वो जो लड़की थी - भाग 13

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मैं दिल्ली से निकल गया था । कार हाइवे पर थी और मैं खयलों में । बेचैन कर देने वाले खयाल । सालों पहले इसी रास्ते को तय करते हुए मैं कितना खुश था । सोच रहा था मैंने सबकुछ पा लिया है । यूपीएससी में रैंक और अपना प्यार दोनों मिल गया मुझे । इससे ज़्यादा ज़िंदगी में और चाहिए ही क्या । बहुत कम खुशनसीबों को ये कोम्बो पैक का ऑफ़र देती है किस्मत । वर्ना हर बार तो दो में तुम्हें क्या चाहिए यूपीएससी या कि प्यार वाला सवाल ही सामने खड़ा रहता है । पहले तो लोग इंतज़ार भी करते थे लेकिन अब तो बंदा इस चक्कर में फंस जाता है कि पढ़ाई करे या सारे दिन में कितनी बार आई लव यू बोला गया है इसका हिसाब रखे । 


तैयारी के दिनों में मैंने लड़की लड़कों को देखा था वहां । ऐसा लगता था जैसे इनका इस दुनिया से कोई वास्ता ही नहीं । सिर्फ़ और सिर्फ़ पढ़ाई की दुनिया । ऐसे लोग चाय तक में भी सवाल और उनके जवाब खोजते रहते थे । मुझे लगता था ये भला प्यार को क्या जानते होंगे और एक मुझे देखो मैं प्यार भी जी रहा हूं और मेहनत भी कर रहा हूं । मगर मुझे क्या ही पता था कि ये प्यार मुझे इस तरह से उलझा देगा । इन्हीं उलझनों में खोया हुआ मैं अपनी कहानी के अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा था । 


हालांकि ये मेरा सोचना था कि मेरी ये कहानी अब पूरी होने वाली है वो लड़की मुझे मिलने वाली है मगर किस्मत ने क्या लिख छोड़ा था मेरे लिए ये कोई नहीं जानता था । इसी उधेड़बुन में मैं आगे बढ़ रहा था तभी मेरा फोन बजा । सलोनी का फोन था । शायद वे लोग पहुंच गए थे । 


"पहुंच गई ?" मैंने फोन उठाते ही पूछा ।


"एक तो तुम्हारी ये आदत मुझे बहुत बुरी लगती है । फोन करने वाला पहले बोलता है मगर तुम हर बार मुझसे पहले अपना सवाल रख देते हो ।" वो पक्का पहुंच गई थी तभी बेबात के भड़क रही थी । 


"अच्छा सॉरी ना । तुम पूछ लो मैं जवाब दे देता हूं ।" 


"हां ये सही है । वैसे हम लोग पहुंच गये हैं । शहर में एंटर करते ही डेढ़ किलोमीटर तक आगे चलना पड़ेगा उसके बाद एक चौराहा आएगा और तुम्हें उसके लेफ्ट साइड वाली रोड पकड़नी है ।" सलोनी मुझे रास्ता समझा रही थी । 


"हम्म्म्म, विधि विहार में हो तुम लोग । क्या बाबा इसी इलाके में है ?" 


"हां हमारे सामने वाले एक पुराने से घर में घुसा है । ये इमारत बहुत ही पुरानी लग रही है । आसपास कुछ ज़्यादा आबादी नहीं है यहां ।" 


"देखने से कैसा लग रहा है कोई रहता भी है यहां ?" 


"हां, लग रहा है यहां पर भी बच्चे ही रहते हैं । कपड़े सूखने लटके हैं काफ़ी, बच्चों के ही हैं । कहीं हम बाबा पर बेवजह शक़ तो नहीं कर रहे ?" 


"अब वजह है या बेवजह ये तो वहां पहुंचने के बाद ही पता चलेगा । मैं घंटे भर में पहुंच जाऊंगा तब तक तुम अपना ध्यान रखना ।" 


"हां और तुम ध्यान से गाड़ी चलाना । अपनी बिछड़ी मोहब्बत से मिलने की बेचैनी में गाड़ी मत भिड़ा देना कहीं ।" इतना कह कर सलोनी बहुत तेज़ हंसी । मैं भी अपनी हंसी रोक नहीं पाया । 


"बहुत बदमाश हो तुम । अच्छा गौरव कुछ पूछ तो नहीं रहा था ना ?" 


"अरे जानते तो हो उसे वो नहीं पूछता हां लेकिन बोलता बहुत है । ना जाने कौन सी चाची ताऊ मामा सबके किस्से सुना डाले हैं इसने ।" 


"कोई ना थोड़ा झेल लो । सागर से बात कर लेना । मैंने कर ली है । तुम्हारे बारे में पूछ रहा था । और हां मुझे ज़रा लोकेशन भी भेज दो वहां की ।" 


"हां मैं भेज देती हूं । तुम से बात करने के बाद उसे ही लगाने जा रही थी । सोच रही बता दूं कि उसकी मां नंबर 2 से मिलने आए हैं ।" वो फिर हंसी । इस बार मैं कुछ बोलता उससे पहले उसका फोन कट गया । 


मैं जानता था ये हंसी उसके दर्द को छुपाने का एक ज़रिया है । उसे बहुत सी बातें अंदर ही अंदर खा रही होंगी मगर इन सबका जवाब उसे दूंगा । जो वो मेरे लिए कर रही है वो बहुत बड़ी बात है । 


सलोनी और गौरव घंटे भर से वहीं गाड़ी में बैठे सामने नज़र रखे हुए थे । कोई खास हरकत नहीं हो रही थी । रात होने के कारण लोग भी इतने नहीं थे वहां । माहौल एकदम शांत था कि तभी एक चीख गूंजी । सलोनी अचानक आई इस चीख से कांप गई । ऐसा लगा जैसे ये उसी घर के अंदर से आ रही थी जहां बाबा गया था । सलोनी ने तुरंत फोन लगाया । 


"अंदर से चीखने की आवाज़ आई है । मैं अंदर जा रही हूं ।" गौरव कुछ समझ ही नहीं पा रहा था कि ये हो क्या रहा है ।


"नहीं अकेली मत जाओ । मैं बस पहुंच ही रहा हूं तुम्हारी भेजी हुई लोकेशन पर । मेरा इंतज़ार करो, बस 10 मिनट ।" 


"बहुत देर हो जाएगी । शायद कुछ अनहोनी ना हो जाए । मैं जा रही हूं ।" इतना कह के सलोनी ने फोन काट दिया और फिर मैं फोन लगाता रह गया मगर फोन नहीं उठा दोबारा । शंका इंसान की सोच में बहुत से ऐसे खयाल भर देती है जिसका वास्तविकता से दूर दूर तक कोई नाता नहीं होता । सलोनी और फिर मेरा हम दोनों का अभी यही हाल था । 


अचानक ही एक्सलेटर पर मेरे पैरों का दबाव बढ़ गया और गाड़ी अपनी समान्य स्पीड से दुगनी रफ्तार में चलने लगी । मुझे 7 मिनट लगे वहां पहुंचने में और ये 7 मिनट मेरे जीवन का सबसे कठिन समय साबित हुए । कितना कुछ नहीं चल पड़ा था मेरे दिमाग में । 


वहां पहुंचते ही मैंने सबसे पहले सलोनी की गाड़ी को खोजा । कुछ देर नज़र दौड़ाने के बाद मुझे उसकी गाड़ी दिख गई । जैसा कि उसने बताया था गाड़ी उस घर के सामने लगी थी जहां बाबा गया था । सामने मुझे एक पुराना सा मकान दिखा वैसा ही जैसा सलोनी ने बताया था । मैं तेज़ कदमों के साथ उस मकान की तरफ बढ़ा । 


पुरानी हवेलियों जैसा था ये मकान । मैंने बड़े से गेट को धक्का दिया । वो पहले से खुला हुआ था । मेरी आंखें गुस्से से लाल थीं और मन घबराहट से भरा हुआ । लेकिन आगे जो मैंने देखा उसे देख कर मेरी जान में जान आ गई । सामने सलोनी और गौरव कुर्सियों पर बैठे हुए थे और कुछ बच्चों ने उन्हें घेर रखा था । सब आपस में बातें कर रहे थे, हंस रहे थे । 


"सलोनी, ठीक हो तुम ।" मैंने ज़ोर से कहा और भागता हुआ उसके पास पहुंचा मेरी आवाज़ सुन कर बच्चे चौंक गये । सबकी निगाह मुझ पर टिक गई । 10 मिनट के अंदर उनके घर में तीन नए मेहमान आ चुके थे, चौंकना जायज़ था उनका ।


सलोनी ने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा "जी डीएम साहब सब ठीक है । आप ना आते अभी तो और ठीक रहता ।" आखिरी बात उसने बहुत धीमे से कही ।


"अरे, साहब आप यहां ? और आप इनको जानते हैं ।" ये बाबा था जिसके हाथ में चाय की ट्रे थी । वो एक दम से हैरान परेशान देखने लगा मुझे । 


"बच्चों को अंदर भेजिए ।" मैंने बहुत ही कड़े लहजे में कहा ।


"हां बच्चे तो चले जाएंगे मगर आप इतनी दूर वो भी रात के समय । ये सब हो क्या रहा है ज़रा बताएंगे आप ?" बाबा के शब्द भी अब सख्त थे । हालांकि उनकी सख्ती बनती भी थी मगर मुझे अभी ये सब कुछ नहीं सूझ रहा था । 


"मैं फिर कह रहा हूं बच्चों को अंदर भेजिए ।" मैंने दांत पीसते हुए कहा । मेरी बात का असर हुआ और बाबा ने सभी बच्चों को अंदर भेज दिया । 


"अब आप मुझे बताएंगे कि ये क्या हो रहा है । आप जैसा बड़ा अधिकारी इतनी दूर से आ कर इतनी रात को मेरे घर पर क्या कर रहा है ?" बाबा ने फिर से अपना सवाल दोहराया । 


"तुम्हारे लिए आए हैं इतनी दूर से । और इस बार बिना सच जाने मैं नहीं जाने वाला । आखिर क्यों इतने झूठ बोले तुमने ? जबकि तुम्हारा मुझसे कोई लेना देना भी नहीं था । क्यों इतना सब छुपा रहे हो ?" मैं बाबा के करीब चला गया था । ये सब मैंने नहीं सोचा था लेकिन ऐसे हालात में बाबा मेरे सामने आया कि मैं सब भूल गया । बस ये याद रहा कि इससे सच उगलवा कर रहूंगा ।


"कैसे झूठ साहब ? आपने जो पूछा उसका सही जवाब दिया है मैंने । अब जब आप अपनी मनगढंत बात को सच मानने को कहेंगे तो भला मैं कैसे मान लूं ?" 


"अच्छा और ये भी सच है कि तुम संस्था में सिर्फ़ नौकरी करते हो ?" 


"हं, हां तो और क्या हम नौकरी नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे ? गरीब आदमी के लिए नौकरी करना भी गुनाह हो गया ।" बाबा की ज़ुबान लड़खड़ाई और मुझे बहुत तेज़ गुस्सा आया । 


"मुंह पर झूठ बोल रहा है ये इंसान । तुम्हारे कागज़ देखे हैं मैंने, संस्था की ज़मीन तुम्हारे नाम है । बताओ ऐसा दानी कौन है जो अपने नौकर के नाम ज़मीन कर देता है । तुम झूठे हो और तुमने उस लड़की के बारे में भी झूठ ही बोला ।" बाबा की अकबक बंद हो गई थी । उसके तेवर ठंडे पड़ चुके थे, वो बस नज़रें झुकाए खड़ा था । 


"बाबा अब तो सारी बात साफ हो रही है । अब तो सच बता दीजिए । आप नहीं जानते ये शख्स कितने सालों से परेशान है आपके झूठ की वजह से ।" सलोनी ने बाबा के करीब जा कर कहा । 


"बेटा मेरा यकीन करो आप लोग । उन सेठ की कोई बेटी ही नहीं थी । अब ये कह रहे हैं उनकी बेटी के बारे में बताऊं । जो थी ही नहीं उसके बारे में क्या बताऊं बेटा ।" 


"और वो ज़मीन वाला झूठ ।" मैंने कुछ बोलना चाहा इससे पहले सलोनी ने एक और सवाल पूछ लिया ।


"ज़मीन मेरी ही है । मैंने ही खरीदी थी लेकिन साहब कहीं मुझसे ये सवाल ना करने लगें कि इतनी महंगी ज़मीन मैंने कैसे खरीदी इसीलिए मैंने झूठ बोला ।" 


"वो सवाल तो अभी भी होगा तुमसे मगर उससे पहले उस लड़की के बारे में बता दो बाबा । माना कि तुम्हारे मालिक की कोई बेटी नहीं थी लेकिन कोई तो थी जो वहां रहती थी । तुम नहीं जानते बाबा मैं उससे कितना प्यार करता हूं । इतना कि उसकी वजह से मैंने मुझसे से प्यार करने वालों को भी दूर रखा । उसे बस एक बार देखना है बाबा । उसे आंख भर देख लूंगा तो चैन आ जाएगा । 18 साल से तरस रहा हूं उसे देखने के लिए बाबा । उसके साथ कुछ गलत कर दिया है क्या तुमने ? क्या वो अब नहीं है ? क्या है तुम्हारी असलियत बाबा । कहां है वो मुझे एक बार बता दो । मुझ पर तरस खाओ बाबा । मुझ पर तरस खाओ ।" 


कहते हैं मोहब्बत इंसान को भिखारी तक बना देती है । आज ये बात खुद पर साबित होते देख रहा था । मेरी आंखें झर रही थीं, हाथ बंधे थे मैं खुद घुटनों पर था और होंठों पर बस एक ही फरियाद थी कि मुझे बस एक बार उसका पता दे दो । मुझे फर्क नहीं पड़ रहा था कि मुझे मेरी बीवी का ड्राइवर ऐसा करते देख रहा है यहा वहां मौजूद बच्चे । मुझे ये भी खयाल ना आया कि मैं अपनी बीवी के सामने अपने पुराने प्यार को आज भी बरकरार बता रहा हूं ।

 

उधर ना जाने क्यों बाबा की आंखें भी आंसू बरसा रही थीं कुछ तो था जो उसे चुभ रहा था । कुछ तो था । सलोनी मुझे संभालने की कोशिश कर रही थी लेकिन मेरे आंसू और मेरी फरियाद दोनों रुकने का नाम नहीं ले रहे थे । 


"अब तो पक्का हमें और तुम्हें अदला बदली कर लेनी चहिए डीएम साहब ।" 


क्रमशः


धीरज झा

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