टूटने से अब डर नहीं लगता (डायरी का पन्ना)

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हर बार एक लंबी लड़ाई (जो मुश्किल से एक दो दिन चलती है) के बाद वो अक्सर मुझसे पूछा करती है कि क्या मुझे डर नहीं लगता कि मैं उसे खो दूंगा ? आज भी उसने बताया कि वो हैरान हो जाती है ये सोच कर कि उसके लिए इतना बेचैन रहने वाला शख्स आखिर इस तरह से कैसे एकदम शांत हो जाता है उसके दूर होने पर जैसे उसका उससे कोई नाता ही ना हो ? जैसे उसका होना ना होना कोई मायने ही ना रखता हो । वो कहती है मैं पहले ऐसे नहीं था । वो जानना चाहती है कि क्यों अब मुझे बेचैनी नहीं होती ।

इस पर मैं मुस्कुराया । उस मुस्कुराहट में एक दर्द था जिसे छुपाने की मैंने पूरी कोशिश करता रहा और कहा कि "मेरे अंदर से कुछ खोने का डर अब मर चुका है ।"

उसने मुझे घूरा लेकिन मैं अपनी बात कहता रहा । उसे बताया कि "कहानीकार होने का अपना एक अलग ही फायदा है । जब आप खूब सारी कहानियां लिख चुके होते हैं तो आपको टूटने का डर नहीं रहता ।"

वो हंसी नहीं लेकिन उसकी बात पर मुझे हंसी आ गई । उसने गुस्से से लाल हुए मुंह के अंदर से कुछ शब्दों को मिर्च मसाला लगा कर भूना और मेरी तरफ दे मारे "अच्छा तो कहानियां आपके आसपास अंबुजा सीमेंट की दीवार बना देती हैं ? जिससे आप कभी टूटते ही नहीं । वाह क्या बात है ।"

मैं हँसा लेकिन उसकी गुस्से से लाल सूरत देख कर मैं शांत हो गया । मैंने शांति से समझाते हुए उसे फिर कहा "टूटते हैं मगर टूटने से आपको डर नहीं लगता । जानती हो किसी चीज़ के डर का मर जाना ही आपको मजबूत बनाता है । कहते हैं उससे सबसे ज़्यादा डरो जिसके पास डर नहीं होता । अभी बहुत से डर हैं मुझमें लेकिन खो जाने का डर नहीं रहा । कहानियों ने मुझे हर तरह का अंत दिखा दिया है । मैं बुरे से बुरा अंत पहले ही सोच चुका हूं, कहानियों में उन्हें जी चुका हूं । खासकर उस अंत को जो मेरी नियति मेरे हर किस्से में पहले से तय कर के रखती है । जो पता है उसके लिए तैयार रखता हूं खुद को ।"

"तुम कहानियां लिखना बंद कर दो ।" इतना कह कर उसने वीडियो कॉल काट दी । मैंने दोबारा नहीं किया क्योंकि मेरे पास कहने को और कुछ था नहीं । वो थोड़ा वक्त लेगी फिर समझ जाएगी कि मैंने जो कहा वो मन से नहीं कहा ।

कहानियां तो बस बहाना हैं । असल सबक तो मुझे इस ज़िंदगी ने सिखाया है और ऐसे सिखाया है कि अब मैं कुछ खोने और उसके बाद टूटने से नहीं डरता । मैंने टूटने और फिर खुद को जोड़ने को ही अपनी नियति मान लिया है ।

कुछ साल पहले तक ऐसा नहीं था । पा से लड़ा भी, जो नहीं कहना चाहिए वो कहा भी, जो नहीं सुनना चाहता था वो उनसे सुना भी लेकिन फिर भी मुझे वो दुनिया में सबसे प्यारे रहे । मां माफ करे लेकिन सच यही है कि मां से मिसिया भर ज़्यादा पा को चाहा है मैंने । इसके बावजूद कि मां के हमेशा करीब रहा, मां हर बार मुसीबतों में ढाल बनी लेकिन फिर भी पा को ही थोड़ा ज़्यादा प्यार किया ।

जब वो जा रहे थे तो लोगों की भीड़ थी उनके आसपास और मैं अभागा किसी फिल्मी सीन की तरह शिवालय में बैठा महादेव के आगे रो रहा था, प्रार्थना कर रहा था जैसे कि फिल्मों की तरह वो कोई फूल गिराएंगे और पा की रुकी हुई सांसें फिर चल पड़ेंगी । ना महादेव माने और ना पा । छोड़ कर चले गए ।

वो जो उस दिन मुझसे छूटा ना, वो अंदर से पाने की चाह को साथ ले गया । उसके बाद मोह ही मर गया कुछ सहेजने का । अब जब भी कुछ छूटने को होता है और मन घबराने लगता है तो अंदर से एक ही आवाज़ आती है कि जो सबसे प्यारा था वही चला गया और मैं उसके बाद भी हंस कर जी रहा हूं तो भला और क्या है जो मेरी ज़िंदगी को रोक सकता है !

उससे बहुत प्यार है मुझे, बहुत बहुत । परिवार के बाद सबसे ज़्यादा मगर मैं जानता हूं वो छीन ली जाएगी मुझे । वक्त पास आ रहा है उसके दूर जाने का और मैं खुद को मजबूत कर रहा हूं । उसे ये कह नहीं सकता मगर सच यही है कि मुझे अब डर नहीं लगता टूटने से । मैं इस बिछड़ने के दर्द का आदी हो चुका हूं । मुझे फिक्र है तो सिर्फ़ उसकी और उसकी उड़ान को लेकर देखे गए मेरे सपनों की । मगर कोई बात नहीं आसमां और भी हैं, मेरी दुआ है उसकी उड़ान बुलंद रहे ।

ज़िंदगी, मैं तैयार हूं तेरे अगले इम्तहान के लिए 😊

************

उसने ये आखिरी लाइन लिखी ही थी कि इसके साथ ही उसकी कलम रुक गई । फोन जो आ गया था उसका । उसने फोन को देखा फिर कुछ देर सोचा और फिर अपनी डायरी का ये पन्ना फाड़ दिया । उसे टूटने का डर भले ना रहे मगर किसी के रूठने का डर ज़रूर था ❤

धीरज झा

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