वो जो लड़की थी - भाग 14

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प्रेम में जो भी होता है वो अनपेक्षित होता है । हर कोई जो प्यार करता है वो अपनी तरफ से दुनिया का अनोखा प्यार ही करता है । उसे लगता है कि ऐसा प्यार तो ना आज तक किसी ने किया है और ना ही कोई कर सकता है । शायद ऐसा होता भी हो लेकिन पता कैसे चले ? प्रेम में होने वाली अधिकांश बातें तो कुछ लोगों के बीच में सिमट कर रह जाती हैं । जो प्रेम करते हैं वो ढिंढोर थोड़े ना पीटते हैं । यही कारण है कि लोग खट से कह देते हैं ऐसा प्यार तो बस कहानियों और फिल्मों में होता है जबकि सच तो ये है कि कहानियां तो सच से ही प्रेरित होती हैं ना । 


प्रेम में हर किसी ने अपने अपने हिस्से का दुख भोगा है फिर भी उन्हें लगता है कि प्रेम में झुक जाना, रो देना ये सब बेवकूफी है । जबकि प्रेम में ना बेवकूफी होती है और ना होशियारी जो होता है सो बस प्रेम ही होता है, प्रेम के लिए ही होता है । 


मैं भी इसी प्रेम के लिए अपनी मर्यादा, मान सम्मान और अपनी शादीशुदा ज़िंदगी को दाव पर लगा कर बाबा के सामने सच जानने के लिए रो रहा था । बाबा जितना पिघल रहे थे उतना ही मेरी आस मजबूत हो रही थी । आगे ना जाने मैं और क्या कर देता इससे पहले ही मेरी सिसकियों को दबाती हुई एक आवाज़ गूंजी वहां "अब तो पक्का हमें और तुम्हें अदला बदली कर लेनी चहिए डीएम साहब ।" 


वही आवाज़ जिसे सुनने के लिए सालों से मेरे कान तरस रहे थे । मुझे विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि यही आवाज़ मैं इतने सालों से अपने खयलों में इतनी बार सुन चुका था कि अभी भी मुझे लग रहा था कि ये सच नहीं बल्कि खयाल ही है । 


"लड़की मैं हूं और इस तरह से मुझे रोना चाहिए लेकिन आपको तो हर काम उल्टा ही करना होता है । इसीलिए कहती हूं अदला बदली कर लीजिए ।" इस आवाज़ को और इन शब्दों को ना जाने कितनी बार सुना होगा । हर बार इन शब्दों ने चेहरे पर मुस्कुराहट ला दी है । आखिरी बार भी यही तो शब्द थे 'अदला बदली कर लेनी चाहिए ।' मगर आज इस आवाज़ को सुन कर लगा कि ज़िंदगी जैसे यहीं थम गई थी । लगा जैसे कि एक उम्र जी कर अब दूसरे जहां में मिल रहे हों हम । उस आवाज़ में अब वो खनक नहीं थी बल्कि कंपकंपी थी । ऐसे मानों जैसे बड़ी हिम्मत जुटा कर ये बात कही हो । जैसे सालों लग गए हों सिर्फ़ इतनी बात बोलने में । 


दूसरी बार जब आवाज़ आई तब मेरी नज़र उस आवाज़ की तरफ अचानक से घूमी । देखा तो मेरा सपना मेरी हक़ीक़त बन कर सामने खड़ा था । मेरे 18 सालों की बेचैनी की कहानी मैं उसके चेहरे पर पढ़ पा रहा था । सलोनी और गौरव दोनों मूक दर्शक बने हुए थे । गौरव समझ नहीं पा रहा था कि ये सब क्या चल रहा है और सलोनी को ये सब समझने के लिए कुछ वक़्त लगने वाला था । बाबा की आंखों से बह रहे आँसूओं की रफ्तार पहले से ज़्यादा तेज हो गई थी और मैं, मैं तो उसकी शक्ल तक सही से नहीं देख पा रहा था । आंखों के आंसू सामने की तस्वीर को धुंधला जो कर रहे थे । 


मैं उठा और लड़खड़ाते कदमों के साथ उसके पास पहुंचा । वो एक कुर्सी पर बैठी थी और मैं उसके सामने घुटनों पर बैठ गया । मेरी आंखें उसके चेहरे को टटोल रही थीं या फिर तसल्ली कर रही थीं इस बात की कि ये वही लड़की है या कोई और । तीन साल से ज़्यादा रहा उसके करीब लेकिन उसे रोते हुए पहली बार आज देख रहा था । कभी ना ऐसी नौबत आई और ना उसका कभी से स्वभाव ऐसा था । मुझे तो लगता था जैसे इसे पता ही नहीं कि रोना होता कैसा है ।


"क्या अब नज़र लगाओगे डीएम साहब ?" उसने आँसूओं की वजह से चमक रहे चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुए कहा । मन हुआ उसे गले लगा लूं मगर कुछ था जो मुझे रोक रहा था । सलोनी इस हालात को समझती थी, उसकी दिक्कत नहीं थी लेकिन कुछ तो था जो मुझे उसे गले लगाने से रोक रहा था । मैं कुछ बोल भी तो नहीं पा रहा था । ना जाने क्या हो गया था मुझे । जानते हैं जब भूखे इंसान के सामने तीन दिन बाद खाना रखेंगे ना तो वो एकदम से खा नहीं पाता । उसका मुंह नहीं खुलता, अन्न गले में चुभता है, हिचकियां आने लगती हैं । मैं भी कुछ ऐसी ही स्थिति में था । बहुत से सवाल तो थे लेकिन वो बात नहीं मिल रही थी जिससे मैं शुरुआत कर सकूं । 


"बहुत कुछ पूछना होगा ना ? बहुत गुस्सा भी आ रहा होगा ?" मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों के घेरे में लेते हुए उसने पूछा । 


"क्यों किया ऐसा ?" इससे ज़्यादा और कुछ मैं बोल ना पाया । मेरे आंसू मेरे शब्दों को घेरे हुए थे कि जो शब्द निकलने की कोशिश करते वो डूब जाते । गला भरा था, आंखें बह रही थीं । 


"किया नहीं, बस समय का ऐसा चक्र चला कि सब हो गया । कैसे क्यों ये सब समझा नहीं सकती लेकिन यकीन करो ठीक तुम्हारे बराबर ही दर्द और बेचैनी झेली है मैंने, ना रत्ती भर कम और ना रत्ती भर ज़्यादा ।"


"ऐसी भी क्या मजबूरी थी कि एक बार ये बताना भी सही ना समझा कि तुम ठीक हो ।" 


"यही तो मजबूरी थी । तुम्हें बताने सामने आती तो ना तुम वापस जाने देते और ना मैं वापस जा पाती ।" 


"तो वापस जाना ही क्यों था ? क्या ऐसी दिक्कत थी मुझमें जो तुमने मेरे साथ ना रहने का फैसला कर लिया ?" मेरे इस सवाल के साथ ही कदमों की तेज आहट दरवाजे से बाहर जाती सुनाई दी । ये सलोनी थी । शायद वो देख नहीं पा रही थी अपने प्यार को बंटते हुए या फिर हमें अकेला छोड़ देना चाहती थी । उसके पीछे बाबा और गौरव भी बाहर चले गए ।


"अब इन बातों का कोई मतलब नहीं । तुम्हारी अपनी ज़िंदगी है ।" उसने इस तरह से रूखे शब्दों में ये बात कही जैसे वो मुझे खुद से दूर करना चाहती हो । 


"मेरी अपनी ज़िंदगी ? किधर है ? कहां है ? मुझे भी मिलवा दो उससे । मैं जान तो सकूं कि आखिर अपनी ज़िंदगी कैसी होती है । जब तक कुछ समझने वाला हुआ तब तक पिता का साया सिर से उठ गया । उसके बाद मेरी ज़िंदगी अपने परिवार के लिए थी । जब वक़्त आया कि परिवार के साथ साथ अपने लिए भी थोड़ा जी लूं तब तुम अचानक चली गई मेरी ज़िंदगी से । उसके बाद से मेरी ज़िंदगी का हर एक लम्हा सिर्फ़ तुम्हारा रहा है । सारा वक़्त यही सब सोचते हुए बीता कि तुम कहां हो, कैसी हो, किसी मुसीबत में तो नहीं हो, तुमने ऐसा क्यों किया । बताओ यहां मेरी ज़िंदगी मेरे पास कहां थी । मेरा तो इस पर इतना भी हक़ ना था कि इसका छोटा सा हिस्सा अपनी पत्नी को बांट कर दे पाता । मैंने तुम्हारे प्यार में खुद को तो तड़पाया ही उसे भी खुद से दूर रखा । ऐसा लगता रहा कि अपने साथ हो रहे इस अन्याय की सज़ा मैं उसे दे रहा हूं । बताओ कि ऐसे में कैसे ना तुमसे सच जानूं मैं ।" मेरे लब जो अभी तक खमोश थे उन्होंने अचानक ही सारी हदें तोड़ दी थीं । 


"सब जानती हूं मैं । मैं तुम्हारे सामने नहीं थी मगर तुम हमेशा मेरे सामने थे । मैंने खुद को हर बार कैसे रोका ये मैं ही जानती हूं ।" उसके चेहरे की बनावटी मुस्कुराहट अब गायब हो चुकी थी । ये खालिस दर्द था जो बह कर सामने आ रहा था । 


"लेकिन क्यों ऐसी भी क्या मजबूरी थी जो तुम सालों तक सामने होते हुए भी छुपी रही  ।" 


"मजबूरी यही थी कि मैं अब और उधार की ज़िंदगी नहीं जीना चाहती थी । नहीं रहना चाहती थी तुम पर बोझ बन कर रहूं । मैंने सोचा था मैं तुम्हारी हिम्मत बनूंगी मगर मैं ऐसी हालत में पहुंच चुकी थी कि हिम्मत नहीं अब कमज़ोरी हो जाती तुम्हारी । इसीलिए मैं छुप गई तुम से ।" उसके शब्द अब और कड़े हो चुके थे ।


"सुनों अगर तुम्हें इस बुड्ढे का डर है तो ये डर निकाल दो अपने मन से । इसे मैं संभाल लूंगा । तुम सेफ हो अब । यूं ही कुछ भी मत बोलो ।" इंसान जो सोच लेता है उसके लिए वही सत्य होता है । मैं भी अब सोच चुका था कि इस लड़की के साथ बहुत बुरा हुआ है । इंतज़ार नहीं कर सकता था पूरी तरह से सच जानने के लिए । मैं झुंझला चुका था और ये झुंझलाहट मैंने उस पर निकाल दी । 


"उन से डरने की मुझे ज़रूरत नहीं है । मुझे डर सिर्फ़ अपनी किस्मत से रहा है । मेरी असलियत नहीं जानते तुम इसीलिए इस तरह बोल रहे हो ।" 


"नहीं जानता तो बता दो मुझे । मैं भी तो जानूं कि आखिर ऐसा क्या है जो मेरे उस प्रेम को कम कर देगा जो मैं इतने सालों से तुम्हें करता आया हूं ।" लड़की कुछ नहीं बोली वो बस रोती रही । मेरा दर्द बेचैनी सब अब गुस्से में बादल चुका था । 


"मैं समझ गया हूं उस बाबा ने ही तुम्हें धमकाया है । उसने ही मुझे तुम से दूर रखा, झूठ बोला मुझसे । वो चाहता तो सालों पहले मुझे तुमसे मिलवा सकता था । तब मैं कमज़ोर था मगर अब मैं उसे ऐसी सज़ा दूंगा कि आज के बाद कोई भी किसी की मोहब्बत को उससे दूर करने की हिम्मत नहीं करेगा ।" मैं इतना कह कर उठ गया । इस समय मेरी जो हालत थी शायद मैं उस बाबा का खून भी कर सकता था ।


"रुक जाओ मेरी बात सुनों । उनकी कोई गलती नहीं है । उन्हें कुछ मत कहना ।" लड़की वहीं से चिल्लाती रही और मैं दरवाजे की तरफ बढ़ता रहा । 


"वो मेरे पिता जी हैं । उन्होंने जो किया वो मेरे कहने पर किया उनकी कोई गलती नहीं है ।" लड़की चिल्ला पड़ी । और इसके साथ ही मेरे कदम जहां थे वहीं रुक गये ।


क्रमशः 


धीरज झा

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