चाय एक पुल है (चाय के दीवानों के लिए एक कहानी)

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"अबे चल यार चाय पिलाता हूं ।"

"रहने दे तू हर बार चाय चाय बोल कर अपनी बात मनवा लेता है । मैं नहीं आने वाला तेरे झांसे में।"

"अबे फुद्दू, तू चाय को ना बोल रहा है बे । कहां रखेगा इतना पाप । तेरी जगह मैं होता ना तो पहले चाय पीता फिर ना बोलता ।"

"हां यार ये भी सही है । इसमें चाय की क्या गलती । चल भूल जा मैंने जो कहा । पहले चाय पिला फिर ना कहूंगा ।"

"ये हुई ना हरामखोर लौंडों वाली बात ।" दोनों कैंटीन की तरफ भागे । दो दो समोसे और दो दो कप चाय के बाद आखिरकार रोहन ने सागर से अपनी बात मनवा ही ली ।

"इसीलिए मना कर रहा था चाय पीने से । पता था तू साला अपनी बात मनवा लेगा ।"

"मुझे भी पता था कि तू चाय पीते पीते बात मान जाएगा । भरोसा है भाई ।"

"चल, ये जान कर अच्छा लगा कि भरोसा है तुझे मुझ पर ।"

"अबे ओ पतीली के, मैं तेरी नहीं, चाय की बात कर रहा हूं। इस पर भरेसा है कि ये बिगड़े काम बना देती है ।"

"अच्छा ऐसा कैसे ?"

"अरे जब कुछ भी काम नहीं आता तब ये चाय काम आती है । जब मैं टेंथ में था तब से इसने मेरा साथ निभाया है ।"

"वो कैसे भाई बता ना ।"

"हग्गू की क्लास है भाई । नहीं गये तो हगा हगा भराएगा । फिर कभी बताउंगा ।"

"ये तो और भी सही है । लगे हाथ ये भी साबित हो जाएगा कि तेरा ये जो चाय पर विश्वास है ये कितना पक्का है और ये कैसे तुझे बचाती है ।"

"देख ले बेटा । मैं तो बच जाउंगा, गद्दियां तेरी सिकेंगी ।"

"मेरी छोड़ तू पहले चाय का रहस्य बता ।"

"ठीक है भाई जैसी तेरी मर्ज़ी ।" रोहन ने एक लंबी सांस ली और सागर को बताना शुरू किया ।

"देख मैं जब जब मुसीबत में फंसा मुझे इस चाय ने बचाया । हर किसी को बचा सकती है और बचाती भी है लेकिन अहसान फरामोश लोग इसे शुक्रिया कहने की बजाए खुद का पिछवाड़ा थपथपाते हैं ।"

"अबे वो पीठ थपथपाना होता है ।"

"ऐसे लोग पीठ की जगह पिछवाड़ा ही थपथपाते हैं भाई । और वैसे भी तुझे चाय के बारे में जानना है या पीठ और पिछवाड़े के बारे में ?"

"माफी भाई । तू शुरू रख अपना ।"

"तो ये ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ अपने घर से । वैसे तो इंसान गलतियों का पुतला होता है मगर हमारे पूज्य पिता जी हमारी माता श्री के लिए गलतियों की चलती फिरती पाठशाला थे । उन्हें लगता था कि उनके पति सिर्फ और सिर्फ गलतियां ही कर सकते हैं और उनसे भी बड़ी गलती उन्होंने खुद की जो हमारे पिता जी से शादी कर ली। अब बेचारे हमारे पिता जी, उन्हें हर रोज़ खुद की इतनी गलतियां गिनवाई गयीं कि उन्होंने खुद मान लिया कि उनका इस धरती पर आना ही गलत है ।"

"ऐसे कैसे मान लिया यार अंकल ने ?"

"बेटा सब मानते हैं बस जताता कोई कोई है । घर की शांति बचाने के लिए इंसान को मानना ही पड़ता है । ख़ैर साले तू मेरे बाप का वकील है क्या जो सही गलत ढूंढ रहा है ?"

"अरे नहीं भाई । अच्छा गलती हुई आगे बोल ।"

"हां तो मैं बता रहा था कि हमारे पिता जी मान गये थे कि वो बहुत गलतियां करते हैं । अब मान लेने से बात थोड़े ना बनती है । कुछ तो करना पड़ता है जिससे गलतियों के बाद सुनना ना पड़े । तो इसके लिए उनके पास एक तरकीब थी । माता जी जब भी खिसियाने को होतीं तब पिता जी जाते और एकदम कड़क मसालेदार चाय बना कर माता जी के आगे धर देते । अब चाय तो अम्मा जी की कमज़ोरी थी । वो चाय पीते पीते पिता जी का मासूम सा चेहरा निहारतीं, उनका माफीनामा सुनतीं और उनकी गलती को उसी चाय में घोल कर पी जाती । अब हम ससुर बचपन से दिमाग वाले हैं । कहने वालों ने तो ये तक कहा कि हमारे तो सर से पैर तक दिमाग ही दिमाग भरा है । सो हमने इस बात को दिमाग में फिट कर लिया कि चाय जो है ये बहुत तगड़ा वाला सुरक्षाकवच है । अब संजोग देख लो लौंडे कि जिन दिनों हमने चाय के गुण जानें उन्हीं दिनों हमारे छः माही पेपर का रिजल्ट आ गया । नंबर इतने कि पेपर चैक करने वाले मास्टर ने हम पर तरस खा के नंबर देने की बजाए हमारा एबसेंट लगा दिया कि कम से कम बीमारी का बहाना बना कर इज्जत तो बचा पाएगा लौंडा । फाइनल बाक़ी थे लेकिन मां बाप के लिए तो टेस्ट भी परिक्षा से कम थोड़े ना होते हैं। वैसे कभी आधा घंटा भी बैठ कर पढ़ाया ना हो लेकिन रिजल्ट के समय सारा ज्ञान झाड़ देंगे सामने बिठा कर । बाक़ी हमारे पिता जी तो खुद सताए रहते थे । हमको पता था कि रिजल्ट सुनते ही अम्मा के सामने मासूम दिखने वाला ये आदमी हमें जल्लाद की तरह पीटेगा । सारे रास्ते बंद दिखने लगे। बस फिर क्या था हमने पिता जी वाला तरीका उन्हीं पर आजमा दिया । वो ऑफिस से थके हुए आए हमने भी चाय के साथ बिस्कुट सामने धर दिए। क्या बताएं लौंडे उस समय हमारे पिता के चेहरे पर जो हमको लेकर प्यार झलका उस पर तो हम उनके हाथों पिटने को भी तैयार हो गये । लेकिन ये सब हमने पिटने को थोड़े ना करी थी । उन्होंने घूंट भरा, चाय इतनी पसंद आई कि आश्चर्य से उनकी भवें चढ़ गयीं। फिर वो हमारे उदास चेहरे को देख कर बोले ।

"क्या बात बेटा, मुंह क्यों लटका है तेरा ।"

"पिता जी हम बहुत पढ़े लेकिन फेल हो गये । हमको लगता है कि हम बहुत बेकार हैं । बहुते ही ज्यादा बेकार ।" लौंडे उस समय उनकी सूरत देखने वाली थी । उनकी सूरत से साफ पता लगा रहा था कि इस खबर ने उनके अहमदाबाद को जला कर लाल कर दिया है। एक पल के लिए हमको तो लगा कि चाय वाय सब फेल, हम तो गये लेकिन फिर वो भांप गये कि लौंडा सही खेल गया।  शायद हमारे बेबस से चेहरे में उन्हें खुद की वो बेबसी नज़र आई जो माता जी के सामने उनके चेहरे पर झलका करती थी । उन्हें गुस्सा चाय में घोलना पड़ा और मन पर पत्थर रख बोलना पड़ा "कोई बात ना बेटा, फाइनल तक मन लगा के पढ़ना पास हो जाएगा । और सुन शाम की चाय हर रोज़ तू ही पिलाएगा ।" था तो ये अन्याय ही लेकिन मार खाने से तो अच्छा ही था । तो इस तरह हमें चाय की अहमियत के बारे में पता चला ।"

"बहुत सही गुरू । लेकिन क्या इतने से ही चाय को मान गये ?"

"अबे यार एक ना तुम खराब पेट से भी जल्दी हगते हो । थम जाओ जरा और ये फोकट का ज्ञान कब तक सुना पाएंगे । चलो एक कप चाय बोलो । और पिछले का बिल भी तुम्हीं चुकाना ।"

"अरे यार ये गलत है । तुम अपने काम से हमको लाए थे ।"

"ठीक है भाई तो हमारा काम हो गया अब चलें ।"

"अबे बइठो यार । मंगाते हैं, तुम शुरु करो आगे ।" सागर ने बुरा सा मुंह बना कर दो चाय का ऑर्डर दिया ।

"तो अब इसके बाद हम बाहर भी ये नुस्खा आजमाने लगे। फाइनल के एग्जाम का टाइम आ गया और बुद्धि में कुछ घुसा ही नहीं। फिर हमने पिलाई अपने मास्टर को चाय ।"

"अबे चल, तुमने चाय पिलाई और अगला मान गया ?"

"फिर बीच में हगा ना। सुन यहां भी चाय ही काम आएगी  । तू ना चाय में पानी डाल के पी तेरा हगना बंद हो ।"

"अच्छा ठीक है अब नहीं बोलेंगे । तू सुनाता रह ।"

"मास्टर साहब को हमने कहा सर आज आपका ये शिष्य आपको चाय पिलाना चाहता है । मास्टर साहब ने हमको ऊपर से नीचे तक देखा । फिर बोले चल कर ले दिल की तमन्ना पूरी। हमने मास्टर को चाय और सुट्टा दोनों पिलाया । पूरा हफ्ता भर पिलाते रहे। इस टाइम पर मास्टर हमारी सारी बातें सुनता । धीरे धीरे हम थोड़ा खुल गये उनसे । उस दुखी आत्मा की कहानियां सुनी दो चार और फिर एक दिन अपनी समस्या बता दी । बंदा मेरे कंधे पर हाथ रख के बोला। बेटा तू चिंता ना कर तेरी समस्या मैं हल करूंगा ।"

"खाली चाय से कोई इतनी बड़ी बात कैसे मान सकता है ।"

"यहीं तो सब गलती कर जाते हैं । बात सिर्फ चाय की नहीं होती । बात होती है चाय पीते हुए साथ बिताए गये वक्त की । इस टाइम हम एक दूसरे की सुन रहे होते हैं । एक दूसरे के चेहरे के हाव भाव पढ़ रहे होते हैं। दुनिया इतनी फुद्दू ना है भाई कि पानी में उबली पत्तियों चुटकी भर चीनी और आधा कप दूध के लिए किसी भी काम को छोड़ कर ब्रेक पर निकल जाए । चाय एक बहाना है एक साथ बोलने बतियाने और अपनी बात रखने का। ये तो बस शुरुआत बताई मैंने। इससे आगे बहुत कुछ चाय के दम पर ही किया । तुझे पता है मैंने अपनी गर्लफ्रेंड के साथ पहली डेट चाय की टपरी पर अरेंज की थी वो भी उसे बिना बताए । कोई कैसे सोचेगा कि मैंने चाय की टपरी पर डेट अरेंज की है। चाय पीने के दौरान ऐसी ऐसी बातें की कि तेरी भाभी फ्लैट हो गयी । और फिर वहां से चलते हुए कह दिया कि याद रखना हमारी पहली डेट टी स्टाल पर हुई थी। आगे से वो शर्मा गयी और शर्माने का मतलब तो तू जानता ही है ।"

"सही है भाई तेरा । दो चार और गुण बता दे चाय के ।"

"अरे जितने भी बताऊं कम है । कॉलेज के सीनियरों से दोस्ती की चाय पिला कर ही, अपने काम निकलवाए चाय पिला कर ही। मैं तो कहता हूं ।'चाय' जिसने भी बनाई बड़ी कमाल की चीज़ बनाई है। ससुर चायपत्ती दूध और चीनी से एक पुल बना दिया ।"

"अब ये क्या है ? पुल और चाय में क्या कनेक्शन बे ।"

"अरे बिलकुल है । चाय पुल ही तो है, दो विचारों के बीच का पुल, दो पीढ़ियों के बीच का पुल, दो अहसासों के बीच का पुल, गरीबी और अमीरी के बीच का पुल । चाय ना होती तो किसी जा रहे अपने को 'रुको चाय बनाते हैं' कह कर रोकने की कोशिल कैसे करते हम ? किसी भूल चुके को 'कभी घर आओ चाय पीने' कह कर अपने घर का रस्ता उसे कैसे याद कराते । कैसे किसी बात पर 'चल यार चाय पीते हैं' कह कर मिट्टी डालते । भाई ये चाय ना होती तो कितने रिश्ते बनने से पहले ही टूट जाते, चाय ना होती तो कितने कीमती दोस्त कहीं पीछे छूट जाते । लौंडे दारू को दोस्ती की नींव मानते हैं लेकिन एक दूसरे का पेग बनाने का रास्ता भी ये चाय ही खोलती है । दारू पी कर लोग मस्ती मज़ाक हंगामा करते हैं लेकिन चाय पीते हुए लोग शक्लों को ग़ौर से देखते हुए अचानक से पूछ देते हैं 'क्या बात है यार उदास लग रहा है ।' इस चाय की कोई उम्र नहीं, बाप बेटे के बीच बात करने का बहाना है चाय, मां के हाथों का प्यार, बहन की फिक्र तक सब इसी चाय में है । और तो और चाय का स्वाद देख कर इंसान बीवी का मूड तक भांप जाता है । अंग्रेज़ चूतिये हो सकते हैं लेकिन वे जो सबसे सही चीज़ छोड़ के गये वो थी चाय ।"

"गजब मेरे भाई । बहुत जगह पढ़ा है कि चाय पीने से बहुत नुक़सान हैं लेकिन जितने फायदे तूने गिना दिए इनके आगे नुक़सान तो बहुत कम हैं भाई । वैसे अपन लोग की दोस्ती भी तो चाय से ही शुरू हुई थी ना ।"

"हां यार, चाय से मुझे बस एक यही तो नुक़सान हुआ ।" सागर ने एक गाली दी और रोहन खूब ज़ोर से हंसा ।

"ज़रा बताएंगे कि क्लास में क्यों नहीं पधारे आप दोनों ?" पीछे से आई इस आवाज़ ने दोनों की हंसी रोक दी । पीछे देखा तो हरीश उर्फ हग्गू सर खड़े थे । सागर की सांस सूख गयी । हरिश सर वो मेंटल केस थे जिसे किसी से डर नहीं था । कॉलेज में भी लौंडों की इनके नाम से गीली हो जाया करती थी ।

"बिलकुल बताएंगे सर । लेकिन पहले यहां बैठिए तो सही ।" रोहन ने कुर्सी से उठते हुए बड़े प्यार से कहा ।

"बैठूंगा तो मैं बाद में पहले वजह बताओ कि क्लास में क्यों नहीं आए ।"

"आपके ही बारे में बात कर रहे थे सर ।"

"मेरे बारे में ?"

"हां सर, अब देखिए ना सर आपके पढ़ाने के तरीके की वजह से सब आपकी कितनी रिस्पेक्ट करते हैं लेकिन आपका ख़याल किसी को नहीं रहता । आप कितना स्ट्रेस लेते हैं हम लोगों के लिए । तो हम आज इसीलिए रुके थे यहां कि क्लास के बाद आपके साथ बैठ कर चाय पीएंगे । स्पैशल चाय है सर।" चाय की सबसे बड़ी खूबी यही होती है कि सामने वाला जान रहा होता है कि मुझे किस वजह से चाय ऑफर की जा रही है लेकिन फिर भी मना नहीं कर पाता । जैसे कि हरीश सर नहीं कर पाए । तीनों ने बैठ कर बातें की और इसी दौरान दोनों ने हग्गू सर को पहली बार मुस्कुराते देखा ।

"तेरा कमाल है भाई । सच में तेरा जवाब नहीं। मगर इतनी हिम्मत लाता कहां से है ।" सर के जाते ही सागर ने रोहन से कहा ।

"अबे सिंपल सी बात है । हर इंसान को अपनी तारीफ और कोई उसकी फिक्र करे ये अच्छा लगता है । बाक़ी मैंने कहा ना चाय आखिरी उम्मीद है मेरे लिए । मैंने सोचा बजानी तो उसने ऐसे भी है तो क्यों ना चाय वाला तरीका आजमा लिया जाए। वैसे भी 10 में से 8 लोग चाय को ना नहीं बोलते और जो लोग सारा दिन जले भुने से दिखते हैं वो तो कतई ना नहीं बोलते ।"

"बहुत सही भाई । मुझे लगता है तेरा चाय पर ये विश्वास एक दिन अपने देश में चायपंथ की नींव रखे जाने का कारण बनेगा । और तू होगा हमारा मसीहा ।"

"चल बे, मैं लोगों को चढ़ाता हूं तू मुझे ही चने के झाड़ पर चढ़ा रहा है ।"

"चने के झाड़ पर नहीं भाई चायपत्ती के झाड़ पर ।" एक साथ दोनों हंसे और पास ही स्टोव पर चढ़ी चाय खौलते हुए भी मुस्कुरा दी ।

धीरज झा

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