दो शामों का सफर (कहानी)

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उस दिन संगम आई थी ये सोच कर कि अपनी सारी मजबूरी कह देगी । संयम के साथ खूब रोएगी लेकिन अगर वो अपने सिद्धांत तोड़ कर उसे अपने साथ चलने को कहेगा तो वो झट से मान जाएगी । वो संयम के लिए तोड़ देगी सारे संबंध उन अपनों से जिन्होंने ज़िंदगी से साथ छुड़ा कर पल पल मरने के लिए किसी और के हाथ में उसका हाथ थमाने से पहले एक बार भी नहीं सोचा । अपने सुपर हीरो पापा से भी बढ़ कर उसने विश्वास दिखाना चाहा था संयम में, जिसे मिले अभी 6 साल ही तो हुए थे । ये सब सोचा था संगम ने लेकिन ऐसा कुछ ना कर पायी ।

खुद को ये सब कहने से तब रोक लिया जब बिना इसकी बात सुने संयम ने ये कह दिया कि "बस इतना ही प्यार था ? बस यही है तुम्हारे अंदर की मजबूती ? तुमने रिश्ते के लिए हां कहने से पहले एक बार भी मेरे बारे में नहीं सोचा । सच सच बताओ तुम्हारे लिए ये सब सिर्फ समय बिताने का एक जरिया था ना ? ये प्यार मोहब्बत, मैं, ये सब बस टाइम पास के लिए ही ना ?"

आखिरी शब्दों ने संगम का भरम तोड़ दिया था । तीर से ज़्यादा नुकीले थे ये शब्द । उसने अपनी सारी सोची बातों को दिल के कोने में एक कब्र खोद कर उसमें दफना दिया और होंठों पर दर्द भरी मुस्कुराहट के साथ आंखों में आंसू लिए लौट आई । वो पीछे से रोता रहा मगर इसने पीछे मुड़ कर नहीं देखा ।

संगम बस सोचे जा रही थी कि कितनी गलत थी मैं जिसने ऐसे इंसान को चुन लिया जिसे मुझ पर रत्ती भर यकीन नहीं है । जिसने मेरे प्यार, मेरे बलिदान सबको टाइम पास कह दिया । बस वो यही सोचते हुए आगे बढ़ती रही, सालों साल तक अपने सुपर पापा द्वारा थमाए हुए हाथ को बेमन से थामे ।

दिन महीनें साल और फिर सालों सब बीत गया किसी फिल्म की तरह । रो रो कर आंखों पर चश्मा लग चुका था । चेहरा और देह तो उसी दिन मुरझा गये थे जिस दिन उसने आंखों से मोहब्बत की खाद बहा कर मन में जुदाई का कीटनाशक भरा था । धीरे धीरे बहुत कुछ सामने आया था जिसने इसे अहसास दिलाया कि जल्दबाजी हो गयी । उधर संयम भी बदल चुका था । कहीं से पता लगा कि वो इसी शहर में आया है।  पहले भी आया करता था और इसे खबर भी होती थी मगर कभी हिम्मत नहीं जुटा पाई। कभी गुस्से ने कदम रोक दिए तो कभी शर्मिंदगी ने ।

लेकिन अब समय नहीं था और ना हिम्मत थी ये सब अंदर ही अंदर दबा कर रखने की । डर तो था इस बात का कि उसके साथ कोई होगी जिसका वो अब हो गया होगा । वो क्या सोचेगी, ये उसे क्या जवाब देगा ? लेकिन मन के अंदर का उबाल इन सब बातों से ज़्यादा था । बस पहुंच गयी उसके दरवाज़े पर ।

दरवाज़ा खटखटाया, अंदर से वही बाइस साल पहले वाला लड़का निकला जो अब बूढ़ापे में लगभग पैर रख चुका था । इसे देखते ही संयम ने चश्मा उतार कर खुद से ही कहा "आज ही चश्मा बनवाया है, कहीं ज़्यादा पावर का तो नहीं दे दिया क्योंकि मुझे अपने पुराने सुहाने दिन दिख रहे हैं।" सारी बातें भूल गयी संगम और खिलखिला कर हंस दी । पूरे बाइस साल बाद । उसका स्वागत करने का अंदाज और तंज दोनों नहीं बदले थे ।

"मुझे देख कर चौंके नहीं ?"

"चौंका तो मौत को देखकर जाता है, आप तो ज़िंदगी हैं। आपको देख कर नस नस में खुशी दौड़ी है, धड़कन उसी की वजह से बढ़ गयी । वैसे भी नज़र रखने का कोर्स आपने अकेले थोड़े किया है, हम भी थोड़ा बहुत सीख गये हैं, 22 साल से आप पर नज़र रखते रखते । अरे अंदर तो आइए ।" संगम दरवाज़े पर खड़ी मुस्कुरा रही थी । संयम के कहने पर वो अंदर आ गयी ।

"साथ नहीं लाए क्या उन्हें ?" हल्की फुल्की मेहमान नवाजी के बाद संगम ने पूछा

संयम ने आगे से सवाल कर दिया "किन्हें ?"

"वही जो हमारे बाद तुम्हारी ज़िंदगी बनीं ।"

"अजी ज़िंदगी है कि केबीसी का फ्लिप दी क्वश्चन, जो एक को बदल के दूसरी ले आते। सुना नहीं कभी क्या 'ज़िंदगी एक ही बार मिलती है ।' हमारी तो बहुत पहले छिन गयी ।"

"शायराना होना बंद करो और बताओ कि अकेले आए हो ?"

"अकेले हैं तो अकेले ही आएंगे। वैसे भी हमारे यहां किराए के लोग साथ लेकर चलने का चलन नहीं है ।"

"मज़ाक बंद करो, गुस्सा आ रहा है ।"

"कैसा गुस्सा ? वैसा ही जैसा उस दिन आया था जब छोड़ कर चली आयी थी हमें ?" वो मुस्कुराता हुआ चेहरा अचानक से संजीदा हो गया ।

"तो मेरी असलीयत पहचान तो गये थे । फिर भला भला कितना टाइम पास करती तुम्हारे साथ ।"

"अच्छा लगा सुन कर कि हमारा इतना कहा मानती थी तुम लेकिन इससे पहले बहुत बार ये भी कहा था मैंने कि तुम्हारे बिना किसी को अपना नहीं सकता । तुम्हारे बिना ज़िंदगी बेरंग है । ऐसा बहुत कुछ कहा था । उन पर यकीन नहीं किया कभी तुमने ?"

कुछ देर खामोश रही वो फिर बोली "ये सब बीत चुका है । आज की ज़िंदगी के बारे में बताओ । बीवी बच्चे घर परिवार सब कुछ बताओ ।"

"तुम्हारा समय बीत गया होगा, मैं तो अभी भी वहीं हूं । जो बात हंस कर बोली जाए ज़रूरी नहीं वो मज़ाक ही हो । नहीं लाया तुम्हारे बाद किसी को ज़िंदगी में ।"

"तुम्हारे ही दोस्त ने कहा था कि तुम शादी कर रहे हो ।"

"ध्यान से सोचो वो मेरा दोस्त था, वही करता जो उसे मैंने कहा ।"

"मगर क्यों ?"

"मैं मर रहा था तिल तिल । चाहता नहीं था तुम भी मरो ऐसे ही । जानता हूं भूली नहीं तुम लेकिन वो सुनने के बाद ज़िंदगी कुछ हल्की लगी होगी।"

"मगर क्यों ? जब मैं नहीं रुकी तो तुम क्यों ?"

"क्योंकि हम हम हैं ।" संयम मुस्कुराया, संगम थोड़ा और नज़दीक आई । उसका चेहरा अपने उन हाथों में लिया और उस माथे को निहारने लगी जिन पर वो कभी उसके और अपने मिलन की रेखा खोजा करती थी ।

"बताओ ऐसा क्यों किया ।"

"एक मां थीं जिनकी ज़िद्द थी कि मैं ऐसे अकेला ना रहूं। उन्हें तकलीफ होती थी मुझे ऐसे देख कर । मैं उनकी बातों पर सोचता उससे पहले वो भी चली गयीं मुझे छोड़ कर ।  मैं अकेला हो गया । एकदम अकेला और इसी अकेलेपन ने ये हिम्मत दे दी कि मैं आगे भी अकेला रह सकता हूं । बस तब से अकेला हूं ।" ये शाम संगम के लिए उस शाम से भी ज़्यादा भारी थी जब वो संयम को पीछे छोड़ कर आगे चल बढ़ी थी ।

उसे अचानक से अपने कंधों का बोझ दुगना लगने लगा था । काश कि उस दिन रुक जाती कुछ देर और, काश कि उस दिन ज़ोर से थप्पड़ मारती संयम के चेहरे पर और ये कहती कि "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमारे प्यार को टाइम पास कहने की" और इसके बाद जब वो टूटने लगता तो उसे अपनी बाहों में समेट लेती । उसे उस दिन अपना हक़ जताना चाहिए था जो लड़के ने उसे दिया था । आज उस हक़ को ना जान पाने और उसे ना समझ पाने की वजह से दो ज़िंदगियां सिसक रही थीं ।

ये शाम इस कहानी की आखरी शाम थी । इसके बाद ये दोनों कभी नहीं मिले । वो बूढ़ा लड़का नहीं चाहता था कि ये लड़की वक्त से पहले सोच सोच कर बूढ़ी हो जाए।  कहानियों का सुखांत होता है या दुखांत मगर ये कहानी हमेशा कहानी ही रही, बिना अंत के । तब तक जब तक दोनों की ज़िंदगियों ने उन्हें मुक्त नहीं किया ।

चित्र - गूगल से साभार

#फिर_दोबारा_से

धीरज झा

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