैं बस सलोनी को घूर कर रह गया और वो हंसती रही ।

सलोनी को नौकरी मिल गई और वो इसके साथ काफ़ी खुश थी । उसे एकदम नया माहौल मिला था । घर और काम के बीच वो एकदम फिट हो गई थी । देखते ही देखते उसे यहां तीन महीनें बीत गए थे ।

उस दिन मैं जब सुबह उठा तो देखा कि सलोनी तैयार हो कर बैठी थी । अमूमन वो मेरे जागने से पहले उठ जाती थी लेकिन इस तरह से तैयार नहीं हुई होती थी । आज शायद उसे किसी ज़रूरी काम से जाना था ।

"आज सुबह सुबह किधर की तैयारी है ?" वो कुछ कागज़ों में उलझी हुई थी । मेरी आवाज़ से चौंक गई ।

"अरे यार डरा ही दिया । चाय लाऊं ?"

"नहीं मैं बना लेता हूं तुम काम करो अपना । तुम पियोगी ?" ना में गर्दन हिलाते हुए वो ऐसे मुस्कुराई जैसे मैंने उसके मन की बात कह दी हो ।

कुछ देर में मैं उसके पास आ कर बैठ गया । मैं अखबार पढ़ने लगा । कुछ देर में उसका काम पूरा हुआ फिर उसे याद आया कि मैंने कुछ पूछा था ।

"अरे यार वो मैंने खुद से एक आफत नौत ली है ।" उसकी बात से मेरा ध्यान अखबार से हट कर उसके ऊपर चला गया ।

"कैसी आफत ?"

"वो ना एक संस्था जो काफ़ी सालों से बेसहारा बच्चों को आसरा दे रही है । संस्था के संचालक का कहना है पहले सब ठीक था मगर कुछ समय से कुछ लोग उनकी ज़मीन खाली कराने के लिए उन पर दबाव बना रहे हैं ।"

"ये तो गलत बात है ।"

"हां मैंने भी यही कहा । पुलिस में भी कोई खास सुनवाई नहीं हो रही उनकी । संस्था के संचालक ये सोच कर हमारे पास आए कि अगर ये खबर अखबारों में आएगी तो शायद प्रशासन हमारी मदद करे । एडिटर इस स्टोरी को बहुत आम तरीके से ले रहे हैं । मैंने जब उनसे कहा तो बोले कि और कई खबरें हैं जो इससे ज़्यादा ज़रूरी हैं अगर आपको लगता है कि ये ज़रूरी है तो आप खुद से ये स्टोरी कवर करें ।" मेरी चाय में से घूंट भरते हुए सलोनी ने कहा ।

"तो फिर तुम मान गई ?"

"हां, मानना ही पड़ा मुझे लगा चैलेंज कर रहा है एडिटर मुझे ।"

"देखो सलोनी या तो किसी ऐसे काम में हाथ ना डालो जो तुम्हें लगता है कि तुम्हारे बस का नहीं और अगर हाथ डाल दो तो उसे इतने गहरे तक खोद डालो कि उसकी सारी परतें खुल के सामने आ जाएं । कौन जाने ये तुम्हारे लिए कोई नया रास्ता खोज दे । वैसे भी बेसहारा बच्चों की मदद है । मेरी कोई ज़रूरत हो तो बताना ।"

"हम्म्म्म, बात तो सही कह रहे हो । अभी से सारा ध्यान इसी पर होगा । वैसे तुम कबसे मेरी मदद करने की सोचने लगे ?"

"आपको बता दें कि हम इस जिले के डीएम हैं और यहां का कोई भी काम पहले हमारा होता है फिर आपका ।"

"जी हम जानते हैं और आप अब चलें और मुझे छोड़ आएं मेरी मंज़िल तक ।"

"लेकिन इतनी जल्दी ?"

"हां यार मैं चाहती हूं इसके लिए ऑफिस टाइम मिस ना हो वर्ना एडिटर फिर चिड़ चिड़ करेगा ।"

"लगता है उसे बताना ही पड़ेगा कि किसकी बीवी हो तुम ।" मैंने मज़ाक में कहा ।

"अरे रहने दो । फिर तो चापलूसी कर कर के जीना हराम कर देगा । वैसे अगर डीएम साहब को बीवी का ड्राइवर बनने में दिक्कत हो रही हो तो मैं गौरव को जल्दी बुला लेती हूं ।"

"अरे नहीं, घर पर मैं अपनी बीवी का ड्राइवर रसोइया सब हूं ।" मैंने चाय वाला कप उठाते हुए कहा ।

"अपनी चाय बना कर अहसान मुझ पर लाद रहे हो । वैसे भले ईमानदार हो मगर मेरे मामले में अक्सर बेईमान कर जाते हो ।" हम दोनों हँसे ।

इसके बाद मैं उसे छोड़ने निकल गया । ये जगह शहर से कुछ बाहर थी । कुछ साल पहले तक ये इलाका सुनसान था मगर अब धीरे धीरे शहर इसे अपने में समेट रहा था । ये कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि लोग इस जगह को खाली करवाना चाहते थे । यहां ज़मीन के दाम आसमान छू रहे थे ।

हम उस संस्था के पास पहुंच गए थे । सलोनी को मैंने उतार दिया और कह दिया कि काम हो जाए तो गौरव को फोन कर ले । वहां बच्चे गार्डन की सफाई कर रहे थे । ये संस्था कोई ज़्यादा बड़ी नहीं थी मगर जितनी भी थी सुंदर दिख रही थी । एक तरफ तरह तरह के फूल थे तो दूसरी तरफ हर तरह की सब्जियां । कुछ बच्चे पौधों में पानी दे रहे थे तो कुछ वहांं पड़ा कचरा चुन रहे थे । हर कोई अपना काम मस्ती में कर रहा था । कुछ देर मैं वहां का नज़ारा देखता रहा और फिर मैंने गाड़ी मोड़नी चाही लेकिन इससे पहले ही मैंने कुछ ऐसा देखा कि मेरे पैर अचानक से ब्रेक की तरफ चले गए ।

"नहीं ये वो नहीं हो सकता ? वो तो यहां से बहुत दूर था । लेकिन शक़्ल उसी की लग रही है । वही बड़ी बड़ी आंखें हैं । हां ये वही है ये वही है, वैसे ही थोड़ा सा लंगड़ा कर चल रहा है । वही बाबा जिसने मुझे चाय पीने बुलाया था । जो खुद को उसके घर केयर टेकर बता रहा था । मगर ये यहां क्या कर रहा है ? कहीं मेरे साथ कोई खेल तो नहीं खेला जा रहा । कहीं इसी ने उस लड़की के साथ कुछ कर तो नहीं दिया । मगर इसने तो कहा था ऐसी कोई लड़की ही नहीं ।" ऐसे तमाम सवाल मेरे ज़हन में चल रहे थे और इन सबका जवाब सिर्फ़ उसी बूढ़े के पास था ।

क्रमशः

धीरज झा

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