इरफ़ान सर के साथ वो मुलाकात ❤️❤️

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ज़्यादा सपने नहीं देखे मैंने कभी । बस थोड़े बहुत हैं जिनमें कुछ पूरे हो गए और एक आध अभी बाक़ी हैं । इन्हीं सपनों में से एक बड़ा सपना था इरफ़ान सर से मिलना । खुशकिस्मत हूं कि उनके जाने से पहले ये सपना पूरा हो गया था ।  उन दिनों किसी काम से अमृतसर गया हुआ था । हालांकि उन दिनों मुझे कुछ खास काम रहता नहीं था इसीलिए किसी के साथ भी कहीं जाता तो यही कहता कि काम से जा रहा हूं । बहरहाल, क्यों गया कैसे गया ये मायने नहीं रखता । बस जान लीजिए कि मैं गया था । 


इरफ़ान सर का हमेशा से प्रशंसक रहा हूं । बाकी सभी अभिनेता मुझे पसंद या ना पसंद हैं लेकिन ये शख्स मेरे लिए अनोखा रहा । मैं हमेशा से जानना चाहता था कि ये इंसान सामने से भी ऐसा ही दिखता है या फिर अलग है । हालांकि किसी से चंद घड़ी भर की मुलाकात या किसी के साथ चलते चलते फ़ोटो खिंचवाने वाली भीड़ का हिस्सा नहीं रहा हूं मैं कभी से । लेकिन इस शख्स से मिलना चाहता था हमेशा से मैं । मुझे अमिताभ बच्चन और इरफ़ान खान में से किसी एक से मिलने का मौका मिलता तो मैं बिना सोचे इरफ़ान सर को ही चुनता । 


मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि अमृतसर में मेरी ये तमन्ना पूरी होने वाली है । इरफ़ान सर अमृतसर आए हुए थे, किसी काम से । हरीश पाजी ने ऐसे ही चर्चा कर दी कि यार एक बंदे से मिलना था लेकिन वो आज किसी हीरो के साथ बीजी है । उसका सारा अरेंजमेंट वही देख रहा है । मैंने ऐसे ही पूछ लिया कि पाजी कौन हीरो । तो बोले यार कोई इरफ़ान खान कर के है । मैं एकदम चौंक गया । मैंने ऐसे ही कहा कि पाजी क्या आपका दोस्त इरफ़ान खान से मिलवा सकता है ? 


पाजी मुसकुराते हुए बोले "साले ने पंज लख देने हैं मेरे जो कहूंगा वो करेगा ।" 


पाजी को मैंने मना लिया और उन्होंने अपने दोस्त को फोन लगा दिया । हालांकि उनका दोस्त ऐसे ही नहीं मिलवा सकता था लेकिन वो बेचारा कर्जदार था, तो उसे पाजी की बात उसे माननी पड़ी । उसने कहा कि ठीक है आज शाम को जब फोन करूं तब आ जाना । 


वैसे तो हमें निकलना था घर के लिए लेकिन मेरी वजह से पाजी भी रुक गए । जैसे जैसे शाम का समय नजदीक आ रहा था वैसे वैसे मेरा दिल धड़क रहा था । मैं सोच रहा था कि आखिर उनसे बात क्या करूंगा ? क्या पूछूँगा ? अगर वो पूछेंगे कि क्या लिखते हो तो क्या सुनाऊंगा उन्हें ? यही सब सोचते सोचते शाम हो गई और हम पहुंच गए वहां जहां मेरा एक सपना सच होने के इंतज़ार में बैठा था । 


हम पहुंचे तो देखा कि सामने वाले कमरे में इरफ़ान सर एक हरी टीशर्ट पहने पैर पर चढ़ा कर बेफिक्री से बैठे हुए अपने ही खयालों की दुनिया में कहीं गुम हैं । हमें देखते ही हरीश पाजी का दोस्त आया, उसने हरीश पाजी से हाथ मिलाया और फिर उनके कान में कुछ कह कर इरफ़ान सर के रूम में चला गया । शायद उसने कहा था कि बस पाँच मिनट ही मिल सकते हैं । खैर मेरे लिए इतने भी बहुत थे । कुछ मिनटों बाद वो बाहर आया और उसने हमें अंदर आने के लिए कहा । 


मैं थोड़ा नर्वस था, थोड़ा नहीं बहुत ज़्यादा ही था । अंदर जाते ही पाजी के दोस्त ने पाजी का इरफ़ान सर से परिचय करवाया और फिर पाजी ने मेरा परिचय इरफ़ान खान से करवाते हुए कहा "सर जी ये मुंडा आपका बिग फैन है जी । जब इसने सुना कि आप आए हैं तो आपसे मिलने की ज़िद करने लगा ।"


"ऐसा क्या है मुझ में यार जो तुमने मिलने की ज़िद कर दी ।" पहली बार सामने से उनकी आवाज़ सुनी थी । उन्हें पर्दे पर इतनी बार देख चुका था कि अब ये हकीकत भी किसी फिल्म जैसी ही लग रही थी । मैं कोई जवाब नहीं दे पाया । 


"अरे छोटे भाई मिलना ही था या फिर कुछ बोलना भी है ?"


"बोलना है सर जी ।" मैं इतना ही बोल पाया और वहीं जम सा गया। 


"अरे यार तुम पहले इधर आओ । बैठो यहां । ये पानी पियो ।" मुझे इस बात का बिलकुल अहसास नहीं था लेकिन मैं पूरी तरह पसीने से भीग चुका था । जब उन्होंने इस तरह से मुझे कहा तब मैंने खुद पर गौर किया । पानी पीया और फिर कुछ इधर उधर की बातें कीं ।  


"सर ये आपकी आँखें । ऐसी ही रहती हैं या फिर वो फिल्म के टाइम कुछ लगा कर ऐसी बना देते हैं ।" कुछ बातें होने के बाद मैंने अपने बे सिर पैर का सवाल उनके सामने रख दिया । मेरा सवाल सुनते ही वो ज़ोर ज़ोर से हंसने लगे । 


"छोटे भाई ये आँखें ही तो असल हैं बाकी सब बनावटी है । इंसान बचने के लिए लाख रूप बदल ले लेकिन ये आँखें हमेशा पकड़ में आ जाती हैं ।" मन हो रहा था वो बोलते जाएं और मैं सुनता रहूं । यकीन मानिए कई नामी फिल्में ऐसी हैं जिन्हें देखने से बेहतर लगा मुझे इरफ़ान सर की बातें सुनना । 


जब उन्हें मैंने बताया कि मैं कहानियां लिखता हूं तो उन्होंने एक कहानी सुनाने को कहा मुझे । इतना करने के लिए मुझे ना जाने कितनी हिम्मत जुटानी पड़ी । मैंने कहानी सुना दी । वो बड़े आराम से सुनते रहे । कहानी के खत्म होने पर बोले । "बढ़िया लिखते हो यार । कभी मेरे लिए भी एक कहानी लिखना जिसमें मैं मरने के बाद भी ज़िंदा रह सकूं ।" 


मैंने मुस्कुरा कर कहा "जरूर सर, मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी ।" 


वो मुस्कुराए । मैंने फिर कहा "सर आज एक सपना पूरा हो गया मेरा ।" 


"कैसा सपना ?"


"आपसे मिलने का । कभी सोचा नहीं था कि इतने आराम से मिल पाऊंगा आपसे ।" 


"यार मोहब्बत होनी चाहिए मिलना मिलाना तो बस एक खयाल सा है । अब जब तुम यहां से जाओगे उसके बाद ये सब तो एक याद ही बन कर रह जाएगा ना । ये पल हम कैद कर के नहीं रख सकते । ये बस दिल की तसल्ली के लिए है कि हां मैं फलां आदमी से मिला हूं । अब मुझे ही देख लो, कभी सोचता था कि फलां हीरो से मिलूँगा, फलां के साथ बैठ के कुछ बातें करूंगा, आज जब ऐसा हो रहा है तब भी क्या बदला है ? मैं मैं ही हूं वो वो ही हैं । बस एक याद बन गई है कि उनसे मिला था ।" मैं उनकी बातें समझने की कोशिश कर रहा था । अभी और देर उनसे बातें करनी थीं मुझे मगर हरीश पाजी चिल्लाने लगे कि उठो उठो, बहुत देर हो गई है । 


मैं खीज गया । सोचा, अभी रात को कहां जाना है उन्हें जो देर हो रही है । मैंने उनकी बात को अनसुना करते हुए इरफ़ान सर से सवाल किया "सर, तो क्या अगर मैं आपसे अपने खयालों में भी मिल लेता तो मेरे मन को शांति मिल जाती ?"


"ये तुम पर निर्भर करता है है कि तुम अपने मन को समझा सकते हो या नहीं । मान लो तो सपना भी सच है और ना मानो तो सच भी हजारों सपनों के बीच खो जाता है ।" वो बोल रहे थे और हरीश पाजी का चिल्लाना और तेज हो रहा था । उठो, उठो, बहुत देर हो गई है । 


मुझे बहुत तेज गुस्सा आया । मैं इरफ़ान सर की परवाह किए बिना उठा और ज़ोर से चिल्लाया "कहां देर हुई है । अभी तो रात है ।"


"हां सुबह के 6 बजे सोने पर दिन के 12 बजे भी रात ही लगती है । बाहर निकल के देखो दुनिया अपने अपने आधे काम निपटा चुकी है ।" ये मां थीं । जब तक मुझे पूरी तरह अहसास होता कि ये सपना है तब तक मैंने दोबारा आँखें बंद कर लीं । मैं उसी जगह था जहां से सपना टूटा था । मैं हर तरफ इरफ़ान सर को खोज रहा था लेकिन वो कहीं नज़र नहीं आ रहे थे । सब कुछ वैसा ही था लेकिन एक वही नहीं थे । मुझे लगा वो जा चुके हैं । मैं मायूस हो कर सपने से हकीकत में लौटने ही वाला था कि वो सामने खड़े दिखे । 


"कहा था ना छोटे भाई, सब मानने पर है ।"


"तो सर क्या अगर मैं इस सपने को हकीकत मान लूं तो हमारी ये मुलाकात सच मानी जाएगी ?"


"पहले ये बताओ कि तुम्हें मनवाना किससे है ? तुम मुझसे अपनी खुशी के लिए मिलना चाहते थे या लोगों को दिखाने के लिए ।"


"अपनी खुशी के लिए सर ।"


"तो फिर इसे सच मानों और खुश हो जाओ ।" उनकी बात सुन कर मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट खिल गई ।"


"बढ़िया, ऐसे ही खुश रहो । और हां, मेरी वो कहानी ज़रूर लिखना । जहां मैं ना हो कर भी हमेशा रहूं । चलो चलता हूं ।"


"पक्का सर । बाय सर ।"


 ************************************


वो चले गए और मैं मुस्कुराता हुआ हकीकत में लौट आया । हमारी मुलाकात बहुत अच्छी रही । मुझे ये कभी नहीं भूलेगी और ना भूलेंगी उनकी बातें । इससे बेहतर और क्या हो सकता है । मैंने इस शख्स को जाने के बाद भी खुद के खयालों में ज़िंदा रखा है, इससे ज़्यादा और मैं क्या ही कहूं उनके लिए । उनके साथ ही एक नया साथी भी मिल गया हरीश पाजी । इस बंदे को अपने सपने से पहले मैं कभी नहीं मिला । खैर बंदा अच्छा था जिसने सपने में ही सही मगर इरफ़ान सर से मुलाकात तो कारवाई ।  


बाकी थोड़ी देर से ही सही जन्मदिन मुबारक हो गुरु, जहां रहो अपनी जिंदादिल मुस्कान के साथ मुस्कुराते रहो । तुम्हें हमेशा याद रखेंगे । इसी तरह कहानियों में किस्सों में । देखो गुरु, तुम ना हो कर भी हर जगह हो ।   


धीरज झा    


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