वो जो लड़की थी - अंतिम भाग (16)

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उसके गालों पर पड़ा चाँटा इतना ज़ोरदार था कि बाहर खड़े तीनों लोग अंदर आ गए भागते हुए । वो लड़की कुछ समझ ही ना पाई कि आखिर मैंने क्यों उसे ये थप्पड़ मारा । उसके गालों पर बना निशान बता रहा था कि मैंने उस पर हाथ उठाया है । मैंने अपराध किया है । 


"तुम पागल हो गए हो ? क्यों मारा इसे ।" सलोनी आगे बढ़ कर उसके चेहरे को अपने हाथों में लेते हुए मुझ पर चिल्लाई ।


उसे कैसे समझाता कि क्यों मारा मैंने उसे थप्पड़ । आपकी उम्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा बीत गया हो किसी की तलाश करते हुए । सालों तक आप हर पल इस बात की फिक्र करते रहे हों कि वो ठीक तो है, कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया । आप अपना मान सम्मान घर परिवार सब दांव पर लगा दो उसे खोजने के लिए और एक दिन वो अचानक से सामने आ कर कह दे कि ये सब उसने जान बूझ कर किया था । इतना ही नहीं बल्कि ऐसा करने का कारण जो बताया जाए वो ये कि मैं तुम पर बोझ नहीं बनना चाहती थी ! 


उस वक़्त लगता है कि दुनिया आप पर हंस रही है आपका मज़ाक उड़ा रही है । मतलब कि आप सामने वाले को इतना यकीन तक ना दिला पाए कि आप हर हाल में आप उसके साथ रहेंगे ? आपके प्यार की यही मजबूती थी ? शायद कोई हो जो ऐसे हालात में शांत रह जाए मगर वो कोई मैं तो नहीं था । मेरी सालों की खामोशी गुस्से में बदल गई थी । उसकी पूरी कहानी सुनने तक मैंने खुद को रोके रखा लेकिन जब पता लगा कि उसने ऐसा क्यों किया तो मैं बर्दाश्त ना कर पाया । 


"उसे मत रोको सलोनी । ये उसका हक़ है । जितनी बुरी तरह से मैंने उसे तड़पाया है उसके सामने ये एक थप्पड़ कुछ भी नहीं ।"


"ये मेरी तड़प के लिए नहीं था । मेरी तड़प तो मेरे प्यार का सबूत है । प्यार ना होता तो तड़प क्यों होती ? ये थप्पड़ था उस कमज़ोर यकीन के लिए जिसने तुम्हें ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि तुम्हारी हालत तुम्हें मुझ पर बोझ बना देगी । क्या सच में ? सच में तुम्हें ऐसा लगता रहा । मैं यकीन नहीं कर पा रहा । इतने साल मुझे गुमराह कर के रखा, मेरी ज़िंदगी एक उलझी हुई पहेली बना दी सिर्फ़ इसलिए कि तुम चल नहीं सकती ? फिर क्यों अपने बाबा को खुद से दूर नहीं कर दिया तुमने ? क्योंकि वो तुम्हारे पिता थे, जो उन्होंने किया वो उनका फर्ज था ? तो फिर मुझे ये हक़ क्यों ना दे सकी तुम ? कम से कम मुझे आज़माया तो होता । तुम्हें क्या लगता है तुमने जो किया उसके बाद मैं खुश रहा ? नहीं इससे ज़्यादा खुश रहता तब जब तुम मेरे साथ रहती । तुमने ज़िंदगी बर्बाद कर दी हमारी, हम सबकी ।" वो कटघरे में थी और ज़िंदगी के आगे मैं अपनी दलील रख रहा था । हर कोई वहां मूक दर्शक था । मैं मान ही नहीं पा रहा था कि मुझे उसने छल लिया है जो मुझे सबसे ज़्यादा प्यार करता है । 


मेरी बातों का उसके पास कोई जवाब नहीं था । बाबा हमेशा की तरह चुप थे । वो शायद वही बात बोलते जो उन्हें बोलने के लिए कहा जाता था । मेरे अंदर का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा था । 


"तुम्हें याद था ना कि मुझे तुम्हारा उधार चुकाना है ? तय हुआ था ना कि मेरे अफसर बनने के बाद मैं ये करूंगा । तो कम से कम उस उधार के बदले ही मुझे आवाज़ दे ली होती । सोचो अगर मुझ पर ऐसी कोई विपत्ति आई होती तो तुम क्या करती ? क्या तुम छोड़ देती मेरे हाल पर ।" 


"नहीं बिल्कुल नहीं । मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती ।" 


"तो तुमने मेरे बारे में ऐसा कैसे सोच लिया ?" 


"तुम पहले से अपनी ज़िंदगी में उलझे हुए थे । तुम्हें सिर्फ़ खुद के ही हालात नहीं बल्कि अपने परिवार के हालातों को भी सुधारना था । मैं ऐसे वक़्त में तुम्हारे लिए नई परेशानी खड़ी नहीं करना चाहती थी ।" 


"परेशानी ? मेरी ज़िंदगी नर्क कर दी तुमने अपनी परेशानी छुपाते छुपाते ।" मैं चिल्लाता हुआ आगे बढ़ा । उसके पास पहुंचता उससे पहले ही सलोनी ने मुझे ज़ोर से धक्का दिया ।


"बस करो तुम दोनों । तुम्हारी ये सही गलत की बहस का कोई अंत नहीं है । जो कुछ भी हुआ उसमें कुछ सोचा समझा नहीं था । इसने जो भी किया तुम्हारे भले के लिए किया । एक बार इसके नज़रिए से भी तो सोच कर देख । तुम पूछ रहे हो कि तुम्हारे साथ ऐसा हुआ होता तो ये क्या करती मगर खुद से पूछो कि उस हालत में तुम क्या करते ? क्या ये चाहते कि ये सारी उम्र तुम्हारे आगे पीछे करते हुए बिता दे ? क्या तुम्हें मंज़ूर होता इस पर बोझ बनना ? यही तो दिक्कत है कि हम सब सिर्फ़ अपने नज़रिए से देख कर सही गलत का फैसला कर लेते हैं जबकि ज़रूरी है कि एक बार हम सामने वाले के नज़रिए से देखने की कोशिश करें । तुम अच्छे से जानते हो कि इन हालातों में मेरा तुम्हारे साथ होना सामान्य नहीं है । होना ये चाहिए कि इतने सालों तक सच छुपाने की बात जान कर मैं तुम्हारी शक्ल तक ना देखूं । जितना दोषी तुम इस लड़की को मान रहे हो मेरे लिए तुम भी इतने ही बड़े दोषी हो । शायद इससे बड़े ही क्योंकि इसने जो किया तुम्हारे लिए किया मगर तुमने हर बात जानबूझ कर छुपाई मुझसे । बताओ इसके लिए क्या सज़ा हो तुम्हारी ? लेकिन मैं इतना नहीं सोच रही क्योंकि मैंने तुम्हारे नज़रिए से भी देखा है और मुझे ये सही भी लगा । तुम भी एक बार इसे अपने नज़रिए से देख के फैसला करो ।" सलोनी की एक एक बात का असर हुआ था मुझ पर । गलत तो मैं भी था और बहुत ज़्यादा था लेकिन सलोनी ने मुझे समझा । 


"बहुत फैला चुके तुम दोनों अपना रायता । अब खुद को और हमें थोड़ा चैन से जी लेने दो । 15 मिनट का समय है तुम्हारे पास, सब समेट लो और अब उलझन से निकलो बाहर ।" सलोनी इतना कह कर बाबा और गौरव को अपने साथ बाहर ले गई । मैं उसे देखता ही रह गया । पहले कभी उसका इस तरह का रूप नहीं देखा था । 


सलोनी की बातों ने मेरे गुस्से को ग़ायब कर के मुझ में शर्मिंदगी भर दी थी । बहुत सी बातें थीं जो मुझे अब भी गलत लग रही थीं मगर इसके बावजूद अब मुझे उस लड़की से कोई शिकायत नहीं थी । मैं धीरे धीरे उसके पास गया ।


उसके सामने बैठते हुए उसका गाल सहला कर मैंने पूछा "ज़ोर से लगी ?" 


ठीक इसी वक़्त एक लहराता हुआ हाथ मेरे गाल पर पड़ा । और इसके बाद वो बोली "इससे थोड़ा ज़्यादा ज़ोर से लगी थी ।" मुझे समझ ही ना आया कि मैं हंसू या फिर गुस्सा करूं । 


"वैसे बीवी कड़क चुनी है तुमने । पहले जब थप्पड़ खाया तुम्हारा तो लगा कि अदला बदली वाली बात सही नहीं है मगर तुम्हारी बीवी को देख कर मैं फिर कहूँगी मुझसे ना सही उसी से अदला बदली कर लो ।" उसकी इस बात पर हम दोनों हंस पड़े । सालों की दूरियां मिट गईं । कुछ देर बाद सब ऐसे था जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं है । 


मुझे सुबह तक लौटना था इसीलिए अभी निकलना ज़रूरी था । सच मानें तो दिल कह रहा था कि उसे अब अपनी आंखों से दूर ना जाने दूं लेकिन इतना कहने की हिम्मत नहीं थी । अब निकलना था । बाबा से मैं नज़रें नहीं मिला पा रहा था लेकिन उन्होंने मुझे माफ कर दिया । 


जब मैं उनके पास गया तो उन्होंने मुझसे कहा "हर पिता चाहता है कि वो अपनी बेटी के लिए एक ऐसा लड़का खोजे जो उसे उससे भी ज़्यादा मानता हो, जिसके लिए वो दुनिया से लड़ जाए । बचपन में हम भी यही चाहते थे । इसकी मां इसको जन्म देते ही चल बसी थी उसके बाद से मेरे जीने का सहारा यही थी । मामूली से ड्राइवर थे हम लेकिन चाहत ये थी कि अपनी बच्ची को राजकुमारी की तरह रखें । अपने भर तो कोशिश करते रहते थे लेकिन गरीब इंसान के लिए तो रोटी तक आफत हो जाता है । हां मगर इसके नसीब में गरीब रहना नहीं लिखा था । करम का खेला है सब । 


मालिक और हम एक दिन कहीं जा रहे थे । लौटते हुए अंधेरा हो गया । हम अपना मस्ती में थे तभी दो लोग हमारा रास्ता रोक दिए । हाथ में पिस्तौल था उनके । हम डर गए । गाड़ी रोक दी और हम मालिक के साथ गाड़ी से उतर गए । दोनों लोग का प्राण सूख रहा था । दोनों बदमाश मालिक का जेब तलाशने लगे, गाड़ी देखने लगे तब तक हम भिड़ गए उनसे । जिसने पिस्तौल पकड़ा था उसके से पिस्तौल छिटक गया । इस हाथापाई में एक तो बेहोश हो गया । दूसरे ने मालिक को दबोच लिया । हम एकदम असहाय हो गए कुछ नहीं सूझा । तभी हमको पिस्तौल दिखा और बिना देर किए उसे उठा कर बदमाश पर तान दिए । हमारा पूरा शरीर कांप रहा था । एक चींटी भी हमको काट लेता था तो उसको मारने की जगह उठा कर अलग रख देते थे । ऐसे में भला किसी आदमी को कैसे मार देते । लेकिन शायद ये बात उस बदमाश को भी पता था कि हम उसको नहीं मार सकते इसीलिए उसका शिकंजा मालिक के गर्दन पर कसता जा रहा था । 


मालिक कहने की कोशिश कर रहे थे कि हम गोली चला दें । हमारा अन्नदाता मर रहा था कब तक खुद को रोकते । गोली चला दिए । वो बदमाश वहीं ढेर हो गया । हम बुरी तरह से डर गए थे । मालिक हमको समझाने लगे । बोले कि पुलिस को पता चल ही जाएगा और वो हम तक पहुंच जाएगी । हमारी छवि बहुत अच्छी है लेकिन अगर हम इस हत्या में फंसे तो हमारा बिज़नेस और प्रतिष्ठा दोनों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा ।


मालिक ने हमको कहा कि तुम्हारी बेटी को हम अपनी बेटी की तरह रखेंगे । उसे हर सुख सुविधा और पिता का प्रेम देंगे बस तुम पुलिस के पास जा कर स्वीकार कर लो कि ये खून तुमने किया है और हम तुम्हारे साथ नहीं थे ।


आत्मरक्षा में मारे थे उसे हम, कोई हत्या नहीं किए थे । मालिक चाहते तो हम दोनों को बचा लेते । लेकिन उनका प्रतिष्ठा पर पड़ रहा था । ऐसे तो हम ना मानते लेकिन बदले में जो मिल रहा था उसके लिए हम फांसी चढ़ने को भी तैयार थे । इस तरह हम अपराधी हो गए । जानते हैं आदमी कितना भी महात्मा काहे ना हो मगर बात जब त्याग का आता है ना तो वो घमंड ज़रूर करने लगता है । बिना फल की इच्छा के तो लोग भगवान तक को नहीं पूजता । हमें भी यही घमंड था कि हम अपनी बेटी के लिए इतने साल का बनवास काटे हैं । एक पिता जिसने अपनी बेटी के नाम आधी ज़िंदगी लिख दी हो वो अपने त्याग पर गर्व कैसे ना करेगा । लेकिन जब आपको देखते हैं तो हमारा घमंड चूर चूर हो जाता है । 


हमें कम से कम ये तो पता था कि हमारी बेटी सुरक्षित ही नहीं बल्कि बहुत बेहतरीन ज़िंदगी भी जी रही है लेकिन आप तो सालों उससे दूर रहे बिना ये जाने कि वो किस हाल में है । हमको इस बात का गर्व है कि हमारी बेटी ने दुनिया के उन चंद लोगों में किसी एक से प्रेम किया जो प्रेम को समझता है । आपके इस प्रेम ने हमारे त्याग को बौना साबित कर दिया साहब । आपसे हर बार सच छुपाते हुए हमारे मन पर क्या बीती है ये हम ही जानते हैं । कई बार मन हुआ कि आपसे सच कह दें लेकिन बेटी के मोह ने हर बार रोक लिया हमें । आप माफ़ी ना मांगिए बल्कि हमको माफ कर दीजिए ।" 


बाबा ने रोते हुए अपने हाथ जोड़ लिए । एक पिता का स्नेह अच्छे से नहीं मिल पाया था मुझे और जो चीज़ नहीं मिलती उसकी कद्र आप बहुत अच्छे से जान पाते हैं । मैंने बाबा को गले लगा लिया । सारे गीले शिकवे मिट गए । 


अब हमें निकलना था । सलोनी और गौरव अपनी गाड़ी में बैठ गए और मैं अपनी गाड़ी से निकलने वाला था । भारी मन के साथ गाड़ी स्टार्ट की और उसी वक़्त उसकी आवाज़ सुनाई दे दी ।


"इतनी मुश्किल से खोजा है, अब क्या यहीं छोड़ जाओगे ? फिर से गुम हो गये तो ?" मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई । मैंने सलोनी की तरफ देखा, वो भी मुस्कुरा रही थी । हमने उसे गाड़ी में बिठाया और निकल पड़े ज़िंदगी के एक नए सफर की ओर । 


वो अब यहीं रहती है । हमारे शहर में । यहां की संस्था वही संभालती है । मेरे साथ साथ सलोनी सागर सुनीता और लक्ष्मी सब समय समय पर उससे मिल जाया करते हैं । मेरे लिए थोड़ा मुश्किल ज़रूर हो गया है ये सब क्योंकि मुझे अपने कर्तव्य, परिवार और अपनी इस संस्था वाली को समान्यरूप से लेकर चलना पड़ता है । लेकिन यहां भी सलोनी मेरे लिए मौजूद रहती है । सलोनी को ये डर तो नहीं रहा कि वो लड़की मुझे उससे छीन लेगी मगर अब उसे ये डर ज़रूर रहता है कि कहीं सागर उस लड़की को अपनी नई मां के रूप में गोद ना ले ले । दोनों की बनती ही इतनी है । सागर अब उससे मिलने की जिद करता रहता है । सलोनी कई बार चिढ़ कर कह देती है कि ना जाने क्या जादू कर दिया है इसने दोनों बाप बेटों पर ।  


मैं उसकी सभी संस्थाओं के बच्चों के लिए कुछ बेहतर करने की कोशिश करता रहता हूं इस उम्मीद में कि उसका दूध और रिक्शे के किराए वाला उधार चुका सकूं । वैसे सच बताऊं तो मुझे खुद को बहुत अच्छा लगता है अपने जैसे बच्चों के लिए कुछ करना और उन्हें प्रोत्साहन दे कर आगे बढ़ाना । वो लड़की अब हमारा परिवार है । कई बार वक़्त चुरा कर मैं उसे आंख भर देख आया करता हूं । उसका आसपास होना सुकून देता है मुझे और इसी सुकून को देख कर सलोनी भी खुश रहती है । उसका विश्वास अब और बढ़ गया है और मुझे हमेशा इस विश्वास को बनाए रखना है ।  


"अब आपको अदला बदली करने की ज़रूरत नहीं दिवाकर बाबू । एक पुरुष को ऐसा ही होना चाहिए जो प्रेम को सही से जान सके और समझ सके और आप ऐसे ही हैं ।" 


"सही कहा सुनैना, और बहुत बहुत शुक्रिया ये मानने के लिए कि मैं जैसा हूं सही हूं ।" मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा । जिसके बाद सब हंस दिए । इसी ठहाके के साथ हमारी कहानी का एक अध्याय खत्म हुआ । 


उम्मीद है अब ज़िंदगी इसी तरह हंस कर कटती रहेगी । अगर कभी मन हुआ आपसे बातें करने का तो मिलूंगा नए अध्याय के साथ । तब तक आप भी अपनी ज़िंदगी में मुस्कुराते रहें । 


*************


जो साथी कहानी के साथ बने रहे उन सबका दिल से आभार । आप सबकी वजह से ही एक आम सी कहानी को एक लघु उपन्यास में बदल पाया हूं । ये कहानी तीन महीने पहले शुरू की थी । सोचा था छोटी सी कहानी लिखूंगा मगर कल्पनाओं ने इसे विस्तृत बना दिया । 


पिछले 2 सालों में ऐसी बहुत सी अधूरी कहानियां लिखी हैं । इस कहानी को लिखने के बाद मन हो रहा है उन्हें भी इसी तरह पूरा कर दूं । अगर मैंने समय निकाल कर इसे लिखा तो आपने भी अपना समय निकाल कर इसे पढ़ा है । आपके स्नेह के लिए, आपके कीमती समय के लिए आपका दिल से आभार 🙏🙏 


फिर मिलेंगे नई कहानी और नई किश्तों के साथ ❤


धीरज झा

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