पिनक बाबा का सांप (कहानी)

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"का हो सुखन, भोरे भोरे लोटकी ले के बड़ा एहर ओहर हो ता । गंड़झरी ध ले ले बा का ?" दुआर पर बैठे दतुअन कर रहे पिनक बाबा ने सुखन को छेड़ते हुए कहा  । बाबा गांव के खिलौना हैं । दिन की शुरुआत से गांव के सोने तक ये लोगों को छेड़ते हैं और लोग इन्हें । क्या बूढ़े क्या बच्चे सब इनके समतुरिया मित्र लगते हैं । ना ये किसी की बात का गुस्सा करते हैं ना कोई इनकी बात का । 

"न हो बाबा, दूध खोज रहे हैं ।" सुखन सामने पड़ी चौकी पर ऐसे बैठा जैसे कोसों चल के आया हो ।

"काहे हो, हेरा गया है का ?" कुल्ला करते हुए बाबा ने फिर से मस्खरी की । सुखन कोई साधू संत नहीं है बस अभी थोड़ा व्यस्त है इसलिए बाबा की मस्खरियों पर ध्यान नहीं दे रहा वर्ना अभी तक तो यहां ऐसे ऐसे शब्दबाण छूट रहे होते कि आधा गांव काम काज छोड़ के जुट जाता इनकी बहस सुनने । 

"बै मरदे दूधो हेराता है का ?" 

"कह रहे खोज रहे हैं, हमको लगा हेरा गया होगा ।" 

"मजाक के मूड नहीं है हमारा । रात बिलईया दूध के भोग लगा दी । आज है नागपचमी, लबा दूध चढ़ाने के लिए मिसिया भर दूध नहीं बचा है । ऊपर से खीर बनेगा । नागपचमी के चलते दूध के टान है एही खातिर भेंट नहीं रहा ।" सुखन ने बाबा को सारी राम कहानी सुना दी । 

सुखन को सुनने के बाद बाबा की आंखों में शरारत नाचने लगी । कुछ याद करते हुए बोले "पिछला मंगर के एक ठो धमिनिया मारे रहे ना ? ओई से पहिले एक ठो ढोंरिया ? आ आई सांप के लबा दूध चढ़ा के असिर्बाद लेना है ?" 

"ऊ दोसर बात है बबा । घर में घुसल सांप को मारे नहीं तो का करें ? किसी को काट ले तब ?" सुखन ने खईनी की डिबिया निकालते हुए अपनी सफाई पेश की । 

"कतना साल के हो सुखन ?" 

"मालूम नहीं लेकिन चालिस तड़प (पार करना) गया होगा । काहे पूछ रहे ?" 

"एतना उमिर में आज ले कहियो सुने हो कि कोनो बिसधर बिना मतलब केकरो के काटा हो ? एक ठो आदमिये अइसा जानवर है जो बिना बात हमला करता है बाकी अउरो कोनो नहीं है अइसा ।" बाबा गमछा से मुंह हाथ पोछते हुए बोले । 

"रखा अपन गेयान अपना पास । हम जा रहे हैं दूध खोजने ।" ये नई बात नहीं है । सुखन के पास जब किसी बात का जवाब नहीं होता तो उसे काम याद आ जाता है । इधर बाबा उसे ऐसे जाता देख ठहाका मार के हंसने लगे । 

"ए मरदे सीधा कह दो कि खीर खाने खातिर मन पगलाया है काहे सांप के नाम ले रहे हो जी ।" बाबा हँसते हुए बोले और सुखन पैर पटकता हुआ भागा । बाबा को सुखन पर तबसे चिढ़ थी जबसे उसने दो सांपों को मारा था । सांपों के लिए इंसान से चिढ़ने वाली बात हजम नहीं होती ना ? लेकिन बाबा के पास इसके लिए बड़ी वजह है । 

बाबा को सांप बहुत प्रिय हैं । लोग एक विशेष दिन चुनते हैं सांपों को दूध चढ़ाने का लेकिन बाबा रोज एक बाटी दूध बेढ़ी के पीछे रख आते हैं । अब चाहे उसे कोई बिल्ली पी जाए या फिर सांप । ये आदत उन्हें बचपन से ही है । एक बार नागपंचमी को ही इनकी अम्मा ने विषधर को दूध चढ़ाने के बारे में बताया था तबसे जब मौका मिलता ये कोठी के पीछे दूध रख आते । ये सिलसिला चलता रहा । कभी कभी बाबा खुद नहीं समझ पाते कि वो ऐसा क्यों करते हैं । 

फिर कुछ ऐसा हुआ जिसने समझा दिया कि सांपों को दूध पिलाना बेवजह नहीं था । एक बार फसाद हुआ था गांव में । बंठा पहलमान जो विरोधी पक्ष का अगुआ था और बाबा अपने पक्ष के । छोटे से विवाद के साथ शुरू हुआ मामला काफ़ी बढ़ गया था । बंठा अपनी क्रूरता के लिए प्रसिद्ध था । 

कहते हैं नेपाल किसी काम से गया था वहां किसी से झगड़ा हो गया तो उसकी गर्दन पर चढ़ गया । सामने वाला जब तक मर नहीं गया तब तक बंठा का पैर उसकी गर्दन से नहीं हटा । किसी की जान लेते हुए ज़रा नहीं सोचता था बंठा । 

मामले को जीवन मरन के सवाल तक पहुंचता देख बाबा ने बातचीत कर इसे ठंडा करने का मन बनाया । सबने मना किया कि बंठा किसी की नहीं सुनेगा, लेकिन बाबा नहीं माने । बाबा जानते थे कि अगर सबके सामने बात हुई तो बात और बेहाथ हो जाएगी इसीलिए उन्होंने बंठा को अकेले ही मिलने बुलाया । इस बात की खबर किसी को नहीं थी । बंठा के स्वभाव को बाबा अच्छे से जानते थे लेकिन एक ज़माने में बंठा उनका जिगरी हुआ करता था इस नाते उन्हें यकीन था कि बंठा से उन्हें कोई खतरा नहीं है । 

रात को अंधेरा घिरने के बाद बंठा बाबा के दलान में पहुंचा । बाबा अकेले थे । पूरा गांव अंधेरे की चादर ताने नींद खींच रहा था । दलान के आसपास भी कोई ना था  । बाबा ने बात शुरू की "देखा बंठा, ई सबसे कोनो लाभ नहीं मिलने वाला । बेकार में लोग सबके जान माल आ काम काज के नुक्सान होगा । बच्चा सबके बात है इसको बढ़ाने से का फायदा ?" 

"हो पिनक, बात अब फायदा नुक्सान के नहीं रह गया मरदे । बात है अपना इज्जत के । बंठा के का इज्जत रह जाएगा अगर हम समझौता कर लिए । जानते हो न पिनक, समझौता ऊ सब करता है जेकरा करेजा में लड़े के दम ना बचा हो । हम त कहते हैं तुम्हो साइड हो जाओ । तोहरा कारन ही बलदेओ आ ओकर लरिका बचा है ।" बंठा ने इतना कहते हुए अपने कुर्ते की आस्तीन को चढ़ा लिया । 

"ई त ना होई बंठा । ना हम पीछे हटब आ ना ई लड़ाई होए देब । हम पूरा गांव के समझाएंगे । तुम्हारा इज्जत के राग के खातिर गांव के बलि नहीं चढ़ने देंगे ।" बाबा भी अपनी बात पर अड़ गए जो बंठा को बिल्कुल पसंद नहीं आई । उसकी आंखों में क्रोध नाचने लगा । घमंडी के घमंड पर हुआ वार उसे आदमखोर बना देता है । 

वो पहले ही सोच कर आया था कि अगर बाबा नहीं माने तो उसे क्या करना है । ऊपर से बाबा के जवाब ने उसका गुस्सा भड़का दिया सो अलग । वो उठा और उसने बाबा को अपनी भुजाओं में कस के जकड़ लिया । बाबा की हड्डियां तड़तड़ाने लगीं । बाबा हमेशा से दुबले पतले रहे हैं । एक पहलमान की भुजाओं के पाश से निकलना उनके बस की बात नहीं थी । 

उनकी आंखों से बह रहे आंसू उसकी जान जाने के भय से ज़्यादा भरोसा टूटने की पीड़ा के गवाह थे । बाबा छटपटाते रहे, उनकी आंखों के सामने अपने परिवार से लेकर बलदेओ का परिवार तक नाचने लगा । उन्हें पता था कि अब बंठा किसी को नहीं छोड़ेगा । हार कर बाबा ने इसे ही अपना अंजाम मान लिया । उन्होंने हमेशा के लिए आंखें बंद करने के लिए पलकें गिरायी ही थीं कि एक ज़ोरदार चीख के साथ बंठा के भुजाओं की पकड़ ढीली होने लगी । 

कुछ ही पलों में उसकी भुजाओं से छूट कर बाबा ज़मीन पर गिर पड़े और साथ ही बंठा भी गिर पड़ा । कुछ देर तड़पने के बाद बंठा की सांसें रुक गईं । बाबा ने देखा कि एक सांप बंठा की भारीभरकम देह के पीछे से निकला और उनके सिर के पास से उन्हें छूता हुआ उसी बेढ़ी के पीछे चला गया जहां बाबा दूध रखा करते थे । जब बाबा उस जकड़न की पीड़ा और इस सदमे से बाहर आए तो शोर मचा कर सबको बुलाया । 

बंठा मर चुका था और उसके साथ ही विवाद भी खत्म हो गया था । बंठा की इस तरह से मौत हर किसी के लिए आश्चर्य की बात थी । बाबा ने कभी किसी को नहीं बताया कि उस रात आखिर हुआ क्या था । सबको बस यही पता था कि बंठा बाबा से मिलने आया था जहां उसे सांप ने काट लिया । अगर वो सबको सच बता देते तो बंठा के बाद बाबा के पक्ष में खड़े लोग दूसरे पक्ष वालों पर हावी होने की कोशिश करते । लेकिन बाबा तो शांति चाहते थे जो आज तक गांव में बनी हुई है । 

उस दिन के बाद बाबा का सांपों के प्रति सम्मान कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया । उनके सामने कोई भी सांपों को मारने की हिम्मत नहीं करता । और अगर उनके पीठ पीछे कोई सांप मार दे तो बाबा उसे इतना जलील करते हैं कि फिर वो दोबारा कभी ऐसा करने से पहले 10 बार सोचता । बाबा मानते हैं कि अगर आप सांपों के साथ सही हैं तो उनसे बड़ा रखबार और कोई नहीं । 

आप सबको नागपंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🙏

धीरज झा

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Qisson Ka Kona | Kisson Ka Kona: पिनक बाबा का सांप (कहानी)
पिनक बाबा का सांप (कहानी)
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