विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस : कुछ बातें महान नहीं बस आम होनी चाहिए...

MenstrualHygieneDay, periods, महावारी, विश्व महावारी स्वच्छता दिवस

हमारी अम्मा हमेशा से ही बहुत धार्मिक प्रवृति की रही हैं। हफ्ते के 4 दिन तो उनके उपवास में ही बीतते थे। अब उम्र बढ़ रही है इसलिए हफ्ते के 3 रहती हैं। सुबह 4 से 5 के बीच उठ जाना और कम से कम 3 घंट सुबह और 1 घंटे शाम में पूजा करना तो उनका रोज का नियम है। बारिश, सर्दी, तूफान कुछ भी हो जाए मगर अम्मा की पूजा नहीं रुकती कभी। बचपन में तो हम लोग जब तक उठते थे तब तक वो अपनी पूजा संपन्न कर के हम लोगों के लिए स्कूल का नाश्ता बना रही होती थीं। पहले तो इतनी समझ नहीं थी कि वो कब उठीं कितनी देर पूजा की, हमें तो यही लगता था जैसे सुबह होना तय है वैसे ही अम्मा का जल्दी उठना और पूजा करना भी तय है लेकिन जैसे जैसे बड़े हुए वैसे वैसे एक बात नोट की कि अम्मा महीने के कुछ दिन पूजा नहीं करतीं।

पूजा क्या वो तो मंदिर में भी नहीं जातीं, उन दिनों उनके चेहरे पर अजीब सी थकान रहती थी। ऐसे में किसी बच्चे का अपनी माँ से ये पूछना गलत नहीं होगा कि हर महीने कुछ दिनों तक उनमें ये बदलाव कैसे आजाता है। मेरा भी कई बार पूछने का मन हुआ लेकिन पता नहीं क्यों हर बार अंदर से लगता कि ऐसा कुछ पूछना सही नहीं होगा। इन दिनों कभी कभी शाम को अम्मा कह देतीं कि आज मंदिर में दिया जला दो, तो आलस के मारे कह ही देते कि आज आप क्यों नहीं जला रहीं तो वो कहतीं कि तबियत नहीं ठीक है। एक दो बार ऐसा कुछ सुनने के बाद फिर से कभी सवाल नहीं किया उनसे।

समय के साथ उनके चेहरे पर उन दिनों की थकान का राज इधर उधर से जान सुन और पढ़ कर पता लग गया। साथ में ये भी पता लग गया कि ये दिक्कत सिर्फ उनके साथ ही नहीं बल्कि सभी महिलाओं के साथ है। लेकिन इतना जानने के बाद भी उनकी तकलीफ का अहसास नहीं हुआ मुझे। कहते हैं ना जिस तन लागे सो तन जाने। लेकिन जब इंटरनेट का चलन बढ़ा जानकारियां साझा होने लगीं वैसे वैसे ये पता लगने लगा कि महिलाओं के लिए हर महीने ये 4 दिन कितने परेशानी भरे होते हैं।

इन दिनों होने वाली शारीरिक परेशानी तो जो है वो है ही इसके आलावा भी बहुत सी परेशानियां हैं जो इस वास्तविक परेशानी से कहीं ज्यादा तकलीफ देह होती हैं। जैसे कि वो आंखें जो इन दिनों महिलाओं के चेहरे की थकावट पढ़ कर कपड़ों पर लगा दाग ढूँढती हैं और फिर उस दाग में व्यंग्य का नया विषय ढूंढ लिया जाता है। शरीर की आम दिक्कत को भेदभाव के जरिए ऐसा बना दिया जाता है कि वो आम सी बात अपराधपूर्ण लगने लगती है। आचार ना छूना, अलग सोना, और तो और कई नियमों से तो ऐसा प्रतीत होने लगाता है कि जैसे भगवान भी भेदभाव करते हैं इसीलिए शायद मंदिर में घुसने से मना किया जाता है।

ये कैसी विडम्बना है कि जहां गाली हर एक के जुबान पर रहते हुए भी उन्हें बोध नहीं कराती कि आप माहौल को दूषित कर रहे हैं वहीं सैनेटरी पैड खरीदते देखना लोगों को शर्मिंदा कर देता है। सोच कर देखिए कि जिस माहवारी का आप नाम लेने तक से कतराते हैं वही आपके घर की किसी बच्ची या महिला को समय पर ना आये तो कितनी परेशानी उठानी पड़ेगी आपको। जनता की विकसित सोच और देश सम्पन्नता का ढोल पीटने के बाद भी हमारे देश में 50% लड़कियां माहवारी के दिनों में स्कूल नहीं जातीं। दुनिया चांद तक पहुंच गयी लेकिन हम आज भी माहवारी और पैड्स का नाम लेने तक से घबराते हैं। समझ नहीं आता कि स्वच्छता के लिए भला कैसी शर्म कैसी झिझक।

इस विषय में जागरूकता लाने के बहुत प्रयास किये गए लेकिन इसके बाद भी वो समय अभी नहीं आया जब महिलाएं इस विषय में खुल कर बोल सकें या बच्चियां अपने पहले अनुभव को बेधड़क बिना डरे किसी को बता सकें। इसका कारण भी हमारी सोच ही है। हमने आम बातों को इस तरह से देखा कि वो जरूरी होने के बाद भी अपराध लगने लगीं। 

मुझे याद है एक बार माहवारी विषय पर हो रही चर्चा के दौरान एक लड़की ने सबको अपना किस्सा सुनाते हुए कहा था कि जब उसे पहली बार माहवारी की समस्या हुई तो उस समय वो स्कूल में थी। खून देख कर वो बहुत डर गयी थी। उसने घर पहुंचने के बाद डरते हुए ये बात अपनी मम्मी को बताई। जानते हैं उसकी मम्मी ने आगे से क्या किया? उन्होंने उस लड़की को डांटा क्योंकि उसने अपनी स्कर्ट खराब कर ली थी। क्या आप समझ सकते हैं उस लड़की का दर्द जो उसने डांट सुनते हुए झेला होगा वो भी जब उसकी कोई गलती नहीं थी।

यही कारण है कि अगर घर का कोई बच्चा अपनी बहन या मां से पूछ देते हैं कि आज दिया क्यों नहीं जला रही तो लड़कियां या महिलाएं सच बोलने का साहस नहीं जुटा पातीं और किसी बहाने का सहारा लेती हैं। जबकि उस बच्चे को पता होना चाहिए कि उसकी बहन या मां के साथ क्या दिक्कत आती है हर महीने। वो इसे जानेगा तभी इसके प्रति जागरुक होगा और फिर इस तरह के दाग को ले कर उसके दिमाग में किसी तरह की गलत सोच नहीं बनेगी। याद रहे, जिन्होंने अपनी मां के चेहरे पर माहवारी के दिनों का दर्द पढ़ा है उनके लिए दूसरी औरतों की ऐसी स्थति व्यंग्य नहीं होती।

सबसे पहले माओं को समझने की जरूरत है कि वे अपनी बच्चियों से इस विषय में खुल कर बात करें, जिससे उन्हें किसी तरह शर्मिंदा ना होना पड़े। अगर चार लोगों में बैठे हुए किसी महिला को इस तरह कि समस्या अचानक से आ जाती है और कोई निशान पड़ जाता है तो उस निशान को ऐसे ना देखें जैसे कुछ बहुत बुरा देख लिया हो, उसके साथ सामान्य और सहज बर्ताव करें। जिनके साथ ये समस्या है वो खुद इसके बारे में खुल कर बात करें। वो समझें कि माहवारी किसी तरह का अपराध नहीं वो आपके शरीर की मांग है, इसके बिना आप स्वस्थ नहीं रह पाएंगी। किसी बेबाक लड़की से ही सुना था कि "माहवारी मेरे लिए समस्या नहीं बल्कि खुशी है। क्योंकि इसका समय पर आना मुझे ये बताता है कि मैं स्वस्थ हूं।"

हर महिला को इन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है इसके बावजूद आज भी सैनेटरी पैड्स की बिक्री बहुत कम है। झोंपड़पट्टियों या ऐसे गांव जहां इन बातों को ले कर किसी तरह का बदलाव नहीं आया वहां आज भी गन्दा कपड़ा, राख, घास यहां तक कि गोबर का प्रयोग किया जाता है। कम से कम समझदार महिलाएं तो अपने आस पास की महिलाओं को इस बारे में जागरूक कर ही सकती हैं। बच्चों को इस विषय में बताने की सबसे अच्छी जगह स्कूल हैं, टीचर्स बच्चों को माहवारी के विषय में आवश्यक बातें बताएं।

आज विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस है। 2014 से 28 मई को विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस इसीलिए मनाया जाता है कि हर तरफ माहवारी में रखी जाने वाली स्वच्छता के लिए महिलाओं को जागरुक किया जाए। आप भले ही कुछ खास नहीं कर सकते हों किन्तु कम से कम अपने घर का और आसपास का माहौल तो बदल ही सकते हैं। पुरुष अपने बच्चों या अपने दोस्तों को इस बारे में बताएं उन्हें समझाएं। जो पुरुष महिलाओं की ऐसी स्थिति पर उपहास करते हैं उन्हें पहले अपने दिमाग से गंदगी साफ करनी चाहिए। अगर आपकी सोच अच्छी होगी तो आपको दाग नहीं महिलाओं की पीड़ा पहले दिखेगी।


आपका शुभ हो


#MenstrualHygieneDay


धीरज झा

COMMENTS

नाम

अन्य रचनाएँ,1,अलविदा,8,इश्क़ वाली कहानियां,38,कल्पनाएं,1,कविता,115,कहानियों का कोना,47,कहानी,138,किश्तों वाली कहानियाँ,22,किस्से गाँव के,15,क्रिकेट के क़िस्से,1,ख़ास लोग,23,खुशियाँ,40,खेल कहानियां,5,ख़्वाहिशें,2,गज़ल,32,चलते फिरते बस यूं ही,2,चिट्ठियाँ,24,जय जवान,12,तड़प मेरी तुम्हारे लिए,72,दु:ख,73,नमन,5,पापा के लिये,31,पुराने किस्से,3,प्रतिभा की दुनिया,2,फिल्म समीक्षा,4,बस यूं ही,27,बातें काम कीं,63,बिहारनामा,3,माँ,19,युवाओं की बात,4,रात के किस्से,6,लघु कहानी,9,लेख,167,वैश्विक,1,व्यंग्य,38,शायरी,31,सिनेमा,1,सिर्फ तुम्हारे लिये,63,हास्य कथा,2,
ltr
item
Qisson Ka Kona | Kisson Ka Kona: विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस : कुछ बातें महान नहीं बस आम होनी चाहिए...
विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस : कुछ बातें महान नहीं बस आम होनी चाहिए...
MenstrualHygieneDay, periods, महावारी, विश्व महावारी स्वच्छता दिवस
https://1.bp.blogspot.com/-qppsta11_7k/YLEFoOEQCAI/AAAAAAAABRM/yWLowo3CmLsnkdEYD4Uj5THt_1yAxSwJwCLcBGAsYHQ/s16000/images.jpeg.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-qppsta11_7k/YLEFoOEQCAI/AAAAAAAABRM/yWLowo3CmLsnkdEYD4Uj5THt_1yAxSwJwCLcBGAsYHQ/s72-c/images.jpeg.jpg
Qisson Ka Kona | Kisson Ka Kona
http://www.qissonkakona.com/2021/05/Story-on-MenstrualHygieneDay.html
http://www.qissonkakona.com/
http://www.qissonkakona.com/
http://www.qissonkakona.com/2021/05/Story-on-MenstrualHygieneDay.html
true
3081115015472439889
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy