विधाता की गलती (आपके काम की बात)

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अगर बात में दम ना लगे तो इसे कोरी बकवास मान कर इग्नोर करें और अगर बात कहीं से सही लगे तो लाइक शेयर कुछ ना करें बस इस पर ज़रा सा सोचें । सोचने से बहुत कुछ सुलझता है । 


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विधाता दुनिया बना रहा था । उसने दुनिया बना दी तब बनाना शुरू किया जीव जंतुओं को और फिर बनाए इंसान। छोटे छोटे कीट मकौड़ों के लिए बड़े जानवर अजूबा थे वैसे ही जानवरों के लिए इंसान आश्चर्य का विषय बन गए । एक दूसरे से कानाफूसी शुरू हो गयी । लाख भिन्नता थी फिर भी सब संतुष्ट थे ये देख कर कि अलग अलग आकार के ही सही अंग तो सबके पास एक जैसे ही हैं । इतने में घोषणा हुई कि सबके जीवन का एक ही तरीका होगा । जैसे जानवर जिएगा वैसे ही इंसान भी जिएंगे ।


छोटों की तो कभी चली ही कहां है । हां लेकिन बड़े खुश थे, फिर वो जानवर हों या इंसान । लेकिन तभी एक घोषणा और हुई बताया गया कि विधाता ने इंसानों को कुछ ज़्यादा ही प्यार से बनाया है इसलिए इनको एक चीज़ अतरिक्त दी है और वो है दिमाग। इस दिमाग से ये इंसान और भी बहुत कुछ सीख सकेंगे जो आगे चल कर धरती के हर जीव के लिए फायदेमंद होगा । दिमाग तो किसी के पास था नहीं इसीलिए किसी को उतना फर्क भी ना पड़ा । मगर महसूस तो होता ही है । भेदभाव हो रहा था और भेदभाव का अहसास तो मन से होता है । किड़े मकौड़े जीव जन्तु सब समझ रहे थे कि इंसानों को जो दिया जा रहा है वे उनके अधिकार से कटा है । जानवर तो जानवर ही थे, उनकी सुनता ही कौन  लेकिन हां दुखी मन की हाय तो बिना कहे सुने भी लग ही जाती है । वही लगी इंसानों को ।


जानवर इंसानों के अधीन हो गये और इंसान के हाथ आई धरती की सत्ता । एक बात मैं हमेशा से आज़माता आया हूं कि हम अपने हक़ से ज़्यादा कुछ भी लेते हैं तो हमें उस चीज़ के मालिक के कर्मों में भी हिस्सेदारी लेनी पड़ती है । जैसे कि आपने अगर किसी चोर का पैसा पा लिया तो आपको उसकी चोरी के पाप में भी भागीदारी मिल जाती है । इंसान को धरती के हर जीव जंतु के हिस्से से थोड़ा थोड़ा जीवन मिला, इंसान को उनसे बेहतर बनाने के लिए उनके कई अधिकार छीन लिए गए । लेकिन इसी के साथ उनके अवगुणों में हिस्सेदारी भी मिली हमें । जो उन्हें भुगतना था वो सब हम ज़िंदगी में कभी ना कभी भुगतते हैं। इंसान इंसानी जीवन भी जीता है, जानवर की तरह कमाता भी है, कीड़ों की तरह रेंगता भी है, गधे की तरह लतिआया भी जाता है और कुत्ते की तरह उसे स्वामीभक्त भी बनना पड़ता है । इसी तरह कई जानवरों की तरह हमें दिन काटने पड़ते हैं ।

इन सबके बाद भी हमें जो सज़ा मिलती है वो हमारे अपने कर्मों की वजह से । हम खुद ही खुद की सज़ा चुनते हैं । हम चाहते तो पेट के लिए भोजन रहने के लिए छत और तन के लिए कपड़ा बना कर संतुष्ट हो सकते थे लेकिन हमें विकसित कहलाना था । साबित करना था कि हमने अपने दिमाग से वो कर दिखाया जो ईश्वर भी हमारे लिए नहीं कर सका । अच्छा भी है, जो हमारे पास है उसका इस्तेमाल क्यों ना करें हम।  लेकिन समस्या तब आ गयी जब हमने खुद को ही मारने का पूरा इंतज़ाम कर लिया जिससे हम खुद को ही उससे बचने का सामान बेच सकें।


हमने खुद के तंदरुस्त शरीर को बीमार किया ताक़ी हम दवाईयां बेच सकें, हमने अपने आसपास का पानी गंदा किया जिससे हम ये आरो ये वाटर फिल्टर बेच सकें, हमने हवा तक में ज़हर मिला दिया क्योंकि हमें मास्क बेचने थे । हम मिट्टी बेच रहे हैं, खून बेच रहे हैं, बारूद बेच रहे हैं, मौत बेच रहे हैं जिससे हम खुद को ही डरा कर खुद की ही सुरक्षा बेच सकें। हम सब तो इंसान ही हैं । फिर हम खाद के नाम पर ज़हर बेचते हुए ये क्यों भूल जाते हैं कि ये एक दिन घूम कर हमारी थाली में ही परोसा जाएगा । हम हवा में ज़हर घोलते हुए क्यों भूल जाते हैं कि हमें भी इसी में सांस लेना है । पानी को गंदा करते समय हमें क्यों याद नहीं रहता कि प्यास हमें भी लगती है । मौत परोसते हुए अनजान हैं इस बात से कि एक दिन यही मौत हमारे बच्चों का गला दबाएगी ।


हमारे पास बहुत कुछ है अच्छा करने के लिए, दुनिया को सुंदर बनाने के लिए लेकिन हमें फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम मक्खियां हो गये हैं हमें घूम कर गंदगी पर ही बैठना है । आज आप किसी से एक अच्छी बात कहें तो सामने से कहा जाएगा 'साला हर वक्त भाषण देता रहता है ।' वहीं कोई गंदा सा चुटकुला सुना दें तो लोग कहेंगे 'फलाने बड़े मजाकिया हैं, सबको हंसाते रहते हैं ।'


जानवर आज भी अपनी ज़िंदगी जी रहा है लेकिन हम अब भी जानवर की ज़िंदगी जी रहे हैं । कभी हम भेड़ हो जाते हैं, कभी हम सब कुछ सहने वाले मार खाते रहने वाले मवेशी तो कभी हम आदमखोर बन जाते हैं । हज़ारों साल लग गये हमें जानवर से इंसान होने में लेकिन उस जानवर को हम अपने अंदर से कभी निकाल ना पाए जिसका हक़ मार कर विधाता ने हमें सर्वश्रेष्ठ बनाया था । 


गलती हुई कहां ? हम क्यों ऐसे होते जा रहे हैं ? क्यों हमें सही गलत में फर्क समझने में देर लग जाती है ? काश कि ईश्वर सामने से दिख पाते तो उनसे ऐसे कई सवाल कर लेता । अगर हम कोशिश नहीं करते हैं इंसान बनने की तो आने वाली नस्लें खुद को विधाता की सबसे बड़ी गलती मान लेंगी । हम कभी नहीं चाहेंगे कि हमारा ईश्वर कभी गलत हो । आंखें खोलनी होंगी और देखना होगा कि आसपास जो हो रहा है वो गलत है, हम सब कहीं ना कहीं गलत हैं। दुनिया को सुधारने के लिए हमें खुद को सुधारना होगा । 



धीरज झा

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