मदर्स डे का तोहफा

Mother, Value of a Mother, Mother Love, Mothers Day


 

'ऐ मां बताओ ना क्या दें तुमको ।' हॉस्टल से लौटे बेटे ने मां के गले में बांहें डाल कर झूलते हुए कहा ।


"अभी तू का देगा हमरा के बेटा ? पहिले खूब पढ़ लो, खूब अच्छा नोकरी करो, फेर खूब पइसा कमाने के बाद हमके देना ।" मां ने अपने लाल का सिर सहलाते हुए कहा ।


"तब का तब देखेंगे ना, अभी हमारे पास जमा किया हुआ पैसा है । आज मदर्स डे है मां । सब दोस्त अपना मम्मी को कुछ न कुछ देगा । हमको भी तुम्हें कुछ देना है ।" बेटा एक सांस में ही सारी बात बोल गया । मां महीनों बाद घर लौटे बेटे की सूरत को निहारते हुए उसी में कहीं खोने लगी ।


तभी बाहर से किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई । मां ने दरवाज़े के पल्ले को थोड़ा सा खोल कर बाहर की स्थिति जाननी चाही । बाहर का नज़ारा देखते ही मां के होश उड़ गये । वो ये सब कुछ अपने बेटे को नहीं दिखाना चाहती थी । गांव के इसी माहौल के चलते तो अपने जिगर के टुकड़े को उसने खुद से इतनी दूर कर दिया था ।


"चलो भीतर जाओ । हम अभी आते हैं तो नास्ता बना देंगे ।" बाहर की तरफ कदम बढ़ाते बेटे को मां ने सख्ती से अंदर जाने का आदेश दिया ।


"हमको भी देखना है ।" बेटे ने ज़िद कर दी ।


"तमाशा नहीं लगा कोई जो देखना है । जाते हो अंदर कि पिता जी को बुलाएं ।" बेटे को बात ना मानता देख मां ने बाहर दुआर पर बैठे पिता को बुलाने की धमकी दी । धमकी काम कर गयी और बेटा अंदर चला गया । बाहर चीखों का शोर कम होने का नाम नहीं ले रहा था ।


"का भइल हो ?" बाहर खड़ी भीड़ में से एक ने दूसरे से पूछा ।


"मालूम न, हम तो अभिए अएबे किए हैं ।" दूसरा कुछ बता ही रहा था कि तभी सबकी नज़र भुनेसर पर पड़ी जिसकी गोद में फुलमतिया थी, उसकी पत्नी । सर से खून ऐसे चू रहा था जैसे मधुमक्खी के छत्ते से शहद चूता है । भुनेसर ने दुआर पर रखी चौकी के ऊपर फुलमतिया को रख दिया । खून रोकने के लिए बेटी को चोट पर कपड़े से कस के दबाए रखने का बोल कर खुद डॉक्टर साहेब को लेने चल दिया ।


सबके मन में एक ही सवाल था कि आखिर फुलमतिया को ये क्या हो गया । मां भी यह सवाल मन में लिए अभी तक दरवाज़े की ओट में खड़ी थी । भुनेसर का घर अगली ही पट्टी में था । वहां का शोर आसानी से यहां तक सुना जा सकता था । लोग यहां तक भीड़ लगाए हुए थे । गांव में भीड़ की संख्या से ही घटना के मामूली या बड़े होने का अंदाजा लगाया जाता है ।


भुनेसर अभी तक डॉक्टर साहेब को लेकर लौटा भी नहीं था कि इतने में अंदर से भुनेसर का छोटा बेटा गुदरी फनफनाते हुए बाहर निकला और फुलमतिया यानी अपनी मां को केश से पकड़ कर सीधा ज़मीन पर पटक दिया । उसकी बहन उसके पैर पड़ रही थी लेकिन वो मानने को तैयार नहीं था, उसने इतनी ही देर में अपनी मां के पेट पर दो चार लात खींच ली थी ।


उसकी ये हैवानियत वहां मौजूद लोगों के सहने से बाहर हो चुकी थी इसीलिए दस बारह लोगों ने उसे पकड़ लिया । वो खुद को सबके चंगुल से छुड़ाने की कोशिश करते हुए चिल्ला रहा था "छोड़ स्सला सब, आज ई साली रंडी के मार के खत्तम कर देब । पचास रुपया नहीं दे रही हमरा के । आज जोन बीच में आई ऊ सबके मार देब । देख रहे हैं कोन डांगडर ऐकर इलाज करता है । छोड़ स्साला सब ।"


उसकी इन बातों से लोगों का ताव बढ़ रहा था । इस कारण वे गुदरी पर शिकंजा कसते चले जा रहे थे और उसका विरोध कमज़ोर पड़ता जा रहा था । लोग सब उसे पकड़ के खलिहान दिसा ले गये । रास्ते भर वो लोगों को यही कहता गया कि "माई मर गेल हमार ।" उसने मान लिया था कि आज उसकी मां मर ही जाएगी । 


इधर डॉक्टर साहब आ चुके थे । फुलमतिया को गहरी चोटें आई थीं लेकिन उसकी जान बच गयी थी । वो होश में तो थी मगर उसका तन और मन शायद सुन्न पड़ गये थे । इधर मां ने गुदरी की गालियां और उसका चिल्लाना सुना था । उन्हें पता लग गया था कि आखिर पूरा माजरा क्या था ।


जब वो अंदर आई तो देखा बेटा कानों में हेडफोन लगा कर कोई मूवी देख रहा था । मां को अंदर आता देख उसने हेडफोन उतार दिए तथा फोन साइड में रख कर मां के पास चला गया । उसने मां का भयभीत चेहरा देखा तो पूछ बैठा "क्या ऐसा हमेशा होता है मां ?" उसकी बात से मां थोड़ा हैरान हुई ।


"तूने सब देखा क्या ?" मां ने आंखें दिखातो हुए पूछा ।


"सॉरी मां ।" बेटे ने भोली सी सूरत बना कर जवाब दिया ।


"कहां से देखा ?"


"छत पर से ।" छत पर से भुनेसर का दुआर दिखता है । मां समझ गयी कि बेटे ने वहां का पूरा घटनाक्रम देखा है । बेटा भी समझ गया कि अगर ये बात चलती रही तो आज उसकी शामत आनी पक्की है । इसीलिए उसने बात ही बदल दी ।


"ऐ मां, तुम बताई नहीं कि का चाहिए । बताओ ना फिर हमको खरीदने भी जाना होगा ।" मां के पल्लू में मुंह ढकते हुए बेटा बड़े लाढ़ से बोला ।


"जो मांगेंगे वो दोगे ?" मां ने छत वाली बात का जिक्र नहीं किया ।


"हां मां हमारे पास काफी पैसा जमा है । नहीं होगा तो पापा से ले लेंगे । तुम बताओ ना बस ।" बेटे ने उछलते हुए कहा ।


"नहीं खरीद कर कुछ नहीं चाहिए । तुम हमारे लिए बस इतना करना कि कभी गुदरी जैसा बेटा ना बनना । भले हमसे दूर रहना मगर उसके जैसा बेटा मत बनना । ऐसा बेटा लोग मां को जिंदा लास बना देता है ।" बोलते हुऐ मां की आंखें नम हो गयीं ।


"गुदरी कौन है मां ?" बेटे ने पूछा लेकिन मां ने कोई जवाब नहीं दिया । उसकी आंखों के सामने अभी तक फुलमतिया का खून से भीगा हुआ चेहरा घूम रहा था तथा कानों में गुदरी द्वारा मां को दी जा रही गालियां गूंज रही थीं ।


*****************************************


पेट के अंदर जब बच्चा लात मारे तो अच्छा लगता है क्योंकि ये संकेत होता है कि बच्चा सुरक्षित है लेकिन जब वही बच्चा बड़ा होने पर रौब दिखाते हुए उसी कोख पर लात मारता है जहां वो नौ महीने रहा तब एक मां खुद के मां होने पर अफसोस करती है । और मां का अफसोस ईश्वर के अफसोस से भी ज़्यादा भयावह होता है ।


नोट :- मैं जानता हूं सभी बेटे ऐसे नहीं होते । बल्कि ऐसों की संख्या बहुत कम है लेकिन ऐसा एक भी बेटा जब तक समाज में है वो अपनी मां के लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए घातक है । कई बार वो लिखना ज़रूरी हो जाता है जिसके बारे में लोग सोचना भी पसंद नहीं करते ।


धीरज झा

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