'गुलशन बावरा' वो गीतकार जिसने अपने दर्द को गीतों की शक्ल देना सीखा और बच्चे बच्चे की जुबान पर छा गया

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कहानी शुरू होती है पंजाब के उस छोटे से कस्बे शेखपुरा से जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। उसी कस्बे में 12 अप्रैल 1937 को जन्म हुआ एक बच्चे का, ऐसे तो बच्चे आए दिन जन्म लेते हैं लेकिन उनमें कुछ एक प्रसिद्धि पाने के लिए पैदा होते हैं फिर भले ही राह में लाख कठिनाइयां क्यों न आएं। शेखपुरा में जन्मा ये बच्चा कुछ ऐसा ही था। घरवालों ने बच्चे का नाम रखा गुलशन पूरा नाम गुलशन कुमार मेहता। बच्चा अपनी मां विद्यावती के साथ हमेशा भजन मंडलियों में जाया करता था, यहां उसने छोटी सी उम्र में ही भजन लिखना शुरू कर दिया। 

बहुत खुशहाल परिवार था, लेकिन परिवार की खुशहाली पर तब ग्रहण लग गया जब देश की आजादी के बाद इसका विभाजन होना तय हुआ। दस वर्ष का गुलशन अपने माता पिता के साथ अपने जन्मस्थान को छोड़ अपने देश लौट रहा था। सांप्रदायिक दंगे चरम पर थे। स्थिति इतनी भयावह थी कि रेलगाड़ियां यात्रियों को नहीं बल्कि लुटी कटी लाशों को सफर करा रही थीं। लेकिन सफर करना ही था, इसके सिवा और कोई रास्ता नहीं था लोगों के पास। गणेश का परिवार भी ऐसे ही हालातों से जूझ रहा था। उन्हें हिंदुस्तान आना था और इसके लिए उन्हें रेल में सवार होना ही पड़ा। ये बात वो भी जानते थे कि ये रेल नहीं मौत का द्वार है और हुआ भी वही। आगे जो हुआ वो उनके जाने मुताबिक ही था। गुलशन के सामने उसके पिता को तलवार से काट दिया गया और मां के सर में गोली मार उनकी हत्या कर दी गयी। 

ज़रा सोचिये उस समय कैसे भाव होंगे उस छोटे से बच्चे के चेहरे पर जिसने अभी अभी अपने माता और पिता को बेरहमी से मौत के घाट उतरते देखा हो। हालांकि रहम बच्चों पर भी नहीं की जा रही थी लेकिन नियति ने उसे बचाना था, किसी भी हाल में। और हुआ भी ऐसा ही वो बचता बचाता जयपुर आ गया। यहां गुलशन की बहन रहती थी। गुलशन की परवरिश बहन ने ही की। ग्रेजुएशन के बाद उसे रेलवे क्लर्क की नौकरी मिल गयी। पहले नियुक्ति हुई कोटा में लेकिन उसे आगे जाना था। नियति ने उसे शेखपुरा से बाहर कोटा में बस कर रेलवे क्लर्क की नौकरी करने के लिए नहीं निकला था। बचपन से अब तक के कठिन सफर के बीच गुलशन से जो एक चीज नहीं छूटी थी वो थी लिखने की आदत। और ये आदत धीरे धीरे उसका जुनून बन गयी थी और कहते हैं जुनून से चाही जाने वाली हर चीज से मिलाने में ईश्वर जरूर मदद करता है। 

गुलशन की मदद भी ईश्वर ने कुछ इस तरह की कि उसका ट्रांसफर मायानगरी मुंबई में हो गया। यहां उसकी चाहतों को पंख लग गए। लेकिन कहीं न कहीं ये नौकरी उसके पैरों की जंजीर बन कर उसे उड़ने से रोक रही थी। लेकिन गुलशन को उड़ना था इसीलिए उसने जंजीरों को तोड़ दिया। नौकरी के दौरान वो अपने लिखे गीतों को ले कर संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के दफ्तर के चक्कर लगाया करता था। आखिरकार सन 1957 में उसकी मेहनत रंग लाई और उसे कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशक में रवींद्र दवे की फिल्म सट्टा बाजार में गीत लिखने का पहला मौका मिला। फिल्म तो उतनी न चल पाई लेकिन उनका लिखा गीत 

"तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे, मोहब्बत की राहों में मिल कर चले थे

भुला दो मोहब्बत में हम तुम मिले थे, सपना ही समझो कि मिल कर चले थे।“ बेहद लोकप्रिय हुआ। 

गुलशन कुमार मेहता का सफर इसी फिल्म तक था, इसके बाद समय था गुलशन बावरा के छा जाने का। इसी फिल्म के बाद शेखपुरा का वो बच्चा जिसने बचपन में ही वो दिन देख लिए जो कोई इंसान अपनी पूरी जिंदगी में नहीं देखना चाहेगा, बावरा नाम से अपनी कामयाबी के शिखर के रास्ते पर बढ़ चला। हुआ कुछ ऐसा कि फिल्म सट्टा बाजार तो इतनी नहीं चली लेकिन फिल्म के वितरक शांतिभाई पटेल गुलशन जी के काम से खासे खुश हुए। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि इतनी कम उम्र में गुलशन इतना गहरा दर्द लिख पाएंगे। लेकिन जब गीत सामने आया तो उन्हें बेहद आश्चर्य और खुशी हुई। रंग-बिरंगी शर्ट पहनने वाले लगभग 20 साल के युवक को देखकर उन्होंने कहा था कि- "मैं इसका नाम गुलशन बावरा रखूँगा। यह बावरे (पागल व्यक्ति) जैसा दिखता है।" इसके बाद से गुलशन कुमार मेहता फिल्म जगत में गुलशन बावरा के नाम से प्रचलित हो गये। इस फिल्म में गुलशन जी के लिए खास ये रहा कि फ़िल्म प्रदर्शित होने पर उसके पोस्टर्स में सिर्फ़ तीन लोगों के नाम प्रमुखता से प्रदर्शित किए गए थे। एक फ़िल्म के निर्देशक रविंद्र दवे, संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी और बतौर गीतकार गुलशन बावरा।

लेकिन अभी गुलशन जी को उनकी मंजिल मिली नहीं थी। मशक्कतें आगे भी जारी रहीं। अपने कठिन समय में उन्होंने कई फिल्मों में छोटे मोटे अभिनय कर के भी अपना गुजरा किया। उनके जिस गीत ने पूरे भारत में उनके नाम का सिक्का जमा दिया, उसके लिए सारा श्रेय उनकी गुड्स क्लर्क की नौकरी को देना उचित जान पड़ता है। दरअसल रेलवे के मालवाहक विभाग में गुलशन बावरा अक्सर पंजाब से आई गेहूं से लदी बोरियां देखा करते थे और इस अनाज को देख कर उनके मन में उस देश की उस धरती का खयाल आया जो ऐसा सोना उगलती है जिसके बिना इंसान का जीवन चल पाना नामुमकिन है। इस तरह उन्होंने लिख दिया ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती, मेरे देश की धरती’ जैसा वो गीत जो अमर हो गया। 

जब उन्होंने अपने मित्र मनोज कुमार को ये पंक्तियां सुनाईं तो उसी समय मनोज जी ने इसे अपनी फिल्म 'उपकार' के लिए चुन लिया। इस गीत के लिए उन्हें सन 1967 में सर्वश्रेष्ठ गीत का 'फ़िल्मफेयर पुरस्कार' दिया गया। कहते हैं कि गुलशन बावरा ने यह गीत राज कपूर की फिल्‍म 'जिस देश में गंगा बहती है' के लिए लिखा था। यह गीत राज कपूर को पसंद भी आया था, लेकिन तब तक वे शैलेंद्र के गीत "होंठों पे सच्‍चाई रहती है, जहां दिल में सफाई रहती है" को फाइनल कर चुके थे। आखिरकार मनोज कुमार ने 'उपकार' में इसका प्रभावशाली उपयोग किया।

सही माएने में फ़िल्म 'उपकार' के इस गीत ने गुलशन बावरा को भारत की जनता से जोड़ दिया। सत्तर की शुरुआत में सबसे पहले 1974 में फ़िल्म 'हाथ की सफाई' में लता मंगेशकर द्वारा गाए उनके गीत "तू क्या जाने बेवफ़ा।।" और "वादा कर ले साजना।।।" बेहद लोकप्रिय रहे। फिर 1975 में आई फ़िल्म 'जंजीर' में उनके गीतों- "दीवाने हैं दीवानों को ना घर चाहिए।।।" और "यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िदगी।।।।" ने पूरे देश में धूम मचा दी। इन दोनों ही फ़िल्मों का संगीत कल्याणजी-आनंदजी ने दिया था। 

गुलशन बावरा ने किसी एक रंग को पसंद कर के उसे ही पकड़े बैठे न रहे बल्कि उन्होंने हर रंग के साथ प्रयोग किया और बेहद शानदार परिणाम दिया । उनके लिखे गीतों में 'दोस्ती, रोमांस, मस्ती, गम' आदि विभिन्न पहलू देखने को मिलते हैं। 'जंजीर' फिल्म के लिए उनका लिखा गीत 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िन्दगी' आज भी दोस्ती में एक कहावत की तरह प्रयोग किया जाता है, वहीं 'दुग्गी पे दुग्गी हो या सत्ते पे सत्ता' गीत मस्ती के आलम में डूबा हुआ है, 'खुल्ल्म खुल्ला प्यार करेंगे', 'कसमें वादे निभाएंगे हम', आदि गीत जवां दिलों को खूब भाते हैं। इसी तरह उनके पास हर मौके के लिए गीत था। उन्होंने संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में 69 गीत लिखे और आर। डी। बर्मन के साथ 150 गीत लिखे। पंचम दा गुलशन बावरा जी के पड़ोसी थे। पंचम दा के साथ उनकी कई यादें जुड़ी हुई थीं। इन यादों को गुलशन बावरा ने 'अनटोल्ड स्टोरीज' नाम की एक सीडी में संजोया था। इसमें उन्होंने पंचम दा की आवाज़ रिकार्ड की थी और कुछ गीतों के साथ जुड़े किस्से-कहानियां भी प्रस्तुत किये थे।

गुलशन बावरा दिखने में दुबले-पतले शरीर के थे। बावरा ने बचपन में जिन परिस्थितियों को झेला उन्हें कभी अपने गीतों या स्वाभाव पर हावी नहीं होने दिया। उनका व्यक्तित्व हंसमुख था। वे कवि से ज्यादा कॉमेडियन दिखाई देते थे। इस गुण के कारण कई निर्माताओं ने उनसे अपनी फ़िल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएँ भी अभिनीत करवायीं। विभाजन का दर्द उन्होंने कभी जाहिर नहीं होने दिया। दोस्तों में पंचम दा के नाम से प्रचलित राहुल देव बर्मन उनके करीबी मित्र थे। एक तरह से राहुल जी का संगीत कक्ष एक तरह की सर्कस थी, जहां प्राय: सभी मित्रों की बैठक होती थी और खूब ठहाके लगाये जाते थे। गुलशन बावरा उस सर्कस के स्थायी 'जोकर' थे। 

इसी जगह से उनकी मित्रता किशोर कुमार से हुई। फिर क्या था अब तो दोनों लोग मिलकर हास्य की नई-नई स्तिथियाँ गढ़ते थे। गुलशन बावरा को उनके अंतिम दिनों में जब 'किशोर कुमार' सम्मान के लिए चुना गया तो उनके चहरे पर अद्भुद संतोष के भाव उभरते दिखाई दिए। उनके लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्षण था। एक तरफ़ यह पुरस्कार उनके लिए विभाजन की त्रासदी से लेकर जीवन पर्यंत किये गए संघर्ष का इनाम था, दूसरी ओर अपने पुराने मित्र की स्मृति में मिलने वाला पुरस्कार एक अनमोल तोहफे से कम नहीं था।

सारा जीवन गुलशन बावरा चुस्त-दुरुस्त रहे। कोई बीमारी न हुई। सुबह-शाम घूमने निकल जाया करते थे। रात को समय पर खाना खाकर सो जाते थे। उनकी पत्नी अंजू उनका बड़ा ख्याल भी रखती थीं। डॉक्टर्स हमेशा स्वस्थ रहने के लिए ऐसी आदतें अपनाने की सलाह देते हैं लेकिन इस तरह की जीवनशैली के बाद भी गुलशन बावरा कैंसर की चपेट में आगये और इस भनक बीमारी ने देखते ही देखते उनके जीवन को अचानक ऐसा संक्षिप्त कर दिया कि वे छः महीने के बीतर चल बसे। 7 अगस्त, 2009 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा। उनकी इच्छानुसार उनके पार्थिव शरीर को जे। जे। अस्पताल को दान कर दिया गया। हिन्दी सिनेमा ही नहीं हिन्दी साहित्य भी गुलशन बावरा जी के अद्भुद योगदान को कभी नहीं भूल पायेगा।

गुलशन बावरा ने एक साक्षात्कार में कहा था- "मैं गाने लिख-लिखकर रखता था। फिर कहानी सुनने के बाद सिचुएशन के अनुसार गीतों का चयन करता था। कहानी के साथ चलना ज़रूरी है तभी गाने हिट होते हैं। आज किसे फुर्सत है कहानी सुनने की? और कहानी है कहाँ? विदेशी फ़िल्मों की नकल या दो-चार फ़िल्मों का मिश्रण। कहानी और विजन दोनों ही गायब हैं फ़िल्मों से।" गुलशन जी आज के गीत-संगीत से भी विचलित थे। वे कहा करते थे- "गीतों में भावना नहीं है और संगीत में आत्मा। पहले श्रोताओं को ध्यान में रखकर रचना बनती थी। आजकल दर्शकों को जेहन में रखा जाता है। उस जमाने में गीत-संगीत और दृश्यों का उम्दा तालमेल होता था। आजकल मात्र दृश्यों को प्रभावी बनाया जाता है। पंजाबी फ़िल्म 'पुन्नो' में बतौर नायक अभिनय कर चुके गुलशन फ़िल्मों में और अधिक लेखन करना चाहते थे, किन्तु इस शर्त पर कि डायरेक्टर और फ़िल्म अच्छी हो। अंतिम वक्त में उनकी पीड़ा थी- "अब हमें पूछने वाला कौन है? जो प्रतिष्ठा और सम्मान मैंने पुराने गीतों को रचकर हासिल किया था, क्या वह आज चल रहे सस्ते गीत और घटिया धुनों के साथ बरकरार रखा जा सकता है?" लेखन से उनका रिश्ता आजीवन जुड़ा रहा। चाहे फ़िल्मों के लिए नहीं, अपने रचनाकार मन के लिए ही सही। नई फ़िल्मों पर उनकी तल्ख टिप्पणी कि "मेरी बर्दाश्त से बाहर हैं नई फ़िल्में" सोचने को विवश करती हैं।

गुलशन जी के प्रसिद्ध गीतों में शामिल हैं-

तुमको मेरे दिल ने पुकारा है

किसी पे दिल अगर आ जाए तो क्या होता है

सनम तेरी कसम

आती रहेंगी बहारें

यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी

मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती

हमें और जीने की चाहत न होती, अगर तुम न होते

तू तो है वही

कसमे वादे निभाएंगे हम

वादा कर ले साजना

पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए

दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए

प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया

कितने भी तू कर ले सितम

धीरज झा 

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Qisson Ka Kona | Kisson Ka Kona: 'गुलशन बावरा' वो गीतकार जिसने अपने दर्द को गीतों की शक्ल देना सीखा और बच्चे बच्चे की जुबान पर छा गया
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