लक्ष्मी की मां (देश के बंटवारे की एक कहानी)

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“संगीता जल्दी चल, देर हो रही है ।” उस अधजले मकान के एक कमरे के बाहर खड़े शख्स ने अंदर बैठी अपनी पत्नी को बड़े हौसले के साथ आवाज़ दी । इतनी बात कहने में उसने खुद को कितनी बार समेटा था ये उसी को पता था । 


“मैं नई जाना, मैं अपणे पुत्त नूँ छड के कित्ते नई जाणा ।” महिला ने रटी रटाई बात को फिर से दोहराया । वो रात से सिर्फ इतना ही बोले जा रही थी । घर के सभी लोग उसे समझाने आए लेकिन उसने किसी की नहीं सुनी । वो बस बिस्तर पर लेटी अपनी 12 साल की बेटी का सिर सहलाए जा रही थी । 


सिसकियों से नम हो चुकी हवा में एकाएक गर्माहट तब आई जब बाहर से कोई शख्स गरजता हुआ घर में आया और तेज कदमों के साथ उस कमरे में घुस गया जहां संगीता अपनी बच्ची के साथ बैठी थी । 


“तू क्या चाहती है इस अपाहज के लिए हम अपने पूरे टब्बर की जान खतरे में डाल दें ? ओए, इसका जीना मरना एक बराबर है संगीता । अगर उसको अपने साथ ले चले तो हम कभी भी यहां से निकल ना पाएंगे । तू जितनी जल्दी इस बात को समझ लेगी, इसे छोड़ना उतना ही आसान होगा तेरे लिए ।”


“तुसी कह रहे हो ए गल्ल ? आपने ही इसका नाम लक्ष्मी रखा था ना ? याद है ना ये जब पैदा हुई थी उसी दिन आपको कितना बड़ा फायदा हुआ था । उसके बाद तो जैसे सच में ऐसा लगा जैसे हमारे घर लक्ष्मी माता आ गई हो । जब तक आपकी दुकान आपका काम अच्छा चला तब तक ये लक्ष्मी थी और आज ये बोझ हो गई आपके लिए ? ये ठीक बात नई बोली आपने । और मैं ना, बड़े अच्छे से समझ गई हूं, बाकी आप समझ लो । मैं ने इसको छोड़ के कहीं नहीं जाना और ना आप लोगों को जाने से रोकना है ।”


“तू समझ क्यों नई रही । अब ये मुल्क हमारा नई रहा संगीता । कुछ देर और यहां रुके तो हम सबकी लाशें यहां जमीन पर पड़ी मिलनी हैं ।”    


“पाजी, हुक्मरानों के लिए मुल्क का मतलब कुछ और होता होगा, आप लोगों के लिए अपना और पराया मुल्क और होगा लेकिन मेरे लिए ना, मेरा मुल्क वही है जहां मेरी ए धी रहेगी । अब ना आप लोग यहां से जाओ, मुझे कहीं नहीं जाना ।” अपनी आवाज़ में ज्वालामुखी की गर्मी लिए जो शख्स आया था पैर पटकता हुआ हवा की तरह वहां से बह निकला । 


बहुत लोग आए सबने समझाने की कोशिश की लेकिन संगीता अपनी बात से टस से मस ना हुई । तेजपाल अभी तक संगीता से कुछ बोल नहीं पाया था । वो बस कमरे के बाहर खड़ा उसे बार बार चलने को कह रहा था । सबको संगीता के आगे हारता देख तेजपाल के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा । उसकी स्थिति संगीता से भिन्न नहीं थी क्योंकि वो भी अपनी बच्ची को उतना ही चाहता था जितना कि संगीता लेकिन उसे अपने परिवार का भी ख्याल था । 


“संगीता ।”


“तुसी वी ? तुसी तां इस तरह ना कहना । मेरे से ज्यादा आपकी लाडली है ये ।” तेजपाल के कमरे में आते ही संगीता बोल पड़ी । 


“ये हमेशा मेरी लाडली रहेगी संगीता लेकिन इस समय हमको पूरे परिवार के बारे में सोचना है । मुझे भी इसकी उतनी ही फिकर है जितनी तुझे है । इसीलिए मैंने सारा इंतजाम कर दिया है इसके लिए । नजमा इसे संभाल लेगी और जब सब ठीक हो जाएगा तो मैन खुद इसे ले जाऊंगा ना ।”


“और जे ना ठीक हुआ सब ?” संगीता के इस सवाल का जवाब तेजपाल के पास नहीं था । वो बस उसकी शक्ल देखता रहा । वो दोनों अभी कमरे में ही थे तभी बाहर से किसी औरत के चिल्लाने की आवाज़ आने लगी । 


“ओ आप लोग किसकी उडीक कर रहे हो । इस शदैन (पागल) ने हम सबको मरवा देना है । मरने दो इसको यहीं । मैं बता दे रही हूं अगर इस अपाहज की वजह से मेरी बेटियों को कुछ हुआ तो मैंने इन दोनों माँ बेटी को अपने हाथों से मार देना है ।” ये संगीता की जेठानी की आवाज़ थी । 


“तू नया सेयापा ना डाल विमला, तेज उसको समझाने गया है ना ।”


“तेज क्या समझाएगा उसको, वो तो वही करेगा जो ये उसे...” विमला की बात पूरी नहीं हो पाई थी इससे पहले ही तेजपाल संगीता के साथ कमरे से बाहर निकल आया ।


हर कोई संगीता को घूरे जा रहा था । अगर कोई अच्छे से देख पाता तो उसे यही लगता कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई एक बार फिर से जंग पर जाने को तैयार है । उसकी 12 साल की बेटी उसकी पीठ पर बंधी थी और उसके हाथ में नंगी तलवार झूल रही थी । 


“ओ तेज, यार इसको समझा..”


“पाजी, अपनी पत्नी को साथ चलने के लिए समझा लिया मैंने लेकिन एक मां इससे ज्यादा समझने को तैयार नहीं है । आप इसकी चिंता ना करो । आज इसके रास्ते में मौत भी आई तो ये उससे भी लड़ जाएगी । आप सब चलो अब जल्दी से ।” कुछ देर तक बहस चलती रही । तभी किसी ने आ कर खबर दी कि दंगाई इधर की तरफ ही आ रहे हैं । इतना सुनते ही जिसके हाथ जो सामान लगा वो लेकर निकल गया । 


बाहर कुछ तांगे पहले से ही लगे हुए थे जिन पर बैठ कर सब करांची रेलवे स्टेशन की तरफ निकले । कल के अखबार में जब से गुरुद्वारे पर हमला कर के 100 से ज्यादा लोगों को मार देने की खबर पढ़ी थी तब से माहौल में एक डर सा छाया था । पुलिस कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी, फोन करो तो फोन इंगेज जाता था, सड़कों या रेलवे स्टेशन पर एक पुलिस वाला नहीं दिख रहा था । पलायन करने वालों के लिए गाड़ियों तक की व्यवस्था नहीं थी । जो घर से निकलता वो एक दूसरे को ऐसे देख के निकलता जैसे अब फिर से मिलने की उम्मीद ही नहीं । 


हर किसी को अपनी जान की परवाह थी लेकिन संगीता को सिर्फ अपनी बच्ची की फिक्र थी । इसके पैदा होने के महीने भर बाद तक संगीता दिन भर उसे नुहारती रहती थी । कितनी प्यारी थी वो, उसे एक नजर देखने वाला अपनी सारी थकान भूल जाता था । उसे रोते तो जैसे किसी ने सुना ही नहीं । ऐसे लगता था जैसे बच्ची ना हो विलायती गुड़िया हो । किसे पता था कि वो सच में गुड़िया ही होगी । ऐसी गुड़िया जो देखने में तो बहुत सुंदर है लेकिन उसके अंदर कोई हरकत नहीं । गर्दन से नीचे का सारा हिस्सा जैसे सुन्न था उसका । बोल भी नहीं पाती थी । बस मुस्कुराती रहती । उसकी आंखों के आंसू खुशी के होते थे या गम के कोई जान नहीं पाता था । 


उसके लिए हर कोई दुखी था, हर कोई तेजपाल के भाग को कोसता था लेकिन कुछ समय बाद सबने उसे भगवान की मर्जी मान स्वीकार कर लिया । कोई रास्ता भी तो नहीं था । तेजपाल के बड़े भाई ने ही उसका नाम लक्ष्मी रखा था । कहते थे उसके पैदा होने के बाद से घर में बरकत होने लगी है । कोई दुलार से तो कोई दया दिखा कर, हर कोई उसके करीब था लेकिन जब बात पाकिस्तान छोड़ कर जाने की आई तो सबको सबसे बड़ा बोझ लक्ष्मी ही लगी । सबको यही चिंता थी कि लक्ष्मी की वजह से पूरे परिवार पर मुसीबत आ जाएगी क्योंकि वो खुद से चल फिर नहीं सकती । लक्ष्मी के पिता तेजपाल उसे साथ ना ले जाने की बात के खिलाफ थे लेकिन उनके बड़े भाई साहब ने जब उन पर जोर डालते हुए पूरे परिवार का हवाला दिया तो उन्हें भी मानना पड़ा । 


“बेटी संगीता, अब भी बात मान ले । इसे यहीं छोड़ दे । तू खुद बीमार है, बाकी सबके लिए अपनी जान संभालना मुश्किल हो रहा है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ।” संगीता की सास ने उसे समझाने की आखिरी कोशिश की । 


“बीजी, आप अपने किसी बेटे को यहां छोड़ कर जा सकती हैं ? नहीं ना, फिर मैं अपनी बेटी को कैसे छोड़ जाऊं । और इसकी जिम्मेदारी की चिंता आपने नई करनी । उसके लिए मैं हूं ।” बीजी समझ गईं कि इसे समझाना बेकार है । 


सब लोग स्टेशन पहुंच चुके थे । कभी ट्रेन की जो छुक छुक सुनने में किसी मधुर संगीत सी लगती थी आज वही छुक छुक काल का रुदन लग रही थी । लग रहा था मानो कह रही हो “ट्रेन में सवारी, मौत की तैयारी ।” मगर यहां रह कर भी किसी ने कौन सा जिंदा रहना था । कल ही तो सिंधी हिंदुओं की बिल्डिंग में सबको मार कर आग लगा दी गई थी । सड़कों पर मौत नाच रही थी, जो ना जाने कब किसके घर में घुस कर क्या अनर्थ कर दे । 


सबके हाथ में समान थे । संगीता की पीठ पर बंधी लक्ष्मी इस मौत के तांडव को चुपचाप देखे जा रही थी । ट्रेन में भीड़ इतनी थी कि हवा को भी गुजरने का रास्ता नहीं मिल रहा था । जैसे तैसे पूरा परिवार ट्रेन में घुसा । संगीता भी लक्ष्मी को लिए ट्रेन में चढ़ गई । उसके हाथ में अभी भी तलवार थी ।  


ट्रेन ने अभी रेंगना शुरू ही किया था कि नंगी तलवारें लहराते हुए दहशतगर्द ट्रेन की तरफ दौड़े । पूरी ट्रेन में चीखें गूंजने लगीं । इंसानियत के बिना जिंदा लाशें कितनी खतरनाक हो जाती हैं ये इस दहशतगर्द भीड़ को देख कर समझा जा सकता था । तलवारें नाच रही थीं, उनके आगे कौन बूढ़ा कौन बच्चा सब एक समान थे । इन तलवारों ने बिना भेदभाव किए सबको बराबर मौत बांटनी शुरू कर दी थी । 


ट्रेन बहुत धीरे धीरे रफ्तार पकड़ रही थी । जितना समय ट्रेन तेज होने में लग रहा था उतने ही लोग ट्रेन से काट कर स्टेशन पर फेंके जा रहे थे । ऐसे ही दहशतगर्दों की एक टोली तेजपाल की बोगी में भी घुस चुकी थी । तलवार के एक वार ने तेजपाल के बड़े भाई की कलाई उतार दी । दूसरा वार तेजपाल पर हुआ था जिसे किसी अन्य यात्री ने धोखे से अपने ऊपर ले लिया । संगीता की जेठानी अपनी दोनों बेटियों को सीट के नीचे छुपाए खुद भीड़ के लिए कालीन बनी हुई थी । डर के मारे चिल्ला भी तो नहीं पा रही थी । तेजपाल के पिता बिना किसी वार के ही डर के मारे दुनिया छोड़ गए थे और मां उनके शरीर से लिपटी रोए जा रही थी । 


मौत धीरे धीरे संगीता और लक्ष्मी की तरफ बढ़ रही थी । इस भीड़ को लक्ष्मी के अपाहिज होने से भी कोई फर्क नहीं पड़ा । कुछ ही देर में भूखी आंखों ने उसे खोज लिया । एक हाथ उस मासूम की तरफ बढ़ा लेकिन उसे छूने से पहले ही शरीर से अलग हो कर गिर पड़ा । 


इस एक वार ने पूरी बोगी की नजरें एक ही दिशा में घुमा दी थीं । संगीता की तलवार से टपकता हुआ लहू इस बात की गवाही था कि औरतों के हाथों पर सिर्फ मेहंदी ही नहीं बल्कि खून का रंग भी बहुत गाढ़ा चढ़ता है । उसने लक्ष्मी को अपनी पीठ से उतार कर सीट पर रख दिया था । उसकी आंखों में वो आग थी जिसे आज से पहले किसी ने नहीं देखा था । वहां मौजूद हर किसी ने संगीता में उस समय मां चंडी को देखा था । मानों जैसे अपने काले केशों को वो खून से धो रही थी । 


उसने हर उस हाथ को काट दिया जो उस बोगी की किसी मासूम को छूने जा रहे थे, उसने हर वो सर धड़ से अलग कर दिया जिस पर हवस से भरी आंखें लटक रही थीं । तलवारों के अनगिनत वार संगीता की देह को भी चीर गए थे लेकिन एक मां की हिम्मत आज काल को परास्त करने जितनी मजबूत हो गई थी । लक्ष्मी सीट के एक कोने में लेटी रण चंडी के शौर्य को देखते निहाल हो रही थी । बोगी के सारे यात्री उसी तरह मूक थे जिस तरह श्रीकृष्ण का विकराल रूप देख पूरी सभा के लोग सुन्न पड़ गए थे । 


बोगी के लगभग आधे दहशतगर्दों को ढेर करने के बाद संगीता निढाल हो के गिर पड़ी । इधर संगीता गिरी उधर ये चमत्कार हुआ कि लक्ष्मी के मुंह से मां शब्द फुट पड़ा । उस बच्ची की बेबसी उसकी आंखों से बह रही थी । मानों वो कह रही हो काश मां, मैं भी तुम्हारी तरह लड़ सकती । 


संगीता भले ही गिर पड़ी थी लेकिन उसके चंडी रूप ने बोगी में मौजूद हर यात्री के अंदर की हिम्मत जगा दी थी । फिर तो बचे हुए दंगाइयों की तलवारों से दंगाई ही काटे गए । इस बोगी से उठी चिंगारी ने पूरे ट्रेन में मौजूद दहशतगर्दों को जला कर खाक कर दिया । इसके बाद ट्रेन ने यहां से जो रफ्तार पकड़ी तो सीधे अमृतसर जा कर ही रुकी ।      


संगीता ने सैकड़ों जानें बचा लीं उस दिन लेकिन खुद की जान ना बचा पाई । उसके जाने के बाद तेजपाल के बड़े भाई ने कहा था “हम सब लोग सारी उम्र अहसान मनाएंगे अपनी लक्ष्मी का जिसने एक मां को शेरनी बना दिया और उस शेरनी ने हम सबको बचा लिया ।”


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आज़ादी के लिए बहुत से लोगों ने अपनी कुर्बानी दी लेकिन आज़ादी के बाद इस देश को सम्पूर्ण बनाने में उनका योगदान भी कम नहीं था जो बिना वजह मारे गए, जिनकी बहन बेटियों की आबरू उनकी ही आंखों के सामने लूट ली गई, जिन बच्चों को छोटी उम्र में ही अनाथ कर दिया गया । काश कि उन सब के बीच भी कोई लक्ष्मी होती जिसकी मां उसे बचाने के लिए चंडी बन जाती । 


हर साल देश की आज़ादी मनाते हुए उन्हें भी श्रद्धांजलि देना जरूरी है जिन्हें अपने देश की मिट्टी में मिलने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी ।    


धीरज झा

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लक्ष्मी की मां (देश के बंटवारे की एक कहानी)
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