क्या बेरोजगारी को लेकर विरोध का ये तरीका सही है ?

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Pic Credit : Outlookindia

विरोध अच्छा लगता है, अलोचना अच्छी लगती है । जब तक कमियों पर बोला नहीं जाएगा तब तक कमियां दुरुस्त कैसे होंगी । लिस्ट में बहुत से ऐसे पढ़े लिखे लोग हैं जिनका विरोध करने का तरीका इतना शानदार है कि भक्त लोग वहां कुछ बोल ही नहीं पाते । कई परम भक्त तो सरकार विरोधी पोस्ट को लाइक तक कर आते हैं । लाइक का मतलब कहीं ना कहीं बात जचती है उन्हें भी । 


लेकिन दूसरी तरफ कुछ ऐसे विरोधी हैं जिन्होंने ठीक वैसा ही गंद मचा रखा है सोशल मीडिया पर जैसा आंखों पर पट्टी बांधे हुए भक्त मचाते हैं । भक्त होने का मतलब ये नहीं कि आप हर बात का समर्थन करते फिरें और विरोधी होने का मतलब ये नहीं कि आप हर रोज़ अनर्गल प्रलाप ही मचाते रहें ।


समर्थकों के मुकाबले विरोधियों में ज़्यादा हिम्मत होती है वो सत्ता के खिलाफ आवाज़ बुलंद करते हैं लेकिन जब यही आवाज़ आपके देश को नीचा दिखाने लगती है तो आप सरकार नहीं देश विरोधी हो जाते हैं ।


हर स्वतंत्रता दिवस पर आपको ए मेरे प्यारे वतन याद आता है और उसके ठीक अगले दिन से आप देश को गरीब बता के खुद ही इसका मज़ाक उड़ाने लगते हैं । आप विरोध की बात करते हैं । कैसा विरोध कर रहे हैं आप ? सोशल मीडिया पर हैश टैग का विरोध ? यूट्यूब पर व्यू बढ़ाने के लिए विरोध होता है, फेसबुक पर लाइक बढ़ाने के लिए और ट्वीटर पर हैशटैग ट्रेंड कराने के लिए । इसके अलावा विरोध है कहां ? 


आज साढ़े तीन सौ की सब्जी खरीदी है जिसमें 250 के 5 किलो आलू ही हैं, ये केवल सब्जी का रेट है अभी तेल मसाला चीनी लटरम पटरम बाक़ी ही है । और ये दाम आज एकदम से नहीं बढ़े बल्कि 2005 के बाद लगातार बढ़ते आ रहे हैं । उससे पहले भी बढ़ते थे मगर इतनी तेजी से नहीं । तब से अब तक कब आप इसके लिए सड़कों पर उतरे ? आपने कब सरकार से सवाल किए ? 


बात चलती है तो कई लोग कहते हैं "यार फिल्म के हीरो हीरोइन बड़े मेहनती होते हैं झट से अपना वजन बढ़ा लेते हैं झट से घटा लेते हैं ।" अबे यार वो उनका काम है । ऐसा नहीं करेंगे तो भूखे मर जाएंगे । बढ़े हुए पेट वाले हीरो या हीरोइन की फिल्म देखने कौन जायेगा ? उनकी मजबूरी कहो या काम मगर इसके बिना रोटी नसीब नहीं होनी उन्हें । इसी तरह कांग्रेस के लिए भाजपा धरने पर बैठी या भाजपा के सेंटर में होने पर सपा बसपा या अन्य पार्टियां बैठीं धरने पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । क्योंकि ये इनका काम है । जब तक विरोध नहीं करेंगे तब तक सुर्खियों में कैसे आएंगे । आज भाजपा विपक्ष में होती तो इन्हीं हालातों पर हंगामा खड़ी कर चुकी होती ।


असली बात तो तब बने जब लोग अपनी बात लेकर सामने आएं। आपका विरोध सुनियोजित है, आप बस ट्रेंड में आए मुद्दे को हवा देने का काम कर रहे हैं । इसके सब आदी हो चुके हैं । 


आज आपको बेरोजगारी दिख रही है लेकिन आपको आरक्षण की मांग तब बेबुनियाद लगी जब हर बार 10, 5 नंबर से परीक्षा ना पास कर पाने वालों की जगह उनसे कम नंबर लाने वालों को नौकरियां मिल गईं । उनके रोजगार की बात आपने करना कभी सही नहीं समझा । 


आपने कभी सरकार से नहीं कहा कि सरकार आप जाति के अधार पर आरक्षण दे कर भेदभाव फैला रहे हैं इसकी जगह आपको सरकारी स्कूलों से आरक्षण की शुरुआत करनी चाहिए । क्योंकि समूचा ज़रूरतमंद भारत यहीं से निकलता है । आप नौकरियों में उन्हें आरक्षण दीजिए जो सरकारी स्कूलों से पढ़े हैं । इससे दो फायदे होंगे, सरकारी स्कूलों में बच्चे बढ़ेंगे और इन स्कूलों की हालत सुधरेगी । इसके साथ ही नौकरियों में पहली प्राथमिकता उनकी होगी जो इसके असली हकदार हैं फिर भले ही वो किसी भी वर्ग से आता हो । 


बताइए क्या आपने कभी कहा ऐसा ? नहीं कहा आपने । 


क्या आपने सरकार के सामने ये बात रखी कि कई होनहार बच्चे हालात के कारण दसवीं या इंटर से ज़्यादा नहीं पढ़ पाते लेकिन उन में काबिलियत होती है । आप जैसे ग्रेजुएशन के बाद नौकरियों के लिए टेस्ट लेते हैं वैसे ही दसवीं और इंटर लेवल पर भी परीक्षाएं शुरू कर के इनकी योग्यता अनुसार नौकरियां दीजिए । 


आपने कभी सही समय पर सही बात नहीं रखी । आपको बस हल्ला मचा कर दिन खराब करना आता है । चुनाव आते ही आप चुनावी सरगर्मियों का हिस्सा बन जाते हैं । फलां को वोट दो फलां का समर्थन करो । ऐसे वक्त पर आपका विरोध आपकी मांगें कहां चली जाती हैं ? 

असल में हमें या अपको कुछ बदलना ही नहीं है हमें बस ट्रेंड फॉलो करना है । कल को अगर सरकार बदलती है तो समस्याएं यही रहेंगी बस सार्थक और विरोधी अपने अपने काम की अदला बदली कर लेंगे । और जिनका काम ही विरोध करना है वो तब भी ऐसे ही रहेंगे क्योंकि उनका घर इसी विरोध से चलता है । 

अंत में अगर बात करें बेरोजगारी की तो ये सच है कि दिक्कतें हैं लेकिन इन दिक्कतों की एक बड़ी वजह हमारी सोच भी है । मेरा एक मित्र है । सालों पहले किसी प्राइवेट कम्पनी में उसकी नौकरी लगी थी । काम अच्छा था, सैलरी भी अच्छी थी लेकिन उसके पिता ने ये नौकरी करने से मना कर दिया । उन्हें दिक्कत ये थी कि एक तो जॉब किसी दूसरे शहर में थी और वो अपने इकलौते बेटे को इतनी दूर भेजना नहीं चाहते थे । दूसरी समस्या ये थी कि उन्हें अपने बेटे को सरकारी नौकरी करते देखना था । बस फिर क्या छूट गई नौकरी और इसके बाद काफ़ी समय तक उसे बेरोजगार रहना पड़ा ।

आज मेरा वही पढ़ा लिखा दोस्त अपने शहर में 10 हज़ार की नौकरी कर के किसी तरह घर चला रहा है । ऐसे बहुत से लोग हैं जो सरकारी नौकरी के लिए हाथ आई अच्छी खासी नौकरी छोड़ देते हैं । अब आप बताइए कि इसमें किसकी गलती है ? रोज़गार चाहिए तो पहले सोच को बदलना होगा ।

इस समय किसी भी समस्या से बड़ी समस्या है आज का ये माहौल जहां किसी के पास करने को कुछ भी नहीं सिवाय सोशल मीडियाई समर्थन और विरोध के ।

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क्या बेरोजगारी को लेकर विरोध का ये तरीका सही है ?
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