मुंशी जी की धरती यात्रा (मुंशी जी की जयंती पर उनके लिए एक कहानी)

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ये कोई डेढ़ साल पहले की बात है । कोरोना महामारी के फैलने से कुछ ही समय पहले की । इस अनजान और जानलेवा वायरस के कारण इधर धरती पर तो हडकंप मचना शुरू हो ही गया था मगर ऊपर स्वर्गलोक में भी कुछ ऐसा हो रहा था जिसने स्वर्गवासियों के मन में कोलाहल मचा दिया था । स्वर्ग संचालकों की तरफ से एक नया फरमान आया था । यही फरमान इस कोलाहल का कारण था । 

इस नए फरमान के पीछे एक बूढ़े का हाथ था । लगभग 149 साल का ये बुजुर्ग एक अलग ही ज़िद ले कर बैठा था सालों से । स्वर्ग की तमाम सुख सुविधाएं और शांति इसे रास नहीं आ रही थी । ऐसा नहीं कि ये जब यहां आया था तब से ऐसी ज़िद किए बैठा था, बल्कि शुरुआत में तो ये खुश ही बहुत था ये सोच कर कि चलो पिंड छूटा अपनी बीमारियों से, अपनी उस दयनीय दशा से लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया इस बुजुर्ग के अंदर एक अजीब सी बेचैनी बढ़ने लगी । 

ऊपर से अक्सर वहां रहने वालों को बदलती दुनिया का नज़ारा दिखा दिया जाता है । एक बड़ी सी खिड़की है वहां से लोग (जो अब आत्माएं हैं) धरती को देख सकते हैं । ये बुजुर्ग जब भी धरती को देखता इसके अंदर की बेचैनी तेज हो जाती । दरअसल इसे कहानियां लिखने की आदत थी और वो आदत यहां आने पर भी नहीं छूट रही थी । पहले तो इसने ज़िद की कागज़ कलम की । काफ़ी मुंह फुल्ल्वल के बाद इसे कागज़ कलम दिया गया । अब कागज़ कलम से कहानी थोड़े ना लिखी जाती है उसे लिखते के लिए अहसास जज़्बात परिस्थितियां सब कुछ चाहिए । अब उस चमकते दमकते स्वर्ग में ये सब कहां से आए । 

सो इन भाई साहब ने जिद ठान दी कि इन्हें धरती पर एक बार जाने दिया जाए ये आज के समय की कुछ कहानियां लिख कर आ जाएंगे । ये सालों से ऐसी बेतुकी ज़िद लेकर बैठे हैं । अरे भई स्वर्ग है कोई सराय तो है नहीं कि जब मन हुआ मुंह उठा के चले आए जब मन हुआ चले गए । लेकिन इन्हें कौन समझाए, ये ज़िद को पकड़े रहे । अब अचानक से इनकी बात मान ली गई । 


स्वर्ग प्रबंधन समिति की बैठक में ये फैसला हुआ कि कलयुग के लोग जो अपने माता पिता के मरे पर भी काम का बहाना बना देते हैं वो सब काम काज छोड़कर घरों में बंद हैं । तो जब इतने बड़े फेर बदल हो ही रहे हैं तो क्यों ना हम भी एक नया प्रयोग करें । तो प्रयोग ये है कि यहां से एक एक कर के उन लोगों को कुछ समय के लिए धरती पर भेजा जाएगा जिन्हें उनके गुजरने के सालों बाद भी धरती के लोग याद करते हैं । चूंकि इसकी ज़िद पहले उस बुजुर्ग ने की तो शुरुआत उसी से की जाए । 

"मुंशी जी तो मन पक्का कर लिए हैं जाने का ?" पीछे से एक भारी सी आवाज़ ने उस बुजुर्ग का ध्यान अपनी ओर खींचा । 

"देवता, हम तो सालों से मन पक्का किए बैठे हैं । आप ही सब नहीं सुनते ।" बुजुर्ग ने पीछे घूमते हुए जवाब दिया । 

"चलिए तो अब सुन ली गई आपकी बात । आप कल सुबह ही निकलेंगे धरतीलोक के लिए । हां लेकिन इसकी कुछ शर्तें और समय सीमा है । आपके लौटने के बाद आपके अनुभव से अन्य फैसले लिए जाएंगे ।" बुजुर्ग मुस्कुरा दिए । 

"धरती वालों का असर आप लोगों पर भी पड़ रहा है । सौदेबाजी करने लगे हैं ।" 

"अरे नहीं मुंशी जी सौदेबाजी नहीं ये सब आप लोगों के लिए ही है ।" बुजुर्ग को उस दूत में एक नेता की झलक मिली । उनकी मुस्कान और गहरी हो गई । 

"अच्छा बताइए क्या क्या नियम तय किए हैं ।" 

"पहले तो जिस तरह आप यहां पर हर रोग दुख तकलीफ से आज़ाद हैं वैसा नहीं होगा । जिस उम्र में आपको वहां से लाया गया था आपकी अवस्था उसी उम्र जैसी होगी । हां आप रोग मुक्त होंगे लेकिन वहां आपको कोई भी रोग पीड़ा हो सकती है सो संभल के रहिएगा । आपके पास अपने काम निपटने के लिए एक साल का समय होगा । समय सीमा पूरी होते ही आपको फिर से लौटना होगा । आप चाहें तो समय से पहले भी लौट सकते हैं । यहां से जाने के बाद आप एक आम इंसान होंगे । आप वहां से कुछ ला नहीं सकते सिवाय यादों के । बाक़ी बातें आपके लौटने के बाद । और हां सबसे जरूरी बात, मरियेगा मत, मरे तो फिर से यहीं आना होगा और दोबारा धरती पर नहीं जा सकेंगे ।" 

दूत इतना बता कर चले गये । मुंशी जी के लिए इन नियमों में कुछ भी अटपटा नहीं था । उन्हें तो अपनी कहानियों के लिए माल मीटर इकट्ठा करना था और चले आना था । 

हां मुंशी जी को एक चिंता ज़रूर खाए जा रही थी और वो ये कि उन्होंने सुना था इतने सालों में दुनिया ने बहुत तरक्की कर ली है । वह सोच रहे थे कि क्या अभी भी होरी और हलकू जैसे लोग होंगे ? क्या माधव और उसके पिता घीसू जैसे किरदार आज भी भुने हुए आलुओं के चलते प्रसव पीड़ा से तड़प रही बुधिया को मरता छोड़ देते होंगे ? उनकी कहानियों ने और वंशीधरों को जन्म दिया होगा या फिर अलोपीदीन जैसे धन्ना सेठों के अन्दर की बची खुची इंसानियत भी दम तोड़ गई होगी ? 

मुंशी जी को डर है कहीं उनके पात्र इस बदलती दुनिया के साथ खत्म ना हो गये हों । लेकिन इन सब बातों का पता तो तभी चल पाएगा जब मुंशी जी धरती पर दोबारा लौटेंगे । वैसे भी मुंशी जी को स्वर्गलोक में आने वाले नए लोगों से पता लगता रहता था कि कैसे उनका गुणगान किया जाता है धरती पर । आज भी जब वो जाएंगे तो लोग उन्हें सरआंखों पर बिठाएंगे और उनकी कहानियों को तो हाथों हाथ लपक लिया जाएगा । भले ही ज़माना कितना भी बदल गया हो मगर उनकी कहानियों का जादू आज भी चलेगा । मुंशी मन ही मन ठान चुके थे कि जिन जिन प्रकाशकों ने उनकी कहानियों से पैसे कमाए हैं उन सबको पकड़ेंगे और अपनी कहानियां प्रकाशित करवायेंगे । 

सालों से मुंशी जी जिस ज़िद पर अड़े थे आखिर उसके पूरे होने का समय आ ही गया था । वह लौट रहे थे धरती पर । उन्हें ले जाने के लिए दूत तैयार खड़ा था । मुंशी जी उत्सुक थे ठीक उसी तरह जैसे वो हर बार अपनी नई रचना को कागज़ पर उतारने से पहले हुआ करते थे । 

मुंशी जी ने आंखें बंद कीं और अगले ही पल वो दूत के साथ बादलों को चीरते हुए धरती की तरफ बढ़ने लगे । कुछ ही समय में मुंशी जी धरती पर थे । रास्ते में दूत ने एक बात उनके कान में कही थी 'मुंशी जी जाते ही मास्क का जुगाड़ ज़रूर कर लीजिएगा ।' अब मुंशी जी सोच रहे थे कि हमारे समय में लोगों के चेहरे पर मुखौटे तो होते थे लेकिन मुखौटे पहनता तो कोई नहीं था । क्या आज कल इंसान मुखौटे पहनने लगा है ? ये सब सोच ही रहे थे की किसी ने पीछे से धक्का दिया उन्हें । जितनी दिक्कत स्वर्ग से धरती तक आने में नहीं हुई थी उससे ज़्यादा दिक्कत इस धक्के ने मुंशी जी को दे दी । वो सड़क पर गिर पड़े । नज़र उठाई तो देखा हर कोई भाग रहा है । 

क्या डाकुओं का हमला है या फिर कोई आदमखोर जानवर तो नहीं घुस आया शहर में । पड़े पड़े ही उन्होंने एक भागते युवक को जीन्स पकड़ ली और पूछ लिया "अरे बेटा कहां भाग रहे हैं सब ?" 

"बाबा लॉकडाउन लग रहा है आज रात से । सब समान भर रहे हैं अपने घरों में । मेरा पैर छोड़ो जाने दो मुझे ।" युवक इतना कह कर पैर झटकते हुए भाग निकला । 

अब ये लॉकडाउन क्या बला है ? और लोग सामान क्यों भर रहे हैं घरों में ? मुंशी जी ये सब सोच ही रहे थे कि इतने में उनकी नज़र ज़मीन पर पड़े एक कागज पर पड़ी । वो किसी अखबार का पन्ना था । हेडलाइन थी 'कोरोना के कारण पूरे भारत में लॉकडाउन के आदेश ।" उसके बार पूरी जानकरी थी । पूरी खबर जानने के बाद मुंशी जी समझ गये कि स्वर्ग वाले उनके साथ खेल खेल गये हैं । लेकिन मुंशी जी के लिए इससे भी चिंताजनक बात थी दुनिया का ये हाल । इतनी बदल गई दुनिया कि आज घरों में बंद होने को तैयार है । 

लॉकडाउन मुंशी जी के लिए कोई नई बात नहीं थी । उन्होंने अपने समय से ही महिलाओं का पर्मानेंट लॉकडाउन और घूंघट जैसा फेस कवर देखा था । खैर जो भी था उन्होंने तो यहां बस कहानियां लिखनी थीं । मगर अब वो अपने पात्रों को कैसे खोजें यही बड़ी समस्या थी । समय भी कम था क्योंकि जहां पूरा जीवन बीत गया और पता नहीं लगा वहां ये साल बीतते कहां देर लगनी थी । खैर मुंशी जी खड़े हुए और बिना किसी तय मंज़िल के चलने लगे । इस दौरान रहने और खाने की समस्या तो सबको थी मगर मुंशी जी का काम चलता रहा । जो दानी सज्जन खाना बांट रहे थे उनसे खाने का काम चल गया और सोने के लिए तो आसमान की छत है ही । मास्क के रूप में मुंशी जी ने भी मुखौटा चढ़ा ही लिया था । 

एक एक कर के उन्हें नए ज़माने की कहानियां मिलने लगीं । उन्होंने देखा कि उनके पात्रों के कपड़े पहले से अलग हैं, इनके हाथ में मोबाईल नामक यंत्र भी आ गया है लेकिन इन सबसे भी इनकी किस्मत नहीं बदली । उन्होंने अपने पात्रों के पांव में पड़े छाले देखे, उनके कंधों पर ज़िम्मेदारियों के बोझ के अलावा बच्चों का भार, बूढ़ी मां का भर, समान का भार लदा देखा । उन्होंने देखा कैसे उनके पात्र सैकड़ों मील का सफर पैदल नाप दे रहे हैं । एक दृश्य पर तो उनकी आंखें भार आई जब उन्होंने देखा कि हीरा और मोती में से एक बैल को गायब है और उसकी जगह खुद झूरी को जोत में लगा हुआ है । 

वही भूख और गरीब की जान की कीमत आज भी शून्य, पुलिस की मार, जानवरों को खुला घूमते देखा और लोगों को घरों में बंद देखा । मुंशी जी ने कहीं पर हालात को जस का तस देखा तो कहीं ऐसे बदलाव देखे जिसकी ना कभी कल्पना की थी और ना ही कामना । 

लेकिन जो भी हो मुंशी जी को कहानियां मिल रही थीं । उन्होंने सोचा क्यों ना ऊपर जाने से पहले कुछ नई कहानियां लिख जाऊं ! लोग तो उन्हें पढ़ने के लिए उत्सुक हैं ही, कितना सम्मान करते हैं उनका । यही सोच कर वो कुछ प्रकाशकों के घर की तरफ बढ़े । कुछ ने कपड़े देख कर घर में घुसने नहीं दिया तो कुछ ने लॉकडाउन का हवाला दे कर चलता कर दिया । दिन रात मुंशी जी का गुणगान करने वाले मुंशी जी को ही नहीं पहचान पाए थे । जगह जगह से प्रकाशकों के पते इकट्ठे करते हुए मुंशी जी जा पहुंचे एक युवा प्रकाशक के पास जिसका प्रकाशन तो पुराना था मगर अब उतना चर्चित नहीं था जितना कभी उसके पिता जी के समय में हुआ करता था । 

प्रकाशक ने पहले तो अन्य लोगों जैसा ही व्यवहार किया मगर फिर मुंशी जी के बार बार कहने पर उन्हें घर में घुसा ही लिया । मुंशी जो को कुर्सी पर बैठाते हुए प्रकाशक बोला "हांजी तो अंकल जी बताइए मैं आपकी क्या हैल्प कर सकता हूं ?" अंकल जी सुन कर मुंशी जी को थोड़ा अटपटा सा लगा । 

"अरे बेटा लगता है तुमने पहचाना नहीं मुझे ।" मुंशी जी ने उसे याद दिलाने की कोशिश । 

"नहीं जी बिल्कुल नहीं पहचाना ।" इतना सुनते ही मुंशी जी का ध्यान उस प्रकाशक के कमरे में लगे एक पोस्टर पर गया जिस पर मुंशी जी की एक कथा कि पंक्ति लिखी थी ।

"वो पंक्ति मेरी ही कहानी की है ।" मुंशी जी ने फिर अपना परिचय देने की कोशिश की । प्रकाशक ने पोस्टर को देखा ।

"जी नहीं ये मुंशी प्रेमचंद की लिखी लाइन है ।" प्रकाशक ने बुरा सा मुंह बना कर कहा ।

"मैं ही मुंशी प्रेमचंद हूं बेटा ।" 

"जी अंकल जी और मैं अमीष त्रिपाठी ।" प्रकाशक ने खीज कर कहा ।

"ये कौन हैं ?" मुंशी जी ने पूछा ।

"देखो अंकल जी अभी वैसे ही बहुत टेंशन चल रही है ऊपर से आप बे सर पैर की बातें कर रहे हो । माना कि लॉकडाउन में काम धंधा नही है लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि आप इस तरह से मेरा समय खराब करो ।" एक तो प्रकाशक ने अभी तक कोई चाय नाश्ता नहीं पूछा था ऊपर से ऐसा व्यवहार । मुंशी जी जो शांत और विनम्र रहने के लिए जाने जाते थे वो उखड़ गये ।

"मूर्ख इंसान, मेरी ही किताबें बेच बेच कर घर चलाते हो, मेरा ही नाम ले ले कर साहित्य के मंच पर लोगों से बेमन तालियां पिटवाते हो, मेरे ही लिखी पंक्तियों को दिवारों पर टांगते हो और मुझे ही नहीं पहचानते । जाओ कहीं से तस्वीर मिलती है मेरी तो मेरा चेहरा मिलाओ, मुझसे मेरी किसी भी रचना के बारे में पूछो । कैसा समय आ गया है कि तुम जैसे को भी अपना परिचय देना पड़ रहा है ।" गुस्से में तमतमाए हुए मुंशी जी कुर्सी से उठ गये । उनका शरीर कांपने लगा । वो जाने को हुए तभी प्रकाशक ने पैर पकड़ लिए । उसने उनकी तस्वीर गूगल कर ली थी । 

"माफ कर दीजिए मुंशी जी मैं पहचान नहीं पाया आपको ।" काफ़ी समय तक प्रकाशक उनसे माफी मांगता रहा । 

"हटो, सोशल डिस्टेंसिंग निभाओ ।" मुंशी जी शांत हो गये थे । प्रकाशक को पैरों से उठा कर खुद फिर कुर्सी पर आ कर बैठ गये । 

इसके बाद मुंशी जी के लिए मस्त नाश्ता आया । इसके साथ ही उन्होंने प्रकाशक को सारी बात विस्तार में बताई और ये भी बताया कि वो क्यों धरती पर आए हैं । 

"तो अब बताओ क्या मेरी कहानियां छपेंगी ?" चाय का कप उठाते हुए मुंशी जी ने पूछा ।

प्रकाशक ने गहरी सांस लेते हुए कहा "हम्म्म्म, छप तो जाएंगी मगर कुछ समस्याएं हैं ।"

"वो क्या ?" 

"आप फिर से जिंदा हो गये हैं ये कौन मानेगा ? किस किस को आप अपनी कहानी बताएंगे ?"

"बात तो सही कह रहे हो । लेकिन कोई उपाय तो होगा ।"

"हां इसका एक उपाय है । नाम बदल कर छापें ।" 

"अरे तो ये कोई समस्या नहीं मैं तो ऐसा करने का अभ्यस्त हूं । और कोई दिक्कत हो तो बताओ ।" 

"इससे भी बड़ी दिक्कत ये है कि जैसी कहानियां आप लिखते हैं वैसी कहानियां अब ज़्यादा लोग पसंद नहीं करते । कुछ नया ट्राई करिए ।" मुंशी जी ने बिस्कुट चाय में डुबाया ही था कि प्रकाशक ने ये बात कह दी । अब नया ट्राई करिए सुनते ही मुंशी जी का पारा फिर से सातवें आसमान पर चढ़ गया । इधर उनका बिस्कुट भी टूट का चाय में डूब गया । इस दोहरे घात से मुंशी जी और तमतमा गये। 

"मूर्ख लड़के, मैं अगर समाज की सच्चाई नहीं लिखूंगा तो क्या लिखूंगा । मुझे यही सब लिखना आता है और मैं यही सब लिखने के लिए जाना जाता हूं ।" 

"मैं आपकी बात समझ रहा हूं मगर वैसा लिखने का क्या फायदा जिसे कोई पढ़े ही ना ।" 

"साहित्य में फायदा नुक्सान नहीं होता यहां सिर्फ भावनाओं का मोल है ।" 

"आपके समय में नहीं होता होगा मगर आज ये भी व्यापार ही है ।" 

"औरों के लिए होगा लेकिन प्रेमचंद के लिए आज भी साहित्य एक साधना ही है । बहस खतम करो और अब मुझे एक रजिस्टर और कलम दो ।" 

"अरे आप लैपटॉप पर लिखिए ना । आज कल कागज पर कौन लिखता है ।" 

"फिर तुम वही बात कर बात कर रहे हो । कोई लिखता है या नहीं लिखता मगर हम जैसे लिखते आ रहे हैं वैसे ही लिखेंगे ।" काफ़ी बहस के बाद वही हुआ जो मुंशी जी चाहते थे । प्रकाशक ने अनमने मन से उनकी हर शर्त मान ली । आखिरकार उन्हीं की वजह से तो उसका ये प्रकाशन था । जिसे उसके पिता ने मुंशी जी की कहानियों के दम पर खड़ा किया था । आज समय था मुंशी जी का कर्ज उतारने का । 

लिखने में मुंशी जी का जवाब नहीं था । वह सारा दिन लिखा करते । अब उन्हें बाहर जाने की ज़रूरत नहीं थी । प्रकाशक ने उन्हें समझा दिया था कि बाहर का सारा मसाला उन्हें न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया पर मिल जाएगा । मुंशी जी दनादन गरीबों की संवेदनाओं को शब्दों में ढालने लगे । सरकार के बुरे फैसलों पर खुल कर लिखने लगे । प्रकाशक उनकी लिखी कुछ कहानियां सोशल मीडिया पर डालने लगा । लेकिन यहीं से समझ आ रहा था कि उनकी कहानियों को कितने पाठक मिलेंगे । 

मुंशी जी पूछते उदास क्यों हो तो प्रकाशक कहता आपकी कहानियों पर लाइक नहीं आ रहे ज़्यादा । अब भला मुंशी जी क्या जानें लाइक कमेंट का क्या झोल है । वो तो बस लिखते जा रहे थे । ऐसे ही मुंशी जी ने कुछ ही महीनों में कहानियों का ढेर लगा दिया । किसान, गरीब, महिला, सरकार, जवान, देश सब पर खुले मन से लिखा । 

अब इतनी कहानियां तैयार थीं कि उनकी पांच सात किताबें छप सकें । पहली किताब छप गई । लॉकडाउन में ढील मिली तो किताब ओनलाईन और बाजार दोनों जगह उपलब्ध होने लगी । किताब पर लेखक के रूप में नाम लिखा गया मुनीम स्नेहचंद । ये भी लाइन जोड़ी गई कि मुनीम जी को पढ़ते हुए आपको लगेगा कि मुंशी जी फिर से जी उठे हैं । इंतज़ार होने लगा कि लोग किताब खरीदें । लेकिन किताबों के पाठक नहीं बल्कि उन पर सिर्फ धूल की परत बढ़ रही थी । 

सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने पर बधाई बधाई हर कोई कर रहा था लेकिन किताब किसी ने ना खरीदी थी । ऐसा ही हाल अन्य किताबों का भी हुआ । हां प्रकाशक की परेशानियां ज़रूर बढ़ गईं । कुछ लोगों ने उन पर असंवेदनशील होने का आरोप लगाया । कुछ ने कहा ये मुंशी जी की नकल करता है । महिलाओं की कहानियों पर उनकी सोच को पिछड़ा हुआ बताया गया । एक दो कहानियों के शीर्षक पढ़ कर कुछ संगठन तो प्रकाशक के घर तक आ पहुंचे । तोड़ फोड़ भी मचाई ।

"आपसे कहा था कि ऐसी कहानियां अब कोई पसंद नहीं करता ।" प्रकाशक ने खिड़की के टूटे कांच बटोरते हुए कहा ।

"तो कैसी कहानियां पसंद करते हैं ?" कांच के टुकड़ों में अपना अक्स खोजते हुए मुंशी जी ने कहा ।

"प्रेम कहानियां, महिला सशक्तीकरण की कहानियां, रोमांचक यात्राओं की कहानियां ।"

"अरे कैसी बात कर रहे हो । मेरी कहानियों में देखो एक गरीब मजदूर अपनी बीवी से कितना प्रेम करता है । उसे गोद में उठा कर अस्पताल अस्पताल उसके इलाज को फिर रहा है ।  प्रेम की इससे सच्ची परिभाषा और क्या होगी । महिला सशक्तीकरण का जो उदाहरण मैंने दिया है कि एक छोटे गांव से आई बहु कैसे अपने पति के बचाव के लिए बड़े बड़े अधिकारियों से भिड़ जाती है, ऐसा कहां पाओगे ? और यात्रा वृतांत अरे आज के समय में सैकड़ों मील पैदल चलने वालों से रोमांचकारी यात्रा वृतांत भला किसका होगा । उसके रोमांच की दास्ताँ उसके पैरों में पड़े छालों से पुछो ।" मुंशी जी ने भावुक हो कर कहा । प्रकाशक ने अपना माथा पीट लिया । फिर प्रकाशक ने मुंशी जी को कुछ फिल्में और वेब सीरिज़ दिखाईं । हालांकि मुंशी जी उन्हें पूरा ना देख ना पाए । 

"देखा आपने । लोग ऐसी कहानियां पसंद करते हैं ।"

"ये कहानियां हैं ? इसे कहते हैं महिला सशक्तीकरण ? इसे कहते हैं प्रेम ? ना कहीं गरीब की पीड़ा है ना किसान का दर्द । सिर्फ निर्लज्जता ।

"जी मुंशी जी यही है आज का साहित्य और सिनेमा ।" इससे उन्हें बहुत दुख पहुंचा । मुंशी जी अपने बिस्तर पर जा कर लेट गये । बहुत सोचने के बाद उन्होंने ये फैसला किया कि अब वो लौट जाएंगे । दूत को मन ही मन संदेश भेज दिया उन्होंने कि कल वो उन्हें आ कर ले जाए । 

आज मुंशी जी को जाना था । प्रकाशक उनके इस तरह जाने से दुखी ज़रूर था लेकिन उससे ज़्यादा दुख उसे उन 7 किताबों में हुए नुक्सान का था । मगर नुक्सान के साथ उसे ये उम्मीद भी था कि हो सकता है ये सात किताबें और मुंशी जी कि अन्य कहानियां आज से 25 30 सालों बाद उसका और उसके बच्चों का भविष्य सँवार दें । 

"पहले ही सही था । कम से कम मैं इस वहम में खुश तो था कि लोगों को आज भी मैं और मेरी कहानियां याद हैं । मगर अब तो लग रहा है जैसे मुझे आना ही नहीं चाहिए था । सब बदल चुका है ।" मुंशी जी की आंखें नाम हो गईं । 

"ऐसा नहीं है मुंशी जी । चलिए आपको कुछ दिखता हूं आपका कितना सम्मान है ।" इतना कह कर प्रकाशक मुंशी जी को बाइक पर बिठा कर एक बुक स्टोर में ले गया । बुक स्टोर का नज़ारा देख कर मुंशी जी हैरान रह गये । यहां मुंशी जी की तस्वीरों वाले कई पोस्टर लगे थे । शुभकामना संदेश भी थे । 

"अरे सर कैसे हैं आप । बताइए क्या मदद करूं आपकी ।" दुकान में घुसते ही काउंटर पर खड़े शख्स ने प्रकाशक को देख कर कहा । 

"इन्हें इनकी पसंद की कुछ किताबें खरीदनी हैं ।" प्रकाशक ने मुंशी जी की तरफ इशारा करते हुए कहा । शख्स ने मुंशी जी को ऊपर से नीचे तक देखा । 

"अच्छा ।" मुंशी जी के कपड़े और जूते देख कर दुकान वाले ने मन ही मन सोचा इसे किताबों से ज़्यादा भोजन की ज़रूरत लगती है । 

खैर किताबें खरीद ली गईं । बिल कटाने का समय आया तो दुकानदार ने बताया कि आज प्रेमचंद जयंती है इस मौके पर डिस्काउंट दिया जा रहा है । मुंशी जी सोच में पड़ गये कि मेरे ही जन्मदिन पर ये शख्स मुझे ही डिस्काउंट दे रहा है । प्रकाशक ये सब देख मुस्कुरा रहा था । 

"क्या आपने मुझे पहचाना नहीं ?" चलते हुए मुंशी जी ने दुकानदार से पूछा । 

"नहीं जी ।" हालांकि मन ही मन उसने कहा था तू कौन सी तोप है बुड्ढे जो तुझे पहचानूं । मुंशी जी अपना सा मुंह लिए बाहर आ गये ।

दूत बाहर खड़ा था मुंशी जी जाने लगे तो प्रकाशक ने कहा "मुंशी जी ज़माने के साथ साहित्य के मायने भी बदलते रहते हैं । आपके समय में भी बदले होंगे । ये आज के लोगों की पसंद है । इनकी बातों को दिल पर मत लीजिएगा और यही सोच कर खुशी खुशी लौटिए कि आज भी आप लोगों में उतने ही चर्चित हैं ।"

"जानते हो बेटा । प्रसिद्धि तो मुझे तब तक भी उतनी नहीं मिली थी जब मैं सच में दुनिया छोड़ कर गया था । लेकिन ये सोच कर संतुष्ट था कि लोग मुझे समझते हैं । मेरी कहानियों से सीखते हैं । मगर इस बार हाथ सिर्फ निराशा लगी है । जब आम लोगों की कहानियों को ही सम्मान नहीं मिला तो मैं अपने सम्मान का क्या करूंगा । तुम्हारी मदद के लिए शुक्रिया तुम्हारा । सदा खुश रहो ।" इतना कह कर मुंशी जी दूत के साथ स्वर्ग लौट गये । 

************************

मुंशी स्वर्गलोक लौट गए थे । इत्ने दिन साथ रहने के बाद प्रकाशक को भी उनकी आदत हो गई थी । वो भी थोडा उदास था लेकिन उससे ज़्यादा चिंता उसे मुंशी जी की लिखी 7 किताबों की थी । इससे उसे भारी नुक्सान हुआ था । बहुत सोचने के बाद उसे एक उपाय सूझा । उसने एक फ़ेसबुकिए लेखक को काम पर रखा और मुंशी जी की लिखी नई कहानियों को आज के समय के अनुसार मसालेदार बनाने को कहा । लाइक बटोरने में माहिर फ़ेसबुकिए लेखक के लिए खुद को साबित करने का ये रक अच्छा मौका था । उसने मुंशी जी की कहानियों को आज के दौर से ऐसे जोड़ा कि मुंशी जी अपनी ही कहानियों से गायब हो गई । 

प्रकाशक का प्रयोग सफल रहा और देखते ही देखते मुंशी जी की 7 की 7 किताबें बेस्ट सेलर सूची में आ गईं । हां फर्क बस इतना था कि किताब से मुंशी जी का नाम और उनकी कहानियों से उनके पात्र गायब थे । 

**************************************

मुंशी जी के जन्मदिन पर इस कहानी के अलावा मेरे पास और कुछ नहीं है । इस कहानी में कुछ खास नहीं है लेकिन मैं संतुष्ट हूं कि उनके चरणों में कुछ शब्द अर्पित कर पाया । मुंशी जी को उनकी जयंती पर मेरा नमन 🙏🙏

लगे कि कहानी कुछ कहती है तो शेयर ज़रूर करें 🙏

धीरज झा

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मुंशी जी की धरती यात्रा (मुंशी जी की जयंती पर उनके लिए एक कहानी)
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