ऑफिस वाला छठ व्रत (कहानी छठ व्रत वाली)

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"हेल्लो रमन ।" रमन कुछ अओच रहा था । इतने में आरुषी ने उसे आ कर टोका । 

"हाए आरुषी ।" 

"अभी तक यहीं बैठे हो । आज लंच नहीं करना क्या ?" आरुषी के सवाल पर रमन कुछ हड़बड़ाया लेकिन फिर उसने खुद को संभाल लिया । 

"करना है ना मगर थोड़ा लेट करूंगा अभी काम है थोड़ा ।" 

"कमाल है ! हर रोज़ तुम्हें ही सबसे जल्दी रहती है और आज तुम कह रहे हो कि लेट लंच करूंगा । ठीक है दोस्त, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी । वैसे मूड बने तो कैंटीन में आ जाना ।" रमन मुस्कुरात रहा, आरुषी चली गई । लगभग ऑफिस का सारा स्टाफ कैंटीन में पहुंच चुका था । जो बचे हुए थे वो या तो फोन पर लगे थे या काम में मग्न थे । 

भूख तो वाकई बहुत लगी थी रमन को लेकिन कुछ कारणों से रुका हुआ था । सब के जाते ही वो झट से उठा । पानी की बोतल को अच्छे से साफ कर के पानी भर लाया । अपने मेज पर पानी के छींटे मार कर उसे साफ किया । ये सब करते हुए वो चोर नज़रों से इस बात पर भी ध्यान दिए हुए थे कि कहीं कोई आ तो नहीं रहा । 

सब साफ करने के बाद वो हाथ धो कर आया । एक बड़ा सा टिफ़िन निकाला और उसे खोल लिया । अमूमन इतना बड़ा टिफ़िन नहीं लाता था रमन लेकिन आज कुछ खास था । वैसे तो वो जब भी कुछ खास बना कर लाता तो सबको टेस्ट करवाता लेकिन आज वो अकेले अकेले चोरों की तरह खा रहा था । 

जब उसका ध्यान पुरी तरह से खाने पर था तभी अमित ने उसे देख लिया और कैंटीन में जा कर सबको बता दिया । अब सब रमन की टांग खींचने दबे पांव वहां पहुंच गए । रमन अभी भी खाने में डूबा हुआ था ।

"तो तुम्हें देर से लंच करना था ?" आरुषी ने खांसते हुए कहा । उसकी आवाज़ सुन कर रमन एकदम से चौंक गया । 

"नहीं वो बस, वो...।" रमन शर्मिंदा हो रहा था । 

"अरे बॉस हम कौन सा तुम्हारा खाना छीन लेते यार ।" अमित ने कहा और बाक़ी सब हंस पड़े ।

"नहीं यार वो बात नहीं है । दरअसल आज मैं जैसे खाना खाता उससे तुम लोग डिस्टर्ब होते और फिर कितने सवाल पूछते तो मैंने सोचा कि मैं आज अकेले ही खाना खाऊं तो बेहतर है ।" 

"अरे भाई 'जैसे खाता' से क्या मतलब है तेरा । मुंह से ही खाता ना ? और सवाल तो हम अब भी करेंगे । जैसे कि ये किस चीज़ की सब्जी है । बड़ी अलग दिख रही ।" रोहन की बात पर फिर से सब हंस दिए । फिर सब उस सब्जी को देखने लगे ।

"ये कद्दू की सब्जी है यार । आज से छठ व्रत शुरू है ना तो आज नहाय खाय है । आज यही कुछ खाना होता है । और वो थोड़ा साफ सफाई और जूठ से परहेज करना होता है । सबके बीच ऐसे करना अच्छा थोड़े ना लगता । इसीलिए मैं अकेले ही...।" 

"अच्छा भाई तो तू छठ व्रत करता है ?" नीरज ने रमन से पूछा । 

"हां यार ।" 

"अरे पागल तो बताना था ना हम सब एडजस्ट कर लेते । वैसे तुमने खुद बनाया ये सब ?" 

"हां यार । मां से पूछ कर बनाया है । वो फोन पर बताती रही और मैंने बना लिया ।" 

"बढ़िया यार । कोई हैल्प चाहिए तो बताओ ।" 

"नहीं नहीं । सब ठीक है यार । तुम सबने मेरी बात को समझा इसके लिए थैंक यू ।" 

"वैसे कद्दू की सब्जी ही क्यों खाते हैं ?" 

"कद्दू के अलावा साग भी खाते हैं । वैसे तो ये चलन में है इसीलिए सब खाते हैं लेकिन अगर देखें तो कद्दू सुपाच्य है, इम्युनीटी मजबूत करता है । साग गर्म होता है सर्दी जुकाम से बचाता है । अगले दो दिन तक व्रत रहना होता है उस हिसाब से एक दिन पहले अगर ऐसा खाना खाए तो बेहतर होगा जो आगे के दिनों में तबियत खराब ना करे ।" 

"हां यार ये बात तो सही कही ।" अमित ने कहा ।

"वैसे ये कमाल है । हमें नहीं पता था कि शहरी कूल डूड बने रहने वाला बंदा इतना ट्रेडिशनलिस्ट है ।" आरुषी ने ये बात कही थी लेकिन हैरान सब थे । रमन को देख कर लगता नहीं था कि वो इन सब बातों में इतनी आस्था रखता होगा । 

"यार यही कुछ पर्व, त्यौहार ही तो हैं जो हमारे अंदर की परंपरा को बनाए हुए हैं वर्ना हम लोग तो कब के पूरी तरह अंग्रेजी रंगत में रंग गए होते । हम समझ नहीं पाते कि यही परंपराएं हमारी पहचान हैं इनसे नाता टूटने का मतलब है कि हमारा वजूद ही मिट जाएगा । मैं पढ़ाई से लेकर नौकरी तक के लिए हमेशा घर से बाहर ही रहा हूं । अलग अलग राज्यों के बड़े बड़े शहरों की रंगत में रंगा लेकिन ये परंपरा और आस्था का रंग कभी फीका नहीं पड़ने दिया ।" 

"सही बात कह रहा है यार । अच्छा तो ये व्रत में तू और क्या क्या करेगा भाई ?" अमित ने उत्सुकतावश पूछा ।

"भाई मैं व्रत सहूंगा दो दिन और दंड प्रणाम दूंगा सूर्य भगवान को ।" 

"दंड प्रणाम ?" 

"वो लेट कर फिर लकीर खींचते हैं फिर...।" 

"हां हां, ये देखा है मैंने । ये तो बहुत मुश्किल होता होगा ना । और व्रत में कुछ नहीं खाना ?" ये रौशनी थी वो एक दम उछल पड़ी ये जान कर ।

"ना खाना ना पीना । दो दिन तक ऐसे ही ।" 

"बाप रे । ये बहुत मुश्किल है । तुम कर लोगे ?" 

"मैं बचपन से कर रहा हूं । छठी मईया सब पार लगा देती हैं ।" इसके बाद रमन ने छठ व्रत के कई किस्से सबको सुनाए । सब बड़े आश्चर्य से उसे सुनते रहे । लंच टाइम आज ऐसे ही खत्म हुआ । 

सब अपने अपने डेस्क पर लौटने लगे । फिर अचानक से अमित ने पूछ लिया "कहां करेगा ये दंड प्रणाम ।" 

"घाट तो कहीं सज नहीं रहे इस बार लेकिन एक भईया हैं उन लोगों ने एक जगह देखी है वहीं करेंगे छठ । उनके साथ ही मैं भी कर लूंगा ।" 

"हम लोग भी आ सकते हैं ? तेरी हैल्प के लिए भी तो कोई चाहिए ना ।" अमित ने सबकी ओर से ये सवाल किया । रमन जो कल तक अकेला महसूस कर रहा था उसे एकदम से लगा जैसे वो गांव पहुंच गया है ।

"बहुत खुशी होगी यार मुझे ।" 

"तो फिर डन रहा । आज ही हम बॉस से बात करते हैं । कल से हम सब भी छठ देखेंगे । जय छठी मईया ।" अमित की इस जयकार के बाद पूरे ऑफिस में छठी माई की जयकार गूंज उठी । 

ये नज़ारा अलग होने वाला था । ऑफिस के लोग पार्टी के नाम पर तो बहुत बार इकट्ठा हुए थे लेकिन आस्था के नाम पर इकट्ठे होने का ये पहला मौका था । रमन इस नए शहर और नई नौकरी के बीच छठ व्रत के पूरा होने को लेकर जितना घबराया हुआ था उतना ही अब सुकून महसूस कर रहा था । 

***************

नहाय खाय से शुरू हुए इस छठ व्रत की आप सबको बहुत बहुत शुभकामनाएं और एक विशेष प्रणाम उन सभी व्रतियों को जो अपनी मिट्टी से दूर देश विदेश में रह कर अपनी परंपरा को ज़िंदा रखे हुए हैं । छठी माई आपको बल दें 🙏🙏

जय छठी माई 

धीरज झा

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