रेडियो नहीं था वो ! (प्रेम कहानी)

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 “शालू तुम तो जानती हो ना मैं सिद्धार्थ के जन्म से पहले से कहता आ रहा हूं कि हमें एक ही बच्चा चाहिए । उसके बाद जो उसका जीवन साथी बनेगा वही हमारा दूसरा बच्चा होगा । बेटी हुई तो दामाद जी को बेटा मान लेंगे और बेटा हुआ तो बहू को बेटी की तरह रखेंगे । लेकिन अब जब बहू आ गई है तब समझ ही नहीं आता कि उसे बेटी की तरह कैसे रखूं ।” नंद जी की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि एक ठहाका गूंजा । नंद जी ने सामने की तरफ घूर के देखा ।


“क्या है ? मैं इतनी गंभीर चर्चा कर रहा हूं और तुम हो कि हंस रही हो । अगर ऐसा दोबारा किया तो मैं बात करने नहीं आया करूंगा । वैसे भी तुमसे बात करने के लिए मुझे लोगों से ना जाने क्या क्या सुनना पड़ता है । अजीब ज़माना है ना जाने किस बात पर उंगली उठा दे । बताओ अपनी बीवी से भी मुझे छुप छुप कर बात करनी पड़ती है । तुम्हें पता है लोग मुझे पागल कहने लगे हैं । मगर मुझे अच्छा लगता है खुद को पागल कहलाना । कितना सही है ना । जवानी में भी तुम्हारे लिए पागल था और आज भी तुम्हारे लिए ही पागल हूं । वैसे मैं अभी भी स्मार्ट दिखता हूं चाहूं तो कहीं और भी बात चला लूं मगर हाय रे ये मोहब्बत ।” नंद जी का इतना कहना था कि कमरे में एकदम खामोशी छा गई ।


“अरे अरे, तुम तो नाराज़ हो गई । प्लीज़ ऐसे चुप ना रहो मुझे अच्छा नहीं लगता । अच्छा माफ कर दो ना । मैंने तो बस मज़ाक किया था । मुझ बुड्ढे को तो सिर्फ तुम ही झेल सकती हो । बोल लो ना प्लीज़, अभी बहू आ जाएगी तो मुझे जाना पड़ेगा ।” नंद जी और भी बोलना चाहते थे लेकिन उससे पहले ही कमरे में कोई दाखिल हुआ ।


“अंदर आ जाऊं पापा ।” ये नंद जी की बहू है रूपा । उसकी आवाज़ सुनते ही नंद जी ने तुरंत पीछे देखा ।


“नहीं, बिलकुल मत आओ ।” नंद जी के जवाब से रूपा के पैर वहीं के वहीं रुक गए । वो थोड़ा सा सहम भी गई ।


“क्या हुआ पापा मुझसे कोई गलती हुई ।” रूपा ने डरते डरते पूछा ।


“हां बहुत बड़ी गलती हुई है ।”


“क्या पापा ? मुझे बताइए । मैं दोबारा नहीं करूंगी ।”


“मैं जानता हूं तुम फिर से करोगी गलती इसीलिए अब से सज़ा मिलेगी ।” नंद जी थोड़ा कड़क हो कर बोले ।


“आप बताइए तो सही मैं पक्का सुधार लूंगी उस गलती को ।”


“तो सुन लो अब से तुम पूछोगी नहीं कि अंदर आ जाऊं पापा । जब पूछोगी तब मैं मना कर दूंगा । कितनी बार कहा है कि अब ये घर तुम्हारा है । तुम जहां मर्जी आओ जाओ । पूछना तो अब मुझे चाहिए ।” नंद जी की बात सुन कर रूपा खिलखिला कर हंस दी, नंद जी ने भी अपने चेहरे से नकली गुस्सा उतार दिया और हंसने लगे ।  


“लेकिन पापा ये तो शिष्टाचार है ना कि बिना पूछे किसी के कमरे में नहीं जाना चाहिए ।”


“अजी तेल लेने गया ऐसा शिष्टाचार । वैसे भी अगर किसी के कमरे का दरवाज़ा पूरी तरह खुला हो तो इसका मतलब होता है कि उसे किसी के भी अंदर आने से आपत्ति नहीं । और मेरा कमरा हमेशा खुला रहता है । शालू को बंद कमरे में डर लगता है ना तो उसी से मुझे भी आदत....” नंद जी बोलते बोलते चुप हो गए । रूपा भी कुछ सोचने लगी लेकिन नंद जी ने झट से बात बदल दी ।


“चलो चाय तो तुम्हारे हाथों की बहुत पी ली आज शरबत भी पी लेता हूं । लाओ दो ।”


“लेकिन शरबत है कहां पापा, ये तो चाय है । ठंड में शरबत क्यों बनाऊँगी मैं ?” रूपा सोच में पड़ गई ।


“बेटा जितनी देर से तुम प्याली लेकर खड़ी हो उतनी देर में तो ये चाय शरबत बन ही गई होगी ।” इसके बाद रूपा ने चाय की तरफ देखा और ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी । नंद जी उसकी हंसी में जैसे खो से गए । बहुत दिनों बाद ऐसी हंसी इस घर में गूंजी थी । वो रूपा का मासूम सा चेहरा निहारते रहे । इतनी देर में सिद्धार्थ भी ऑफिस से लौट आया ।


“तुम में शर्म हया है की नहीं । ससुर जी के सामने ऐसे हंसती हो ?” सिद्धार्थ की आवाज़ सुन कर सबकी नज़र दरवाज़े की तरफ गई ।


“ससुर होते तो ना हंसती मगर पापा के सामने तो ऐसे ही हंसती आई हूं और ऐसे ही हंसती रहूंगी । क्यों पापा, गलत कहा हो तो कहिए ?”


“अरे बिलकुल नहीं बेटा । ये तो गधा है । ऐसे ही बोलता रहता है ।” रूपा फिर से हंसने लगी ।


“सही है पापा, इतनी सेवा मैंने की और अब आप उसकी साइड हो गए ।”


“कौन सी सेवा बेटा । तेरे कच्छे तक मैं धोता रहा हूं । अपना काम होता नहीं और मेरी सेवा करेगा । चल भाग ।” रूपा की हंसी रुक ही नहीं रही थी ।


“क्या पापा बीवी के सामने ऐसे इंसल्ट करेंगे आप ।”


“तेरी बीवी के सामने थोड़े ना कर रहा हूं । मैं तो अपनी बेटी के सामने कर रहा हूं, तेरी ‘इंसल्ट’ ।”


“अब दांत ही दिखती रहोगी या मुझ गरीब को चाय पानी भी दोगी । अब यहीं रहना है तुम्हें । जी भर के सुन लेना मेरी बुराई ।” कुछ देर हंसी मज़ाक के बाद सिद्धार्थ और रूपा कमरे से निकल गए । उनके निकलते ही कमरे में जो पहले सन्नाटा छाया था वो अचानक ही किसी मधुर गीत के साथ टूट गया । नंद जी ने मुसकुराते हुए दूसरी तरफ देखा ।


“मान गई तुम ।” नंद जी एक टक उसी तरफ तब तक देखते रहे जब तक उनकी आँखों ने बरसात शुरू नहीं कर दी ।


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कई दिनों बाद


कुछ दिनों से रूपा की बहन आई हुई थी । उसके आने से घर की रौनक और बढ़ गई थी । बड़ा चंचल स्वभाव था उसका, सारा दिन घर में इधर से उधर करती रहती थी । नए बच्चे बड़े बुजुर्गों से दूर भागते हैं लेकिन वो नंद जी के साथ काफी समय बिताती थी । उनके कमरे से किताबें ले आती, उनके किस्से कहानियां सुन सुन कर कभी हंसती तो कभी रो देती । ऐसा लगता था जैसे वो नंद जी को किसी पहेली की तरह सुलझा रही हो लेकिन वो जितना उन्हें सुलझाने की कोशिश करती वो उतने उलझे हुए नज़र आते । दूसरी तरफ नंद जी काफी खुश थे । अक्सर कहते “हमने तो एक बेटी का कहा था यहां तो दो दो आ गईं ।”


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उन्हीं दिनों किसी दिन


“दीदी तुमसे कुछ पूछूं ? बुरा तो नहीं मानोगी ना ?” दोपहर के समय दोनों बहनें रूपा के कमरे में लेटी हुई थीं तभी अचानक से खुशी ने ये पूछ लिया ।


“वाह बेटा, इतनी तहज़ीब कहां से सीख ली ? तू कब से कुछ करने से पहले पूछने लगी ।” रूपा की आँख लगी ही थी कि खुशी के इस सवाल ने उसकी नींद उड़ा दी ।


“बात ही कुछ ऐसी है । वैसे भी अब ये तुम्हारा घर है और यहां के बारे में कुछ भी कहने पूछने से पहले तुमसे पूछ लेना लेना जरूरी है ना ।”


“गुड गर्ल । चल अब पूछ ले ।”


“देखो बुरा लगे तो माफ कर देना । गुस्सा मत करना ।”


“ऐसा क्या पूछने वाली है तू ? अच्छा पूछ नहीं करूंगी गुस्सा । वैसे भी मैं तुझ पर गुस्सा नहीं करती जानती है ना तू ।”


“हां बस मुंह फुला कर कई दिनों तक बात नहीं करती । तुम्हारे गुस्सा ना करने से अच्छा तो यही है कि तुम गुस्सा कर लिया करो ।”


“अच्छा मुंह भी नहीं फुलाऊँगी । अब पूछ ले वर्ना मैं चली सोने ।”


“नहीं नहीं मैं पूछती हूं ।”


“हां पूछ ।”


“ये पापा कैसे लगते हैं तुम्हें ?” खुशी के सवाल पर रूपा मुस्कुराने लगी ।


“जब घर थी और पापा कहीं बाहर जाते थे तो मैं दिन में दो बार उन्हें फोन करती थी । उनके बिना अच्छा ही नहीं लगता था । लेकिन जबसे यहां आई हूं तबसे उन्हें मैं फोन नहीं करती । कुछ दिन बीतने पर वो खुद कर लेते हैं । अब तू ये सोच कि जिस शख्स ने मुझे मेरे पापा की कमी ही महसूस नहीं होने दी वो मेरे लिए कैसा होगा ?” खुशी रूपा का जवाब सुन कर लाजवाब हो गई ।


“वैसे तू ने ऐसा क्यों पूछा । मुझे तो लगता था तुझे भी वो बहुत अच्छे लगे तभी तू उनके साथ इतना समय बिताती है ।”


“हां तो मैंने कब कहा कि मुझे वो पसंद नहीं हैं । मुझे भी यहां आने के बाद घर की याद कहां आई है । मैं बस ये जानना चाहती थी कि वो कुछ अजीब हरकतें क्यों करते हैं ?”


“जैसे कि ?”


“जैसे कि वो अकेले ही बातें करते रहते हैं । कोई उनके कमरे में जाए तो वो चुप हो जाते हैं । आज टीवी के ज़माने में भी पुराना सा रेडियो सुनते रहते हैं । किसी के जाने पर रेडियो बंद कर देते हैं । कुछ हरकतों से लगता है जैसे उनका दिमाग ठीक नहीं लेकिन जब कोई साथ हो तो वो इतनी अच्छे से पेश आते हैं, इतनी बढ़िया बातें करते हैं । सच कहूं तो मैं उनको समझना चाहती हूं मगर समझ नहीं पा रही । कभी कभी लगता है वो पागल हैं और दूसरे ही पल वो सबसे ज़्यादा होशियार लगने लगते हैं ।” खुशी की बातें सुन कर रूपा चुप हो गई ।


“हे, दीदी। नाराज़ हो गई क्या ? तुमने प्रॉमीस किया था ।”


“अरे नाराज़ नहीं हुई पागल बस पापा के लिए सोच कर बुरा लग रहा है । और जिसे तू अजीब हारकत या पागलपन समझ रही है ना वैसा पागलपन नसीबवालों को मिलता है ।”


“मैं समझी नहीं दीदी ।”


“जब मैं पहले पहले इस घर में आई थी तो कुछ दिन मैं भी नहीं समझी थी लेकिन उसके बाद जब सिद्धार्थ ने सब समझाया तब पापा के प्रति सम्मान और बढ़ गया ।  


 

“ऐसा क्या है दीदी, प्लीज़ मुझे भी समझाओ ।”


“कोशिश करती हूं पता नहीं तू समझे या ना समझे ।”


“कोशिश तो करो मैं इतनी नादान भी नहीं हूं ।”


“अच्छा ठीक है । तो सुन, पापा और मां दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे । ज़माने भर ने उनके प्यार को अलग करना चाहा लेकिन वे अलग ना हुए । दोनों ने लव मैरिज की थी । पापा मां और फिर सिद्धार्थ, तीनों की छोटी सी दुनिया थी जिसमें तीनों बहुत खुश थे । मां को पापा के अलावा किसी से प्यार था तो वे थे गीत । उन्हें गीत इतने पसंद थे कि रात को रेडियो उनके सिरहाने में रखा रहता था । वो गीत सुनते सुनते सो जाती थीं फिर पापा रेडियो बंद करते थे । वो जो पुराना रेडियो तू ने देखा ना वो पापा ने ही मां को तब गिफ्ट दिया था जब उनका रेडियो खराब हो गया । मां के सारे गहने छिन जाते तो उन्हें दुख ना होता मगर उस रेडियो को कुछ हो जाता तो शायद वो पागल ही हो जातीं । पहले संगीत से प्यार था फिर इस रेडियो से हो गया । कहती थीं आपकी पसंद को जो अपनी पसंद बना ले उसका दिया हुआ तोहफा जान से भी ज़्यादा प्यारा होता है । सब कुछ बहुत अच्छा था । घर में चार लोग हो गए थे ये तीनों और इनका ये रेडियो । एक बार मां की तबियत अचानक से बिगड़ गई । डॉक्टर ने कहा कोई दिक्कत की बात नहीं बस कमज़ोरी है । पापा मां का दिल ओ जान से ध्यान रखने लगे । ऐसी हालत में भी मां का उस रेडियो से प्यार कम नहीं हुआ था । एक रात मां को बहुत घबराहट होने लगी । पापा बार बार कहते रहे कि वो डॉक्टर को बुला लाते हैं मगर मां ना जाने क्यों ज़िद पकड़ कर बैठ गई कि नहीं आप कहीं मत जाओ । यहीं मेरे पास बैठो । उस रात वो सिद्धार्थ और पापा से लिपटी रही । उनकी हालत कितनी बुरी रही होगी इस बात का अंदाज़ा इससे लगा लो कि उस रात उन्होंने एक बार भी रेडियो की तरफ नहीं देखा । मां को ऐसे बेचैन देख पिता जी ने खुद ही रेडियो चला दिया । कमाल की बात ये हुई कि रेडियो बजते ही मां को नींद आ गई । पापा ने भी चैन की सांस ली और ये मन बना लिया कि वो कल ही मां को दिल्ली ले जाएंगे, किसी अच्छे डॉक्टर से दिखाने ।” इतना कह कर रूपा चुप हो गई ।


“फिर क्या हुआ दीदी ? मां कैसे ठीक हुईं ?”


“काश कि वो ठीक हो जातीं । अगले दिन जब पापा ने उन्हें जगाया तो वो उठी ही नहीं । उस रात उनको इतनी गहरी नींद आई जो फिर कभी दोबारा नहीं खुली ।” रूपा की आंखें भर आईं ।


“ओ गॉड, ये बहुत बुरा हुआ ।”


“कई दिनों तक पापा इस सदमें से बाहर ही नहीं आए । सिद्धार्थ की बुआ कुछ दिनों तक यहां रुकीं, तब तक सिद्धार्थ की देखभाल करती रहीं लेकिन उनके जाने के बाद पापा को सिद्धार्थ का भी खयाल ना रहता । उसने खाना खाया या नहीं, वो स्कूल गया या नहीं, मां के जाने के बाद वो कैसा महसूस कर रहा है, इन सब बातों से पापा का ध्यान हट गया था । उल्टा सिद्धार्थ ही पापा का ख्याल रखता था । वो बस एक कोने में पड़े रहते । सिद्धार्थ के साथ मां का वो रेडियो भी अनाथ सा हो गया था जो पापा ने मां को गिफ्ट किया था । फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि पापा पहले की तरह खुश रहने लगे ।”


“ऐसा क्या हुआ था दीदी ?”


“एक दिन पापा अपने कमरे में हमेशा की तरह गुमसुम उदास बैठे थे । तभी अचानक से वो रेडियो बजने लगा । पापा को लगा ये सिद्धार्थ ने बजाया है । उन्होंने बार बार मना किया, चिल्लाए भी लेकिन जब रेडियो ना बंद हुआ तो वो सिद्धार्थ के पास जाने के लिए खड़े हुए । पूरे घर में सिद्धार्थ को खोजा मगर वो कहीं नहीं था । दोबारा जब अपने कमरे में आए तो देखा कि रेडियो सामने मेज पर पड़ा है । उन्होंने रेडियो बंद किया और फिर से कुर्सी पर आ कर बैठ गए लेकिन रेडियो फिर से चलने लगा । और गीत भी ऐसे बज रहे थे कि मानों कोई उन्हें मनाने की कोशिश कर रहा हो । उन्हें आश्चर्य हुआ, उन्होंने फिर से रेडियो बंद किया लेकिन फिर से वही हाल । ना जाने कितनी बार उन्होंने रेडियो बंद किया मगर वो फिर से बजने लगता । अंत में पापा को इतना गुस्सा आया कि पापा ने रेडियो पटक दिया और रोते हुए फिर से कुर्सी पर आ कर बैठ गए । लेकिन उनके आश्चर्य का तब ठिकाना नहीं रहा जब टुकड़ों में बिखरा रेडियो फिर से बजने लगा । शायद कोई आम इंसान होता तो डर जाता लेकिन जिसने अपने किसी जान से प्यारे को खोया हो उसे भला जान का कैसा डर । पापा रेडियो से हार गए । रेडियो बजता रहा । लेकिन सिद्धार्थ जब घर लौटे और पापा के कमरे में आए तो उनके आते ही रेडियो बंद हो गया ।”


“अरे, ये कैसे हुआ ?”


“तब तो पापा को भी समझ नहीं आया कि ये कैसे हुआ । वो भला सिद्धार्थ से भी क्या बताते । उल्टा सिद्धार्थ उनसे गुस्सा हो गया ये कह कर कि आपने मां का रेडियो क्यों तोड़ा । बाद में पापा को भी अफसोस हुआ । उन्होंने रेडियो को समेटा और सोचा कि इसे ठीक करवा लाऊँगा । मगर ये खराब ही कब हुआ था जो पापा ठीक करवाते । जब भी पापा अकेले होते वो रेडियो अपने आप बजने लगता । ऐसा लगता जैसे रेडियो बात कर रहा हो क्योंकि उसमें गीत बिलकुल स्थिति के हिसाब से बजते । शुरू शुरू में सिर्फ पापा को समझाने और मनाने वाले गीत बजे । लेकिन उसके बाद तो ऐसे था कि जब हंसने वाली बात हो तो हंसी की आवाज़ आए रोने वाली बात पर किसी के सिसकियाँ भरने की । जैसी परिस्थिति हो उस हिसाब से अपने आप वो गीत बजता । कुछ ही दिनों में पापा को ये विश्वास हो गया कि मां यहीं है और इस रेडियो द्वारा उनसे बात कर रही है । पापा भी मां से बात करने की कोशिश करने लगे । देखते ही देखते ये उनकी आदत बन गई । और ऐसा होने के बाद से ही पापा ठीक होने लगे । उसके बाद तो उन्होंने सिद्धार्थ का ऐसे खयाल रखा जैसे कोई मां भी नहीं रख सकती ।” रूपा की पूरी बात सुनने के बाद खुशी के चेहरे पर हैरानी साफ झलक रही थी ।


“क्या ये सब आपको पापा ने बताया ।”   


“नहीं, सिद्धार्थ ने । एक बार पापा ने उन्हें बताया था लेकिन उसके बाद इस बारे में कभी बात नहीं की । उसके बाद सिद्धार्थ ने कई बार ऐसा कुछ होते देखा जिससे पापा की बातें सच्ची साबित हो गईं । पापा अपनी तरफ से किसी को नहीं बताते और हम लोग भी उनसे ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे हमने कुछ देखा ही नहीं और ना हमें इस बारे में पता है । सिद्धार्थ कहते हैं भले ही ये उनका वहम हो लेकिन इस वहम के साथ वो खुश हैं तो सब ठीक है । वैसे भी पापा किसी के सामने ऐसा कुछ नहीं करते, दुनिया के लिए वो एकदम सही हैं । वैसे भी वो प्यार ही क्या जिसमें पागलपन ना हो ।” खुशी के लिए ये सब बातें किसी सपने जैसी थीं । इतनी जल्दी इन बातों पर यकीन करना मुश्किल था उसके लिए । रूपा भी ये समझती थी । रूपा ने खुशी से ये वादा लिया कि वो इस बारे में घर जा कर मम्मी पापा को कुछ नहीं बताएगी । खुशी ने वादा किया कि वो ऐसा नहीं करेगी ।


खुशी को रूपा की बातों पर यकीन हो ना हो लेकिन वो सब सुनने के बाद वो नंद जी का पहले से ज़्यादा सम्मान करने लगी थी । कुछ दिनों बाद खुशी घर लौट गई । उसके बाद वह तब आई थी जब रूपा प्रेग्नेंट थी । उसने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया था । उस पूरी रात नंद जी के कमरे में खुशी के गीत बजते रहे । उनके घर बेटी ने जन्म जो लिया था । खुशी इसके बाद दो बार और आई और फिर उसकी शादी हो गई ।


******************************************


सालों बाद


नंद जी आज अचानक ही सबको छोड़ कर चले गए । सिद्धार्थ का रो रो कर बुरा हाल था । एक पापा ही तो बचे थे उसके पास और आज वो भी चले गए । संयोग से खुशी भी अपने मायके आई थी । शादी के बाद वो पति के साथ आस्ट्रेलिया शिफ्ट हो गई थी । तब फिर नंद जी से कहां मिलना हो सका । हां लेकिन फोन पर वो हमेशा उनसे बात करती थी । इस बार सोच कर आई थी कि नंद जी से मिलना है लेकिन उससे पहले ही उसे ये मनहूस खबर मिल गई थी । वो मम्मी पापा के साथ दीदी के घर आ गई । अब तो परी भी बड़ी हो गई थी । सिद्धार्थ के बाद नंद जी के जाने का सबसे बुरा असर परी पर ही पड़ा था । उसका सबसे प्यारा दोस्त जो चला गया था ।


संस्कार के बाद सब अपने अपने घर लौट गए थे । खुशी कुछ दिनों बाद फिर रूपा से मिलने आई । दोनों ने पापा को खूब याद किया । खुशी अब जाने वाली थी तभी उसे कुछ याद आया । उसे पता था कि उसके जाने के बाद ये बात ना हो सकेगी । इसलिए वो बोल पड़ी ।


“दीदी जानती हूं ये सही वक्त नहीं है लेकिन मैं ये जाने बिना रह नहीं पाऊँगी ।” उसकी इस बात पर रूपा मुस्कुराने लगी ।


“जानती हूं क्या पूछने वाली है ।”


“क्या पूछने वाली हूं ? बताओ ?”


“यही ना कि वो रेडियो कैसा है ।”


“हां बिलकुल लेकिन आपको कैसे पता ?” खुशी एकदम चौंक गई ।


“क्योंकि पापा के जाने के बाद हमने भी यही जानना चाहा था ।”


“तो क्या पता चला ।”


“यही कि पापा के बाद वो रेडियो भी हमेशा के लिए खामोश हो गया । अब वो नहीं चलता । मीकैनिक को भी दिखाया लेकिन उसने कहा ये तो कब से बंद पड़ा है । इसके पुर्जों तक में जंग लग चुका है । ठीक होने का सवाल ही नहीं पैदा होता ।” खुशी को लगा अब वो जैसे बेहोश हो जाएगी । उसने खुद अपनी आँखों से भी वो रेडियो देखा, उसे चलाने की कोशिश भी की लेकिन रेडियो नहीं चला ।


प्यार के एक युग का गवाह वो रेडियो उस युग के साथ खुद भी खत्म हो गया था । ऊपर बैठ कर अब नंद जी और उनकी धर्मपत्नी शालू शायद अब एक दूसरे को गीत सुनाते होंगे और अपने प्यारे रेडियो को शुक्रिया कहते हुए उसे खूब याद करते होंगे ।


आपके पास भी कोई रेडियो हो तो उससे बात कर के देखिएगा । लगेगा जैसे आपका कोई बिछड़ा हुआ आपसे बात करने की कोशिश कर रहा हो ।


धीरज झा

नोट :  ये कहानी मेरे ही नाम के साथ प्रतिलिपि पर भी प्रकाशित है । 

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Qisson Ka Kona | Kisson Ka Kona: रेडियो नहीं था वो ! (प्रेम कहानी)
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