सन्यासी नहीं रहा मां (कारगिल वॉर हीरो की कहानी)

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"अम्मा देर हो रहा है । जल्दी से निपटओ अपना ये टीम टोटका ।" कन्धे पर बैग टांगे उस लड़के ने बार बार घड़ी देखते हुए चिढ़ कर कहा ।

"अइसन बात नहीं बोलते बबुआ । बचपन का सपना पूरा करने के प्रयास में जा रहे हो दही शक्कर खा के जाओगे तो काम बना ही समझो ।" मां ने हाथों से दही शक्कर खिलाते हुए कहा । 

"मां ये सपना तो हम पूरा कर के ही रहेंगे । चाहे हमको किस्मत से लड़ना भिड़ना काहे ना पड़े । बाक़ी बस तुम्हारा आशीर्वाद मिलता रहे सब होगा । अब चलते हैं ।" इतना कह कर लड़के ने मां के पैर छुए और भगता हुआ निकला बाहर ।

"बाप पर गया है, हर वक्त लड़ना भिड़ना ही याद रहता है ।" मां मुस्कुराते हुए मन ही मन बुदबुदाई ।

"फारम खतम हो जाएगा तो दांत चियारे देखते रहना । एतना टाइम तो लड़कियो सब नहीं लगती बे ।" बाहर बाइक पर इंतज़ार कर रहे दोस्त ने लड़के को आता देख कहा ।

"अरे नहीं यार वो अम्मा दही शक्कर के फेर में लेट करा दी । अब तुम देर ना करो चलो जल्दी ।" बाइक पर बैठते हुए लड़का बोला ।

"वाह बेटा, देर खुद करो और रौब हम पर गांथो ।" बाइक चल पड़ी अपनी मंज़िल की ओर ।

"अबे सामने देखो बे, भिड़ जाओगे कहीं । हमको लंगड़ा नहीं होना है ।" दोस्त को बाइक चलाते हुए कहीं और निगाह मारते देख लड़का बोला ।

"अरे शांत रहो । दुआ करो तुम्हारी भाभी दिख जाए । बड़ी लच्छमिनिया है । उसको देख लिए तो काम बना समझो ।" दोस्त ने एक लंबी आह भरते हुए आगे कुछ दूर एक मकान की छत पर देखते हुए कहा । 

"अबे जाओ बे, बानर सन मुंह है उसका । उसको देख के और काम बिगड़ जाएगा । वैसे भी जो तुम्हारे साथ होती है लच्छमी सरस्वती दुर्गा सब माता उसी में दिखती है तुमको ।" 

"सुने नहीं का महबूब में खुदा के दीदार होते हैं ।" 

"तुम्हारी महबूब है तुम करो दीदार ।" 

"तुम्हों बना लो ।" 

"हमारी बचपन से है । भारत माता को ही दिल दे दिए हैं अब किसी को देने के लिए कुछ बचा नहीं ।" 

"तुम सैनिक स्कूल वालों का यही पंगा है । बचपन से ही देश भक्ति, अनुशासन, नियम यही सबका राग चलता है । इससे अच्छा तुम साले सन्यासी बन जाओ ।"

"इसी सन्यासी की शहादत पर एक दिन लोर चुआते फिरोगे ।"

"मिठाई बांटेंगे बे । मिठाई ।"

"एक बाप के हो तो बात पर अड़े रहना ।" इसी तरह हँसते बतियाते दोनों वहां आ पहुंचे जहां से लड़के ने अपने सपनों की पहली उड़ान भरनी थी । 

हाथ में एनडीए का फॉर्म है, आंखों में अलग सी चमक है और दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे लड़का पहली बार प्रेम पत्र लिख रहा हो । प्रेम पत्र ही तो है । देश के नाम, ये कहते हुए कि हमें तुमसे बहुत प्यार है, हमें अपने आगोश में आने का एक मौका दे दो, जान तक दे देंगे तुम्हारे लिए । 

लड़के ने धड़कते दिल के साथ फॉर्म भरना शुरू किया । नाम - मनोज कुमार पांडेय

पिता का नाम - गोपी चंद पांडेय

ग्राम - रुधा

जिला - सीतपुर

प्रदेश - उत्तर प्रदेश

एक सवाल था आर्मी में क्यों भर्ती होना चाहते हैं ? अब ये कैसा सवाल हुआ भाई ? इस पर कोई क्या जवाब देगा । अन्य लड़कों ने अपने मन से जवाब दिए । किसी ने लिखा देश की सेवा करने के लिए, किसी ने लिखा आर्मी चीफ बनने के लिए, एक भोंपलेट लिखता है विदेश में पोस्टिंग के लिए । 

मनोज ने क्या लिखा ? मनोज ने लिखा "परमवीर चक्र पाने के लिए ।" लड़के के इरादे देख रहे हो भाई साहब ? सीधा परमवीर चक्र । 

"हो गया ?" बाहर आते दोस्त ने पूछा ।

"हां हो गया । पता है पूछ रहे थे सेन में क्यों जाना चाहते हो ?" 

"तो का लिखे ?" 

"परमवीर चक्र पाने के लिए ।" 

"अबे तुम मिठाई बंटवा के मानोगे क्या ।" दोनों घर लौट आए । 

मां के आशीर्वाद से एनडीए में प्रवेश मिल गया । एन डी ए से स्नातक करने के बाद 1997 में मनोज बतौर कमीशंड ऑफिसर ग्यारहवां गोरखा राइफल्स की पहली बटालियन में भर्ती हो गया । पोस्टिंग वहां मिली जहां के हालात बेहद बुरे थे, कश्मीर में । युद्ध के आसार पहले से ही दिख रहे थे । मां बाप बच्चों को सेना में भेजने से डर रहे थे । मगर जिनकी आंखों में बचपन से एक ही सपना खेला हो उन्हें भला कौन रोक सकता था सेना में जाने से । 

स्टेशन छोड़ने आए दोस्त गले लगाते हुए कहा "कुछ भी करना पर साले मरना मत ।" 

"सेना में कोई नहीं मरता पट्ठे । यहां सब शहीद होते हैं और जब तक शहीद ना हुआ तब तक तू मिठाई कैसे बांटेगा ।" दोस्त ना चाहते हुए भी रो पड़ा । 

"मां का ध्यान रखना ।" 

"तुमको कहने की ज़रूरत नहीं बे । तुम बस अपना ध्यान रखना । जल्दी लौटना, तेरी शादी में नाचने का बड़ा मन हो रहा है ।" ट्रेन चल पड़ी, अपना गांव, सारे रिश्ते, ये शहर लखनऊ सब पीछे छूट गया । साथ रहा तो सिर्फ देश । 

समय बीतता रहा, युद्ध नजदीक आता रहा । कारगिल युद्ध का बिगुल बज चुका था । चोटी पर बैठी दुश्मन टुकड़ियां अपनी जीत का दम भर रही थीं । मनोज इससे पहले एक सीनियर सेकेंड लेफ्टिनेंट पी एन दत्ता के साथ एक महत्वपूर्ण मिशन को अंजाम दे चुका था । दत्ता इस आतंकी मुठभेड़ में शहीद हो गये और उन्हें मिला अशोक चक्र । इस घटना ने मनोज को और मजबूत कर दिया था  । 

समय आ चुका था अपने सपने को पूरा करने का । सब जानते थे कि इस युद्ध में एन्ट्री तो है लेकिन एग्ज़िट का कोई दरवाजा नहीं है । 1/11 गोरखा राइफल्स की ‘बी कम्पनी को खालूबार को फ़तह करने का जिम्मा सौंपा गया। मनोज पाँचवें नम्बर के प्लाटून कमाण्डर थे और उन्हें इस कम्पनी की अगुवाई करते हुए मोर्चे की ओर बढ़ना था ।

अभी कुछ ही दिन पहले मां को चिट्ठी लिखी थी मनोज ने । बताया था कि "मां युद्ध पास आ रहा है । हालात बिगड़ रहे हैं । कुछ भी हो सकता है लेकिन तू मेरी चिंता मत करना । मैं हर हाल में जीत हासिल करूंगा । ज़िंदा रहा तो देश जीतेगा, शहीद हुआ तो सपना पूरा होगा ।" जंग में गया बेटा अपनी मां को इससे ज़्यादा क्या लिख सकता है ।

मां ने भी उधर से खत में हिम्मत लपेट कर भेजी । जवाब में लिखा "जो भी हो जाए पीछे मत हटना बेटा ।" सोच सकते हैं आप कि ये लिखते हुए मां का दिल कितनी ज़ोर से धड़का होगा ? कितनी हिम्मत इकट्ठी की होगी उसने अपने बेटे को ये बात कहने में । अपनी ममता को ताक पर रख के उस मां ने देश को चुना । मां के इस जवाब से मनोज की हिम्मत पहाड़ को धराशायी कर देने जितनी बढ़ गई । 

3 जुलाई 1999 को कंपनी कारगिल फतह करने के मंसूबे से आगे बढ़ी ही थी कि पहाड़ी की चोटियों से हर तरफ जबरदस्त गोलियां बरसने लगीं । दुश्मनों ने हर तरफ बंकर बनाए हुए थे । 

"सर जी इस गोलियों की बौछार में आगे बढ़ पाना मुमकिन नहीं लग रहा ।" पत्थरों के पीछे छुपे सिपाही हनुमान ने मनोज से कहा । 

"हनुमान जी मुमकिन तो संजीवनी बूटी के लिए पूरे पर्वत को उठना और लक्ष्मण जी को फिर से ज़िंदा करना भी नहीं था । आप तो खुद हनुमान हो आपसे ऐसी बात की उम्मीद नहीं करता मैं ।" मनोज के जवाब पर उस माहौल में भी सब मुस्कुरा दिए । 

"सॉरी सर, नथिंग इज़ इम्पॉसिबल फ़ॉर हनुमान ।" 

"जय महाकाली, आयो गोरखाली ।" मनोज के इस नारे के साथ ही सभी सिपाही जोश से भर गये । इन बरसती गोलियों का खौफ जाता रहा । अब मनोज का सबसे पहला काम था इन दुश्मन बंकरों को तबाह करना । 

उसने तुरंत हवलदार भीम बहादुर की टुकड़ी को आदेश दिया कि वह दाहिनी तरफ के दो बंकरो पर हमला करके उन्हें नाकाम कर दें और वह खुद बाएँ तरफ के चार बंकरों को नष्ट करने का जिम्मा लेकर चल पड़ा । मनोज के मन में भय नाम की चीज़ ही ना बची । उसने निडर होकर हमला बोलना शुरू किया और एक के बाद एक चार दुश्मनों को मार गिराया।

दुश्मन की गोलियां अपना काम कर रही थीं और मनोज अपना । तीन बंकर तबाह कर चुका था मनोज लेकिन उसके कंधे और टाँगें बुरी तरह घायल चुके थे । हां मगर मनोज की हिम्मत जस की तस बनी हुई थी । उसे अब चौथा और अंतिम बंकर तबाह करना था । 

जोश से भरे मनोज को अपने ये गहरे घाव किसी चींटी के काटने के समान लग रहे थे । उसने हाथ में एक ग्रेनेड पकड़ा, और जय महाकाली आयो गोरखाली का जयघोष करते हुए वो ग्रेनेड चौथे बंकर की तरफ उछाल दिया । इधर ग्रेनेड मनोज के हाथ से निकला ही था कि उसे लगा जैसे कुछ बहुत तेजी से उनके सिर में घुस गया हो । सब सुन्न पड़ गया । मनोज जो अब तक गोलियां लगने के बाद भी डटा हुआ था वो अब ज़मीन पर गिर पड़ा । ये एक गोली थी जो दुश्मन सिपाही ने चलाई थी । 

इधर मनोज गिरा उधर उसका फेंका हुआ ग्रेनेड बिना चूके बंकर से जा टकराया । एक धमाके के साथ चौथा बंकर भी तबाह । मनोज गिर पड़ा था लेकिन उसकी हिम्मत अभी खड़ी थी । आंखें मूंदने से पहले उसने ज़ोर से कहा "ना छोड़णू ।" जवान समझ गये कि मनोज कह रहा है इन दुश्मनों को मत छोड़ना । 

मनोज की आंखें हमेशा के लिए बंद हो रही थीं । सामने उनकी मां थी जिसने कहा था कभी पीछे मत हटना । वो दोस्त था जो भाई से बढ़ कर रहा । उसका गांव था, उसका वो पहला और अखिरी प्यार था जिसके लिए उसने जान तक कुर्बान कर दी थी । 

6 बंकरों के साथ खलूबार अब भारत के कब्जे में आ गया था । ये जीत कारगिल युद्ध जीतने में सबसे महत्वपूर्ण साबित हुई । मनोज की शहादत ने उसके जवानों को इतना उत्तेजित कर दिया था कि वह पूरी दृढ़ता और बहादुरी से दुश्मन पर टूट पड़े थे और विजयश्री हथिया ली । 

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दरवाजे की घंटी बजी । मां ने दरवाजा खोला । सामने दरवाज़े पर दोस्त खड़ा था । हाथ में मिठाई का डब्बा था और आंखों में इतने आँसूं जैसे पूरा समंदर इन्हीं में समाया हो । मां को समझते देर नहीं लगी । दोस्त ने मां की तरफ मिठाई का डब्बा बढ़ाते हुए कहा "सन्यासी नहीं रहा मां । शहीद हो गया ।" मां उससे लिपट कर रोने लगी । मिठाई का डब्बा हाथों से छूट गया । 

जब मनोज का बचपन का सपना पूरा हुआ और उसे परमवीर चक्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो दोस्त ने पूरे गांव में मिठाई बंटवा कर अपना वादा पूरा किया । 

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कैप्टन मनोज पाण्डेय पर लिखी गई ये कहानी काल्पनिक है लेकिन उनकी वीरता उतनी ही सच्ची है जितना दिन का उजाला और रात का अंधेरा । बाक़ी उनकी वीरता की कहानी कहने के लिए उनके ये शब्द ही काफ़ी हैं ‘मौत भी मुझे मेरी मातृभूमि की रक्षा के कर्तव्य से रोकने आई तो उसे पराजित कर दूंगा!‘ मनोज ने सच में अपनी मातृभूमि  के लिए मौत को भी हरा दिया । 

कारगिल विजय के इस अवसर पर नमन है उन सभी वीर जवानों को जिनके लिए देश हमेशा से सर्वोपरि रहा है । नमन है उन्हें जिन्होंने देश के खातिर खुद को कुर्बान किया । नमन है उन्हें जो आज भी हमारे लिए कुर्बान होने के लिए तैयार खड़े हैं 💐💐💐🙏🙏🙏🙏

धीरज झा

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