नुसरत साहब की आवाज़ पाकिस्तान से आने वाली वो सदा है जो आज भी हिंदुस्तान की फिज़ाओं में गूंजती है और यहां की आत्मा में घुली हुई है...

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किसी अन्य पाकिस्तानी को भारत से इतनी मोहब्बत शायद ही मिली हो जितनी नुसरत साहब पा गये


संगीत हवा की तरह सरहदों के बंधन से आज़ाद है । यही कारण है कि जो इस संगीत के साधक हैं उन्हें दुश्मन खेमें से भी स्नेह मिलता रहता है । पाकिस्तान के साथ भले ही हमारे संबंध उतने मधुर ना रहे हों मगर वहां के फनकारों को भारत ने हमेशा सर आंखों पर बिठाया । इन्हीं में से एक हैं नुसरत फतेह अली खान साहब । कहते हैं सूफी संगीत अगर कोई मज़हब होता तो निसंदेह जनाब नुसरत फतेह अली खां साहब को उस मजहब का खुदा मान लिया जात । मोहब्बत की हवा ने जिन जवान दरख्तों की जड़ों को छुआ वे सभी नुसरत साहब की गज़लों के दीवाने रहे, जिन्होंने खुदा की इबादत की उनके लिए नुसरत साहब की कव्वालियां भजन के समान पवित्र रहीं । 


नुसरत साहब को सदाबहार गायक का खिताब हासिल है। उनकी आवाज़ को हर दौर के युवाओं ने दिल में जगह दी। गायकों के लिए उनका नाम अल्लाह के नाम जितना पाक रहा । तभी तो उनका नाम लेते हुए गायक आज भी कानों को छू कर उनके प्रति अपने सम्मान को दर्शाते हैं। भले नुसरत साहब पाकिस्तान की सरज़मीं पर जन्में और पले बढ़े लेकिन उनकी आवाज़ ने उन्हें भारत में उतना ही सम्मान दिलवाया जितना यहां के फनकारों को हासिल है। दूसरी तरफ नुसरत साहब ने भी भारत को हमेशा उतना ही चाहा जितना उन्होंने अपने मुल्क को चाहा । वैसे भी फनकारों का मज़हब तो उनका फन ही होता है । अपने कद्रदानों को वे कभी देश और मज़हब के हिसाब से नहीं बांटते । 


नुसरत फतेह अली खान का परिवार बंटवारे से पहले पंजाब के जालंधर में रहता था । 13 अक्टूबर 1948 को पाकिस्तान के फैसलाबाद में पैदा हुए नुसरत फतेह अली खान का संबंध ऐसे परिवार से था जिसका सगीत से 600 साल पुराना नाता था । बचपन से ही कानों में घुल कर ये संगीत नुसरत साहब की नसों में दौड़ रहा था।  हां लेकिन ये बात भी सच है कि संगीत भले उन्हों विरासत में मिला मगर प्रसिद्धि नुसरत साहब ने खुद कमाई । नुसरत साहब के वालिद फतेह अली खान को संगीत में अच्छा भविष्य नहीं दिखता था इसीलिए उन्होंने अपने 5 बच्चों में इकलौते बेटे नुसरत को डॉक्टर या इंजीनियर बनाने का सपना देखा । मगर नियति के सामने किसी के सपनों का कोई मोल नहीं । वही होता है जो नियति ने तय किया हो।  


नुसरत साहब की नियति में सूफी संगीत का उस्ताद बनना लिखा था फिर वह भला किसाी और रास्ते कैसे चल सकते थे । उनकी संगीत की चाहत के आगे परिवार को भी झुकना पड़ा और फिर घरवालों ने उनके आगे बढ़ने में उनकी बहुत मदद की । नुसरत साहब 16 साल के थे जब उन्होंने अपना पहला स्टेज परफॉर्मेंस दिया था । इसके बाद तो उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा ही नहीं। उनकी प्रसिद्धि में सिर्फ और सिर्फ उनकी मेहनत का हाथ रहा और इसी मेहनत ने पूरी दुनिया के सूफी संगीत प्रेमियों को उनकी आवाज़ का दिवाना बना दिया । नुसरत साहब की सबसे खास बात ये थी कि वह अपनी कव्वाली तथा गज़लों को इस तरह से पेश करते थे कि वह खुदा और महबूद दोनों को समर्पित हो जाती थी । आज भी धार्मिक लोग जहां खुदा की इबादत समझ कर इन कव्वालियों पर झूमते हैं वहीं आशिक इसे महबूब के लिए गुनगुनाते हैं।  


नुसरत साहब को दो बार ग्रैमी अवार्ड के लिए नॉमिनेट किया गया, पाकिस्तान के राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित किया गया । इसके साथ दुनिया भर में उनके संगीत की धाक रही लेकिन ये सब नुसरत साहब के लिए आसान नहीं था। संगीत को पाने के लिए सबसे पहली जंग तो उन्हें अपने पिता से ही लड़नी पड़ी । पिता समझते थे कि पाकिस्तान में संगीत को इतना सम्मान नहीं मिलता। दूसरी तरफ नुसरत शरीर से काफी भारी भरकम थे जिस कारण फतेह अली खान को लगता था कि उनसे संगीत की कठिन साधना नहीं हो पाएगी। लेकिन नुसरत भी ज़िदी थे । उन्होंने भी ठान लिया था कि संगीत को ही वह अपनी ज़िंदगी बनाएंगी। एक दिन नुसरत हार्मोनियम बजा रहे थे।  उन्हें पता नहीं था कि फतेह अली खान उनके पीछे खड़े हैं। वह अपनी धुन में बजाते रहे । जब उन्हें पता चला कि उनके पिता उनके पीछे खड़े हैं तो वह ये सोच कर डर गये कि आज तो उनकी खैर नहीं, मगर पिता गुस्सा होने की बजाय उनसे बहुत प्रभावित हुए और ये कहते हुए संगीत सीखने की इजाज़त दे दी कि इसका असर पढ़ाई पर ना पड़े । 


इसके अलावा नुसरत साहब को गांव गांव जा कर अपनी गायकी का हुनर पेश करना पड़ा । सबसे कठिन तो था नुसरत साहब का रियाज़ । वह बंद कमरे में 10 घंटे रोजाना रियाज़ किया करते थे । संगीत उनके लिए साधना बन गयी थी । लेकिन इसका फल भी उतना ही मीठा मिला। देखते देखते नुसरत साहब की ख्याति पूरे विश्व में फैलने लगी । इस भारी भरकम शरीर वाले शख्स की आवाज़ में वो जादू था जो विदेश की धरती पर लाख लोगों की भीड़ को घंटों उनकी जगह पर बैठा रहने को मजबूर कर देती थी । 


नुसरत साहब भले पाकिस्तान से थे लेकिन हिंदुस्तान ने उन्हें अपना समझ कर प्यार दिया । स्टेज परफॉर्मेंस के अलावा उन्होंने बेंडिट क्वीन, धड़कन, कारतूस, और प्यार हो गया, कच्चे धागे जैसी हिंदी फिल्मों में गीत गाये और लोगों के दिलों पर एक अलग ही छाप छोड़ी । कव्वालियों में शास्त्रीय संगीत का प्रयोग नुसरत साहब का ही किया हुआ है। नुसरत साहब ने सूफी संगीत को पूरी दुनिया में पहचान दिलायी । उनकी कव्वालियों की लोकप्रियता इतनी रही कि आज की नयी फिल्मों में उनके ही गीतों का रीमेक सुन लोग झूम उठते हैं । 'मेरे रश्के कमर' और 'क्या से क्या हो गये देखते देखते' जैसे गीत नुसरत साहब की गायी कव्वालियां ही हैं जिन्हें अब उनके भतीजे राहत फतेह अली खान ने आवाज़ दे कर लोगों की ज़ुबान पर चढ़ा दिया । 


नुसरत साहब का भारत में स्थित ख्वाजा अजमेर शरीफ दरगाह से विशेष लगाव था । वह यहां अक्सर अपनी गायकी पेश करने आया करते थे । पिता के गुज़र जाने के बाद एक रात उन्होंने एक सपना देखा जिसमें वह और उनके पिता किसी दरगाह पर एक साथ कव्वाली गा रहे थे। इसकी चर्चा जब उन्होंने अपने एक परिचित से की तो उन्होंने बताया कि ये ख्वाजा अजमेर शरीफ की दरगाह है। इसके बाद नुसरत साहब यहां आए तथा फिर ये सिलसिला चलता रहा । इसके अलावा हिंदी सिनेमा में शो मैन के नाम से मशहूर राज कपूर ने अपने पुत्र ऋषि कपूर की शादी में इन्हें बुलाया था । सिनेमा जगत की नामचीन हस्तियों के बीच जब नुसरत साहब ने अपनी कव्वालियां उठानी शुरू कीं तो किसी को पता ही नहीं चला कि रात के 10 बजे से सुबह के 7 कब बज गये । खुद महानायक अमिताभ बच्चन नुसरत साहब के मुरीद रहे हैं।  


वहीं नुसरत साहब के दिल में भी भारत के गायकों के लिए स्नेह और सम्मान बना रहा। बताया जाता है कि जब नुसरत साहब से फिल्म कच्चे धागे में गाना कंपोज़ करने को कहा गया तो उन्होंने शर्त रखी कि उनके कंपोज़ किये गीत में कम से कम एक गाना लता मंगेशकर से गवाया जाए । उनकी इच्छा का सम्मान किया गया और नुसरत साहब के संगीत के बीच लता मंगेशकर ने ऊपर खुदा आसमां नीचे गीत को अपनी आवाज़ दी । 16 अगस्त 1997 को कव्वाली के राजाओं के राजा नुसरत साहब इस दुनिया को अलविदा कह गये । नुसरत साहब को गुज़रे 23 साल हो गये लेकिन आज भी उनकी लोकप्रियता बनी हुई है ।


धीरज झा 

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नुसरत साहब की आवाज़ पाकिस्तान से आने वाली वो सदा है जो आज भी हिंदुस्तान की फिज़ाओं में गूंजती है और यहां की आत्मा में घुली हुई है...
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