पापा की शर्ट (कहानी)

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"पापा के पास कोई और शर्ट पैंट नहीं है क्या ? जब से देख रहा हूं यही तीन चार जोड़ी कपड़े लटकाए रहते हैं ।"  कोचिंग से आ कर पानी भी नहीं पिया सीधा मां को शिकायत सुनाने लगा । 


"क्या हुआ आज फिर किसी ने पापा पर कमेंट कर दिया क्या ?" छत से लाए कपड़ों को तह लगाते हुए मां ने कहा । 


"और नहीं तो क्या । पापा का नाम ही चेक शर्ट वाले अंकल रख दिया है सबने । और ना जाने क्या क्या कहते रहते हैं ।" वो एकदम से रुआंसा हो गया । मानों अभी रो देगा । 


"किसी के बोलने से क्या होता है । बच्चे तो ऐसे ही लड़ते हैं । तू खुद हरीश के पापा को किस नाम से बुलाता है याद है तुझे ।" वो समझ गया कि मां पापा की ही साइड लेंगी इसीलिए चुपचाप अपने कमरे में चला गया । 


पापा तक हर बात पहुंच जाती थी । उनका जानना ज़रूरी भी था कि उनका बेटा उनके बारे में क्या सोचता है । वो हर बात सुनते और बस मुस्कुरा कर रह जाते । इंसान अगर समझदार है तो वो कभी भी छोटी छोटी बातों पर प्रतिक्रिया नहीं देता । सारे दिन का थका हुआ होता है, चाहता है कि अब घर में कुछ ऐसा ना हो जो थकान इतनी बढ़ जाए कि फिर उतरे ही ना । ऐसा भी नहीं कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता । पड़ता है मगर वो बताते नहीं । इसी फर्क के कारण उन्हें ऐसा कुछ सुनने पर घंटे भर बाद नींद आती है । एक करवट लेटे वो सोचते रहते हैं कि आखिर बच्चों के लिए क्या ऐसा करें कि वे उनसे खुश रह सकें, उन पर गर्व कर सकें । 


हर तीसरे दिन मां के पास पापा की कोई ना कोई शिकायत पहुंच जाया करती थी । पापा ऐसा क्यों करते हैं, पापा के पास पुराना स्कूटर क्यों है, नई गाड़ी या बाइक क्यों नहीं ? पापा ने ये नहीं दिलाया, पापा कहीं अच्छी जगह घुमाने क्यों नहीं ले गए कभी, पापा बाक़ी दोस्तों के पापा लोग की तरह अमीर क्यों नहीं ? 


ऐसी ही शिकायतों के साथ हर साल की तरह ये साल भी बीत गया । बेटे का इस साल इंटर था । रिजल्ट आया तो मर मर कर पास हुआ था । मैट्रिक में जिस लड़के के 82% थे, इंटर में वो 53% पर पहुंच गया । शाम को पापा आए तो घर में मैय्यत का सन्नाटा पसरा था । बेटे साहब अपने कमरे में दुबके पड़े थे । 


"कहां है ?" बैग टेबल पर रखते ही पापा ने पहला सवाल यही किया । शायद ऑफिस में ही रिजल्ट देख लिया था । 


"जाने दीजिए ना, पहले ही बहुत डरा हुआ है ।" मां पापा के मूड को भांप गई थी इसलिए चाह रही थी कि फिलहाल बेटा इनके सामने ना ही आए तो अच्छा है । 


"उसे बुलाओ जल्दी और ये अपनी ममता ना साल भर के लिए बचा कर रखो । साल भर हम हर गलती माफ करते हैं । कभी बोलने नहीं जाते मगर आज तुम्हारी ये ममता एक पिता के गुस्से को रोक नहीं सकती । यहां बुलाओ उसे, अगर हम कमरे में चले गए तो आज लात बांह छिटका देंगे ।" मां समझ गई कि पिता का गुस्सा तूफान बन चुका है और उस तूफान को ये ममता का छाता रोक ना पाएगा । किसी भी घर में ऐसा समय माओं को दुविधा में डाल देता है । 


मां उसे कमरे से समझा बुझा कर लाई । जो अक्सर पिता के बारे में नुक्स निकालता रहता था आज एकदम सहमा हुआ सा खड़ा था । पापा ने उसे एक बार ऊपर से नीचे तक देखा । 


"तो फिर बताओ कि इतने कम नंबर किस वजह से आए तुम्हारे ? क्या इसका कारण ये है कि हमारे पास सिर्फ़ चार जोड़ी कपड़े ही हैं जो हमने सालों पहले सिलवाए थे ? या फिर हमारी पुरानी स्कूटर के कारण तुम नंबर ना ला पाए ? या फिर हम अमीर नहीं हैं तुम्हारे दोस्त के पापा लोग की तरह इस वजह से तुम्हारे नंबर काट लिए गए ?" पापा के इन तानों को सुन कर बेटे ने एक बार मां की तरफ देखा और फिर से सिर झुका लिया । 


"मन में कोई वहम हो तो चलो तुमको कल ही गांव ले चलते हैं अपने और वहां मिलवाते हैं अपने पुराने साथियों से । वे सब तुम्हें बताएंगे कि हम क्या चीज़ थे । महीने का कलेंडर बाद में बदलता था मगर हम अपने जूते और कपड़े पहले बदल लेते थे । पूरे जिले भर में इकलौती राजदूत बाइक थी हमारे पास । उसकी आवाज़ से ही कोई कह देता था कि भूरे भईया होंगे । और एक हमारे पिता जी थे वही दो जोड़ी धोती और दो चलानी गंजी लाटकाए रहते थे । तुम लोगों जितना दिमाग नहीं चढ़ा था हमारा लेकिन फिर भी सोच लेते थे कभी कभी कि आखिर पैसा रख कर करेंगे क्या, जब तन पर एक ठो अच्छा कपड़ा नहीं है ।" बेटे का सिर अभी भी झुका था । शायद वो समझ ही नहीं पा रहा था कि पापा ये सब मुझे क्यों बता रहे हैं । 


"वक़्त बदला, हालात भी बदल गए । पिता जी असमय चले गए । उनके जाने के बाद बुद्धि खुली । समझ आ गया कि पिता के होते तक ही मौज है उसके बाद तो जरूरतें पूरी हो जाएं वही बहुत है । खुद को जानते थे हम । पता था कि खुद को खेत में जोत कर कुछ खास कर नही पाएंगे इसलिए पढ़ाई में मन लगाने लगे । किस्मत अच्छी रही कि नौकरी मिल गई । आधी बुद्धि तो पिता जी के जाते ही खुल गई और आधी खुली जब तुम हुए ।" पापा आज अपनी पूरी भड़ास निकल देने के मूड में थे । 


"तुम्हारे पैदा होने के बाद हमें समझ आया कि पिता जी वो दो जोड़ी धोती और गंजी में कैसे सालों बिता देते थे । ये जो तुम अमीर घरों के बच्चों के बीच पढ़ते हुए हमारे पैंट शर्ट पर शर्मिंगी महसूस करते हो, महंगा फोन चलाते हो, वो लैपटॉप जो लिए पढ़ने के लिए हो और चलाते गेम और फिल्में हो, ये कपड़े जूते, ये सब इसीलिए हैं क्योंकि हमारे पास सालों से सिर्फ़ चार जोड़ी कपड़े हैं । हम ऐश कर पाए क्यों कि हमारे पिता के पास केवल दो जोड़ी कपड़े थे । ऐसा थोड़े ना है कि हमारा मन नहीं करता बन ठन के रहने का, अच्छा पहनने अच्छा खाने का लेकिन हम मन मारते हैं सिर्फ़ इसलिए कि तुम्हारे मन का हो सके और बदले में क्या चाहते हैं तो बस यही कि तुम पढ़ाई में अच्छा करो ।" 


"पापा मैं....वो...।" इससे ज़्यादा वो कुछ बोल नहीं पाया । 


"हां हां, बताओ क्या वो ? अरे अब तो वो ज़माना भी नहीं रहा कि तुमको सिर्फ़ पढ़ने के लिए कहें । बताओ हमको कि पढ़ाई से ध्यान हटा कर तुम कौन से खेल या कला में आगे बढ़े हो ? बताओ कि हमारी मेहनत की कमाई, हमारे त्याग और हम जो अपने ही बच्चे से बेजती सहते हैं उसके बदले क्या मिला है हमको ?" बेटे के पास इसका कोई जवाब नहीं था । वो कैसे कहता कि उसका सार ध्यान तो खुद और अपने साथ के बच्चों के बीच का फर्क नापने में गया है । 


"तुम पढ़ाई में अच्छे हो, ये हम जानते हैं । ना होते तो हम कुछ कहते ही नहीं । तुम अच्छा कर सकते हो लेकिन दिक्कत पता है क्या है ? तुम ना अभी से हैसीयत नापने लगे हो । इतना क्रिकेट देखते और खेलते हो कभी ये नहीं सीखे कि पहले ही ओवर में 25 30 रन बना देने वाला बड़ा खिलाड़ी नहीं होता । बड़ा खिलाड़ी वो है जो अंत तक मैदान में खड़ा रहता है और जिसका कुल स्कोर उसकी टीम को जिताता है । बेटा शुरुआत कोई नहीं देखता यहां सबको अंजाम से मतलब है । अभी से हैसीयत देखोगे तो कुछ हाथ नहीं आएगा । अभी तो वक़्त है खुद की हैसीयत बनाने का । ध्यान दो वर्ना कुछ भी हासिल नहीं कर पाओगे ।" बेटा अभी भी सिर झुकाए वहां खड़ा था । 


"अब जाओ, इतना ही कहने को बुलाए थे । अभी समझ आ जाए तो अच्छा है वर्ना बाद में सिवाए पछताने के कुछ कर नहीं पाओगे ।" मां कुछ नहीं बोली बस पापा को देखती रही । 


अगले दिन पापा ऑफिस से आए तो बेटा सिर झुकाए सामने खड़ा था । पापा ने बैग टेबल पर रखा और अपने थके शरीर को सोफे पर पटक दिया । 


"पापा ।" 


"हम्म्म्म ।"


"एडमिशन करा ली मैंने ।" 


"अच्छी बात है । कौन से सबजेक्ट लिए हो ।" 


"वही साइंस ही ।"


"इंटर में देख ही लिए हो कि साइंस नहीं हो पाएगा तो कुछ और देख लेते ।" 


"फिर से इंटर में ही एडमिशन लिया है । एक साल तो बर्बाद जाएगा मगर इस बार अच्छे नंबर आएंगे । पूरी मेहनत करूंगा ।" बेटे ने डरते हुए कहा । पापा मुस्कराए


"पढ़ना तुमको है बेटा । हम बस ये चाहते हैं कि अच्छा बुरा के बीच का फर्क जान जाओ । और ध्यान रखना कि अगर मेहनत होती रहे तो साल कभी बर्बाद नहीं जाता ।" बेटा पिता की बातों को समझ गया था ये देख कर पिता को अच्छा लगा । 


कुछ देर बाद बेटा अंदर से एक लिफ़ाफ़ा ले कर आया और पापा को थमा दिया । पापा ने लिफ़ाफ़ा देखते पूछा "ये क्या है ?" इतना कहते हुए उन्होंने लिफ़ाफ़ा भी खोल लिया । 


"शर्ट है पापा । अपनी पॉकेट मनी से लाया हूं । समझ आ गया है कि आप मेरे लिए खुद की जरूरतों पर खर्च करने से भी डरते हैं लेकिन मैं तो अपने खर्च में कटौती कर के आपके लिए कुछ ला सकता हूं ना ।" पापा बेटे को देखते रहे । उनका मन हुआ कि उठ कर गले लगा ले उसे मगर इतना खुले नहीं थे ना उससे । 


"और मां के लिए ?" पीछे खड़ी मां ने खुद के आँसुओं को रोकते हुए कहा । 


"वो पापा ले आएंगे ना ।" इस बात पर सबके चेहरे पर हंसी आ गई । 


बेटा आगे क्या करेगा ये तो पता नहीं लेकिन अब से पापा की इज़्ज़त ज़रूर करेगा ये पक्का है ।


***********


बड़े झा साहब कहानी आपके लिए है । हम भूले नहीं हैं इस 20 अक्टूबर को । भूल भी कैसे सकते हैं । और भूल भी जाएं तो आप हैं ना याद कराने के लिए, जैसे आज सपने में आ कर करा गए याद । 


विशेष क्या कहें आपके लिए, जो कहना था कहानी में कह ही दिया है । बस यही प्रार्थना रहेगी कि जहां रहें खुश रहें 🙏🙏


आपका बेटा 


धीरज झा 

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